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बरसाईत पावनि मे नव पबनैतिनक संग सब अईहब वटवृक्षमे जल अवश्य ढ़ारै छथि

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लेख विचार
प्रेषित: आभा झा
श्रोत: दहेज मुक्त मिथिला समूह
लेखनी के धार ,बृहस्पतिवार साप्ताहिक गतिविधि
विषय :- वटसावित्री व्रत : मिथिला संस्कृति मे नारी शक्ति आ श्रद्धाक प्रतीक

भारतीय संस्कृति मे व्रत-त्योहार सभक बहुत गहिंर महत्व अछि। मिथिला, जे अपन सांस्कृतिक आ धार्मिक परंपराक लेल प्रसिद्ध अछि, ओहि में वटसावित्री व्रत एक महत्वपूर्ण स्थान रखैत अछि। ई व्रत स्त्रीक समर्पण, प्रेम आ पतिव्रता धर्मक प्रतीक अछि, जे विशेष क’ मिथिलाक विवाहित महिलासभ द्वारा अत्यंत श्रद्धा आ विधिपूर्वक मनाओल जाइत अछि।

व्रतक पौराणिक कथा
वटसावित्री व्रतक मूल कथा महाभारतक वनपर्व मे भेटैत अछि। कथा अनुसार, राजा अश्वपति केर पुत्री सावित्री अत्यंत सुंदर, विदुषी आ पतिव्रता स्त्री रहथि। हुनक विवाह एक वनवासी राजकुमार सत्यवान सँ भेल। विवाहक बाद सावित्री केँ ज्ञात भेल जे सत्यवान अल्पायु छथि। तथापि, ओ अपन प्रेम आ विश्वास सँ पति केँ मृत्यु सं बचेबाक संकल्प लेने रहैथ। यमराज द्वारा सत्यवानक प्राण ल’ जाइत काल, सावित्री अपन धैर्य, बुद्धि आ निष्ठा सँ यमराज केँ प्रसन्न कएने छलीह आ पति केँ जीवनदान दिएली। एहि कथा पर आधारित ई व्रत महिलासभ द्वारा अपन पति केर दीर्घायु आ सौभाग्य लेल राखल जाइत अछि।

मिथिला में व्रतक विशेष महत्व
मिथिलांचल मे वटसावित्री व्रत केँ बहुत श्रद्धा आ उत्साह सं मनाओल जाइत अछि। विवाहिता महिलासभ एहि दिन लाल वस्त्र, सिंदूर, चूड़ी, टिकुली, पायल, आ आलता सँ सजि अपन सौभाग्यक प्रतीक रूप मे उपस्थित होइत छथि।

ई व्रत मिथिला मे केवल धार्मिक अनुष्ठान नहि, बल्कि नारी सशक्तिकरण, पारिवारिक मूल्य आ लोकसंस्कृतिक संग संग नारीक आत्मबल केर अभिव्यक्ति सेहो अछि।

वटवृक्षक पूजा विधि
व्रत केर प्रमुख केंद्र बिंदु वटवृक्ष (बरगदक गाछ) अछि। मिथिला में वटवृक्ष केँ त्रिदेव – ब्रह्मा, विष्णु आ महादेव – केर प्रतीक मानल जाइत अछि। स्त्रीगण वटवृक्ष केर चारू कात कच्चा सूत (डोरी) सँ सात बेर परिक्रमा करैत छथि, आ प्रत्येक बेर पति केर दीर्घायु आ सुख-शांति लेल कामना करैत छथि। व्रतकाल में बरगद गाछ के समक्ष पूजा सामग्री – फल, फूल, पान, सुपारी, चूड़ा-दही, मिठाई, दूब, अक्षत, आ धूप-दीप, बीयैन आदि सँ पूजा कएल जाइत अछि।

सावित्री-सत्यवान कथा श्रवण
वटवृक्षक पूजा सँ पूर्व या उपरांत महिलासभ समूह मे बैसि कऽ सावित्री-सत्यवानक कथा सुनैत छथि। कथाकेँ श्रवण सँ महिलासभ में धैर्य, प्रेम आ पति पर श्रद्धा केर भावना प्रबल होइत अछि।

कहल जाइत अछि —
“सावित्री जेकाँ पतिव्रता, सत्यवान सन पति सदा।
यम सन मृत्युो हारि गेल, प्रेम केर विजय सदा।”

लोकजीवन में व्रतक स्थान
मिथिला मे व्रतक संग कई लोकगीत, कहावत आ रीति-नीति जुड़ल अछि। विवाहिता महिलासभ कहैत छथि —
“बरगद बाबा, दिय वरदान, पिया रहए सुखी, मोर सिन्दूर रहए उजियार।”
एहि व्रत मे सामूहिकता देखल जाइत अछि। स्त्रीगण सभ एक दोसर सँ सिंदूर दान करैत छथि, आपस मे सौभाग्यक शुभकामना दैत छथि, आ व्रतक उपरांत प्रसाद ग्रहण करैत छथि।

आधुनिक सन्दर्भ मे व्रतक अर्थ
आजुक बदलैत समय में वटसावित्री व्रत केवल परंपराक निर्वाह मात्र नहि रहि गेल अछि, बल्कि ई नारीक आत्मबल, सामाजिक एकता आ सांस्कृतिक चेतना केर प्रतीक बनि गेल अछि।
ई व्रत नवपीढ़ी के ई सीख दैत अछि जे –
“श्रद्धा, प्रेम आ निष्ठा सं असंभव सेहो संभव बनैत अछि।”

 

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