लेख विचार
प्रेषित: दिलीप कुमार झा
श्रोत: दहेज मुक्त मिथिला समूह
लेखनी के धार ,बृहस्पतिवार साप्ताहिक गतिविधि
विषय :- प्रकृति संग जीवन: मिथिलाक हरियरी संस्कृति
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मिथिला केवल एक भौगोलिक क्षेत्र नहि, अपितु एक जीवंत सभ्यता छी जतय प्रकृति आऽ जीवनक संग-संग यात्रा होइत अछि। हरियर-कंचन खेत, आम-कटहरक बगिचा, पोखरि-झांकुर, कल कल बहैत धार, बर-पीपरक छाँह आऽ ऋतुक लय पर नचैत जीवन ई सब मिथिलाक पर्यावरणीय परंपरा के दर्शबैत अछि। प्रकृति मिथिला मे मात्र संसाधन नहि बल्कि आराधना, जीवनशैली आऽ संस्कृति के मूल आधार छी।
मिथिलाक लोकजीवन मे प्रकृति देवता रूपे पूज्य अछि। तुलसी थान, पीपरक वृक्ष आऽ गाछी-गाछ सब पूजित अछि। सौर-चंद्र पंचांग आधारित पर्व–त्योहार, जइमे छइठ, समा-चकेवा, अष्टमी पूजा, बैसाखी आदिक मूल प्रकृतिक ऋतुचक्र पर आधारित अछि।
मिथिलाक कृषिप्रधान समाज मे खेत-पाइन, वर्षा आऽ माटिक विशेष महत्त्व अछि। सब घरक चहुदिस गाछी (फलदार वृक्ष), बारी (सब्जी क्षेत्र) आऽ पोखरि-खत्ता देखल जा सकैत अछि। प्राकृतिक संसाधन जेना बांस, खर, पुआर घरेलू उद्योग आऽ निर्माणक मुख्य आधार रहल अछि।
लोकगीत, लोकनृत्य, मिथिला चित्रकला आऽ मिथिला वास्तुकला मे प्रकृति के विशेष स्थान अछि। फुलवरिया मे खिलल मधुकर, कोकिलक बोली आऽ गाछी मे झुलैत कन्या-पुतोहु ई सब प्रतीक मिथिलाक सौंदर्यबोध के प्रकृति सँ जोड़ैत अछि।
मिथिला मे जीवन ऋतु आधारित रहल अछि। जाड़क समय मे मकर संक्रांति, गर्मीक काल मे जट-जटिन, वर्षा मे कजरी, बट सावित्री, बसंत ऋतु मे होली, जुड़िशितल आऽ शरद ऋतु मे कोजगरा इत्यादि उत्सव, मौसम अनुसार सामाजिक एकता आऽ चेतना के पुष्ट करैत अछि।
मिथिला के भोजन सत्तू, तिलकुट, माछ-भात, चुरा दही सब प्रकृति द्वारा प्रदत्त अन्न-जल पर आधारित अछि। आमक आमिल, मखान, सिजनक फुल ई सब स्वाद आऽ स्वास्थ्यक संग प्रकृति के उपहार थीक।
मिथिला दर्शन मे “वसुधैव कुटुम्बकम्” भाव निहित अछि। गाछ-गाछी आऽ जीव-जंतु सब के समान अधिकार प्राप्त अछि। कोनो वृक्ष के काटनाइ पाप मानल जाइत अछि। ‘गाछ लगाउ, जीवन बचाउ’ ई नीति घर-घर तक प्रचलित रहल अछि।
आजुक समय मे नगरीकरण, प्लास्टिक प्रदूषण, जलस्तर मे गिरावट, जंगलक कटाई आऽ रासायनिक खेतीक चलन मिथिलाक प्राकृतिक संतुलन के विखंडित क’ रहल अछि। संगहि पोखरिक भराई, बगिचाक विनाश, पारंपरिक बीजक समाप्ति, वर्षा मे अनियमितता आऽ प्रदूषित नदी-नहरि ई सब संकेत दैत अछि जे अगर आबहुं हम सचेत नहि भेलौं त मिथिलाक पारंपरिक समृद्धि आऽ संतुलन एकटा दन्तकथा बनिकय रहि जायत।
तहि हेतु हमरा सभ के संरक्षणक दिशा मे सतत प्रयास करवाक चाही जाहि सँ मिथिलाक पारंपरिक गाछी-पोखरि संस्कृति पुनःस्थापित भ सकै। गामक चर चांचर मे फेर सँ तुलसी, धान, पीपर-बरगद रोपल जाय। हर घर दुआरि पर फुलवारी सजायल जाय।
लोकपर्व आऽ पर्यावरण के जोड़ी जाहि सँ छइठ, समा-चकेवा, जट-जटिन के संग वृक्षारोपण आऽ स्वच्छता अभियान जोड़ल जाय संगहि नव-आंदोलन सँ पर्यावरण संरक्षण के संदेशक प्रचार प्रसार कैल जाय।
मिथिला चित्रकला आऽ गीत द्वारा जनजागरूकता पसारब हमरा सभ के नैतिक कर्तव्य अछि। मधुबनी पेंटिंग मे पर्यावरणीय संदेश अंकित कएल जायके चाही ।बालगीत, झिझिया, भजन आऽ नाटक द्वारा पर्यावरण प्रेम के जन-जन तक पहुँचायल जाए।
परंपरागत ज्ञानक पुनर्व्याख्या कैल जाए जाहि मे गाछक औषधीय महत्त्व, जैविक खेतीक लाभ, आऽ लोककथा मे छिपल ज्ञान ई सब स्कूल स्तर पर सिखायल जेबाक चाही।
मिथिला के आध्यात्मिक संत–विद्वान जेना लखनदास बाबा, विद्यापति, याज्ञवल्क्य सब प्रकृति सँ प्रेम करबाक संदेश देने छथि। हुनकर जीवनशैली मे साधना संग प्रकृति–संरक्षण गूथल छल। एहि सब तरहक नवदृष्टि के जरिये प्रकृति आऽ आध्यात्मिक पुनर्स्थापना के प्रयास करब हमर सभक कर्तव्य थिक।
आई फेर आवश्यकता अछि एक एहन जीवन दृष्टिक, जतय भोग नहि, योग हो जतय मनुष्य, गाछ, नदी, जानबर सब एक परिवार हो जतय ‘प्रकृति के संग जीवन’ हो केवल ‘प्रकृति पर निर्भरता’ नहि।
मिथिलाक परंपरा मे प्रकृति पूजा नहि, जीवन संगिनी रहल अछि। आइ फेर ओकर रक्षा, सम्मान आऽ प्रेम जरूरी अछि। हम सभ मिलिकय फेर ओहि मिथिला के गढ़ि सकैत छी, जतय सब गाम एक गाछी हो, सब पोखरि एक तीर्थ हो आऽ सब घर एक भावुक बगिया।
हम त एतवा कहब जे…..
आउ आउ
गाछ-बिरिछ बचाउ, मिथिला बचाउ,
नेम-धरम निभाउ, संस्कृति के सजाउ,
प्रकृति सँ प्रेम करु, जीव रक्षाक संकल्प धरु,
आऽ मिथिला के सब कोना सँ हरियरीक गीत गाउ।”
