साहित्य – महाभारतक एक कथा
– सी. राजगोपालाचारी
देवयानीक विवाह
एक बेर गर्मीक दुपहरिया दिन, वन मे खेल-कुद सँ थाकल देवयानी आ असुर सभक राजा वृषपर्वाक बेटी सब एकटा जंगली पोखरिक ठंढ़ा पानि मे नहाय गेलिह, आर पानि मे पैसय सँ पहिने ओ सब अपन माला केँ महाड़ (किनार) पर राखि देलिह । तेज हवा हुनका लोकनिक कपड़ा केँ एक्के बेर मे उड़ा देलक – आर जखन ओ सब ओकरा फेर सँ उठाबय अयलिह, त स्वाभाविक रूप सँ किछु गलती भेलैक । एना भेलैक जे राजाक बेटी राजकुमारी शर्मिष्ठा देवयानीक कपड़ा पहिरि लेलिह । देवयानी केँ ई देखिकय तामश चढ़लनि जे शिष्यक बेटी गुरुक बेटीक कपड़ा कियैक पहिरलनि । देवयानी मज़ाक मे कहि देलनि जे शिष्यक बेटी गुरुक बेटी केर कपड़ा कियैक पहिरलिह । ई शब्द लगभग मज़ाक मे कहल गेल छलैक, लेकिन राजकुमारी शर्मिष्ठा बहुते क्रोधित भ’ गेलिह आ अहंकारपूर्वक बजलिह : “कि तोरा नहि पता छौक जे तोहर पिता हरेक दिन हमर शाही पिताक सोझाँ विनम्रतापूर्वक झुकल करैत छथि ? कि तूँ एकटा भिखारीक बेटी नहि थिकेँ जे हमर पिताक देल दान पर जिबैत अछि ? तूँ बिसरि जाइ छँ जे हम ओहि शाही वंश सँ छी जे गर्व सँ दैत अछि – जखन कि तूँ एक एहेन वंश सँ छँ जे माँगैत अछि आर लैत अछि – आर तूँ हमरा सँ एना बजबाक हिम्मत करैत छँ ?” शर्मिष्ठा बाजैत रहल, आर ओ आरो बेसी तमसाइत चलि गेल, जाबत धरि ओ क्रोध मे आबिकय अन्ततः देवयानीक गाल पर एक चमेटा नहि मारैछ तथा ओकरा एकटा सुखायल इनार मे धकेलि दैत अछि । असुर युवती सब सोचलक जे देवयानी अपन जान गमा देलक आ ओ सब महल दिश घुरि गेल ।
देवयानी इनार मे खसिकय मरल नहि छल, लेकिन ओ दयनीय अबस्था मे छल कियैक तँ ओ ऊँच ढलान पर नहि चढ़ि सकैत छल । भरत वंशक सम्राट ययाति जे जंगल मे शिकार कय रहल छलथि, एकटा सुखद संयोग सँ अपन प्यास मिझेबाक लेल ओहि स्थान पर अयलाह । जखन ओ इनार भीतर तकलनि त हुनका किछु चमकैत चीज देखाय देलकनि आ नजदीक सँ देखला पर हुनका आश्चर्य भेलनि जे इनार मे एकटा सुन्दर युवती पड़ल अछि ।
ओ पुछलनि: “हे सुन्दर युवती, जेकर कान मे चमकैत कुंडल आर नह लाल अछि, अहाँ के छी ? अहाँ इनार मे केना खसि पड़लहुँ अछि ?”
ओ उत्तर देलिह, “हम शुक्राचार्यक पुत्री छी । अहाँ केँ नहि पता जे हम इनार मे खसि पड़ल छी । हमरा उठाउ ।” आर ओ अपन हाथ आगू बढ़ा देलिह । ययाति हुनकर हाथ पकड़ि लेलनि आ हुनका इनार सँ बाहर निकालि देलनि ।
देवयानी असुर लोकनिक राजाक राजधानी मे वापस नहि जाय चाहैत छलिह । ओ ओतय गेनाय सुरक्षित नहि बुझैत छलिह, कियैक तँ बेर-बेर शर्मिष्ठाक आचरण पर ओ विचार कय रहल छलिह । ओ ययाति सँ कहलनिः “अहाँ एकटा युवतीक दाहिना हाथ पकड़ि रखने छी, आर अहाँ केँ ओकरा सँ विवाह करबाक चाही । हमरा लगैत अछि अहाँ सब तरहें हमर पति बनबाक योग्य छी ।”
ययाति उत्तर देलनि: “हम अहाँ सँ प्रेम करैत छी, हम क्षत्रिय छी आर अहाँ ब्राह्मण कन्या छी । हम अहाँ सँ केना विवाह कय सकैत छी ? शुक्राचार्यक पुत्री, जे समस्त जगत केर गुरु हेबाक योग्य छथि, हमरा जेहेन क्षत्रियक पत्नी केना बनि सकैत छथि ? हे पूज्य महिला, घर लौटि जाउ ।” ई शब्द कहिकय ययाति अपन राजधानी वापस चलि गेलाह ।
प्राचीन परम्पराक मुताबिक क्षत्रिय कन्या ब्राह्मण सँ विवाह कय सकैत छलथि, लेकिन ब्राह्मण कन्याक क्षत्रिय सँ विवाह करब गलत मानल जाइत छल । महत्वपूर्ण बात ई छल जे महिला लोकनिक नस्लीय स्थिति केँ कम नहि होबय देल जाय । ताहि लेल अनुलोम या उच्च जातिक पुरुष सँ विवाह करबाक प्रथा वैध छल आर एकर विपरीत प्रथा, जेकरा प्रतिलोम केर रूप मे जानल जाइत अछि, अर्थात निम्न जातिक पुरुष सँ विवाह करब, शास्त्र द्वारा निषिद्ध छल ।
देवयानीक घर लौटबाक कोनो मन नहि छलन्हि । ओ जंगले मे एकटा गाछक छाया मे दुःख मे डूबल बैसल रहली ।
शुक्राचार्य देवयानी केँ अपन प्राणों सँ बेसी स्नेह करैत छलथि । अपन सहेली सभक संग खेलाय गेलिह आ अपन पुत्रीक लौटबाक बहुत दिन धरि व्यर्थ इन्तजार कयलाक बाद, ओ एकटा स्त्री केँ हुनका ताकय लेल पठौलनि । थाकल-हारल खोजक बाद ओ दूत (महिला) अंततः ओहि गाछ लग पहुँचलति, जेतय देवयानी अत्यन्त उदास भ’ बैसल छलथि, हुनकर आँखि तामश आ दुःख सँ लाल छलन्हि । आर ओ हुनका सँ पुछलनि जे कि भेल छल ।
देवयानी कहलनि: “सखी, तुरन्त जाकय हमर पिता सँ कहू जे हम वृषपर्वाक राजधानी मे पैर नहि राखब” आर ओ हुनका शुक्राचार्य लग वापस पठा देलिह ।
अपन पुत्रीक दुखद स्थिति सँ अत्यन्त दुःखी भ’ कय शुक्राचार्य हुनका लग पहुँचलथि ।
हुनका दुलार करैत ओ कहलनि: “मनुष्य अपन नीक या बेजा कर्मक कारणे सुखी या दुःखी होइत अछि । दोसरक गुण या दोष हमरा सब केँ कनिकबो प्रभावित नहि करैछ ।” एहि ज्ञानपूर्ण शब्द सब सँ ओ हुनका सांत्वना देबाक कोशिश कयलनि ।
ओ दुःख आर क्रोध मे उत्तर देलिह : “पिताजी, हमर गुण-दोष केर त बाते छोड़ि दियौक, जे कि आखिर हमरहि अपन चिन्ता छी । लेकिन हमरा ई बताउ – कि वृषपर्वाक पुत्री शर्मिष्ठा ठीके कहने छल जे अहाँ राजाक प्रशंसा करयवला एकटा दरबारी गायक छी ? ओ हमरा चापलूसी सँ प्राप्त दान पर पलयवाली एकटा भिक्षुकक बेटी कहने छल । एहि अहंकारी अपमान सँ संतुष्ट नहि भ’ ओ हमरा थापड़ सेहो मारलक आ लगहि एकटा खधारि (इनार) मे फेकि देलक । हम ओकर पिताक क्षेत्र मे कहियो कतहु नहि रहि सकैत छी ।” आर देवयानी कानय लगलिह । शुक्राचार्य गर्व सँ अपन माथ उपर उठौलनि आ कहलनि, “देवयानी, अहाँ कोनो दरबारी गायकक बेटी नहि छी । अहाँक पिता चापलूसीक मजदूरी नहि जिबैत छथि । अहाँ एक एहेन व्यक्तिक बेटी छी, जेकर भरि संसार सम्मान करैत अछि । देवता लोकनिक राजा इन्द्र केँ सेहो ई बात पता छन्हि आ वृषपर्वा केँ सेहो हमरा प्रति अपन कर्जक पता छैक । लेकिन कोको योग्य व्यक्ति अपन गुण सभक बखान नहि करैत अछि आर हम अपना बारे मे किछु कहब । उठू, अहाँ महिला सब मे अद्वितीय रत्न छी, अपन परिवार मे समृद्धि अनैत छी । धैर्य राखू । चलू घर चलैत छी ।”
एहि संदर्भ मे भगवान व्यास शुक्राचार्य द्वारा अपन पुत्री केँ संबोधित निम्नलिखित शब्द मे मानव केँ सामान्य रूप सँ सलाह देलनि अछि:
“ओ संसार केँ जीत लैत अछि, जे अपन पड़ोसीक दुर्व्यवहार केँ धैर्यपूर्वक सहन कय लैत अछि । जे अपन क्रोध केँ नियंत्रित करैत अछि, जेना घोड़सवार अनियंत्रित घोड़ा केँ तोड़ि दैत अछि, से वास्तव मे सारथी छी, नहि कि ओ जे केवल लगाम धरैत अछि आ घोड़ा केँ जेम्हर जेबाक छैक से जाय दैत अछि । जे अपन क्रोध केँ साँप जेकाँ त्यागि दैत अछि, से सच्चा वीर छी । जे दोसर द्वारा देल गेल पैघ सँ पैघ पीड़ाक बादो विचलित नहि होइछ, से अपन लक्ष्य केँ प्राप्त करैत अछि । जे कखनहुँ क्रोध नहि करैछ, ओ ओहि कर्मकांडी सँ श्रेष्ठ अछि जे शास्त्र द्वारा निर्दिष्ट यज्ञ केँ सौ वर्ष धरि निष्ठापूर्वक करैत अछि । जे लोक क्रोध केँ अपनाबैत अछि, ओकरा सेवक, मित्र, भाइ, पत्नी, बच्चा, सदाचार आर सत्य त्यागि दैत छैक । बुद्धिमान व्यक्ति लड़का-लड़की सभक बात पर ध्यान नहि दैछ ।”
देवयानी विनम्रतापूर्वक अपन पिता सँ कहलिह: “हम वास्तव मे एकटा छोट लड़की छी, मुदा, हमरा आशा अछि जे अहाँक द्वारा सिखायल गेल महान सत्य सँ लाभ लेबाक लेल हम ओतेक छोटो नहि छी । तैयो, एहेन लोकक संग रहनाय उचित नहि अछि, जेकरा मे शालीनता आ शिष्टाचार केर कोनो भाव नहि छैक । बुद्धिमान लोक ओहि लोक सभक संग संगति नहि करत जे ओकर परिवारक बारे मे खराब बजैत-सोचैत छैक । ओ चाहे कतबो धनिक कियैक नहि हो, खराब आचरण के लोक वास्तव मे जातिक दायरा सँ बाहरक चांडाल छी । पुण्यात्मा लोक केँ ओकरा संग नहि मिलबाक चाही । वृषपर्वाक बेटीक ताना सँ उत्पन्न क्रोध सँ हमर मन जरि रहल अछि । हथियार सँ लागल घाव समयक संग भरि सकैत अछि; पपड़ी धीरे-धीरे ठीक भ’ सकैत छैक; लेकिन शब्द सँ लागल घाव जा धरि जीवित रहैत अछि, ताबत धरि पीड़ादायक रहैत अछि ।”
शुक्राचार्य वृषपर्वा के पास गेलाह आर हुनका उपर अपन दृष्टि गम्भीरतापूर्वक जमबैत कहलाह:
“हे राजन, भले ही कोनो पापक तुरन्त दण्ड नहि भेटय, मुदा ओ अवश्ये टा, देर-सबेर, समृद्धिक बीज केँ नष्ट कय दैत अछि । बृहस्पतिक पुत्र कच ब्रह्मचारी छल, जे अपन इन्द्रिय सबपर विजय प्राप्त कय लेने छल आर कहियो कोनो पाप नहि कएने छल । ओ निष्ठापूर्वक हमर सेवा कयलक आ कहियो धर्मक मार्ग सँ विचलित नहि भेल । अहाँक सेवक सब ओकरा मारबाक प्रयास कयलनि । हम ओ सहन कयलहुँ । हमर पुत्री, जे अपन मान केँ बहुत मानैत अछि, ओकरा अहाँक पुत्री द्वारा कहल गेल अपमानजनक शब्द सुनय पड़लैक । एकर अलावा, अहाँक पुत्री ओकरा इनार मे धकेलि देलकैक । ओ आब अहाँक राज्य मे नहि रहि सकैत अछि । ओकरा बिना हमहुँ आब एतय नहि रहि सकैत छी । हम अहाँक राज्य सँ बाहर जा रहल छी ।”
एहि शब्द सँ असुर लोकनिक राजा बहुत व्याकुल भ’ गेलाह आ कहला : “हम अपन द्वार पर लगायल गेल अभियोग सब सँ अनभिज्ञ छी । यदि अहाँ हमरा त्यागि देब, त हम अग्नि मे प्रवेश कय केँ मरि जायब ।”
शुक्राचार्य उत्तर देलथिन, “हम अहाँ आ अहाँक असुर लोकनिक भाग्य सँ बेसी अपन पुत्रीक सुख केर चिन्ता करैत छी, कियैक त वैह टा हमरा पास एकमात्र वस्तु अछि जे हमरा प्राणों सँ बेसी प्रिय अछि । यदि अहाँ ओकरा प्रसन्न कय सकी, त नीक होयत । अन्यथा हम चलि जाइत छी ।” वृषपर्वा और हुनकर अनुचर ओहि वृक्ष लग गेलाह, जेकर नीचाँ देवयानी ठाढ़ छलिह आर ओ सब प्रार्थना मे स्वयं केँ हुनकर चरण मे समर्पित कय देलनि । देवयानी जिद्दी रहथि आ बजलिहः “शर्मिष्ठा जे हमरा बतेलक कि हम एकटा भिखारीक पुत्री छी, ओ हमर दासी बनत आ हमर पिता जाहि घर मे हमर विवाह करता, ओतय हमर सेवा करत ।” वृषपर्वाक सहमति लेबाक वास्ते ओ अपन सेवक से अपन पुत्री शर्मिष्ठा केँ अनबाक लेल कहलनि । शर्मिष्ठा अपन गलती स्वीकार कयलक आर सिर झुकाकय प्रणाम कयलक । ओ कहलक : “जेना हमर सखी देवयानी चाहैत अछि, ओहिना हो । हमर पिता हमरा द्वारा कयल गेल कोनो दोषक कारण अपन गुरु केँ नहि हारता । हम हुनकर अनुचर रहब ।” देवयानी शांत भ’ गेलिह आ अपन पिताक संग अपन घर लौटि गेलिह ।
एक अन्य अवसर पर सेहो देवयानी ययाति सँ भेटलिह । ओ अपन अनुरोध दोहरौलिह जे ओ हुनका अपन पत्नीक रूप मे स्वीकार करथि कियैक तँ ओ हुनकर दाहिना हाथ पकड़ि रखने छलाह । ययाति फेरो सँ अपनी आपत्ति दोहरौलनि जे ओ एकटा क्षत्रिय छथि आर विधिपूर्वक ब्राह्मण सँ विवाह नहि कय सकैत छथि । अंततः ओ दुनू गोटे शुक्राचार्य लग गेलथि आ विवाहक लेल हुनकर स्वीकृति प्राप्त कयलनि । ई प्रतिलोम विवाह केर एकटा उदाहरण भेल जेकर सहारा असाधारण अवसर सब पर लेल जाइत छल । निस्संदेह शास्त्र मे उचित आर अनुचित केर वर्णन अछि, लेकिन एक बेर विवाह भ’ गेलाक बाद ओ अमान्य नहि कयल जा सकैत छल ।
ययाति आर देवयानी कतेको दिन खुशी सँ बितेलनि । शर्मिष्ठा हुनका सभक संग परिचारिका रूप मे रहली । एक दिन शर्मिष्ठा गुप्त रूप सँ ययाति सँ भेटलिह आ हुनका सँ अपन पत्नीक रूप मे हुनको स्वीकार करबाक प्रार्थना कयलिह । ओ हुनकर प्रार्थना स्वीकार कय लेलनि आ देवयानीक जानकारी बिना हुनका सँ विवाह कय लेलनि ।
लेकिन देवयानी केँ ई बात पता चलि गेलनि आ ओ बहुते क्रोधित भेलिह । ओ अपन पिता सँ शिकायत कयलिह आ शुक्राचार्य क्रोध मे आबिकय ययाति केँ समय सँ पहिनहिं बुढ़ापाक श्राप दय देलनि ।
एहि प्रकारे ययाति, जे अपन युवावस्थाक चरम पर अचानक वृद्धावस्था सँ ग्रसित भ’ गेल छलाह, ओ एतेक विनम्रता सँ क्षमा मांगलनि जे शुक्राचार्य, जे कि देवयानी केँ इनार सँ निकालबाक घटना केँ बिसरल नहि छलथि, से आखिरकार मानि गेलथि ।
ओ कहलखिन: “हे राजन, अहाँ युवावस्थाक गौरव हरा देलहुँ । श्राप वापस नहि लेल जा सकैछ, लेकिन यदि अहाँ केकरो सँ अपन युवावस्थाक बदला अपन आयु देबाक लेल राजी कय सकब त ओ परिवर्तन प्रभावी भ’ जायत ।” एहि प्रकारे ओ ययाति केँ आशीर्वाद देलनि आर हुनका विदा कयलनि ।
सौजन्य: महाभारत, सी. राजगोपालाचारी द्वारा
The Marriage of Devayani
One warm afternoon, pleasantly tired with sporting in the woods Devayani and the daughters of Vrshaparva, king of asuras went to bathe in the cool waters of a sylvan pool, depositing their garlands on the bank before they entered its waters. A strong breeze blew their clothes together into a huddled heap – and when they came to take them up again, some mistakes naturally occurred. It so happened that princess Sarmishtha, the daughter of the king, clad herself in Devayani’s clothes. The latter was vexed and exclaimed half in jest at the impropriety of the daughter of a disciple wearing the clothes of the master’s daughter.
These words were spoken half in jest, but the princess Sarmishtha became very angry and said arrogantly: “Do you not know that your father humbly bows tin reverence to my royal father every day? Are you not the daughter of a beggar who lives on my father’s bounty? You forget I am of the royal race which proudly gives – while you come of a race which begs and receives – and you dare to speak thus to me?” Sarmishtha went on, getting angrier and angrier as she spoke till, working herself up into a fit of anger, she finally slapped Devayani on the cheek and pushed her into a dry well. The asura maidens thought that Devayani had lost her life and returned to the palace.
Devayani had not been killed by the fall into the well but was in a sad plight because she could not climb up the steep sides. Emperor Yayati of the Bharata race who was hunting in the forest by a happy chance came to this spot in search of water to slake his thirst. When he glanced into the well, he saw something bright, and looking closer, he was surprised to find a beautiful maiden lying in the well.
He asked: “Who are you, O beautiful maiden with bright ear-rings and ruddy nails? How did you fall into the well?”
She replied, “I am the daughter of Sukracharya. He does not know that I have fallen into the well. Lift me up.” and she held forth her hands. Yayati seized her hand and helped her out of the well.
Devayani did not wish to return to the capital of the king of the asuras. She did not feel it safe to go there, as she pondered again and again on Sarmishtha’s conduct. She told Yayati: “You have held a maiden by her right hand, and you must marry her. I feel that you are in every way worthy to be my husband.”
Yayati replied: “Loving you, I am a kshatriya and you are brahmana maiden. How can I marry you? How can the daughter of Sukracharya, who is worthy to be the preceptor of the whole world, submit to be the wife of a kshatriya like myself? Revered lady, return home.” Having said these words Yayati went back to his capital.
A kshatriya maiden could marry a brahmana according to the ancient tradition, but it was considered wrong for a brahmana maiden to marry a kshatriya. The important thing was to keep the racial status of women unlowered. Hence anuloma or the practice of marrying men of higher castes was legitimate and the reverse practice, known as pratiloma, i.e. marrying men of lower caste, was prohibited by the sastras.
Devayani had no mind to return home. She remained sunk in sorrow in the shade of a tree in forest.
Sukracharya loved Devayani more than his life. After waiting long in vain for the return of his daughter who had gone to play with her companions, he sent a woman in search of her. The messenger after weary search came on her at last near the tree she was sitting in dejection, her eyes red with anger and grief. And she asked her what had happened.
Devayani said: “Friend, go at once and tell my father that I will not set my foot in the capital of Vrishparva” and she sent her back to Sukracharya.
Extremely grieved at the sad plight of his daughter Sukracharya hurried to her.
Caressing her, he said: “It is by their own actions, good or bad, that men are happy or miserable. The virtues or vices of others will not affect us in the least.” With these words of wisdom, he tried to console her.
She replied in sorrow and anger: “Father, leave alone my merits and faults, which are after all my own concern. But tell me this – was Sarmishtha, the daughter of Vrishaparva, right when she told me you were but a minstrel singing the praise of kings? She called me the daughter of a mendicant living on the doles won by flattery. No content with this arrogant contumely, she slapped me and threw me into a pit which was by. I cannot stay in any place within her father’s territory.” And Devayani began to weep.
Sukracharya drew himself up proudly: “Devayani,” he said with dignity, “you are not the daughter of a court minstrel. You father does not live on the wages of flattery. You are the daughter of one who is reverenced by all the world. Indra, the king of the gods, knows this, and Vrishaparva is not ignorant of his debt to me. But no worthy man extols his own merits, and I shall say no more about myself. Arise, you are a peerless gem among women, bringing prosperity to your family. Be patient. Let us go home.”
In this context Bhagvan Vyasa advises humanity in general in the following words of counsel addressed by Sukracharya to his daughter:
“He conquers the world, who patiently puts up with the abuse of his neighbours. He who controls his anger, as a horseman breaks an unruly horse, is indeed a charioteer and not he who merely holds the reins, but lets the horse go whither it would. He who sheds his anger just as a snake its slough, is a real hero. He who is not moved despite the greatest torments inflicted by others, will realize his aim. He who never gets angry is superior to the ritualist who faithfully performs for a hundred years the sacrifices ordained by scripture. Servants, friends, brothers, wife, children, virtue and truth abandon the man who give way to anger. The wise will not take to heart the words of boys and girls.”
Devayani humbly told her father: “I am indeed a little girl, but, I hope, not too young to benefit by the great truth taught by you. Yet, it is not proper to live with persons who have no sense of decency or decorum. The wise will not keep company with those who speak ill of their family. However rich they may be, the ill-mannered are really the veritable chandalas outside the pale of caste. The virtuous should not mix with them. My mind is ablaze with the anger roused by the taunts of Vrishaparva’s daughter. The wounds inflicted by weapons may close in time; scalds may heal gradually; but wounds inflicted by words remain painful as long as one lives.”
Sukracharya went to Vrishaparva and fixing his eyes on him gravely said:
“O king, though one’s sins may not bring immediate punishment they are sure, sooner or later, to destroy the very germ of prosperity. Kacha, the son of Brihaspati, was a brahmacharin who had conquered his senses and never committed any sin. He served me with fidelity and never strayed from the path of virtue. Your attendants tried to kill him. I bore it. My daughter, who holds her honour high, had to hear dishonouring words uttered by your daughter. Besides, she was pushed into a well by your daughter. She cannot any more stay in your kingdom. Without her I cannot live here either. I am going out of your kingdom.”
At these words the king of the asuras was sorely troubled and said: “I am ignorant of the charges laid at my door. If you abandon me, I shall enter fire and die.”
Sukracharya replied, “I care more for the happiness of my daughter than for the fate of you and your asuras, for she is the one thing I have and dearer to me than life itself. If you can appease her, it is well and good. Otherwise I go.”
Vrishaparva and his retinue went to the tree under which Devayani stood and they threw themselves at her feet is supplication.
Devayani was stubborn and said: “Sarmishta who told me that I was the daughter of a beggar, should become my handmaiden and attend on me in the house into which my father gives me in marriage.”
Vrishaparva consented and asked his attendants to fetch his daughter Sarmishtha.
Sarmishtha admitted her fault and bowed in submission. She said: “Let it be as my companion Devayani desires. My father shall not lose his preceptor for a fault committed by me. I will be her attendant.” Devayani was pacified and returned to her house with her father.
On another occasion also Devayani came across Yayati. She repeated her request that he should take her as his wife since he had clasped her right hand. Yayati again repeated his objection that he, a kshatriya, could not lawfully marry a brahmana. Finally they both went to Sukracharya and got his assent to their marriage. This is an instance of the pratiloma marriage which was resorted to on exceptional occasions. The sastras, no doubt, prescribe what is right and forbid what is wrong but a marriage once effected cannot be made invalid.
Yayati and Devayani spent many days in happiness. Sarmishtha remained with her as an attendant. One days Sarmishtha met Yayati in secret and earnestly prayed to be taken also as his wife. He yielded to her prayer and married her without the knowledge of Devayani.
But Devayani came to know of it and was naturally very angry. She complained to her father and Sukracharya in his rage cursed Yayati with premature old age.
Yayati, thus suddenly stricken with age in the very prime of his manhood, begged so humbly for forgiveness that Sukracharya, who had not forgotten Devayani’s rescue from the well, at last relented.
He said: “O king, you have lost the glory which is youth. The curse cannot be recalled, but if you can persuade anyone to exchange his youth for your age the exchange will take effect.” Thus he blessed Yayati and bade him farewell.
Courtesy: The Mahabharat, by C. Rajagopalachari
देवयानी का विवाह
एक गर्म दोपहर, जंगल में खेल-कूद से थकी हुई देवयानी और असुरों के राजा वृषपर्वा की बेटियाँ एक जंगली तालाब के ठंडे पानी में नहाने गईं, और पानी में उतरने से पहले उन्होंने अपनी मालाएँ किनारे पर रख दीं। तेज़ हवा ने उनके कपड़ों को एक साथ उड़ा दिया – और जब वे उन्हें फिर से उठाने आईं, तो स्वाभाविक रूप से कुछ गलतियाँ हुईं। ऐसा हुआ कि राजा की बेटी राजकुमारी शर्मिष्ठा ने देवयानी के कपड़े पहन लिए। शर्मिष्ठा को यह देखकर गुस्सा आया कि शिष्य की बेटी ने गुरु की बेटी के कपड़े क्यों पहने। शर्मिष्ठा ने मज़ाक में कहा कि शिष्य की बेटी ने गुरु की बेटी के कपड़े क्यों पहने। ये शब्द आधे मज़ाक में कहे गए थे, लेकिन राजकुमारी शर्मिष्ठा बहुत क्रोधित हो गई और अहंकार से बोली: “क्या तुम नहीं जानती कि तुम्हारे पिता हर दिन मेरे शाही पिता के सामने विनम्रतापूर्वक झुकते हैं? क्या तुम एक भिखारी की बेटी नहीं हो जो मेरे पिता के दान पर पलता है? तुम भूल जाती हो कि मैं उस शाही वंश से हूँ जो गर्व से देता है – जबकि तुम एक ऐसे वंश से हो जो माँगता है और लेता है – और तुम मुझसे ऐसा बोलने की हिम्मत करती हो?” शर्मिष्ठा बोलती रही, और वह और भी क्रोधित होती गई, जब तक कि वह क्रोध में आकर अंततः देवयानी के गाल पर थप्पड़ नहीं मारती और उसे सूखे कुएँ में धकेल देती। असुर युवतियों ने सोचा कि देवयानी ने अपने प्राण खो दिए हैं और महल में लौट गईं।
देवयानी कुएँ में गिरने से नहीं मरी थी, बल्कि वह एक दुखद स्थिति में थी क्योंकि वह खड़ी ढलानों पर नहीं चढ़ सकती थी। भरत वंश के सम्राट ययाति जो जंगल में शिकार कर रहे थे, एक सुखद संयोग से अपनी प्यास बुझाने के लिए पानी की तलाश में इस स्थान पर आए। जब उसने कुएँ में झाँका तो उसे कुछ चमकीली चीज़ दिखाई दी और करीब से देखने पर उसे आश्चर्य हुआ कि कुएँ में एक सुंदर युवती लेटी हुई है।
उसने पूछा: “हे सुंदर युवती, जिसके कानों में चमकीले कुंडल और लाल नाखून हैं, तुम कौन हो? तुम कुएँ में कैसे गिर गई?”
उसने उत्तर दिया, “मैं शुक्राचार्य की पुत्री हूँ। उसे नहीं पता कि मैं कुएँ में गिर गई हूँ। मुझे उठाओ।” और उसने अपने हाथ आगे बढ़ा दिए। ययाति ने उसका हाथ पकड़ लिया और उसे कुएँ से बाहर निकाला।
देवयानी असुरों के राजा की राजधानी में वापस नहीं जाना चाहती थी। वह वहाँ जाना सुरक्षित नहीं समझती थी, क्योंकि वह बार-बार शर्मिष्ठा के आचरण पर विचार कर रही थी। उसने ययाति से कहा: “तुमने एक युवती का दाहिना हाथ पकड़ रखा है, और तुम्हें उससे विवाह करना चाहिए। मुझे लगता है कि तुम हर तरह से मेरे पति बनने के योग्य हो।”
ययाति ने उत्तर दिया: “मैं तुमसे प्रेम करता हूँ, मैं क्षत्रिय हूँ और तुम ब्राह्मण कन्या हो। मैं तुमसे कैसे विवाह कर सकता हूँ? शुक्राचार्य की पुत्री, जो समस्त जगत के गुरु होने के योग्य है, मेरे जैसे क्षत्रिय की पत्नी कैसे बन सकती है? पूज्य महिला, घर लौट जाओ।” ये शब्द कहकर ययाति अपनी राजधानी वापस चले गए।
प्राचीन परंपरा के अनुसार क्षत्रिय कन्या ब्राह्मण से विवाह कर सकती थी, लेकिन ब्राह्मण कन्या का क्षत्रिय से विवाह करना गलत माना जाता था। महत्वपूर्ण बात यह थी कि महिलाओं की नस्लीय स्थिति को कम नहीं होने दिया जाए। इसलिए अनुलोम या उच्च जातियों के पुरुषों से विवाह करने की प्रथा वैध थी और इसके विपरीत प्रथा, जिसे प्रतिलोम के रूप में जाना जाता है, अर्थात निम्न जाति के पुरुषों से विवाह करना, शास्त्रों द्वारा निषिद्ध था।
देवयानी का घर लौटने का कोई मन नहीं था। वह जंगल में एक पेड़ की छाया में दुःख में डूबी रही।
शुक्राचार्य देवयानी को अपने प्राणों से भी अधिक प्यार करते थे। अपनी सहेलियों के साथ खेलने गई अपनी पुत्री के लौटने का बहुत दिनों तक व्यर्थ इंतजार करने के बाद, उसने एक स्त्री को उसकी खोज में भेजा। थकी-मांदी खोज के बाद दूत अंततः उस वृक्ष के पास पहुंचा, जहां वह उदास बैठी थी, उसकी आंखें क्रोध और दुख से लाल थीं। और उसने उससे पूछा कि क्या हुआ था।
देवयानी ने कहा: “मित्र, तुरंत जाकर मेरे पिता से कहो कि मैं वृषपर्वा की राजधानी में पैर नहीं रखूंगी” और उसने उसे शुक्राचार्य के पास वापस भेज दिया।
अपनी पुत्री की दुखद स्थिति से अत्यंत दुखी होकर शुक्राचार्य उसके पास पहुंचे।
उसको दुलारते हुए उन्होंने कहा: “मनुष्य अपने अच्छे या बुरे कर्मों के कारण ही सुखी या दुखी होते हैं। दूसरों के गुण या दोष हमें जरा भी प्रभावित नहीं करेंगे।” इन ज्ञानपूर्ण शब्दों से उन्होंने उसे सांत्वना देने की कोशिश की।
उसने दुःख और क्रोध में उत्तर दिया: “पिताजी, मेरे गुण-दोषों की तो बात ही छोड़ दीजिए, जो कि आखिर मेरी अपनी चिंता है। लेकिन मुझे यह बताइए – क्या वृषपर्वा की पुत्री शर्मिष्ठा ने ठीक ही कहा था कि तुम राजाओं की प्रशंसा करने वाली एक गायिका हो? उसने मुझे चापलूसी से प्राप्त दान पर पलने वाले एक भिक्षुक की पुत्री कहा था। इस अहंकारी अपमान से संतुष्ट न होकर उसने मुझे थप्पड़ मारा और पास ही एक गड्ढे में फेंक दिया। मैं उसके पिता के क्षेत्र में कहीं भी नहीं रह सकती।” और देवयानी रोने लगी। शुक्राचार्य ने गर्व से अपना सिर ऊपर उठाया और कहा, “देवयानी, तुम किसी दरबारी गायक की बेटी नहीं हो। तुम्हारे पिता चापलूसी की मजदूरी पर नहीं जीते। तुम एक ऐसे व्यक्ति की बेटी हो, जिसका सारा संसार सम्मान करता है। देवताओं के राजा इंद्र को यह बात मालूम है और वृषपर्वा को भी मेरे प्रति अपने ऋण का पता है। लेकिन कोई भी योग्य व्यक्ति अपने गुणों का बखान नहीं करता और मैं अपने बारे में और कुछ नहीं कहूंगा। उठो, तुम महिलाओं में अद्वितीय रत्न हो, अपने परिवार में समृद्धि लाती हो। धैर्य रखो। चलो घर चलते हैं।”
इस संदर्भ में भगवान व्यास ने शुक्राचार्य द्वारा अपनी पुत्री को संबोधित निम्नलिखित शब्दों में मानवता को सामान्य रूप से सलाह दी है:
“वह संसार को जीत लेता है, जो अपने पड़ोसी के दुर्व्यवहार को धैर्यपूर्वक सहन कर लेता है। जो अपने क्रोध को नियंत्रित करता है, जैसे घुड़सवार अनियंत्रित घोड़े को तोड़ देता है, वह वास्तव में सारथी है, न कि वह जो केवल लगाम पकड़ता है, बल्कि घोड़े को जहाँ जाना है जाने देता है। जो अपने क्रोध को साँप की तरह त्याग देता है, वही सच्चा वीर है। जो दूसरों द्वारा दी गई बड़ी से बड़ी पीड़ा के बावजूद विचलित नहीं होता, वह अपने लक्ष्य को प्राप्त करता है। जो कभी क्रोध नहीं करता, वह उस कर्मकांडी से श्रेष्ठ है, जो शास्त्र द्वारा निर्दिष्ट यज्ञों को सौ वर्षों तक निष्ठापूर्वक करता है। जो व्यक्ति क्रोध को अपनाता है, उसे सेवक, मित्र, भाई, पत्नी, बच्चे, सदाचार और सत्य त्याग देते हैं। बुद्धिमान व्यक्ति लड़के-लड़कियों की बातों पर ध्यान नहीं देते।” देवयानी ने विनम्रतापूर्वक अपने पिता से कहा: “मैं वास्तव में एक छोटी लड़की हूँ, लेकिन, मुझे आशा है कि आपके द्वारा सिखाए गए महान सत्य से लाभ उठाने के लिए मैं इतनी छोटी नहीं हूँ। फिर भी, ऐसे लोगों के साथ रहना उचित नहीं है, जिनमें शालीनता या शिष्टाचार का कोई भाव नहीं है। बुद्धिमान व्यक्ति उन लोगों के साथ संगति नहीं करेगा जो उनके परिवार के बारे में बुरा बोलते हैं। वे चाहे कितने भी अमीर क्यों न हों, बुरे आचरण वाले लोग वास्तव में जाति के दायरे से बाहर के चांडाल हैं। पुण्यात्मा लोगों को उनके साथ नहीं मिलना चाहिए। वृषपर्वा की बेटी के तानों से उत्पन्न क्रोध से मेरा मन जल रहा है। हथियारों से लगे घाव समय के साथ भर सकते हैं; पपड़ी धीरे-धीरे ठीक हो सकती है; लेकिन शब्दों से लगे घाव जब तक जीवित रहते हैं, तब तक पीड़ादायक रहते हैं।” शुक्राचार्य वृषपर्वा के पास गए और उन पर अपनी दृष्टि गम्भीरतापूर्वक जमाते हुए बोले:
“हे राजन, भले ही किसी के पापों का तुरन्त दण्ड न मिले, पर वे अवश्य ही, देर-सवेर, समृद्धि के बीज को नष्ट कर देते हैं। बृहस्पति का पुत्र कच ब्रह्मचारी था, जिसने अपनी इन्द्रियों पर विजय प्राप्त कर ली थी और कभी कोई पाप नहीं किया था। उसने निष्ठापूर्वक मेरी सेवा की और कभी भी धर्म के मार्ग से विचलित नहीं हुआ। आपके सेवकों ने उसे मारने का प्रयास किया। मैंने उसे सहन किया। मेरी पुत्री, जो अपने मान को बहुत मानती है, को आपकी पुत्री के द्वारा कहे गए अपमानजनक शब्द सुनने पड़े। इसके अलावा, आपकी पुत्री ने उसे कुएँ में धकेल दिया। वह अब आपके राज्य में नहीं रह सकती। उसके बिना मैं भी यहाँ नहीं रह सकता। मैं आपके राज्य से बाहर जा रहा हूँ।”
इन शब्दों से असुरों का राजा बहुत व्याकुल हो गया और बोला: “मैं अपने द्वार पर लगाए गए अभियोगों से अनभिज्ञ हूँ। यदि आप मुझे त्याग देंगे, तो मैं अग्नि में प्रवेश करके मर जाऊँगा।”
शुक्राचार्य ने उत्तर दिया, “मैं तुम्हारे और तुम्हारे असुरों के भाग्य से अधिक अपनी पुत्री के सुख की चिंता करता हूँ, क्योंकि वह मेरे पास एकमात्र वस्तु है और मेरे लिए प्राणों से भी अधिक प्रिय है। यदि तुम उसे प्रसन्न कर सको, तो अच्छा है। अन्यथा मैं चला जाता हूँ।” वृषपर्वा और उनके अनुचर उस वृक्ष के पास गए, जिसके नीचे देवयानी खड़ी थी और उन्होंने प्रार्थना में स्वयं को उनके चरणों में समर्पित कर दिया। देवयानी जिद्दी थी और बोली: “शर्मिष्ठा जिसने मुझे बताया कि मैं एक भिखारी की पुत्री हूँ, वह मेरी दासी बनेगी और मेरे पिता जिस घर में मेरा विवाह करेंगे, वहाँ मेरी सेवा करेगी।” वृषपर्वा ने सहमति दी और अपने सेवकों से अपनी पुत्री शर्मिष्ठा को लाने के लिए कहा। शर्मिष्ठा ने अपनी गलती स्वीकार की और सिर झुकाकर प्रणाम किया। उसने कहा: “जैसा मेरी सखी देवयानी चाहती है, वैसा ही हो। मेरे पिता मेरे द्वारा किए गए किसी दोष के कारण अपने गुरु को नहीं खोएँगे। मैं उसकी अनुचर रहूँगी।” देवयानी शांत हो गई और अपने पिता के साथ अपने घर लौट गई।
एक अन्य अवसर पर भी देवयानी ययाति से मिली। उसने अपना अनुरोध दोहराया कि वह उसे अपनी पत्नी के रूप में स्वीकार करे क्योंकि उसने उसका दाहिना हाथ पकड़ रखा था। ययाति ने फिर से अपनी आपत्ति दोहराई कि वह एक क्षत्रिय है और विधिपूर्वक ब्राह्मण से विवाह नहीं कर सकता। अंततः वे दोनों शुक्राचार्य के पास गए और विवाह के लिए उनकी स्वीकृति प्राप्त की। यह प्रतिलोम विवाह का एक उदाहरण है जिसका सहारा असाधारण अवसरों पर लिया जाता था। निस्संदेह शास्त्रों में उचित और अनुचित का वर्णन है, लेकिन एक बार विवाह हो जाने के बाद उसे अमान्य नहीं किया जा सकता।
ययाति और देवयानी ने कई दिन खुशी से बिताए। शर्मिष्ठा उसके साथ परिचारिका के रूप में रही। एक दिन शर्मिष्ठा ने गुप्त रूप से ययाति से मुलाकात की और उससे अपनी पत्नी के रूप में स्वीकार करने की प्रार्थना की। उसने उसकी प्रार्थना स्वीकार कर ली और देवयानी की जानकारी के बिना उससे विवाह कर लिया।
लेकिन देवयानी को यह बात पता चल गई और वह बहुत क्रोधित हुई। उसने अपने पिता से शिकायत की और शुक्राचार्य ने क्रोध में आकर ययाति को समय से पहले बुढ़ापे का श्राप दे दिया।
इस प्रकार ययाति, जो अपनी युवावस्था के चरम पर अचानक वृद्धावस्था से ग्रसित हो गया था, ने इतनी विनम्रता से क्षमा मांगी कि शुक्राचार्य, जो देवयानी को कुएं से निकालने की घटना को भूले नहीं थे, आखिरकार मान गए।
उन्होंने कहा: “हे राजन, तुमने युवावस्था का गौरव खो दिया है। श्राप वापस नहीं लिया जा सकता, लेकिन यदि तुम किसी को अपनी युवावस्था के बदले अपनी आयु देने के लिए राजी कर सको तो वह परिवर्तन प्रभावी हो जाएगा।” इस प्रकार उन्होंने ययाति को आशीर्वाद दिया और उसे विदा किया।
सौजन्य: महाभारत, सी. राजगोपालाचारी द्वारा
