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परिधान सँ बढ़य आत्मविश्वास

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लेख विचार
प्रेषित: आभा झा
श्रोत: दहेज मुक्त मिथिला समूह
लेखनी के धार ,बृहस्पतिवार साप्ताहिक गतिविधि
विषय :-  परिधान: पहचान आ संस्कृति के प्रतीक

परिधान छी जीवनक श्रृंगार,
शरीरके सजाबै सुंदर आकार।
संस्कारक परिचायक ई भाव,
संस्कृतिक चिन्ह छी एकर स्वरूप।
कपड़ा सँ बनय मानवी स्वभाव,
आदर-सम्मान राखय अपन बात।
परिधान सँ बढ़य आत्मविश्वास,
सरलता होइ वा भव्यताक एहसास।
जीवनमे भरय रंगक उमंग,
परिधान छी मनुष्यक संग।

परिधान अर्थात कपड़ा सिर्फ शरीर के ढँकबाक माध्यम नहि होइत अछि, बल्कि ओ हमर सभक पहचान आ संस्कृति के जीवंत परिचायक सेहो होइत अछि। जीवन में परिधानक महत्व बहुत पैघ छै, जे व्यक्तिगत, सामाजिक आ सांस्कृतिक रूप सँ हमर सभक जीवन केँ प्रभावित करैत अछि।

पहिने तऽ, परिधान हमर सभक पहचानकेँ स्थापित करैत अछि। जेना लोकक वस्त्र देखिकय हुनकर सामाजिक स्थिति, व्यवसाय, आ उमेरक बारे में बुझि सकैत छी। उदाहरण स्वरूप, शिक्षक अपन औपचारिक पोशाक मे होइत छथि, तऽ किसान साधारण धोती-कमीजमे। युवा लोक अपन मनपसंद फैशनक माध्यम सँ अपन अलग पहचान बनबैत छथि, जे हुनकर व्यक्तित्व आ रुचिक परिचायक होइत अछि।

दोसर महत्वपूर्ण पक्ष छै परिधानक सांस्कृतिक महत्व। भारत जेकाँ बहु-सांस्कृतिक देश मे, प्रत्येक क्षेत्रक अपन पारंपरिक वस्त्र होइत अछि, जे ओहि ठामक जलवायु, रीति-रिवाज आ जीवनशैली सँ जुड़ल होइत अछि। उदाहरण स्वरूप, मिथिलाक लोक सभ मिथिला पेंटिंग साड़ी आ धोती-कुर्ता पहिरैत छथि, ओतहि पंजाब मे सूट-सलवार आ राजस्थान मे लहरिया रंगीन पोशाकक प्रचलन अछि। विवाह, उत्सव आ धार्मिक अवसर पर विशेष परिधान पहिरनाइ परंपराक सम्मान करबाक द्योतक होइत अछि।

परिधान समाजक भेद-भाव, जाति, धर्म आ क्षेत्रीय पहचान केँ सेहो देखबैत अछि। विभिन्न समुदायक लोक अपन परंपरागत पोशाक सँ अपन इतिहास आ संस्कृतिक सम्मान करैत छथि। संगहि, सभ्य समाज मे उचित आ सम्मानजनक वस्त्र पहिरनाइ शिष्टाचार आ संस्कृति के परिचायक मानल जाइत अछि।

आधुनिक समय मे परिधानक रूप बदैल गेल अछि। फैशन, डिज़ाइन आ ब्रांडिंग परिधान के सिर्फ पोशाक सँ बेसी बनौने अछि। ई आत्मविश्वास, रचनात्मकता आ व्यक्तित्व के अभिव्यक्ति बनि गेल अछि। युवा लोक अपन कपड़ा सँ अपन संदेश दुनिया तक पहुँचबैत छथि।

तथापि, परिधानक मूल उद्देश्य शरीरक सुरक्षा आ आराम अछि। ताहि लेल मौसम आ अवसर अनुसार कपड़ा चुननाइ जरूरी अछि जे हमरा स्वस्थ राखए आ सहजता प्रदान करए।

अंत मे कहब जे परिधान हमर संस्कृति, पहचान आ समाजक दर्पण छी। ई हमरा सभकेँ जड़ि सँ जोड़ैत अछि आ सभ्य समाज मे सम्मान दियबैत अछि। ताहि लेल परिधानक चयन सोच-विचार सँ करबाक चाही जे ओ हमर व्यक्तित्व आ सांस्कृतिक विरासत दूनू के सम्मानित करए। एहि तरहें परिधान केवल शरीरक आच्छादन नहि, बल्कि अपन संस्कृति, अस्मिता आ अभिमान के प्रतीक अछि। जय मिथिला, जय मैथिली।­

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