विचार
– प्रवीण नारायण चौधरी
गम्भीर चिन्तनक विषयः विवाहरूपी संस्कार केर बदहाली
(मैथिल-मैथिल परिवार बीच बढ़ैत दूरी मैथिलक विवाह मे भारी समस्याक कारक तत्त्व!)
मिथिलाक लोकसंस्कार मे सामुहिकता आ एकजुटता सँ पाबनि-तिहार मनबैत ‘आनन्द’ प्राप्तिक सूत्र निहित छैक । मुदा, दिनानुदिन ई सामुहिकता आ एकजुटताक सर्वनाश होइत जा रहल अछि कहब अतिश्योक्ति नहि होयत ।
भौतिकतावादक पराकाष्ठा नांघि रहल छी हम सब । टका भगवान् भ’ गेल । अभाव मे जिबि लेब, कम्मे मे पार लगा लेब, कोनो बातक लोभ नहि करब, एक साँझ भुखले रहि जायब मुदा केकरो सँ मांगब नहि… ई सब बात आजुक समय मे करब पूर्णतया असत्य त नहि मुदा ९९% सत्य जरूर भ’ गेल अछि ।
ई पक्का मकान, महला पर महलाक ऊंचाई, रंग-बिरंगक डिजाइन, एक सँ बढिकय एक गाड़ी… तहिना खाय आ पहिरय लेल सेहो एक पर एक वेरायटी प्रति बढ़ि रहल आकर्षण…. शुद्धता-सात्विकताक घोर अभाव आ ऐँठ-कुइठ किछो भोजन करब, पञ्चदेव पूजा तक नहि करब, तुलसी मे जल तक नहि ढारब, भगवान्-भगवती अदृश्य छथि त हुनकर कोन मोजर… एहि सब तरहक नास्तिकता अपनायब…. लाज-लेहाज आ पाप-पुण्यक विचार सब ताख पर राखब… बहुतो तरहक परिवर्तन ओहिना साफ देखा दय रहल अछि ।
खास कय केँ हमर उमेर समूह (५० वर्ष आसपास) के लोक त अपन बाल्यकाल आ युवाकाल मे जे मिथिला समाज देखने छी, से त नहिये टा भेटत । हमर बाल्यकाल मे सेहो पुरान लोक सब कहथि जे जमाना बदैल रहल छैक । एकटा बड लोकप्रिय गीत सेहो सुरेश पंकज केर आवाज मे प्रसिद्ध भेल छल । ‘जमाना सीटसाट के, जमाना फीटफाट के…’! ताहि समय बड हँसिकय-मखरिकय सुनल करी । आब ओहि समय केर तुलना आजुक समय सँ करैत छी त आर बेसी बदलल देखि रहल छी ।
आब आउ मूल मुद्दा पर –
जमाना त अपन गति सँ बदलिये रहल अछि, लेकिन एहि मे सब सँ बेसी प्रभावित भ’ रहल अछि ‘विवाह’ जेहेन पवित्र संस्था । जीवनक जरूरी अनुबन्ध, स्त्री-पुरुषक संसर्गक ठोस संस्कार प्राप्ति थिक विवाह । गृहस्थी धर्मक अनिवार्य कर्मरूपी व्यवहार आ सृष्टि केँ निरन्तरता हेतु मूल सम्बन्ध निर्माणक आधार थिक ‘विवाह’ ।
आब प्रथम विवाह ‘टका’ संग होबय लागल अछि । भौतिकतावादक कुरूप चेहरा एतहि स्पष्ट देखा रहल अछि । लड़का हो वा लड़की – सब पहिने टका कमेनाय मूल धर्म बुझि रहल अछि । विवाहक महत्व खत्म !! आब रजस्वला धर्म प्राप्त पुत्रीक पिता केँ रक्तपानक पाप वला शास्त्रीय विधान गेल छप्पर पर । टकाक महत्ता एतबा अधिक जे वगैर टका कमेने आ टका कमाय योग्य भेने, नीक पैकेज भेने, विवाह रूपी महत्वपूर्ण संस्कारक कोनो माइन-मोजर नहि ।
आर, यैह भौतिकतावादक दोसर कुरूपता ई अछि जे विवाह लेल सजातीयता सेहो टका केर टर्म मे स्थापित भ’ गेल । आब कुलीनता आ संस्कार आदिक निरीक्षण मे प्रथमतः टका सर्वोपरि बनि जेबाक कारण स्वजाति, स्वसंस्कृति, स्वभाषा, गताते परिवार, सुसंस्कृत आ उच्च कुल-मूल केर परिवार आदि सब छप्पर पर उरिया गेल । आर त आर, स्वयं केर माता-पिता तक केँ सम्मान नहि राखल जा रहल अछि वर्तमान युग मे ।
विवाहक समस्याक निदान केर चिन्तनक क्रम मे एकटा आर पैघ चिन्ताक विषय अभरल अछि । मैथिल परिवारक बच्चा सब गैर-मैथिल परिवार मे बेसी आकर्षित होबय लागल अछि । एकर जड़ि मे जायब त पता चलत जे मैथिल-मैथिल बीच टेढ़ी आ अपन धन-बुद्धिक घमन्ड सँ नजदीकी नहि रहि गेल अछि । सब अपनहि मे टकाक मद सँ – अपन बुद्धिक मद सँ फुचियायल अबस्था अछि । एहि चलते मैथिल परिवारक बच्चा सब गैर मैथिल परिवार दिश बेसी झुकाव देखा रहल अछि ।
हम सब अपन सन्तान केँ उच्च सँ उच्च शिक्षा दियेबाक लेल संसार मे खुल्ला छोड़ैत छी । ओ सब अन्यान्य संस्कृति-भाषा-धर्मक लोक सभक संग-संग अपन शिक्षा ग्रहण करबाक यात्रा पूरा करैत रहैत अछि । ओ सब मैथिल परिवार सँ बेसी गैर-मैथिल परिवारक बात-विचार बुझय लगैत अछि । एम्हर अपन माय-बापक स्थिति एहने रहैत छैक जे गाम-घर सँ कटल रहैत छैक ।
अपन स्वजन परिवार ओतय पर्यन्त कोनो काज-प्रयोजन भेल त ओहि मे लोक सहभागी नहि भ’ पबैत अछि । सहोदर भाइ तक सँ सम्बन्ध निर्वाह करब आजुक भौतिकतावादी युग मे दुर्लभ रहैत छैक । एहेन कतेको कारण सँ बच्चा सब जीवन, परिवार, स्वजाति, स्वभाषा, स्वधर्म आदिक महत्व नहि बुझि अपन २५ वर्षक न्यूनतम् वैवाहिक उमेर मे अलगे निर्णय करब पसिन करय लागल अछि । ई घोर चिन्ताक विषय थिक ।
एकर समाधान मैथिल-मैथिल परिवार बीच आपेकता बढ़ेबाक उपक्रम अपनेनाय आवश्यक अछि । वैवाहिक परिचय सभाक आयोजन हर जगह पर करब आवश्यक अछि । जहिना मैथिल ब्राह्मण समाज पहिने ४२ स्थान पर सभावास करैत वैवाहिक समस्याक निदान ताकथि, ठीक तहिना फेरो सभावासक आवश्यकता अछि । विवाहक उमेर एहि भौतिकतावादक युग मे घटायब सम्भव नहि बुझाइछ । त, अन्य विकल्प पर सोचब आवश्यक अछि ।
हरिः हरः!!
