लेख विचार
प्रेषित: आभा झा
श्रोत : लेखनीकेँ धार, दहेज मुक्त मिथिला
साप्ताहिक गतिविधि,बृहस्पतिवार
विषय : लघुकथा : – दहेजक दंश
शिखा गामक एक तेज-तर्रार लड़की छलीह। पढ़ाईमें अव्वल, संस्कारमें आदर्श। पिता रमेश बाबू, प्राथमिक स्कूलमें शिक्षक छलाह। छोट परिवार, मुदा स्वाभिमानी।
शिखा स्नातकके बाद शिक्षक बनि गेलीह। रमेश बाबू सोचलखिन – “बेटी कमाइत अछि, जँ योग्य वर भेटत त’ अपन कमाइ सँ घर चला सकैत अछि, की जरूरत छै दहेज देबाक?”
गामक एक परिवार सँ बात भेल – लड़का, आलोक, बैंक मे नौकरी करैत छलाह। शुरुमे सब सामान्य छल। आलोकक परिवार कहलखिन – “हमरा दहेज नै चाही, शिखा नीक लड़की छैथ।”
विवाह भ’ गेलनि।मुदा विवाहक किछु सप्ताह बाद शिखाक जीवन बदलि गेलनि। सासु कहय लगलखिन –”बड़का घड़िया देलकौ? ई कोन ठेठही जकाँ जेवर छै? हमर बेटा बैंकमे अफसर छै, हमरो समाजमें देखाबै के छै।”
आलोको बदल’ लागल। कहए –
“हमरा ऑफिसक मित्र सब कहैत अछि – पत्नी डॉक्टर या इंजीनियर होइत, त कमाइओ होइत। तैं हम सोचलौं जे अहाँक सैलरी त’ बहुत कम अछि, त’ कम सँ कम दहेज त’ नीक भेटतै।”
शिखा बुझि गेलीह – प्रेम आ सम्मान मात्र दिखावा छल। दिन-ब-दिन ताना, मानसिक पीड़ा, कहियो कहियो मारि सेहो।
रमेश बाबू बेटीक तकलीफ देख नै सकलखिन। कहलखिन –
“बेटी, बड्ड भेल। तोहर आत्मसम्मान सब सँ पैघ अछि। चल, घुरि चल।”
शिखा चुप रहलि। फेर कहलखिन –
“हम भागि नै सकैत छी। हमर आब एकटा निर्णय जे दोसर लड़कीके जीवन बर्बाद होइ सँ बचा सकत।”
ओ कानूनी सहायता लेलनि। घरेलू हिंसा आ दहेज प्रताड़ना केर केस केलक। समाजमें बहुत लोक हँसल, किछु आलोचना केलक, मुदा बहुतो बेटी शिखा सँ हिम्मत पएलक।
मामला कोर्ट गेल। सबूत, डॉक्टरी रिपोर्ट, कॉल रिकॉर्डिंग सब देल गेल। आलोक आ ओकर परिवार पर कानूनी कार्रवाई भेल। शिखा डिवोर्स केलनि, फेर सँ अपन जीवनक शुरुआत केलनि।
कालांतरमें, ओ महिला सहायता केंद्रमें काउंसिलर बनि गेलीह। पीड़ित महिलाक मदद करए लगली।
गामक मंच सँ ओ कहलखिन –
“दहेज सिर्फ धन नै छी, ई बेटीक सपना, आत्मा, आ इज्जत लूटै’ के तरीका बनि गेल अछि। विरोध जरूरी छै, आवाज उठाऊ – चुप्पी अपराधक हिस्सा छी।”
संदेश:शिखाक कहानी एखनहुँ हजारों बेटीक वास्तविकता छी। दहेजक दंश सिर्फ शरीर नै, आत्मा के घायल करैत अछि। मुदा जँ एक बेटी आवाज उठाबैत छै, त सैकड़ो बेटीक जीवन बचि जाइत अछि।
