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लेख-विचारः फिल्म, समाज आ हम

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फिल्म, समाज आ हम

  • प्रवीण नारायण चौधरी

फिल्मी फैशन आ पोज केर बहुत पैघ प्रभाव समाज पर पड़ल अछि । एहेन कियो नहि जे ‘सिल्वर स्क्रीन’ पर प्रस्तुत काटल-छाँटल ‘रिल्स’ द्वारा गोटेक घन्टा मे ‘मानव जीवन’ सँ जुड़ल अनेकों ‘कथा-गाथा’ प्रस्तुति सँ स्वयं केँ बचा सकल हो । एकर सर्वाधिक प्रभाव छौंड़ा माँरड़ि पर पड़ैत देखलहुँ जखन स्वयं छौंड़ा-माँरड़ि रही । कहियो केशक स्टाइल नीक लागि जाय, कहियो हिरो सब जे कपड़ा पहिरय से नीक लागि गेल करय । जे किछु टका बचत होइत छल, बुझू जे ओहि सब प्रकरण मे फूरफैंसी करैत खत्म कय लैत छलहुँ । हम असगर रही से बात नहि, हमरे जेकाँ लगभग सब रहय – गोटेक जे नहि रहय तेकरा हम सब ‘मनसुखा’ कहिकय मजाक उड़बी ।

ई ‘लव’ कि होइत छैक से बुझू जे फिल्मे सँ सिखलहुँ । काफी समय तक ‘लवर’ केर खोज सेहो चलल । मुंगेरीलाल जेकाँ आँखि मिरमिरा गेल करय जहाँ कोनो छौंड़ी केँ कनिक फैशन मे देखी । आब मोनक भीतर जे चलैत छैक से थोड़े न कियो देखैत छैक…. ई फिल्मक नशा एतबा अधिक छल तहिया जे ‘सिन्दूर’ देखिकय निकललहुँ त अपना केँ ‘गोविन्दा’ हिरो रूप मे देखिकय अपन हिरोइन ‘नीलम’ केर खोज करय लागी । ई बुझबे नहि करियैक जे जीवनक वास्तविक सिनेमा मे ई हिरोइन सब सिवाय बर्बादी दोसर किछु नहि थिकैक ।

बड़-बुजुर्ग सब केँ देखी – फिल्म देखय केँ खराब मानथि । गप नहि बुझियैक । कियैक खराब कहैत छथिन से साफे नहि बुझियैक । ‘मायापुरी’ फिल्मी पत्रिका पढ़बाक सख माथा मे ताण्डव करैत छलय । फिल्मी गीतक कतेको रास किताब किनने रही । जखनहिं समय भेटि गेल, चकइ-के-चकधुम-मकइ-के-लाबा आ हम-नहि-हेबउ-केकरो-बाबा वला धुन सँ सीखल ढोलक चौकी, टेबुल, थारी, बाटी, अर्हिया, ढकना – कतहु ठोकय लागी आ ‘जिन्दगी की ना टूटे लड़ी, प्यार कर ले घड़ी दो घड़ी’ ओहि अन्जान – अनदेखा हिरोइन लेल गाबय लागी । फिल्मक प्रभाव यदि हमरा पर एना छल, त निश्चय एकर असर सारा समाज पर पड़ैत छलैक से स्वाभाविक सत्य थिकैक ।

आब हम ५३ वर्षक छौंड़ा छी – I am a lad of 53 year old! ओ हिरो-हिरोइन वला उमेर अपन कहिया न मरल । आब त धियापुता सब ओहि उमेर मे अछि । अपन जीवन मे ओ मुंगेरीलालक सपना वला आँखिक मिरमिराहट आ सिन्दूर सिनेमाक गोविन्दा-नीलम वला जोड़ी बनेबाक भुलभुलैया – सबटा गेल निखत्तर मे । जहाँ यथार्थक दुइ-चारि चटकन गाल पर पड़ैत छैक, जहाँ कोनो हिरोइन केँ प्रोपोजल करिते ‘रौ टटीबा, टाटिये पर दय एबउ’ वला गाइर-ताइर सुनलहुँ, कि मैथिल हिरोक सारा हिरोपनी किदैन मे घुसैड़ जाइछ । एक बेर त एहनो भेल छल जे हिरोइन बस मे सीटे पर बगल मे भेटि गेल छल । ‘दिल है कि मानता नहीं’ वला अमीर खानक अमीरी देखेलहुँ, कि ततबे मे ओ हिरोइन आगाँ कोनो सीट पर बैसल अपन कोनो भैयाक जोर सँ हाक देलक… “यौ भैया, देखय छियै ई फौतीबा छौंड़ा के, तखन स’ फिल्मी डायलौग सब मारि-मारिकय परेशान कएने अछि!” डरे तेना सकपकेलहुँ जे फेर दोसर दिन बसक सीट, तइपर बैसल हिरोइन आ अमीर खान – पूजा भट्ट वला गीत सब – सारा बिसरा गेल छल ।

अन्त मे ‘लाल दुपट्टा मलमल का’ जेकाँ सादा-सादी हिरो-हिरोइन बनिकय ला दुपट्टा, रेशमी जुल्फ, हिरणीक चाइल, हथिनी वला मदमस्त चाइल, कोयलीक कुहू-कुहू – इत्यादि अनेकों उपमा-उपमेय सब वला सेहो दौड़ मे जीलहुँ । एहनो नहि छलैक जे हिरोइन सब नहि भेटल, मुदा स्वजाति नहि छलय आ समाज परजाति केँ स्वीकार नहि करैछ, गरीबक बेटा… कहीं परजाति मे गेलहुँ त सार घुरिकय घरो नहि टपय देत गौआँ… से सब सोचिकय ओहो हिरोइन केँ छोड़य पड़ल जे कहने रहय ‘मेरे पापा कम्यूनिस्ट विचार के हैं, जात-पात नहीं मानते । आप एक आदर्श युवक हैं, मेरे पापा तो मान ही जायेंगे ।’ खैर छोड़ू – राजू काका सहिये कहथिन, उमेर मे सब टा फिल्मक कथानक सब ओहिना अबैत छैक आ जेना ३ घन्टा मे ‘दि एन्ड’ वला भुकभुकिया अबिते सिनेमा घरक सीट सँ उठि सब अपन-अपन पोन झाड़ैत घर दिश जाइछ, तहिना तोरो सब केँ समय एला पर सबटा ठीक भ’ जेतौक ।

सैह भेल । हारि-थाकिकय बाप केँ चिठ्ठी लिखलियनि जे ई फिल्म, फिल्मी पर्दा, ताहि पर स्नो-पाउडर-लिपिस्टिक वाली हिरोइन, अपना गोविन्दा-सलमान-अमीरखान बनबाक सख… सबटा गेल पानि मे । आब जल्दी सँ कोनो नीक मैथिल जोड़ी ताकू जे विवाह कय केँ असल गृहस्थक जीवन जियब । बाप एतबा खुश भेलाह जे पुछू जुनि । अफसोस, ऐगला बरख अपने चलि गेलाह बपटूरा बनाकय । मुदा आखिरि मे हमर हिरोइन वन्दनियाँ भेटिये गेल, आ आइ यथार्थक जीवन मे जिबैत ४ टा हिरो-हिरोइन केर बाप-माय बनल छी ।

बन्धुगण! लम्बा भ’ गेल कथा – कहबाक एतबी छल जे फिल्मक प्रभाव मे पड़ला सँ जीवन भरि दुःखे-दुःख भेटैछ । ३ घन्टा मे रील्स मार्फत जीवनक प्रस्तुति सचमुच कोरा कल्पना टा होइत छैक । बहुत विरले फिल्म होइछ जे जीवनक यथार्थ सँ परिचय करबैत हमरा-अहाँक वास्तव मे मार्गदर्शन कय पबैछ । आजुक समाज मे फिल्मक नग्नता-फूहड़ता पहिरन-ओढ़न तक केँ चौपट कय देने अछि । अपन मूल्यवान् परम्परा सब छोड़िकय हरैद-मेंहदी वला रंगीन वैवाहिक परम्परा सब सेहो लादि देने अछि । लोक आडम्बर आ दिखाबा मे तेना ओझरा गेल अछि जे वास्तविकता आ यथार्थता मुंह छिपेने नुकाइत देखैत छी । बेतहाशा मुन्नी बदनाम भ’ रहल अछि डार्लिंग तेहल्लो सब लेल । राति भरि दीया जराकय पिया कि-कि करैत अछि से सरेआम । सावधान ! कृपया एना फिल्म आ धारावाहिक केँ माथ पर नहि चढ़ा लियह जे परिवार आ सम्बन्धक सीमा-मर्यादा केँ सरेआम ‘रेप सीन’ (बलात्कार) होइक । मानव छी, मानवता केँ सर्वोपरि राखय जाउ ।

हरिः हरः!!

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