लेख विचा
प्रेषित: आभा झा
लेखनीकेँ धार दहेज मुक्त मिथिला
साप्ताहिक गतिविधि बृहस्पतिवार
विषय : कोनो काज प्रयोजन (उपनयन, मुड़न, विवाह आदि) में लेन-देन आ व्यवहार –
मैथिल समाजमें पारंपरिक संस्कारक बड्ड महत्व अछि। उपनयन, मुड़न, विवाह जेकाँ काज केवल सामाजिक कर्तव्य नहि, बल्कि आत्मीयता, संस्कृति आ आपसी संबंधकेँ गहिंर प्रतीक मानल जाइत अछि। एहेन अवसर पर जे व्यवहार आ लेन-देन होइत अछि, ओ एक दिस रीति-रिवाज आ परंपराक पालन करैत अछि, त’ दोसर दिस परिवार आ समाजकेँ जोड़ैत सेहो अछि।
कोनो संस्कार जेना उपनयन (जनेऊ), मुड़न (पहिल बेर केश कटाई), आ विवाहमें आमंत्रण सँ ल’ क’ आतिथ्य, वस्त्र, दहेज, आ भेट-उपहार तक जे लेन-देन होइत अछि, ओ भावनात्मक आ सामाजिक आधार पर टिकल होइत अछि। जेठ भाय, समधी, सखा, आ देयाद संग जे व्यवहार कएल जाइत अछि, तकर आधार सद्भाव, आदर आ प्रतिष्ठा होइत अछि।
विवाहमें विशेष क’ लेन-देनकेँ रूप अत्यधिक देखल जाइत अछि। कन्या पक्ष द्वारा वर पक्षकेँ प्रति आदरस्वरूप वस्त्र, आभूषण, सामर्थ्यानुसार उपहार देल जाइत अछि। यद्यपि समयक संग किछु ठाम एहि लेन-देनकेँ रूप विकृत भ’ गेल अछि – जाहिमें दहेज रूपी बोझ समाजमें समस्या बनि गेल अछि – मुदा परंपरागत रूपमें ई व्यवहार पारिवारिक स्नेह आ आत्मीयताकेँ द्योतक मानल जाइत छल।
एहि प्रकारक काज प्रयोजनमें आमंत्रण पत्र पठा क’ लोक सभकेँ बुजाओल जाइत अछि, जतय प्रत्येक अतिथिकेँ आदरपूर्वक स्वागत करब, भोजन करेबा, आ अंगवस्त्र देब – एहेन व्यवहार संस्कारक आवश्यक अंग मानल जाइत अछि। उपनयनमें गुरुजन आ विद्वान सभकेँ निमंत्रण, आ हुनका द्वारा वरकेँ शिक्षा आ आशीर्वाद देब सेहो एक विशेष प्रकारक लेन-देन अछि – जे ज्ञान आ अनुभवक आधार पर होइत अछि।
मुड़न संस्कारमें बालककेँ प्रथम केश कटाई करबाक अवसर पर संबंधिक आ पड़ोसी सभकेँ बजाओल जाइत अछि। ओ सभ अपन-अपन सामर्थ्यानुसार भेट दैत छथि, जे मात्र भौतिक वस्तु नहि, बल्कि स्नेह आ आशीर्वादक प्रतीक होइत अछि। एहि प्रकारक अवसर पर जे मान-सम्मान आ व्यवहार होइत अछि, ताहि पर पूरा समाजमें परिवारक प्रतिष्ठा निर्भर करैत अछि।
कुल मिला कऽ कहल जा सकैत अछि जे मैथिल समाजक एहेन संस्कारिक आयोजन केवल धार्मिक काज नहि, बल्कि सामाजिक एकता, आपसी संबंध, आ पारिवारिक परंपराक पोषण करैत अछि। एहि लेन-देन आ व्यवहारमें प्रेम, सहयोग आ सम्मानक आदान-प्रदान होइत अछि, जे अपनत्व भावनाकेँ गहिंर करैत अछि। जौं ई व्यवहार स्नेह संग कएल जाए, त’ संस्कारकेँ सार्थकता बढ़ि जाइत अछि।
अंततः कहल जाए त लेन-देन या व्यवहार अपन स्थान पर उचित अछि, मुदा ओतबे समय तक जखन तक ओ स्नेह, सद्भाव आ सहयोग के प्रतीक बनल रहय। जँ ओ दिखावा, बोझ आ तुलनाकेँ रूपमें परिवर्तित भ’ जाए, त समाजक लेल ई हानिकारक सिद्ध होइत अछि। अतः हमरा सभकेँ चाही जे एहेन संस्कार सभक मूल भावनाकेँ बुझी आ सादगी, समता आ प्रेम स’ संग मनाबी।
