लेख विचार
प्रेषित: कीर्ति नारायण झा
लेखनी के धार, दहेज मुक्त मिथिला
साप्ताहिक गतिविधि बृहस्पतिवार
विषय : कोनो काज प्रयोजन में लेन देन
लेन देन आ ब्यवहारक आदान प्रदान – मनुख के विषय मे कहल जाइत छैक जे ओ एकटा सामाजिक प्राणी होइत छैथि। अपना सभक ओहिठाम सामाजिक सहयोग सँ कठिन सँ कठिन काज के आसान बना देल जाइत छलैक आ सामाजिक सहयोग दुनू दिस सँ होइत छलैक कारण थोपड़ी दुनू हाथ सँ बजैत छैक। एहि सम्बन्ध के मजबूत करबाक लेल अनेक प्रकारक गतिविधि कयल जाइत छैक जेना उपनयन संस्कार मे मरबा बनहाइ सँ लऽ कऽ रातिम धरि समाजक लोक संग रहैत छैथि। बियाह दान में कुर्सी टेबुल चौकी शामियाना सँ लऽ कऽ भोजन के व्यवस्था इत्यादि मे समाजक लोक उपस्थित रहैत छैथि। स्त्रीगण सभ ओहि काजक आंगन मे जा कऽ गीत नाद गबैत छैथि आ सभटा निःस्वार्थ भाव सँ, मात्र एकटा आशा रहैत छैन्ह जे हुनको काज में लोक सभ एहिना उपस्थित रहैथि।
एहि प्रकारक लेन देन अथवा ब्यवहार केर कोनो मूल्य नहिं होइत छैक, इ अनमोल होइत छैक। एगारह, एकावन, एक सौ एक रूपैया नव वधू के आशीर्वाद स्वरूप रूपया सँ नववधू बहुत धनीक भऽ जयतीह से संभव नहिं हँ ओहि आशीर्वाद सँ हुनक बैवाहिक जीवन अवश्य सुखमय भऽ जेतैन्ह। नव कनियाँ के अयला पर अथवा बेटी के द्विरागमन सँ पहिले अपना सभक मैथिल समाज मे खाइक देवाक ब्यवस्था छैक जे इ संदेश दैत छैक जे नववधू जे अपन सासुर अयलीह अछि ओ समस्त टोल आ गामक वधू छथिन्ह तहिना बेटी जे द्विरागमन कऽ कऽ सासुर जयतीह हुनक नैहर समस्त गाम छियन्हि नहिं की एकमात्र माय बापक परिवार। अर्थात बेटी पुतोहु के टोल समाज के होयवाक संकेत दैत इ ब्यवहार समस्त मैथिल समाज के एकसूत्र में बान्हवाक लेल मूल मंत्र अछि। नीक ब्यवहार सँ केहनो केहनो संघर्ष के जीतल जा सकैत अछि आ एकर विपरीत अव्यवहारिक लोक के कतहु कोनो महत्व नहिं……मिथिलाक व्यवहार जगप्रसिद्ध अछि। पहिले के जमाना मे भार आ भरिया के पांती लागल रहैत छलैक एकर अतिरिक्त काज अथवा प्रयोजन नहियों भैलाक उपरांतो लोक अपना ओहिठाम सँ किनको भूखले नहिं पठबैत छलखिन्ह….मुंडन अथवा जनेऊ भेला पर बरुआ के मामागाम सँ वस्त्र अबैत छैक, इ सभ व्यवहार थिकै मिथिला के।
