लेखक वैह जिनकर पाठक अछि
मैथिली हमर मातृभाषा थिक । एहि मे लिखैत छी त अपन मिथिलाक लोक – अपन घर-परिवारक लोक – हिनका सभक हितचिन्तक बनिकय लिखब अन्तरात्मा मे सेवा करबाक भाव प्रदान करैत अछि । एहि सँ लोक त लोक, परलोक आ खासकय जगजननी जानकी जी सेहो प्रसन्न होइत छथि ई अन्तर्भाव मे मग्न रहल करैत छी ।
मैथिली, नेपाली आ हिन्दी सहित कतेको भाषा मे सृजन कयनिहार साहित्यकार धीरेन्द्र प्रेमर्षि सामान्य चर्चाक क्रम मे अपन फेसबुक देबाल पर लिखलनि जे फेसोबुक पर मैथिली लेखन केँ सुन्दर, सुसंगत एवं व्यवस्थित बनेबाक आह्वान करैछ । विषयगत स्पष्टताक संगहि भाषिक आवरण पर सेहो ध्यान देबाक ‘अपेक्षा’ पर ओ प्रकाश देलनि । एहि मूल-सन्देश संगहि प्रेमर्षि भाइजी नेपालक विभिन्न कोण सँ जिनका सभक लेखन केँ ‘आधार व आदर्श’ बनायल जा सकैछ, तेकर जिकिर करैत किछु महत्वपूर्ण नाम सेहो लेलनि ।
स्वाभाविक सत्य छैक जे एक छोट पोस्ट मे आ एक्के बेर मे बहुत गोटेक नाम नहि समेटल जा सकैत छल, तेँ गोटेक नाम छुटबो केलनि – सेहो आत्मसात करैत पोस्ट मे ओ एहि बात लेल अन्यथा नहि लेबाक स्पष्ट आग्रह कयने छथि । तथापि ई एकटा विमर्शक मुद्दा बनि गेल । फल्लाँक नाम लेलनि, चिल्लाँक नाम कियैक छोड़लनि, मैथिली मे यैह काट-छाँट आ शुद्धीकरण-वर्गीकरण आदिक खोंच-पेंच एहि भाषा केँ सीमित वर्ग, जाति, धर्मक सीमा मे बान्हि देलक – इत्यादि अनेकों दृष्टि सँ कतेको लोक एहि पोस्ट पर टीका-टिप्पणी करैत देखा रहल छथि ।
हमरो भाग्य ! भाइजी उपरोक्त पोस्ट मे हमरो नाम रखलनि । निश्चय ई गौरवबोधक बात भेल हमरा लेल । एक बहुचर्चित व लोकप्रिय स्रष्टा जखन अपन मुखारविन्द सँ एक बेर ‘वाह प्रवीण’ कहि दैत छथि त स्वाभाविके रूप सँ प्रसन्नता भेटैछ । ओहि उत्साहवर्धक शब्द सँ हृदय मे आशीर्वादक किरण प्रवेश करैछ । ओहि ठाम विराजित परमात्मा सेहो गदगद भ’ जाइत छथि । हमर आत्मिक सुखक वर्णन त शब्द मे भ’ए नहि सकैछ । हम लिखैत छी, ई मात्र हमर सख आ मातृभाषा-मातृवाणी मे मातृभूमिक लोक लेल सेवा थिक, परमार्थ थिक । ई हमरा पुरुषार्थ प्रदान करैछ ।
इहो स्पष्ट कय दी जे झूठक खरखाँही लेल एकदमे नहि लिखैत छी । लेखन हमर विषय अछि । नौकरी (पेशा) सेहो लेखकहि केर अछि । हिन्दी, अंग्रेजी, नेपाली, भोजपुरी, मगही आदि बाजि सकैत छी – लिखि सकैत छी । मैथिली त मातृभाषा थिक । एहि मे लेखन करब हमरा अपन घर-परिवार आ गाम-स्वदेशक हितचिन्तक सेहो बना दैछ तेँ सेवाभाव सँ लिखैत छी । लिखिते टा नहि छी, बल्कि जतेक सम्भव होइछ ततेक अभियानमूलक काजो सब करैत छी । स्वतःस्फूर्त भाव मे लोक सब कहि दैत छथि जे अहाँक लेख हम पढ़ैत छी, बस ! कन्हा कुकुर माँड़हि तिरपित ! एहि सँ बेसी किछु नहि चाही ।
रहस्य ई छैक जे लिखय सँ पहिने पढ़य मे रुचि जगैत छैक । पढ़ैत-बुझैत अपन आन्तरिक वैचारिकता निर्माण होइछ । मोन मे ई भाव अबैछ जँ हम कोनो विषय-सन्दर्भ पर लिखब त बहुतो लेल हितकर हेतैक । शब्द-शिल्प संगहि लेख केर भाव पाठक लेल उपयोगी हेतैक । ततेक स्पष्टता आ सहजताक कसौटी पर कसिकय लिखब । मानवीय संसारक अमर लेखक – महाकाव्य रामचरितमानस केर रचयिता ‘महाकवि तुलसीदास’ केर शब्द मे लेख वैह भेल जे पढ़ला सँ लोकक हित (कल्याण) सम्भव छैक । बस, एहि गुरुमंत्र केँ ध्यान मे राखिकय लेखनकार्य करैत छी ।
अन्त मे, प्रत्येक लेखक महाकवि तुलसीदासक उपरोक्त निर्णय पर विचार करब । शुद्ध-अशुद्ध या आन मानदंड आदिक चिन्ता कएने बिना ‘लोककल्याणकारी लेख’ लिखैत रहब । मैथिली हो, नेपाली हो, अंग्रेजी हो कि हिन्दी वा आने कोनो भाषा हो – वर्ण-विन्यास सँ शब्द-संसार एवं शिल्प-शैलीक विशेषता अपनेले सँ पाठक केँ प्रभावित करबनि । बिना पाठक सब जीरो! लेखक वैह, जिनकर पाठक होयत । अगबे खोंच-पेंच नहि चलत ।
हरिः हरः!!
