लेख-विचार
– प्रवीण नारायण चौधरी
कथा आ वार्ता
(प्रवीणक अनुभव)
विवाह योग्य बेटीक पिता रूप मे वैवाहिक कथा-वार्ता बारे अपन किछु अनुभव सब लिखबाक इच्छा भेल अछि । ई बुझैत जे हमरे जेकाँ कतेको बेटा-बेटीक मातापिता केँ हमर ई अनुभव (विचार) सहितक लेख पढ़िकय बहुते रास शंका-दुविधाक समाधान भेटतनि, ई लेख प्रस्तुत कय रहल छी । आइ-काल्हि विवाह सम्बन्ध निर्धारण करब, यथोचित जोड़ी खोजब, खोजक उपरान्त वार्ता बिच्चे मे भंग होयब, सभक अलग-अलग प्राथमिकता आ जिबय के कला भिन्न होयब आदिक अवस्था सर्वविदिते अछि । पहिने अभिभावकीय भूमिकाक प्रधानता, विवाहक उमेर कम आ कन्याक वर-सासुर परिवार पर ‘निर्भरता’ आदिक अवस्था मे परिवर्तनक कतेको रास साइड इफेक्ट्स (इतर प्रभाव) सब छैक । एहेन अवस्था मे हताशा-निराशा आ अपन मोन मे कतेको रंगक कमी-कमजोरीक सामना करबाक द्वंद्व सब सम्भव छैक – जे कि पूर्णतया गलत छैक; ईश्वर मात्र विवाहक जोड़ी तय करैत छथिन ई कहावत सर्वथा सिद्ध छैक से मानि सब कियो हँसी-खुशी अपन जीवन जिबय जाय, एहि लेख केर मूल अभिप्राय यैह टा छैक ।
चूँकि विवाहक उम्र पहिने सँ भिन्न भ’ गेल अछि, मात्र उम्रे टा नहि अपितु वैवाहिक प्राथमिकता – गृहस्थी धर्मक निर्वहन – ब्राह्मण संस्कार आदि मे काफी परिवर्तन आबि गेल अछि । दिनानुदिन धर्मपथ – पारम्परिक व वैदिक निर्देशन अनुरूप मानव जीवन पटरी सँ उतरैत जा रहल अछि । चारूकात अन्हार आ तेकरा हंटेबाक लेल कृत्रिम प्रकाशक झलझली यानि खोखला (आडम्बरी) व्यवहारक भार त’र मानव समाज बिलाइत जा रहल अछि । एहेन स्थिति मे मातापिता एवं सन्तान सभक दृष्टि-चोन्हरी (झलफली) दूर करबाक लेल आध्यात्मिक दिग्दर्शन आ पौराणिक कथा-गाथा सँ विवेकक विचार व निर्णयक पहर थिक ई दुरुहकाल । शायद मदति करय हमर ई लेख । हम अपन सन्तान सब सँ सेहो विशेष मुखातिब (सम्बोधन करैत) आरो अभिभावक लोकनि लेल ई लेख समर्पित कय रहल छी ।
हमरा एक गोट कुलीन परिवार मे जन्म भेटल । हमर समस्त सन्तान सेहो हमरहि जेकाँ एकटा कुलीन परिवारक सन्तान कहाय, किछु तेहने प्रयास आजन्म करैत आयल छी । स्पष्ट कय दी जे कुलीन परिवार मे केकरो जन्म ओकर पूर्वजन्मक नीक कर्म व प्रारब्ध सँ मात्र सम्भव छैक । एकर प्रमाण जिबन्त छैक । गीताक छठम् अध्याय मे महान् अर्जुन भगवान् कृष्ण सँ अत्युत्तम प्रश्न पुछलनि आ तेकर जवाब श्रीकृष्ण द्वारा बहुत शानदार ढंग सँ देल गेल अछि । हम ई वार्तालाप संछेप मे उद्धृत् करय चाहब –
अर्जुन उवाच
अयतिः श्रद्धयोपेतो योगाच्चलितमानसः ।
अप्राप्य योगसंसिद्धिं कां गतिं कृष्ण गच्छति ॥ (३७)
कच्चिन्नोभयविभ्रष्टश्छिन्नाभ्रमिव नश्यति ।
अप्रतिष्ठो महाबाहो विमूढो ब्रह्मणः पथि ॥ (३८)
एतन्मे संशयं कृष्ण छेत्तुमर्हस्यशेषतः ।
त्वदन्यः संशयस्यास्य छेत्ता न ह्युपपद्यते ॥ (३९)
अर्जुन बजलाह –
“हे कृष्ण! प्रारम्भ मे श्रद्धा-पूर्वक योग मे स्थिर रहयवला, मुदा बाद मे योग सँ विचलित मनवला असफल योगी परम-सिद्धि केँ नहि प्राप्त कय केँ कोन लक्ष्य केँ प्राप्त करैछ ? परमात्माक प्राप्तिक मार्ग सँ विचलित भेल जे मनुष्य नहिये सांसारिक भोगे भोगि पेलक, आ न अहीं केँ प्राप्त कय सकल, एहेन मोह सँ ग्रसित मनुष्य कहीं छिन्न-भिन्न बादल जेकाँ दुनू दिश सँ नष्ट त नहि भ’ जाइछ ? हम अपने सँ प्रार्थना करैत छी जे हमर एहि संशय केँ सम्पूर्ण रूप सँ केवल अपने टा दूर कय सकैत छी कियैक तँ अहाँक अतिरिक्त आर कियो एहि संशय केँ दूर करयवला भेटब संभव नहि अछि ।”
एहि महत्वपूर्ण प्रश्न आ स्थिति मे हम बहुतो लोक अक्सर फँसल रहैत छी । कतबो प्रयास करैत छी, कतहु न कतहु मोहग्रसित भ’ गलती भ’ गेल करैछ । तदोपरान्त मन मे भय सेहो भेल करैछ जे आब की होयत । आब देखू जे अर्जुन केँ भगवान् कि जबाब देलनि अछि –
श्रीभगवानुवाच
पार्थ नैवेह नामुत्र विनाशस्तस्य विद्यते ।
न हि कल्याणकृत्कश्चिद्दुर्गतिं तात गच्छति ॥ (४०)
प्राप्य पुण्यकृतां लोकानुषित्वा शाश्वतीः समाः ।
शुचीनां श्रीमतां गेहे योगभ्रष्टोऽभिजायते ॥ (४१)
अथवा योगिनामेव कुले भवति धीमताम् ।
एतद्धि दुर्लभतरं लोके जन्म यदीदृशम् ॥ (४२)
तत्र तं बुद्धिसंयोगं लभते पौर्वदेहिकम् ।
यतते च ततो भूयः संसिद्धौ कुरुनन्दन ॥ (४३)
पूर्वाभ्यासेन तेनैव ह्रियते ह्यवशोऽपि सः ।
जिज्ञासुरपि योगस्य शब्दब्रह्मातिवर्तते ॥ (४४)
प्रयत्नाद्यतमानस्तु योगी संशुद्धकिल्बिषः ।
अनेकजन्मसंसिद्धस्ततो यात परां गतिम् ॥ (४५)
श्री भगवान् बजलाह – हे पृथापुत्र! ओहि असफ़ल योगी केँ नहिये एहि जन्म मे आ न ऐगले जन्म मे किन्नहुं विनाश होइत छैक, कियैक तँ हे प्रिय मित्र! परम-कल्याणकारी नियत-कर्म करयवला कहियो दुर्गति केँ प्राप्त नहि होइत अछि । योग मे असफ़ल भेल मनुष्य स्वर्ग आदि उत्तम लोक केँ प्राप्त भ’ कय ओहि मे अनेकों वर्ष धरि जाहि इच्छा सभक कारण योग-भ्रष्ट भेल छल, ओहि इच्छा सभक भोग कय केँ फेर सम्पन्न सदाचारी मनुष्यक परिवार मे जन्म लैत अछि । अथवा उत्तम लोक मे नहि जाकय स्थिर बुद्धिवला विद्वान् योगी केर परिवार मे जन्म लैत अछि, मुदा एहि संसार मे एहि तरहक जन्म निःसंदेह अत्यन्त दुर्लभ होइछ । हे कुरुनन्दन! एहेन जन्म प्राप्त कय केँ ओतय ओ पूर्व-जन्मक योग-संस्कार पुन: प्राप्त भ’ जाइत अछि आर वैह संस्कार सभक प्रभाव सँ ओ परमात्मा प्राप्ति रूपी परम-सिद्धि केँ प्राप्त करबाक उद्देश्य फेर सँ प्रयत्न करैत अछि। पूर्व जन्मक अभ्यासक कारण ओ निश्चित रूप सँ परमात्म-पथ दिशि स्वत: आकर्षित भ’ जाइत अछि, एहेन जिज्ञासु योगी शास्त्र सभक अनुष्ठानक उल्लंघन कय केँ योग मे स्थित भ’ जाइत अछि । एहेन योगी समस्त पाप-कर्म सँ शुद्ध भ’ कय अनेकों जन्मक कठिन अभ्यास सँ एहि जन्म मे प्रयत्न करैत परम-सिद्धि केँ प्राप्त करबाक पश्चात् परम-गति केँ प्राप्त करैत अछि ।
हम स्वयं केँ, सब सन्तान केँ, समस्त पाठकजन केँ सर्वप्रथम अपन उच्च संस्कार आ निष्ठा सदैव सर्वोपरि बनाकय रखबाक आग्रह करैत उपरोक्त अर्जुन-कृष्ण वार्ताक अंश राखल एहि लेख मे । आब अबैत छी – एहि संसारक अनेकों आडम्बरी आ खोखला व्यवहार मे, जे हमरा सब केँ यदाकदा आहत (मन दुःखी) कय देल करैत अछि । मनक दुःख नीक बात नहि छैक, अन्तर्मन केँ सदिखन दुविधा सँ दूर राखी । ईश्वर केँ धन्यवाद करी जे विवाह पूर्वहि केर वार्ता मे केकरो लोभ, मोह, क्रोध आदिक उदाहरण स्पष्ट भ’ गेल से नीके भेल । हमरा सब केँ चाहि लेला सँ केकरो जीवन आ मोनक अवस्था मे परिवर्तन नहि भ’ सकैत छैक । तेँ अपन साधुता मात्र केँ सदैव बरकरार रखबाक चेष्टा करी । अपना दिश सँ सेहो कोनो त्रुटि वा क्षुद्रता देखा जाय त तुरन्त पश्चाताप करी, प्रण ली जे दोबारा एहेन गलती नहि करब । संसार मे कियो पूर्ण नहि अछि, किछु न किछु त्रुटि सम्भव छैक । यैह परिस्थिति अर्जुन-कृष्ण वार्ता मे आयल अछि ।
एखन बेसी केस (प्रकरण) मे तुनुकमिजाजी आ अहंताक पराकाष्ठा बाधक बनि रहल छैक । सब कियो टका प्रधान मानि विवाह आ गृहस्थी केँ पहिल प्राथमिकता मे नहि रखबाक दुरुहकाल मे प्रवेश कयल बुझा रहल अछि । संसार मे एतेक बेसी संलिप्त भ’ गेल छी हम सब जे वगैर भौतिक आर्जन आ उपलब्धिक आत्मसम्मान-आत्मगौरव जेहेन स्थिति नहि अबैछ – ई भाष्य स्थापित भ’ गेल देखाइछ । एहेन स्थिति-परिस्थिति मे वैवाहिक सम्बन्ध निर्धारण लेल स्वाभाविके रूप सँ बेसी बात झूठ आ मक्कारीपूर्ण होइछ । १०० मे ८० बेइमान – फिर भी मेरा भारत महान – यैह नीति आ नीयति पर कायम छी हम सब । तेँ, निराशा आ दुःख कोनो हाल मे नहि आनू कियो गोटे ।
हमरा मोन पड़ैत अछि – अपन जेठ बहिनक विवाह । ईश्वी १९८५ ! बहिनक मैट्रिक परीक्षा भेलैक आ माँ पिताजी सँ दिनहुं कथा देखय, बात बढ़बय, घटकैती लेल दबाव बनाबय लागल । ‘काका’ (हम पिताकेँ जेठ पितियौतक लाट मे काका कहियैन) बड़ ‘जपी-तपी’ लोक रहथि, ओ जबाब देल करथिन – से कनी बेसी जोर सँ दहाड़ैत, “चुप रहू, बड बजैत छी । कनियां-पुतराक खेल छियैक की विवाह-दान? भगवान् केँ जहिया इच्छा हेतनि, स्वतः भेटि जायत कथा ।” एम्हर हमर माँ लक्ष्मणजी जेकाँ रामजी सँ “कि भैया, दैव-दैव आलसी पुकारा, दैवक भरोसे कतहु समुद्र बाट देत? निकालू बाण आ सोखि लियह समुद्र केँ ।” तहिना जिद्द करनि, आ पिताजी बस अपन शरणागतवत्सल भगवान् पर सब किछु छोड़ि देल करथि । सही समय पर सब काज भेलनि । ओझाजी रूप मे हमर परिवार लेल स्वयं विष्णु भगवान् भेटि गेलाह । पिताजीक अटूट विश्वास सँ बिल्कुल हुनकर सोचक अनुरूपहि सबटा काज भेल ।
निष्कर्षतः – विवाह एकटा अलौकिक सम्बन्ध होइत छैक । एकर निर्णय स्वयं ईश्वर तय करैत छथिन । वैवाहिक वार्ताक कतबो अम्बार लागि जाय, लिखलहबे जोड़ी संग सब बात तय होइत छैक । ईश्वर सर्वोपरि – ईश्वर मे आस्था सर्वोपरि ।
सभक लेल शुभकामना ! लेख लम्बा भेल, लिखबाक आरो इच्छा छल, मुदा बात झँपले-तोपले बुझय जाउ । दोसर दिन आरो खोलिकय लिखय कहब त लिखि देब । मुदा बहुत गोटे आहत सेहो हेताह, तेँ आइ सैद्धान्तिक-आध्यात्मिक विम्ब पर आधारित ई लेख सब कियो स्वच्छ हृदय सँ आ स्वस्थ मानसिकता राखिकय पढ़य जायब । अपने बच्चा सभक बहाने सभक बच्चा लेल ई लेख राखल । सब बच्चा केँ आशीर्वाद !!
हरिः हरः!!
