विचार
– प्रवीण नारायण चौधरी
सीताजीक कलियुगी वकील अक्सर देखय मे अबैत अछि जे सीताजीक अग्नि-परीक्षा, सीताजी पर अनावश्यक शंका आ लोकनिन्दा, राजा रामचन्द्र द्वारा पत्नीरूपी सीताक गर्भवती अवस्था मे परित्याग, पुनः धर्म-कर्म मे सीताजीक स्थान पर मूर्तिरूपी सीताक प्रयोग कय कर्मकाण्ड पूरा करबाक उद्धरण, लव-कुश द्वारा स्वयं केँ श्री रामचन्द्र केर पुत्र रूप मे प्रस्तुति उपरान्त पुनः सीता सँ प्रमाण रखबाक सन्दर्भ आ तदनुसार सीताक धरती मे समेबाक कठोर प्रमाणक प्रस्तुति – एहि सब विन्दु पर श्री रामचन्द्र पर फौदारी चलबयवला कय गोट वकील सब एम्हर-आम्हर नजरि आबि गेल करैत अछि। हमरा नहि पता जे ओ सब वास्तव मे कतेक गहींर आ भावपूर्ण अध्ययन कएने रहैत अछि, मुदा एहि गोटेक प्रसंग मे अधजल गगरी छलकल जाय वाली कहावत मात्र सिद्ध करैत देखाइत अछि। ओहेन वकील सब सँ हम आह्वान करय चाहब जे अध्ययन पूरा करू। रामायण केँ बुझबाक चेष्टा करू। मनुष्य थिकहुँ त मस्तिष्क सही दिशा मे उपयोग करू। अन्यथा अपना त भ्रष्ट होइते छी, समाजहु केँ भ्रष्ट करबाक निन्दनीय कार्य करबाक दोषी होयब। तेँ, एहि सँ बचू।
रामायण कथा मे श्री रामचन्द्र असुर रावण केर वध कय अपहृता सीता केँ मुक्त करैत अयोध्या अबैत छथि, राजगद्दी पर विराजमान होइत छथि, रामराज्य संचालन होबय लगैत अछि, प्रजा आ समस्त जीवमंडल सँ ब्रह्माण्डीय अनन्त लोक धरि सुखे-सुख पसरल छल। आइयो लोक कामना करैत अछि जे राम राज्य आबय। भक्त हृदय सदिखन सीताराम-सीताराम नाम जप करैत रहैत अछि। जहाँ-तहाँ मन्दिर, बाग-बगीचा, गाछ-वृक्ष – सब तैर सिर्फ आ सिर्फ ‘सीताराम’ केर स्वरूप देखैत अछि।
तखन फेर अचानक श्री रामजी प्रति लक्षित अनेकों सवाल ठाढ़ करब आ मोन मे दोषभाव आनब ततेक योग्यता किनका आ केना-केना अबैत अछि? एहि सवालक जवाब स्वयं ताकू।
तर्क-कुतर्क कय केँ प्रभु श्री सीताराम केर दर्शन आ स्मरण करब त कथमपि भक्ति परिपूर्ण नहि भ’ सकत। दोसर बात, रामकथा कहनाय-सुननाय केर एकटा निश्चित इतिहास वर्णित छैक। महादेव अपन श्रीमुख सँ पार्वती केँ वर्णन कयलनि। काकभुशुन्डिजी द्वारा गरुड़जी केँ रामकथा सुनायल गेल। याज्ञवल्क्यजी सँ भरद्वाजजी सुनलनि। वाल्मीकिजी श्री सीताराम भगवान् केर समकालीन रहथि, हुनका द्वारा पहिने तँ सीताजीक दुइ पुत्र लव व कुश केँ सुनाकय अयोध्यावासी धरि सीताक वास्तविकता आ फेर स्वयं केँ श्रीरामक पुत्र रूप मे परिचय देबाक कथा आयल अछि, आर फेर हुनकहि लिखल रामायण केँ मूल आधार बनाकय विभिन्न कवि व स्रष्टा लोकनि रामायणक अनेकों रूप लिखलनि अछि।
कहियो वाल्मीकि रामायण हाथ मे लय कय पढ़ब त पता चलत जे वर्तमान स्वरूप मे कतेको अंश ‘प्रक्षिप्त’ यानि ‘जोड़ल गेल’ कहिकय वर्णित अछि। एहि तरहें श्रीरामकथा मे जोड़ल गेल बात सब केँ आधार बनाकय स्वयं अपन ईष्टदेव प्रति सवाल उठेनाय कथमपि उचित नहि छैक। मनन करय जाउ।
आ, जँ सवालहि केर भाव मे भक्ति करबाक इच्छा सँ कियो सीता आ राम बीच रेखा खींचबाक प्रयत्न करैत छी त अवश्य करू। ध्यान ई राखब जे मनुष्य रूप मे श्री राम आ सीताजीक प्रस्तुति मनुष्यहि केँ बाट देखेबाक लेल भेल। जतबा कष्ट वनवास आ राक्षस सभक सामना करैत श्री सीता, श्री राम आ श्री लक्ष्मण उठौलनि – जहिना ओ सब वनवासी लोक आ जीव केँ धर्मक रक्षा लेल संगठित कय केँ असुर प्रजाति केँ हरौलनि, आ फेर अन्त मे नगरवासी मनुष्यक बीच मे अयलाह आ फेर शुरू भ’ गेल सीताक परीक्षा, पुरुषवादी वर्चस्व, सीताक निर्वासन आ अन्त मे सीताक अन्तिम परीक्षा जे जँ हम सब जीवन मे केवल आ केवल श्रीरामक भार्या मात्र रहल छी त हे पृथ्वी माता, अहाँ फाटू आ हमरा अपन कोरा मे स्थान दिय’, से कहिकय पृथ्वी मे समा गेलीह; पुनः श्री राम सेहो मनुष्यलोक केँ अपन जन्मक अभिप्राय अन्त होयबाक अनुभूति दैत बिना सीता एक पल एहि पृथ्वी पर नहि रहबाक प्रण कयलनि आ तदनुसार जलसमाधि लय अपन जीवनलीला अन्त कयलनि – एहि सब सन्दर्भ मे उच्चकोटिक ज्ञान राखिकय चिन्तन-मनन करू।
हरिः हरः!!
