स्वाध्याय
– प्रवीण नारायण चौधरी
रामचरितमानस मोती
श्रीरामायणजीक आरती
आरती श्रीरामायणजी की।
कीरति कलित ललित सिय पी की॥
गावत ब्रह्मादिक मुनि नारद।
बालमीक बिग्यान बिसारद॥
बालमीक बिग्यान बिसारद॥
सुक सनकादि सेष अरु सारद।
बरनि पवनसुत कीरति नीकी॥
बरनि पवनसुत कीरति नीकी॥
गावत बेद पुरान अष्टदस।
छओ सास्त्र सब ग्रंथन को रस॥
छओ सास्त्र सब ग्रंथन को रस॥
मुनि जन धन संतन को सरबस।
सार अंस संमत सबही की॥
सार अंस संमत सबही की॥
गावत संतत संभु भवानी।
अरु घट संभव मुनि बिग्यानी॥
अरु घट संभव मुनि बिग्यानी॥
ब्यास आदि कबिबर्ज बखानी।
कागभुसुंडि गरुड के ही की॥
कागभुसुंडि गरुड के ही की॥
कलिमल हरनि बिषय रस फीकी।
सुभग सिंगार मुक्ति जुबती की॥
सुभग सिंगार मुक्ति जुबती की॥
दलन रोग भव मूरि अमी की।
तात मात सब बिधि तुलसी की॥
तात मात सब बिधि तुलसी की॥
आरती श्रीरामायणजी की।
कीरति कलित ललित सिय पी की।।
कीरति कलित ललित सिय पी की।।
-जय श्रीरामचंद्रजी की-
पवनसुत हनुमान की जय
हरिः हरः!!

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