स्वाध्याय
– प्रवीण नारायण चौधरी
कविचन्द्र विरचित मिथिलाभाषा रामायण
उत्तरकाण्ड – दोसर अध्याय
रावण आदिक तपस्या, वर पायब तथा विवाहादिक कथा
।जयकरी छन्द।
अथ एक समय तहाँ वित्तेश । राजित पिता वास जहि देश ॥१॥
पुष्पक चढ़ल भानु-सम राज । राज-राज सम्राज विराज ॥२॥
तनिकर विभव देखल सतमाय । नाम केकसी अवसर पाय ॥३॥
रावण काँ से देल देखाय । कतय अहाँ कहाँ धनपति भाय ॥४॥
करु गय सुत अहँ तेहन उपाय । होउ हुनक सन कर्म्म बढ़ाय ॥५॥
शुनि रावण मन बाढ़ल कोप । कयल प्रतिज्ञा मन आरोप ॥६॥
तनि सन होयब हम की बाढ़ि । करब तपस्या साहस गाढ़ि ॥७॥
माता मन नहि चिन्ता करब । मनस्ताप सभटा हम हरब ॥८॥
रावण सानुज बनि मुनिवर्ण । फल-सिध्यर्थ गेला गोकर्ण ॥९॥
तप दुष्कर मे दृढ़ मन धयल । निज निज नियम तिनू जन धयल ॥१०॥
दश हजार गत भय गेल वर्ष । कुम्भकर्ण तप कयल सहर्ष ॥११॥
कयल विभीषण तप बड़ गाढ़ । एक चरण-भर रहला ठाढ़ ॥१२॥
वर्ष बीति गेल पाँच हजार । सत्य-धर्म्म-रत सद्व्यवहार ॥१३॥
दिव्य सहस्र वर्ष हठ ठानि । कर तप रावण अन्न न पानि ॥१४॥
एक सहस्र पूर्ण हो वर्ष । होम करथि शिर अनल सहर्ष ॥१५॥
नव सहस्र वत्सर गत काल । नव शिर होम करथि दशभाल ॥१६॥
काटय लगला निज कर माथ । दौड़ि द्रुहिण तनिकर धर हाथ ॥१७॥
वर मांगू रावण हम वृत्त । तप दुष्कर सौँ होउ निवृत्त ॥१८॥
होइ अमर वर समरहु मारि । देवासुर सौँ कहल विचारि ॥१९॥
नाग सुपर्ण आदि जे यज्ञ । समर न हारब हुनक समक्ष ॥२०॥
मानव तृण सम हेतु कि लड़त । चिउटी गजक पाद-तल पड़त ॥२१॥
कहल तथास्तु कयल ततकाल । वत्स सुमुनि अहँ छी दशभाल ॥२२॥
जय गोट कयल होम शिर आगि । सभटा नव नव जायत लागि ॥२३॥
अक्षय हयत जाउ सुख वास । अहँ काँ सभक मिटायत त्रास ॥२४॥
गेला विभीषण भक्त समाज । कहल विरञ्चि माँगु वर आज ॥२५॥
विनत विभीषण जोड़ल हाथ । धर्म्महिँ बुद्धि रहय नित नाथ ॥२६॥
कहल विरञ्चि तथास्तु उदार । रावण-अनुजक सत्याचार ॥२७॥
विधि सन्तुष्ट अमरता देल । सज्जन वचन सत्य शुनि लेल ॥२८॥
कुम्भकर्ण-तट गेला जखन । सुरपति काँ वार्त्ता भेल तखन ॥२९॥
थर थर सकल देव-गण काँप । कुम्भकर्ण बुझि उग्र-प्रताप ॥३०॥
जौँ विधि हिनकाँ देल वरदान । एक मुनिक नहि बाँचत प्राण ॥३१॥
जयता सभकाँ सत्वर खाय । चलु चलु जतय शारदा माय ॥३२॥
विधि करइत छथि बड़ अन्याय । देवि शारदा होउ सहाय ॥३३॥
कुम्भकर्ण काँ कण्ठ समाउ । हमरा सभहिक प्राण बचाउ ॥३४॥
भावार्थः
एक समय धनेश पुष्पकविमान पर चढ़िकय सूरज समान चमकैत ओतय विराजमान रहथि जेतय पिता हुनका वास देने रहथि । मौका पाबिकय हुनकरी सौतेली माता केकसी हुनकर वैभव देखलनि । ओ अपन पुत्र रावण केँ देखौलनि आ कहलनि – “कतय तूँ आ कतय तोहर भाइ धनेश । हे पुत्र, तूँ सेहो एहेन उपाय करे जाहि सँ तोरा अपन कर्मक बल पर हुनकर बराबरी कय सकें ।” ई सुनिकय रावणक मन आइन सँ भरि गेलैक । ओ अपन मन मे दृढ़ संकल्प कयलक – “हम हुनका समान कि, गहींर तपस्या आ साहस कय केँ हुनकहु सँ बेसी उन्नति कय केँ देखायब । हे माता, अहाँ मन मे चिन्ता जुनि करू । हम अहाँक मोनक सब सन्ताप दूर कय देब ।” छोट भाइ कुम्भकर्ण आ विभीषणक संग रावण मुनिक वेश धारण कय अपन कामना पूरा करबाक लेल गोकर्ण नामक तीर्थ गेल । तीनू अपन-अपन नियम सभक पालन करैत कठोर तपस्या मे लागि गेल । दस हजार वर्ष बीति गेल, कुम्भकर्ण अथक रूप सँ तप करैत रहल । विभीषण त ताहू सँ कड़ा (कठोर) तपस्या कयलक । ओ एक्के टाँग पर ठाढ़ रहि गेला । पाँच हजार वर्ष बीति गेल । ओ सत्यक धर्म मे लागल रहलाह तथा सुन्दर व्यवहार कयल करथि । रावण तँ अन्न आ जल सेहो त्यागिकय देवता लोकनिक वर्षक हिसाब सँ एक हजार वर्ष साहसपूर्वक तपस्या करैत रहल । प्रत्येक एक हजार वर्ष पूरा भेला पर रावण हर्षक संग अपन एकटा सिर काटिकय आगि मे हवन कय दैत छल । एहि तरहें नौ हजार वर्ष बीति गेलैक आर रावण अपन नौ गोट सिर केँ हवन कय देलक । जखन दसम सिर सेहो एहि तरहें काटय लागल तखन ब्रह्मा दौड़िकय अयलाह आर ओकर हाथ पकड़ि लेलनि । ओ कहलनि – “हे रावण, अहाँ वर माँगू । हम देबाक लेल तैयार छी । आब आगाँ कठिन तपस्या छोड़ू ।” रावण सोचि-विचारिकय कहलकनि – “एहेन वर देल जाउ जे युद्ध मे हमरा न देवता मारि सकथि आ न दानव । नाग, सपर्ण, यक्ष आदि जे सब प्राणी अछि तेकर सामने त हम लड़ाइ मे कहियो हारिये नहि सकैत छी । मनुष्य त हमरा सोझाँ तिनका बराबर अछि । ओ सब हमरा सँ कि लड़त । ओकरा सब केँ तँ ओहिना मसैल देबैक जेना हाथीक पैरक नीचाँ चुट्टी ।” ब्रह्मा कहलनि – “हे वत्स रावण, अहाँ वास्तव मे मुनि छी । जतेक सिर सब केँ अहाँ हवन कयलहुँ ओ सब फेर सँ नव सिर रूप मे जुड़ि जायत । अहाँ जाउ आ अक्षय भ’ सुखपूर्वक रहू । अहाँ केँ केकरहु डर नहि रहत ।” तखन ब्रह्मा भक्त विभीषण लग गेलाह आ कहलनि – “अहाँ वर माँगू ।” विभीषण झुकिकय हाथ जोड़िकय कहलनि – “हे प्रभु, हमरा यैह वर देल जाउ जे चित्त सदिखन धर्म मे लागलय रहय ।” दयालु ब्रह्मा कहलनि – “एहिना होबय” । रावणक छोट भाइ विभीषण केर यैह सच्चाइ थिकन्हि । ब्रह्मा प्रसन्न भ’ कय हुनका अमर हेबाक वर देलनि । सज्जन विभीषण अमर होयबाक सत्य बात सुनि लेलनि । जहिना ब्रह्मा कुम्भकर्ण लग पहुँचलाह तहिना इन्द्र केँ खबैर भ’ गेलनि । सब देवता लोकनि भयभीत भ’ काँपय लगलाह । ओ सब जनैत रहथि जे कुम्भकर्णक प्रताप बड बेसी उग्र छैक । ओ सब सोचय लगलाह – “जँ ब्रह्मा एकरा वरदान दय देता त एकहु टा मुनिक प्राण नहि बाँचत । ई त सब केँ झटपट खा जायत । चलू, आब हमरा लोकनि माँ सरस्वती लग चली ।” ओ सब सरस्वती लग जाकय कहलनि – “ब्रह्मा बड़ा अनर्थ करय जा रहला अछि । हे देवी सरस्वती, अपने हमरा लोकनिक मदति कयल जाउ । अपने कुम्भकर्णक वाणी मे समा जाउ आर हमरा लोकनिक प्राण बचाउ ।” ॥१-३४॥
।सोरठा।
कहल विधाता आबि, कुम्भकर्ण वर माँगु अहँ ॥३५॥
मन-वाञ्छित फल पाबि, जाउ छोड़ि घर कठिन तप ॥३६॥
कण्ठ शारदा-वास, कुम्भकर्ण माँगल तखन ॥३७॥
सभ सुर-मन हो त्रास, की मँगताह विरञ्चि सौँ ॥३८॥
भावार्थः
ब्रह्मा आबिकय कहलनि – “हे कुम्भकर्ण, अहाँ वर माँगू, मन मे जे कामना हो ओ पाबिकय कठोर तपस्या केँ छोड़ि घर चलि जाउ ।” गला मे जखन सरस्वती आबिकय बैसि गेलखिन, तखन कुम्भकर्ण वर माँगलक । सब देवता लोकनिक मन मे आतंक रहनि जे ओ ब्रह्मा सँ कि न कि वर माँगि लेत ॥३५-३८॥
।जयकरी छन्द।
निद्रा मे बीतय षट मास । एक दिन भोजन विषय-विलास ॥३९॥
विधि देलनि वर से तहिठाम । हृष्ट देव जपि देवी नाम ॥४०॥
गेलि सरस्वति मुख बहराय । कुम्भकर्ण लगला पछताय ॥४१॥
शुनल सुमाली विधि-वरदान । पलटल हमर भाग्य भगवान ॥४२॥
प्रहस्तादि काँ सङ्ग लगाय । भय सौँ रहित चलल बहराय ॥४३॥
मिलि मिलि रावण परिचय कहल । वत्स बहुत दिन दुख हम सहल ॥४४॥
आज पुरल अछि मन-अभिलाष । हरषैँ कनयित गदगद भाष ॥४५॥
लङ्कहिँ छल छी गेलहुँ पड़ाय । अहँक माय काँ एतहि नड़ाय ॥४६॥
हम दुख सहब अहँक सन नाति । रक्षा करु राखू निज जाति ॥४७॥
क्रम क्रम सकल चरित से कहल । बड़ सम्पति छल किछु नहि रहल ॥४८॥
हमरा सबहिँ रसातल रहब । अपनैँक विभव पाबि दुख सहब ॥४९॥
धनदक ओतय समाद पठाउ । अथवा बल सौँ हुनि उपटाउ ॥५०॥
राजा काँ सम्बन्ध कि भाय । राजा दैवक दोसर न्याय ॥५१॥
भावार्थः
ओ ई वर माँगलक – “यैह वर देल जाउ जे हम छः मास निन्द मे बिताबी, मात्र एक दिन भोजन आ विषय-भोग करी ।” ब्रह्मा एहेन वर तुरन्त दय देलखिन्ह । देवता लोकनि प्रसन्न भ’ कय भगवती सरस्वतीक नाम जपय लगलाह । सरस्वती मुँह सँ जहिना निकललखिन्ह आ कि कुम्भकर्ण पछताय लागल । सुमाली सुनलक जे ब्रह्मा अमुक-अमुक वरदान देलखिन, ओ प्रसन्न भ’ कय बाजल – “भगवान आब हमर भाग्य पलटा देलनि ।” प्रहस्त आदि केँ संग लय केँ ओ बिना कोनो डर केँ निकलिकय चलि देलक । रावण सँ बेर-बेर मिलिकय ओ अपन परिचय देलक – “हे वत्स, हम बहुत दिन धरि दुःख झेललहुँ । आइ हमर मोनक कामना पूर्ण भेल ।” – हर्ष सँ कनैत आ भरल गला सँ ओ कहलक – “हम लंके मे रही । अहाँक माता केँ कतहु छोड़िकय हम भागि गेल रही । अहाँ जेकाँ नाति केर रहैत हम दुःख झेली ई ठीक नहि अछि । अहाँ आब हमरा सभक रक्षा करू तथा अपन कुल केर प्रतिष्ठा बचाउ ।” धीरे-धीरे ओ अपन सब कहानी सुनौलक – “बहुत धन-सम्पत्ति छल, मुदा आब त किछु नहि रहि गेल । कि हम सब रसातले मे रहब आर अहाँक विभव केँ पाबियोकय हम सब दुःखे झेलैत रहब ? धनेश केँ समाद दियौन जे ओ हंटि जाइथ, अथवा हुनका एतय सँ बलपूर्वक हंटा दियौन । राजा सब केँ भाइचारा नहि होइत छन्हि । राजा आर देवताक अलग रास्ता होइत छन्हि ।” ॥३९-५१॥
।रूपमाला छन्द।
कहल दशमुख कथा शुनि, शुनि थिकथि धनपति भाय ॥५२॥
ज्येष्ठ गुरुतर बड़ तपस्वी, करब नहि अन्याय ॥५३॥
हुनक सन के भाय हमरा, देखु आँखि पसारि ॥५४॥
अछि बनल घर विश्व भरि, अरि कर समर के मारि ॥५५॥
भावार्थः
ई सुनिकय रावण कहलक – “धनेश हमर भाइ छथि । ओ हमरा सँ पैघ छथि, पैघ तपस्वी सेहो छथि । हुनका प्रति हम अन्याय नहि करब । आँखि खोलिकय देखू, हुनका समान हमर कोन भाइ छथि ? संसार भरि मे घर बहुतो जगह बनल अछि । एहि लेल शत्रु सँ युद्ध मे कियो माइर कियैक करत ?” ॥५२-५५॥
।चौपाइ।
तखन प्रहस्त कहल तहिठाम । शुनु प्रभु रावण अहँ गुणधाम ॥५६॥
शुनल शूर काँ नहि सौभ्रात्र । अतिशय कठिन धर्म्म थिक क्षात्र ॥५७॥
सुर राक्षस थिक कश्यप-तनय । तनिकाँ एक घड़ी नहि बनय ॥५८॥
अर्थी काँ किछु अर्थे सूझ । शूर सहोदर काँ नहि बूझ ॥५९॥
कहइतछी नहि वचन अशुद्ध । देव असुर काँ हेतु कि युद्ध ॥६०॥
रावण वचन गेला पतिआय । मानल मन कहइत अछि न्याय ॥६१॥
रावण कोप नयन बड़ लाल । कहलनि करब असुर प्रतिपाल ॥६२॥
ई वृत्तान्त कहल नहि माय । ज्ञात भेल हम करब उपाय ॥६३॥
गिरि त्रिकूट पर रावण जाय । देलनि दूत प्रहस्त पठाय ॥६४॥
कहब धनाधिप निकट समाद । हमरा हुनका कोन विवाद ॥६५॥
हमरा मातामहक निवास । त्यागथु लङ्का जौँ मन त्रास ॥६६॥
कहलनि धनपति आबथु बेश । कतहु बसब गय बड़ गोट देश ॥६७॥
स्वस्ति स्वस्ति रावण लङ्केश । आबथु पुर मे करथु प्रवेश ॥६८॥
धनपति छोड़ल लङ्कागाम । रावण आबि गेल तहिठाम ॥६९॥
दशमुख कयलनि लङ्का-वास । मन्त्री सहित रहित-मन-त्रास ॥७०॥
पुछलनि धनद पिता काँ जाय । लङ्का सौँ अयलहुँ बहराय ॥७१॥
छोड़ि देल रावण काँ धाम । कयल न एक वचन सङ्ग्राम ॥७२॥
जाउ कहाँ से भेट निदेश । कहल पिता जत देव महेश ॥७३॥
आज्ञा शुनि गेला कैलास । कयल तपस्या कत दिन वास ॥७४॥
तुष्ट महेश देल वरदान । अलका तनिकाँ वासस्थान ॥७५॥
शिव-पालित भेला दिकपाल । मित्र महेशक भाग्य विशाल ॥७६॥
भावार्थः
तखन मंत्री प्रहस्त तुरन्त बजलाह – “हे प्रभु रावण, सुनू । अहाँ परम गुणवान् छी । सुनल अछि जे वीर पुरुष केँ भाइचारा नहि होइत छन्हि । राजाक कर्तव्य छात्र-धर्म बहुत कठिन होइत अछि । देव आ दानव दुनू कश्यप केर सन्तति छथि, हुनका सबकेँ आपस मे एकहु घड़ी मेल नहि रहैत छन्हि । जे अर्थ (सांसारिक अभ्युदय) चाहयवला छथि हुनका केवल अर्थ देखाय दैत छन्हि । विर पुरुष एहेन नहि सोचैत अछि जे ई हमर सहोदय भाइ थिकाह ।” ताहिपर रावण कहलकनि – “अहाँक कहब गलत नहि अछि । देवता आ दानव मे लड़ाइ केर कारण कि अछि ?” रावण प्रहस्तक बातक कायल (बात सँ बहुत बेसी प्रभावित) भ’ गेल । मन मे सोचलक जे ई ठीक कहैत अछि । बस फेर कि छल, रावणक भीतर क्रोध जागि गेलैक । ओकर आँखि लाल भ’ गेलैक । ओ बाजल – “हम असुर सभक रक्षा अवश्य करब । एहेन बात त माँ कहियो नहि कहने छल । आब पता चलल । हम प्रतिकार करब ।” एना कहिकय रावण त्रिकूट पर्वत पर गेल आ प्रहस्त केँ दूत बनाकय पठौलक तथा कहलक – “धनेश लग हमर ई समाद पहुँचाउ जे हमरा मे आ हुनका मे कोनो विवाद नहि अछि । लंका हमर नानाक निवास थिक । हुनका जँ मन मे कनिकबो डर होइन्ह त ओ लंका छोड़ि देथि ।” ई सुनिकय धनेश कहलनि – “ठीक अछि, ओ आबय चाहथि त आबथि । दुनिया बड़की टाक छैक । हम कतहु जाकय बसि जायब । कल्याणक संग रावण आबथि, लंकाक राजा बनथि । नगर मे प्रवेश करथि ।” ई कहिकय धनेश लंका छोड़ि देलनि आ रावण ओतय आबि गेल । रावण मंत्री-सहित निःशंक भ कय लंका मे रहय लागल । ओम्हर धनेश पिता (विश्रवा) सँ जाकय पुछलनि – “हम त लंका केँ छोड़िकय चलि अयलहुँ । ओ स्थान रावण लेल छोड़ि देलहुँ । एको आखर (शब्द) केर विवाद नहि कयलहुँ । आब आज्ञा देल जाउ जे हम कतय जाउ ?” पिता कहलनि – “अहाँ ओतय जाउ जेतय भगवान् शिव छथि ।” पिताक आज्ञा सुनिकय ओ कैलास चलि गेलाह । बहुतो दिन धरि ओहिठाम रहिकय तपस्या कयलनि । शिवजी प्रसन्न भ’ कय हुनका वरदान देलनि जे हुनका निवास हेतु अलकापुरी भेटतनि । शिव केर संरक्षण पाबिकय ओ दिक्पाल बनि गेलाह, शिव केर मित्र भेलाह आ हुनकर भाग्य चमैक गेलनि ॥५६-७६॥
।सोरठा।
सकल लोक सन्ताप, कर रावण निज-गण-सहित ॥७७॥
दिन दिन बाढ़ प्रताप, निश्शंसय मन नहि मरण ॥७८॥
भावार्थः
एम्हर अपन दल-बल सहित रावण सब लोक केँ सताबय लागल । ओकर पराक्रम दिन-पर-दिन बढ़ैत गेलैक । ओकर मन मे मरबाक कोनो आशंका नहि रहलैक ॥७७-७८॥
।चौपाइ।
सूर्प्पनखा काँ भेल विवाह । कालखञ्ज सौँ बड़ उत्साह ॥७९॥
विद्यु ज्जिह्व तनिक छल नाम । मायाविनि बड़ लङ्कागाम ॥८०॥
मय देल रावण कन्या दान । मन्दोदरी नाम सविधान ॥८१॥
देलनि अमोघ शक्ति कर जाय । दितिसुत रावण जानि जमाय ॥८२॥
वैरोचन दौहित्री आनि । कुम्भकर्ण काँ देल सन्मानि ॥८३॥
वृत्रज्वाला कन्या नाम । लोक विदित छल अछि सभ ठाम ॥८४॥
धर्म्मराज शैलूष महान । तनिकाँ कन्या देल भगवान ॥८५॥
सरमा नाम विभीषण-दार । सकल सुलक्षण शोभागार ॥८६॥
भावार्थः
सूर्पनखाक विवाह खूब धूमधाम सँ कालखंज सँ भेलैक । ओहि कालखंजक नाम विद्युज्जिह्व (बिजली समान जीभवला) रहैक । लंका जादूक नगरी छल । मय मन्दोदरी नामक अपन बेटी विधानपूर्वक रावण केँ देलनि । दितिक पुत्र मय रावण केँ जमाइ बुझिकय अपन अमोघ शक्ति (कखनहुँ निशाना सँ नहि चूकयवला वरछी) देलनि । वैरोचन अपन दौहित्री (नातिन) केँ सम्मानपूर्वक कुम्भकर्णक संग ब्याहि देलनि । ओहि कन्याक नाम वृत्रज्वाला छल । ओ एहि नाम सँ सब जगह विख्यात छलिह । धर्मराज शैलूष केँ भगवानक कृपा सँ एकटा कन्या भेल छलन्हि, जिनक नाम सरमा छलन्हि । ओ सबटा शुभ लक्षण सँ युक्त आ सुन्दरी छलिह । हुनक विवाह विभीषण सँ भेलनि ॥७९-८६॥
।सोरठा।
पुत्र भेल बलवान, मन हर्षित मन्दोदरी ॥८७॥
गर्ज्जल मेघ-समान, मेघनाद तैँ नाम छल ॥८८॥
भावार्थः
मन्दोदरी केँ एकटा बेटा भेलन्हि । ओ खूब प्रसन्न भेलिह । ओ बच्चा बहुते बलशाली छल । जनमिते देरी ओ मेघ जेकाँ गरजल, तेँ ओकर नाम मेघनाद पड़लैक ॥८७-८८॥
।चौपाइ।
कुम्भकर्ण कह बड़का भाय । निद्रा सौँ ताकल नहि जाय ॥८९॥
रावण देल गुहा बनबाय । कुम्भकर्ण सुख सुतला जाय ॥९०॥
रावण भ्रमण करय लगलाह । सभटा करथि कर्म्म अधलाह ॥९१॥
मुनि सज्जन काँ मारथि जाय । रावण करथि बहुत अन्याय ॥९२॥
धनपति शुनल दशानन-कर्म्म । शिव शिव रावण करथि अधर्म्म ॥९३॥
कहा पठाओल दूत देआय । करु जनु रावण अहँ अन्याय ॥९४॥
शुनि रावण धनपति दिश टूटि । लेल जीति कत सम्पति लूटि ॥९५॥
पुष्पक रथक कयल से हरण । खल उपदेश करब थिक मरण ॥९६॥
यम ओ वरुण पुरी नर्भीति । रावण लेलनि सभ केँ जीति ॥९७॥
स्वर्ग्ग लोक रावण गेलाह । मघवा युद्धोद्दत भेलाह ॥९८॥
सकल देव सुरपति सङ्ग्राम । रावण काँ बाँधल तेहिठाम ॥९९॥
से शुनि मेघनाद तत जाय । देल पिताक बाँध कटबाय ॥१००॥
गञ्जन बन्धन बापक हेरि । देवराज काँ बाँधल फेरि ॥१०१॥
सुरपति बान्धल सङ्ग लगाय । पिता सहित हर्षित पुर जाय ॥१०२॥
ब्रह्मा अयला बुझि अन्याय । सुरपति काँ देल बाँध फोआय ॥१०३॥
वर दय ब्रह्मा अपना धाम । गेला जखना हे प्रभु राम ॥१०४॥
रावण बहुत लोक काँ जीति । रण साहस से कयल अनीति ॥१०५॥
भुज उठाय लेल गिरि कैलास । सकल लोक काँ बाढ़ल त्रास ॥१०६॥
नन्दीश्वर तत देलथिनि शाप । रावण तोहरा बाढ़ल पाप ॥१०७॥
हयतौ नर-वानर-कर मरण । काज न अयतौ दुष्टाचरण ॥१०८॥
अति उन्मत्त गेला एक काल । हैहयपट्टन गर्व्व विशाल ॥१०९॥
रावण काँ से बाँधल ततय । बहु अन्याय फलित हो कतय ॥११०॥
तत पुलस्त्य मुनि तहि थल जाय । कहि शुनि केँ देल बाँध कटाय ॥१११॥
बालिक ओतय कयल बल लाख । ओ धय राखल अपना काँख ॥११२॥
चारु समुद्र समुद्र घुमाय । षन्मासावधि देल अटकाय ॥११३॥
बड़ दुख काटल धयले धयल । बहरयला मिलि मैत्री कयल ॥११४॥
मारल रावण काँ प्रभु राम । रावणि काँ लक्ष्मण सङ्ग्राम ॥११५॥
कुम्भकर्ण गिरि-सन्निभ जीति । राखल विश्व चिरन्तन रीति ॥११६॥
अपनैँ नारायण भगवान । विभु विश्वम्भर सर्व्वनिदान ॥११७॥
नाभिकमल ब्रह्मा उत्पन्न । मुख सौँ अग्नि वचन संपन्न ॥११८॥
बाहुयुगल सौँ सभ जन-पाल । नयनैँ रवि शशि भेला विशाल ॥११९॥
दिशा विदिश कर्णहि सौँ जात । घ्राण सौँ प्राण वायु विख्यात ॥१२०॥
तथा अश्विनी युगल कुमार । जङ्घादिक सौँ लोकप्रचार ॥१२१॥
भेल उदर सौँ सागर चारि । स्तन सौँ वरुण तथा पाकारि ॥१२२॥
बालखिल्य-गण भेल उत्पन्न । उर्द्ध्वरेत सद्गुण-सम्पन्न ॥१२३॥
भेल मैढ़्र सौँ यम-उतपत्ति । गुद सौँ मरणक सर्व्व विपत्ति ॥१२४॥
अहँक कोप रुद्रक अवतार । अस्थि सौँ पर्व्वत अति विस्तार ॥१२५॥
कच सौँ जलद रोम सौँ सर्व्व । औषधि भेल अनन्त निखर्व्व ॥१२६॥
नख-संजात खरादिक भेल । अपनै विश्वरूपता लेल ॥१२७॥
स्थावर जङ्गम जत संसार । सभ अपनहिँ बाहर व्यवहार ॥१२८॥
भावार्थः
कुम्भकर्ण कहलक – “हे जेठ भाइ, हमरा त निन्द सँ आँखिये नहि खुजैत अछि ।” रावण एकटा गुफा बनवा देलक आ कुम्भकर्ण ओतय जाकय सुख सँ सुति रहल । रावण घूमय लागल आ सबटा कुकर्म करय लागल । मुनि आ भला लोक सब केँ जा-जाकय मारैत छल आ अन्याय करैत रहैत छल । धने रावणक करनी सब सुनलनि जे ओ बहुते रास पापकर्म सब कय रहल अछि । ओ दूत द्वारा समाद पठौलनि – “हे रावण, एहि तरहें अन्याय जुनि करू ।” सुनितहि देरी रावण आगि-बबूला भ’ गेल, (हुनका उपर) आक्रमण कय देलक, हुनकर सम्पत्ति आ पुष्पकविमान छीनि लेलक । दुष्ट केँ उपदेश देनाय मानू मृत्यु केँ नोत देनाय होइछ । ओ (रावण) यम आ वरुण केर नगरी मे पैसिकय सब केँ जीति लेलक । फेर रावण स्वर्गलोक पहुँचल आ इन्द्र सँ सेहो लड़य लेल तैयार भ’ गेल । इन्द्रक संग ओकर लड़ाइ मे देवता लोकनि मिलिकय रावण केँ ओतहि बाँधि रखलनि । खबर पाबिकय मेघनाद ओतय दौड़ि पहुँचल आ पिता केँ बन्धन सँ मुक्त कय लेलक । अपन पिताक गंजन करय आ बाँधय केर बदला चुकेबाक लेल ओ इन्द्र केँ बाँधि देलक । बँधायल इन्द्र केँ संग लेने पिता-सहित सहर्ष लंकापुरी आयल । रावण एतेक भारी अन्याय कयलक – से खबरि पाबिकय ब्रह्मा ओतय अयलाह आ इन्द्र केँ बन्धन सँ छोड़ाकय लय गेलाह । हे राम, जहिया सँ ब्रह्मा रावण केँ वर दय केँ ब्रह्मलोक गेलाह, तहिये सँ ओ साहसक संग लड़ाइ ठानिकय बहुतो केँ जितय आ अन्याय करैत रहल । कैलास पर्वत केँ अपन बाँहि पर उठा लेलक आ ओहि पर रहयवला सब त्रस्त भ’ उठलाह । ओतय शिव केर वृषभ नन्दीश्वर रावण केँ शाप देलनि – “अरे रावण, तोहर पाप बढ़ैत जा रहल छौक । नर आ वानर सब सँ तोहर मृत्यु हेतौक । कोनो दुष्टतापूर्ण कुकर्म तोरा काज नहि देतौक ।” एक समय ओ मतवाला भ’ कय भारी घमंडक संग हैहयपट्टन गेल । ओतय राजा हैहय ओकरा बाँधि रखलनि । अन्याय बहुते बेर नहि फबैत छैक । फेर पुलस्त्य मुनि केँ खबैर भेलनि त ओतय गेलाह हैहय सँ अनुनय-विनय कय केँ ओकरा बन्धन सँ छोड़ेलनि । फेर ओ (रावण) बालिक लग अपन बाहुबल देखबय गेल । बालि ओकरा काँख मे दबाकय राखि लेलनि । बालि ओकरा काँख मे दबेने चारू समुद्र घुमा अनलनि आ छः मास धरि काँखहि मे दबेने रखलाह । जखन काँख मे दबायल रावण बहुते कष्ट उठेलक तखन बालि सँ दोस्ती कय केँ हुनकर काँख सँ निकलल । रावण केँ युद्ध मे राम मारलनि आ रावणक पुत्र मेघनाद केँ लक्ष्मणजी मारलनि । पर्वतक समान विशालकाय कुम्भकर्ण केँ जीतिकय रामजी विश्व भरि मे सनातन परम्पराक रक्षा कयलनि । अपने भगवान् नारायण थिकहुँ । अपने सर्वव्यापी छी, सारा विश्व केर पालन करनिहार छी, आर सभक मूल-कारण छी । अहाँक नाभि-कमल सँ ब्रह्मा उत्पन्न भेल छथि, मुँह सँ अग्नि उत्पन्न भेल अछि, तथा वाणी उत्पन्न भेल अछि । अहाँक दुनू बाँहि सँ इन्द्र आदि लोकपाल उत्पन्न भेल छथि, आँखि सँ सूर्य आ चन्द्र उत्पन्न भेल छथि । अपनेक कान सँ आठ गोट दिशा उत्पन्न भेल अछि तथा नाक सँ प्राणवायु उत्पन्न भेल अछि । अहाँक जाँघ सँ अश्विनीकुमार उत्पन्न भेल छथि, ई सर्वविदित अछि । अहाँक पेट सँ चारि गोट समुद्र भेल अछि, स्तन सँ वरुण आ इन्द्र भेल छथि । अहीँ सँ सबटा बालखिल्य उत्पन्न भेल छथि जे अखंड ब्रह्मचारी छथि तथा सबटा सद्गुण सब सँ युक्त छथि । अपनेक लिंग सँ यम उत्पन्न भेल छथि तथा गुदा सँ मृत्युक सम्पूर्ण उपाधि उत्पन्न भेल अछि । अपनेक क्रोध सँ रुद्रक अवतार भेल, तथा अहाँक हड्डी सँ विशाल पर्वत सब बेल । अपनेक केश सँ मेघ उत्पन्न भेल आ अपनेक रोम सँ अनगिनती अरबों-खरबों वनस्पतिक उत्पत्ति भेल अछि । अपनेक नख (नह) सँ स्वर्ग आदि भेल अछि । एहि प्रकार सँ अपने विश्वरूप थिकहुँ । संसार मे जे किछु चल-अचल वस्तु सब अछि, सब अपनहिंक बाह्य व्यावहारिक सत्ता थिक ॥८९-१२८॥
।दोहा।
अपनैक बल पिब अमृत सुर, सकल यज्ञ मे जाय ॥१२९॥
भासमान रवि चन्द्रमा, अपनैँक भा काँ पाय ॥१३०॥
सर्व्वग नित्य अनन्त प्रभु, ज्ञान-विलोचन-दृष्ट ॥१३१॥
नहि देखथि अज्ञान-दृग, रवि काँ लोचन मृष्ट ॥१३२॥
देखयित छथि निजदेह मे, योगीजन परमेश ॥१३३॥
भक्ति-भावना ज्ञान-बल, सकल वस्तु सभ देश ॥१३४॥
भावार्थः
देवगण अपनहिंक बल पर सब यज्ञ मे आबिकय अमृत पिबैत छथि । अपनहिं सँ चमक पाबिकय सूरज आ चन्द्रमा प्रकाश दैत अछि । अपने सर्वत्र पहुँचयवला थिकहुँ, सदा रहयवला थिकहुँ, अन्तहीन थिकहुँ । अपनेक दर्शन केवल ज्ञानरूपी आँखि सँ होइत अछि । जेकर आँखि मे अज्ञान (माया) केर पट्टी बाँधल रहैछ, से अहाँ केँ ओहि तरहें नहि देखैछ जाहि तरहें आन्हर सूर्य केँ नहि देखि पबैछ । योगी लोकनि अपना शरीरहि मे अहाँ केँ भक्ति एवं ज्ञान केर बल सँ सब वस्तु व स्थान सब मे परमेश्वर-रूप मे देखैत छथि ॥१२९-१३४॥
।सोरठा।
क्षमब सकल अपराध, प्रभुक अनुग्रहवान हम ॥१३५॥
विरहित मायाबाध, अपनैँ सेवा-निरत रहि ॥१३६॥
बारंबार प्रणाम, कयल सकल मुनि मिलि ततय ॥१३७॥
कयल वचन विश्राम, रामक छथि देखथि सतत ॥१३८॥
भावार्थः
हे प्रभु ! अपने हमरा सभक अपराध केँ क्षमा करब । हम सब अपने सँ अनुगृहीत छी । अपने हमरा सब केँ मायाक बन्धन सँ अलग कयकेँ अपन सेवा मे लगाउ ।” ओतय सब मुनि लोकनि मिलिकय बेर-बेर प्रणाम कयलनि आ निरन्तर रामक झाँकी देखैत मौन (चुप) भ’ जाय गेलाह ॥१३५-१३८॥
।इति श्री चन्द्रकवि-विरचिते मिथिला-भाषा रामायणे उत्तरकाण्डे द्वितीयोऽध्यायः।
॥मैथिल चन्द्रकवि-विरचित मिथिलाभाषा रामायण मे उत्तरकाण्डक दोसर अध्याय समाप्त भेल॥
हरिः हरः!!

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Ravan aa hunkar 3nu Bhai apan apan budhhi vivek san prahma jee san aashirvad pabi k. Apan apan soch k anukul karma sab koro laglah. Ohi kram m ravan apan ochhi soch k karan atamk machbo laglah.
क्षमब सकल अपराध, प्रभुक अनुग्रहवान हम ॥१३५॥
विरहित मायाबाध, अपनैँ सेवा-निरत रहि ॥१३६॥
बारंबार प्रणाम, कयल सकल मुनि मिलि ततय ॥१३७॥
कयल वचन विश्राम, रामक छथि देखथि सतत ॥१३८॥
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