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मैथिल प्रबुद्धजन समूहक सपना पूरा करत ‘ग्लोबल मैथिल’

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प्रबुद्ध मैथिल समूह – ग्लोबल मैथिल

‘ग्लोबल मैथिल’ – मैथिलीभाषी समुदाय लेल एकटा प्रबुद्ध मैथिल समूहक रूप मे अग्रसर होइत देखा रहल अछि । प्राचीन संस्कृति-सभ्यता तथा पौराणिक इतिहास मे वर्णित मिथिला भले आइ धरि अपन पान्डित्य परम्परा एवं वेदानुसारक जीवन पद्धति लेल ओतबे जिबन्त देखा रहल हो, परन्तु सामयिक राजनीति आ स्थिति-परिस्थिति मे मिथिलाक अस्तित्व केवल बयानबाजी आ नेताजी लोकनिक भाषणहि धरि सीमित भेल यथार्थ अछि । एहेन समय, राज्य एवं राजनीति सँ उत्पन्न विभिन्न अवसर मे ‘मैथिलीभाषा’ अथवा ‘मिथिलासभ्यता’ किंवा ‘मैथिलएथनिसिटी’ आधारित कोनो अवसर कतहु नहि देल जाइछ आ न एहि अवधारणा सभक कतहु कोनो ठोस मान्यते स्थापित अछि । तखन, स्वतःस्फूर्त स्वयंसेवाक भावना सँ कार्यरत हजारों संघ-संस्था मिथिला व मैथिली केँ जिबन्त रखबाक लेल अपना तरहें जी-तोड़ कोशिश मे लागल अछि । हालांकि एहि संघ-संस्थो सभक प्रयास ‘ग्राउन्ड जीरो’ पर अत्यल्प, मुदा प्रवासक्षेत्र मे सर्वाधिक नजरि पड़ि रहल अछि ।
‘ग्राउन्ड जीरो’ मे अत्यल्प हेबाक पाछाँ वर्तमान राजनीति जाहि मे सरकारी खरात, पेन्शन, सुविधा, भत्ता, सत्ताक भाग मे ओझराकय रखबाक कारण भाषा, साहित्य, संस्कृति या सभ्यता प्रति सामाजिक जागरुकता नगण्य अथवा विरले कोनो-कोनो स्थान पर नजरि पड़ैछ । वैह प्रवासक्षेत्र मे सरकारी सुविधा आ खरातक लोभ सँ मुक्त मैथिलजन अपन भाषा, साहित्य, संस्कृति, सभ्यता, बाप-पुरखाक देल महत्वपूर्ण परम्परा सभक मूल्यांकन अत्यन्त सजगता सँ बुझैत-मनन करैत छथि, तेँ प्रवासक्षेत्र मे एकर रक्षार्थ बेसी गतिविधि सब भ’ रहल देखाइछ ।
वर्तमान समय मिथिला दुइ देश मे विभाजित अछि । दुनू सम्प्रभुतासम्पन्न राष्ट्र नेपाल व भारत केर हिस्सा थिक मिथिला । ठीक जेना अंग्रेज सब तमिल सम्प्रदाय केँ भारत-श्रीलंका मे विभाजित कयलक, पंजाबी सम्प्रदाय केँ भारत-पाकिस्तान मे विभाजित कयलक, बंगाली सम्प्रदाय केँ भारत-बांग्लादेश मे विभाजित कयलक – तहिना मैथिली, गढ़वाली, भोजपुरी आ अबधी भाषी समुदाय-सम्प्रदाय केँ भारत आ नेपाल मे विभाजित कयलक । हालांकि भारत-श्रीलंका, भारत-पाकिस्तान, भारत-बांग्लादेश सँ भिन्न भारत-नेपालक मित्रता ‘विशिष्ट स्वरूप’ मे कायम अछि, परञ्च ई कतेक समय धरि रहि सकत एकर कोनो गारन्टी नहि ।
हम केंद्रित छी मैथिल सम्प्रदायक मौलिक हक-हित आ दुइदेशीय अन्तर्सम्बन्धक दायरा मे मित्रता आ खुल्ला सीमाक अवस्था कायम राखक लेल । मैथिल पहिचान (एथनिसीटी) बरकरार राखय लेल, भाषा-साहित्य, संस्कृति-सभ्यता आ इतिहासक एक-एक पन्ना एक-एक व्यक्तिक मानसपटल मे ताजा रखबाक लेल, एहि क्षेत्रक आर्थिक, सामरिक, सामाजिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक आदि विभिन्न सरोकार पर लोकस्तरीय सेवा-योगदान लेल – हम सब ध्यानस्थ आ सेवारत छी । हमर सरोकारक विषय मे यदि हमरा ‘मैथिल प्रबुद्धजन’ केर समूहक जरूरी होयत त हम किनका आ केना चिन्हब, ई घोर समस्या मे फँसल छी । नहि त हमरा सभक कोनो थिंकटैंक ग्रुप अछि, नहिये पोलिटिकल कन्सर्न्स आ स्टेक्स डील करयवला कोनो समूह अछि – जे अछि से मोथी मे गछारल पोठी-टेंगरा-भूल्ला-गरइ-चेंगा माछ जेकाँ ! जेकर बल सँ कोनो ऊहिगर काज भ’ जाय त कल्याणे भेल बुझू ।
एहेन स्थिति-परिस्थिति मे ‘ग्लोबल मैथिल’ एकटा नव आशक जन्म दैछ । एकरा जिबन्त रखबाक लेल किछुए गोटे सही, मुदा आरम्भ करैत निरन्तरता मे ५ वर्ष राखि सकल छी – ई बहुत पैघ बात भेल । एतय चमचागिरी या तुष्टिकरणक पद्धति त कहियो चलिये नहि सकैछ, कारण पौराणिक इतिहास सँ कलियुग धरिक चौजुगी इतिहासक रक्षा ‘निरपेक्ष आचार-विचार एवं वास्तविक निःस्पृह कर्म’ मात्र सँ सम्भव छैक । जनक जेहेन मुक्तजीव केर परिकल्पना अदौकाल सँ जिबित छैक । तेँ, वगैर कोनो पक्षपाती आचार-विचार केवल सटीक डेग बढ़ेला सँ हम सब अपन लक्ष्यसन्धान मे सफलता हासिल करब । सब गोटे ध्यान एहि बातक राखय जाउ ।
हरिः हरः!!

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