स्वाध्याय
– प्रवीण नारायण चौधरी
गीताक छठम् अध्याय पर आधारित
अध्याय ६ – आत्म संयम योग
अनाश्रितः कर्मफलं कार्यं कर्म करोति यः ।
स सन्न्यासी च योगी च न निरग्निर्न चाक्रियः ॥ (१)
श्री भगवान कहलनि – जे मनुष्य बिना कोनो फल केर इच्छा सँ अपन कर्तव्य बुझिकय कार्य करैत अछि, वैह संन्यासी छी आर वैह योगी छी, नहि त अग्नि केँ त्यागयवला टा संन्यासी होइत अछि आ नहिये कार्य सब केँ त्यागयवला मात्र योगी होइत अछि। (१)
न ह्यसन्न्यस्तसङ्कल्पो योगी भवति कश्चन ॥ (२)
हे पाण्डुपुत्र! जेकरा संन्यास कहैत छैक, ओकरे अहाँ योग (परब्रह्म सँ मिलन करबयवला) बुझू, कियैक तँ इन्द्रिय-सुख (शरीर केर सुख) केर इच्छाक त्याग कयने बिना कहियो कियो लोक योग (परमात्मा) केँ प्राप्त नहि कय सकैत अछि। (२)
योगारूढस्य तस्यैव शमः कारणमुच्यते ॥ (३)
मन केँ वश मे करबाक इच्छा वला लोक केँ योग केर प्राप्तिक लेल कर्म करब कारण होइत छैक, आर योग केँ प्राप्त होइत-होइत सब सांसारिक इच्छा केर अभाव भ’ गेनाय टा कारण होइत छैक। (३)
सर्वसङ्कल्पसन्न्यासी योगारूढ़स्तदोच्यते ॥ (४)
जखन मनुष्य सब सांसारिक इच्छा केँ त्यागि कय, नहि त शारीरिक सुख लेल कार्य करैत अछि, आ न फल केर इच्छा सँ कार्य मे प्रवृत होइत अछि, ताहि समय ओ लोक योग मे स्थित कहाइत अछि। (४)
आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः ॥ (५)
मनुष्य केँ चाहियैक जे ओ अपन मन द्वारा अपन जन्म-मृत्यु रूपी बन्धन सँ उद्धार करबाक प्रयत्न करय, आर अपना केँ निम्न-योनि मे नहि खसय दियए, कियैक तँ यैह मन टा जीवात्माक मित्र थिक, आर यैह जीवात्माक शत्रु सेहो थिक। (५)
अनात्मनस्तु शत्रुत्वे वर्तेतात्मैव शत्रुवत् ॥ (६)
जे मनुष्य मन केँ वश मे कय लैत अछि, ओकर वैह मन परम-मित्र बनि जाइछ। लेकिन जे मनुष्य मन केँ वश मे नहि कय पबैछ, ओकरा लेल वैह मन परम-शत्रु समान होइछ। (६)
शीतोष्णसुखदुःखेषु तथा मानापमानयोः ॥ (७)
जे मन केँ वश मे कय लेने अछि, ओकरा परम-शान्ति स्वरूप परमात्मा पूर्ण-रूप सँ प्राप्त भ’ जाइत छथि, ओहि मनुष्य लेल सर्दी-गर्मी, सुख-दुःख आर मान-अपमान एक समान होइत छैक। (७)
युक्त इत्युच्यते योगी समलोष्टाश्मकांचनः ॥ (८)
एहेन मनुष्य स्थिर चित्तवला आर इन्द्रिय केँ वश मे कय केँ, परमात्माक ज्ञान द्वारा परमात्मा केँ प्राप्त कय केँ, पूर्ण सन्तुष्ट रहैत अछि, एहेन परमात्मा केँ प्राप्त भेल मनुष्यक लेल माइट, पाथर आर सोना एक समान होइत छैक। (८)
साधुष्वपि च पापेषु समबुद्धिर्विशिष्यते ॥ (९)
एहेन मनुष्य स्वभाव सँ सभक हित चाहयवला, मित्र आ शत्रु मे, तटस्थ और मध्यस्थ मे, शुभ-चिन्तक आ ईर्ष्यालु मे, पुण्यात्मा और पापात्मा मे सेहो एक समान भाव राखयवला होइत अछि। (९)
एकाकी यतचित्तात्मा निराशीरपरिग्रहः ॥ (१०)
एहेन मनुष्य निरन्तर मन सहित शरीर सँ कोनो वस्तु केर प्रति आकर्षित भेने बिना आ कोनो वस्तु केँ संग्रह कएने बिना परमात्माक ध्यान मे एक्के टा भाव सँ स्थित रहयवला होइत अछि। (१०)
नात्युच्छ्रितं नातिनीचं चैलाजिनकुशोत्तरम् ॥ (११)
उपविश्यासने युञ्ज्याद्योगमात्मविशुद्धये ॥ (१२)
योगक अभ्यास लेल मनुष्य केँ एकान्त स्थान मे पवित्र भूमि मे नहिये बेसी ऊँच आ न बेसी नीचाँ, कुश केर आसन पर मुलायम वस्त्र या मृगछाला बिछाकय, ओहि पर दृढ़ता-पूर्वक बैसिकय, मोन केँ एक बिन्दु पर स्थित कयकेँ, चित्त आर इन्द्रिय सभक क्रिया केँ वश मे राखैत अन्तःकरण केर शुद्धिक लेल योग केर अभ्यास करबाक चाही। (११,१२)
सम्प्रेक्ष्य नासिकाग्रं स्वं दिशश्चानवलोकयन् ॥ (१३)
मनः संयम्य मच्चित्तो युक्त आसीत मत्परः ॥ (१४)
योग केर अभ्यास लेल मनुष्य केँ अपन शरीर, गर्दनि तथा सिर केँ अचल आर स्थिर राखिकय, नासिकाक आगू भाग पर दृष्टि स्थित कयकेँ, एम्हर-ओम्हर आन दिशा सब केँ बिना देखने, बिना कोनो भय सँ, इन्द्रिय विषय सँ मुक्त ब्रह्मचर्य व्रत मे स्थित, मोन केँ खुब नीक जेकाँ शान्त कयकेँ, हमरा (भगवान्) केँ अपन लक्ष्य बनाकय आर हमरहि आश्रय भ’ कय, अपन मोन केँ हमरहि मे स्थिर कयकेँ, मनुष्य केँ अपन हृदय मे हमरे टा चिन्तन करबाक चाही। (१३,१४)
शान्तिं निर्वाणपरमां मत्संस्थामधिगच्छति ॥ (१५)
एहि तरहें निरन्तर शरीर द्वारा अभ्यास कयकेँ, मन केँ परमात्मा स्वरूप मे स्थिर कयकेँ, परम-शान्ति केँ प्राप्त भेल योग मे स्थित मनुष्य मात्र सबटा सांसारिक बन्धन सँ मुक्त भ’ कय हमर परम-धाम केँ प्राप्त कय पबैत अछि। (१५)
न चाति स्वप्नशीलस्य जाग्रतो नैव चार्जुन ॥ (१६)
हे अर्जुन! योग मे स्थित मनुष्य केँ नहि तँ अधिक भोजन करबाक चाही आ न कम भोजन करबाक चाही, नहि त बेसी शयन (सुतबाक) चाही, आ हरदम जागिते रहबाक चाही। (१६)
युक्तस्वप्नावबोधस्य योगो भवति दुःखहा ॥ (१७)
नियमित भोजन करयवला, नियमित चलयवला, नियमित जीवन निर्वाह लेल कार्य करयवला और नियमित सुतयवला योग मे स्थित मनुष्य सबटा सांसारिक कष्ट सँ मुक्त भ’ जाइत अछि। (१७)
निःस्पृहः सर्वकामेभ्यो युक्त इत्युच्यते तदा ॥ (१८)
योग मे स्थित मनुष्य केँ योग केर अभ्यास द्वारा विशेष रूप सँ मन जखन आत्मा मे स्थित परमात्मा मे टा विलीन भ’ जाइत अछि, तखन ओ सब तरहक सांसारिक इच्छा सब सँ मुक्त भ’ जाइत अछि, ओहि समय ओ पूर्ण रूप सँ योग मे स्थिर कहल जाइत अछि। (१८)
योगिनो यतचित्तस्य युञ्जतो योगमात्मनः ॥ (१९)
उदाहरण लेल जेना बिना हवावला स्थान मे दीपक केर लौ बिना एम्हर-ओम्हर भेने स्थिर रहैत अछि, तहिना योग मे स्थित मनुष्य केर मन निरन्तर आत्मा मे स्थित परमात्मा मे स्थिर रहैत अछि। (१९)
यत्र चैवात्मनात्मानं पश्यन्नात्मनि तुष्यति ॥ (२०)
योग केर अभ्यास द्वारा जाहि अवस्था मे सब प्रकारक मानसिक गतिविधि सब रुकि जाइत अछि, ओहि अवस्था (समाधि) मे मनुष्य अपनहि आत्मा मे परमात्मा केँ साक्षात्कार कयकेँ अपनहि आत्मा मे मात्र पूर्ण सन्तुष्ट रहैत अछि। (२०)
वेत्ति यत्र न चैवायं स्थितश्चलति तत्त्वतः ॥ (२१)
तखन ओ अपन शुद्ध चेतना द्वारा प्राप्त करबा योग्य परम-आनन्द केँ शरीर सँ अलग जनैत अछि, आर ओहि अवस्था मे परमतत्व परमात्मा मे स्थित ओ योगी कहियो विचलित नहि होइत अछि। (२१)
यस्मिन्स्थितो न दुःखेन गुरुणापि विचाल्यते ॥ (२२)
परमात्मा केँ प्राप्त कयकेँ ओ योग मे स्थित मनुष्य परम-आनन्द केँ प्राप्त भ’ कय एहि सँ अधिक आन कोनो सुख नहि मानैत भारी सँ भारी दुःखहु सँ कनिकबो विचलित नहि होइत अछि। (२२)
स निश्चयेन योक्तव्यो योगोऽनिर्विण्णचेतसा ॥ (२३)
मनुष्य केँ चाही जे दृढ़-विश्वास केर संग योग केर अभ्यास करैत समस्त सांसारिक संसर्ग सँ उत्पन्न दुख सब सँ बिना विचलित भेने योग समाधि मे स्थित रहिकय कार्य करय। (२३)
मनसैवेन्द्रियग्रामं विनियम्य समन्ततः ॥ (२४)
मनुष्य केँ चाही जे मोन सँ उत्पन्न होयवला सबटा सांसारिक इच्छा सब केँ पूर्ण-रूप सँ त्यागिकय आ मन द्वारा इन्द्रिय सभक समूह केँ सब दिश सँ वश मे करय। (२४)
आत्मसंस्थं मनः कृत्वा न किंचिदपि चिन्तयेत् ॥ (२५)
मनुष्य केँ चाही जे क्रमश: चलिकय बुद्धि द्वारा विश्वास-पूर्वक अभ्यास करैत मन केँ आत्मा मे स्थित कयकेँ, परमात्माक चिन्तनक अलावा आन कोनो वस्तुक चिन्तन नहि करय। (२५)
ततस्ततो नियम्यैतदात्मन्येव वशं नयेत् ॥ (२६)
मनुष्य केँ चाही जे स्वभाव सँ स्थिर नहि रहयवला आ सदा चंचल रहयवला ई मोन जेतय-जेतय प्रकृति मे जाय, ओतय-ओतय सँ खींचिकय अपनहि आत्मा टा मे स्थिर करय। (२६)
उपैति शांतरजसं ब्रह्मभूतमकल्मषम् ॥ (२७)
योग मे स्थित मनुष्य केर मन जखन परमात्मा मे एक्के टा भाव मे स्थिर रहैत अछि आर जेकरा रज-गुण सँ उत्पन्न होयवला कामना सब सँ बढियाँ जेकाँ शान्त भ’ गेल छैक, एहेन योगी सब पाप-कर्म सँ मुक्त भ’ कय परमानन्द केँ प्राप्त करैत अछि। (२७)
सुखेन ब्रह्मसंस्पर्शमत्यन्तं सुखमश्नुते ॥ (२८)
एहि प्रकारे योग मे स्थित मनुष्य निरन्तर योग अभ्यास द्वारा सब तरहक पाप सँ मुक्त भ’ कय सुख-पूर्वक परब्रह्म सँ एक्के गोट भाव मे स्थिर रहिकय दिव्य प्रेम स्वरूप परम-आनंद केँ प्राप्त करैत अछि। (२८)
ईक्षते योगयुक्तात्मा सर्वत्र समदर्शनः ॥ (२९)
योग मे स्थित मनुष्य सब प्राणी मे एक्के टा आत्माक प्रसार देखैत अछि आर सब प्राणी केँ ओहि एक गोट परमात्मा मे स्थित देखैत अछि, एहेन योगी सब केँ एक समान भाव सँ देखयवला होइत अछि। (२९)
तस्याहं न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति ॥ (३०)
जे मनुष्य सब प्राणी मे हम परमात्मा टा केँ देखैत अछि आ सब प्राणी केँ हम परमात्मा टा मे देखैत अछि, ओकरा लेल हम कखनहुँ अदृश्य नहि होइत छी आ ओ हमरा लेल कहियो अदृश्य नहि होइत अछि। (३०)
सर्वथा वर्तमानोऽपि स योगी मयि वर्तते ॥ (३१)
योग मे स्थित जे मनुष्य सब प्राणी केर हृदय मे हमरा स्थित देखैत अछि और भक्ति-भाव मे स्थित भ’ कय हमरहि स्मरण करैत अछि, ओ योगी सब प्रकार सँ सदिखन हमरहि मे स्थित रहैत अछि। (३१)
सुखं वा यदि वा दुःखं स योगी परमो मतः ॥ (३२)
हे अर्जुन! योग मे स्थित जे मनुष्य अपनहि समान सब प्राणी केँ देखैत अछि, सब प्राणी केर सुख आर दुःख केँ सेहो एक समान रूप सँ देखैत अछि, ओकरे परम पूर्ण-योगी बुझबाक चाही। (३२)
योऽयं योगस्त्वया प्रोक्तः साम्येन मधुसूदन ।
एतस्याहं न पश्यामि चञ्चलत्वात्स्थितिं स्थिराम् ॥ (३३)
अर्जुन कहलखिन – हे मधुसूदन! ई योग केर विधि जेकरा द्वारा समत्व-भाव दृष्टि भेटैत छैक जेकर अपने द्वारा वर्णन कयल गेल अछि, मन केर चंचलताक कारण हम एहि स्थिति मे स्वयं केँ अधिक समय तक स्थिर नहि देखैत छी। (३३)
तस्याहं निग्रहं मन्ये वायोरिव सुदुष्करम् ॥ (३४)
हे कृष्ण! कियैक कि ई मन निश्चय टा बड़ा चंचल अछि, अन्य केँ मथि दयवला अछि आ बड़ा हठी संग बलवान सेहो अछि, हमरा एहि मन केँ वश मे करब, वायु केँ वश मे करय समान अत्यन्त कठिन लगैत अछि। (३४)
असंशयं महाबाहो मनो दुर्निग्रहं चलम् ।
अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते ॥ (३५)
श्री भगवान कहलखिन – हे महाबाहु कुन्तीपुत्र! एहि मे कोनो संशय नहि छैक जे चंचल मन केँ वश मे करनाय अत्यन्त कठिन अछि, मुदा एकरा सब सांसारिक कामना सभक त्याग (वैराग्य) आर निरन्तर अभ्यास द्वारा वश मे कयल जा सकैत अछि। (३५)
वश्यात्मना तु यतता शक्योऽवाप्तुमुपायतः ॥ (३६)
जाहि मनुष्य द्वारा मन केँ वश मे नहि कयल गेल अछि, एहेन मनुष्यक लेल परमात्माक प्राप्ति (योग) असंभव अछि लेकिन मन केँ वश मे करयवला प्रयत्नशील मनुष्य लेल परमात्माक प्राप्ति (योग) सहज होएत छैक – एहेन हमर विचार अछि। (३६)
अयतिः श्रद्धयोपेतो योगाच्चलितमानसः ।
अप्राप्य योगसंसिद्धिं कां गतिं कृष्ण गच्छति ॥ (३७)
अर्जुन – हे कृष्ण! प्रारम्भ मे श्रद्धा-पूर्वक योग मे स्थिर रहयवला मुदा बाद मे योग सँ विचलित मनवला असफल-योगी परम-सिद्धि केँ नहि प्राप्त कय कोन लक्ष्य केँ प्राप्त करैत अछि? (३७)
अप्रतिष्ठो महाबाहो विमूढो ब्रह्मणः पथि ॥ (३८)
हे महाबाहु कृष्ण! परमात्माक प्राप्तिक मार्ग सँ विचलित भेल लोक जे नहि त सांसारिक भोगे केँ भोगि पबैछ आ न अपनहिं केँ प्राप्त कय सकैत अछि, एहेन मोह सँ ग्रसित मनुष्य कि छिन्न-भिन्न मेघ जेकाँ दुनू दिश सँ नष्ट त नहि भ’ जाइत अछि? (३८)
त्वदन्यः संशयस्यास्य छेत्ता न ह्युपपद्यते ॥ (३९)
हे श्रीकृष्ण! हम अपने सँ प्रार्थना करैत छी जे हमर एहि संशय केँ सम्पूर्ण रूप सँ मात्र अपने टा दूर कय सकैत छी, कियैक तँ अपनेक अतिरिक्त आर कियो एहि संशय केँ दूर करयवला भेटब संभव नहि अछि। (३९)
पार्थ नैवेह नामुत्र विनाशस्तस्य विद्यते ।
न हि कल्याणकृत्कश्चिद्दुर्गतिं तात गच्छति ॥ (४०)
श्री भगवान कहलखिन – हे पृथापुत्र! ओहि असफ़ल योगीक नहि तँ एहि जन्म मे आ न ऐगले जन्म मे विनाश होइत छैक, कियैक तँ हे प्रिय मित्र! परम-कल्याणकारी नियत-कर्म करयवला कहियो दुर्गति केँ प्राप्त नहि होइत अछि। (४०)
शुचीनां श्रीमतां गेहे योगभ्रष्टोऽभिजायते ॥ (४१)
योग मे असफ़ल भेल मनुष्य स्वर्ग आदि उत्तम लोक केँ प्राप्त भ’ कय ओहि ठाम अनेकों वर्षों तक जाहि इच्छा सभक कारण योग-भ्रष्ट भेल छल, ताहि इच्छा सभक भोग कयकेँ फेर सम्पन्न सदाचारी मनुष्य केर परिवार मे जन्म लैत अछि। (४१)
एतद्धि दुर्लभतरं लोके जन्म यदीदृशम् ॥ (४२)
या फेर उत्तम लोक मे नहि जाकय स्थिर बुद्धिवला विद्वान योगी लोकनिक परिवार मे जन्म लैत अछि, मुदा एहि संसार मे एहि प्रकारक जन्म निःसन्देह अत्यन्त दुर्लभ अछि। (४२)
यतते च ततो भूयः संसिद्धौ कुरुनन्दन ॥ (४३)
हे कुरुनन्दन! एहेन जन्म प्राप्त कयकेँ ओतय ओ पूर्व-जन्म केर योग-संस्कार फेरो पाबि गेल करैत अछि आर ओहि संस्कार सभक प्रभाव सँ ओ परमात्मा प्राप्ति रूपी परम-सिद्धि केँ प्राप्त करबाक उद्देश्य फेर सँ प्रयत्न करैत अछि। (४३)
जिज्ञासुरपि योगस्य शब्दब्रह्मातिवर्तते ॥ (४४)
पूर्व जन्म केर अभ्यासक कारण ओ निश्चित रूप सँ परमात्म-पथ दिश स्वत: आकर्षित भ’ जाइत अछि, एहेन जिज्ञासु योगी शास्त्र केर अनुष्ठानक उल्लंघन कयकेँ योग मे स्थित भ’ जाइत अछि। (४४)
अनेकजन्मसंसिद्धस्ततो यात परां गतिम् ॥ (४५)
एहेन योगी समस्त पाप-कर्म सँ शुद्ध भ’ कय अनेकों जन्मक कठिन अभ्यास सँ एहि जन्म मे प्रयत्न करैत परम-सिद्धि केँ प्राप्त करबाक बाद परम-गति केँ प्राप्त करैत अछि। (४५)
कर्मिभ्यश्चाधिको योगी तस्माद्योगी भवार्जुन ॥ (४६)
तपस्वियो सँ योगी श्रेष्ठ अछि, शास्त्र-ज्ञानियो सँ योगी श्रेष्ठ मानल जाइत अछि आर सकाम कर्म करयवलाक अपेक्षा सेहो योगी श्रेष्ठ अछि, ताहि लेल हे अर्जुन! अहाँ योगी बनू। (४६)
श्रद्धावान्भजते यो मां स मे युक्ततमो मतः ॥ (४७)
सब तरहक योगियो मे सँ जे पूर्ण-श्रद्धा सहित, सम्पूर्ण रूप सँ हमरे आश्रित भेल अपन अन्त:करण सँ हमरा निरन्तर स्मरण (दिव्य प्रेमाभक्ति) करैत अछि, एहेन योगी हमरा द्वारा परम-योगी मानल जाइत अछि। (४७)
॥ हरि: ॐ तत् सत् ॥
