सिंगल मदर के आन्तरिक पीड़ा आ संघर्षक आत्मकथा

लेख

– संगीता मिश्र

सिंगल मदर के आन्तरिक पीड़ा आ संघर्षक कथा

आजुक स्थिति-परिस्थिति मे गामक शिक्षा व्यवस्था पर बड़ा भारी सवाल ठाढ़ भेल छैक । एहेन नहि छैक जे गाम-घर मे पढाई करबाक माहौल नहि छैक, लेकिन शहरी परिवेश संग शहरी विद्यालयक एडवान्स्ड शिक्षा प्राप्त कयल लोक लेल करियर बनबय सँ लयकय शहरहि मे नौकरी-चाकरी आ जीवन निर्वाह करबाक बदलल परिस्थितिक कारण गाम मे बहुतो लोक बच्चा सब केँ नहि पढ़ाबय चाहैत अछि । हम अपन जीवन मे बड़ा भारी संघर्ष झेललहुँ एहि लेल – अपन परिजन आ परिवेशक लोक के देल सलाह-सुझाव आ समस्या निदानक विकल्प रूप मे गाम मे बच्चा सब केँ पढ़ेबाक-लिखेबाक बाध्यता विरूद्ध निर्णय कयलहुँ । ई लेख एहि विषय पर केन्द्रित अछि ।

गामक शिक्षा आ शहरक शिक्षा मे मुख्य रूप सँ भाषा के अन्तर हाेइत छैक । अहाँ देखब जे गाम मे बेसीतर हिन्दी भाषा वा क्षेत्रीय भाषा मे पढ़ाई करायल जाइत छैक । एकर उल्टा शहर मे छोट-पैघ सब स्कूल मे अंग्रेजी भाषा पर बेसी जोर देल जाइत छैक । गाम या शहर मे सब लोक के लगैत छनि जे हुनकर बच्चा केँ अंग्रेजी स्कूल मे पढ़ाई करय के चाही । ओ सब एना सोचैत छथि कियाक त हुनका सब के पता छनि जे बिना अंग्रेजी के आइ-काल्हि नीक नौकरी भेटब मुश्किल होइत छैक । और बहुत हद तक ई बात सहियो अछि। गाम मे पढ़ाई के लेल स्कूल अछि मुदा आइ के समय के हिसाब सँ पढ़ाई के व्यवस्था नहि अछि ।

हम सब अंग्रेजीक महत्व केँ नकारि नहि सकैत छी । हालांकि अंग्रेजी अपनेला सँ समस्या सेहो उठैत अछि, जखन अंग्रेजिया छाप संस्कृति पर हस्तक्षेप करय लगैत अछि । अंग्रेजी अंतर्राष्ट्रीय भाषा छी आ एकरा सिखनाय वर्तमान समयानुसार बहुत जरूरी भ’ गेल अछि । धरि पाश्चात्य संस्कृति केँ आँखि मुनि कय अपनेनाय उचित नहि होइत छैक । हरेक संस्कृति मे किछु नीक चीज होइत छैक, ओकरा सिखबाक चाही आ साथ मे अपन संस्कृति केँ सेहो संरक्षित करबाक चाही । हमर अनुभव –

हम स्वयं एक गृहिणी हेबाक संग पतिक अनुगामिनी, हुनकर काज सब मे बढ़ि-चढ़िकय हिस्सा लयवाली नारी रही । कम्प्यूटर के ज्ञान, अंग्रेजी भाषा के ज्ञान, कम्पोजिशन के ज्ञान, डिजाइनिंग के ज्ञान – बहुत रास बात पोथी प्रकाशन सँ जुड़ल विषय मे हम पतिक संग सहकार्य करैत सीखि लेने रही । हमरा ई अनुभव भेल जे गामहु सँ पढ़ल-लिखल महिला कनी-कनी बात पर खूब गम्भीरता सँ ध्यान दियए लागय त ओकरा लेल कोनो नव लुरि सिखनाय असम्भव नहि छैक । संगहि महिला सशक्तिकरण आ आर्थिक विकास एक दोसरा पूरक हेबाक विन्दु पर आइ हरेक गृहिणी मे घरक कामकाज के अलावे बाहरो के कामकाज सिखब आवश्यक छैक, से बुद्धि भेनाय जरूरी छैक, खास कय महिला सब मे ।

आर्थिक विकास के बिना महिला सशक्तिकरण संभव नहि अछि । आत्मनिर्भरता महिला सशक्तिकरण केर पहिल शर्त छैक वर्तमान समय मे । एहि पर हम पहिने एकटा विशेष लेख लिखि चुकल छी । सशक्तिकरण केवल आत्मनिर्भर बनला सँ संभव अछि आ एकर सीधा असर जीवनस्तर मे सुधार पर पड़ैत अछि । जा धरि निर्णय लेबाक स्वतंत्रता नहि भेटत ता धरि अहाँ आत्मनिर्भर सेहो नहि भ’ सकैत छी । जकरा लेल आर्थिक रूप सँ दोसर पर निर्भरता केँ समाप्त करब पहिल आवश्यकता होइछ ।

विपरीत परिस्थितिक विपरीत अनुभव –

हमर बसल गृहस्थी मे अचानक एकटा दुराचारिणी स्त्रीक फेरा लागि गेल । एहेन विपत्ति कोनो गृहिणी या परिवार पर कदापि नहि पड़य हम यैह प्रार्थना करब । हमर संतान सब बहुत छोट छल । दुराचारिणी स्त्रीक फेरा मे स्वार्थी-दुराचारी पति केँ अपन परिवारक घोर उपेक्षा आ मनमोहिनी दुराचारिणी लेल तरह-तरह के आर्थिक मदति, कपड़ा, गहना, स्कूटी आदि दैत देखलहुँ । अपन स्त्री आ समाज केँ धोखा देबाक दृष्टि सँ ई सारा उपहार भाइ-बहिन के पवित्र सम्बन्ध आ रक्षाबन्धन (राखीक नाम पर) गिफ्ट करैत देखी । कहियो भाइ-बहिन बना, त कहियो जन्मदिन त कहियो हमरा सँ नुका-छुपा कय उपहार देल जाइक । असल चरित्र एहेन जे समाज सोचियो नहि सकैत अछि । राति-राति भरि ओहि व्याभिचारिणी कुलटाक संगे वैह राखी बन्हेनिहार भाइ जेकरा महिमामण्डित करैत ‘भाइजी’ नाम राखल गेल ।

हमर विरोध कयलापर हमरा गालीगलौज आ हाथापाई-मारिपीट भेटय । एक बेर त एक शुभेच्छु (पतिक मित्र) के संकेत पर हम स्वयं ओहि दुराचारिणी महिलाक घर अधरतिया मे छापामारी कयलहुँ आ एहि भाइ-बहिनक सम्बन्ध केँ अपवित्र करनिहार रंगे सियार केँ रंगे हाथ अभद्र अवस्था मे पकड़लहुँ । बस, हमर यैह दुस्साहस हमर गृहस्थीक काल बनि गेल । हमरा संग मारिपीट, गालीगलौज आ बात-कथा त जे भेल से भेबे कयल, हमरा तीन गोट अबोध सन्तानक संग घर सँ बाहर निकाला भेटल । कतबो कहल गेल जे बच्चा खातिर अबैध सम्बन्ध सँ दूर भ’ अपन गृहस्थी केँ सम्हारू, मुदा भेल सबटा उल्टा ।

हमरा सोझाँ प्रस्ताव आयल जे ‘तूँ गाम मे रह । बच्चा सब सम्हार । गामे मे पढ़ा-लिखा । खेत अछि, उपजा कर, खो, अपना आ अपन बच्चा लेल जीविकोपार्जन कर, आदि ।’ हमरा आ बच्चा सभक देखभाल करय लेल कोनो तरहक पैसा-कौड़ी देनाय बन्द कय देल गेल । एहेन विपरीत परिस्थिति मे एक असहाय आ निरीह परित्यक्ता बनि हम किछु दिन सासुरहि मे रहलहुँ । भटकल पति केँ बाट पर आनबाक अथक प्रयास हम, हमर शुभेच्छु, हुनकर शुभेच्छु बहुतो लोक प्रयास कयलहुँ । मुदा दुराचारिणीक यौवन हमर गृहस्थी धर्म, सन्तान प्रति मातृत्व धर्म आ कुल-परिवारक मर्यादित नारीधर्म सब किछु अपमानित भेल । पति जेकरा परमेश्वर कहल जाइछ से पूर्ण रूप सँ दानवीय हवस मे दिवाना रहल ।

आब हमरा लेल कठोर निर्णय सब लेबाक बेर सोझाँ छल । हमर शिक्षा-दीक्षा आ परवरिश एहेन नहि रहय जे हम बर्दाश्तक सीमा मे गलैत रहितहुँ । बच्चा सभक पढ़ाई मे बाधा होबय लागल छल । कियो सासुर पक्ष के लोक साथ नहि देलक किया त सब स बड़ा पैसा होइत अछि। जे हमरा पास नहि रहय, आ हिनका पास रहनि । एकटा कहावत अछि “बाप बड़ा ना भैया सबसे बड़ा रुपैया” । हमर जे साथ दितय ओकरा हमर आ हमर संतान के भार उठाबय पड़ितैक । आ पतित आदमी के परिवार सेहाे पतित होयत अछि, एहेन कतेको खराब अनुभूति सब हमरा होइत रहल । हमरा लग बहुत कठिन समय छल ।

पहिने त हमरा गांव मे रहय लेल कहल गेल, मगर बाद मे गांव में सेहो खर्चा नहि देल गेल । सासु माँ रहैत छलीह त कुनु तरह सँ जिबय लेल दुनू साँझक भोजन भेटि जाइत छल । मगर बच्चा सबकेँ देखि बहुत ग्लानि होइत रहय जे हम एकरा सबकेँ कुनू भविष्य नहि दय रहल छी । हमरा लेल बहुत कठिन समय रहय ओ । हम तहन २ साल इंतजार बाद जहन ई ओहि दुराचारिणीक बाहुपाश सँ नहि निकलि सकलाह तखन विचित्र परिस्थिति मे कठिन निर्णय लय लेल बाध्य भ’ गेलहुँ । बच्चा सभक भविष्य बर्बाद भ’ रहल रहय । तहन हम गाम छोड़ि महापुरुष द्वारा लेल गेल रहय ओतहि आबि गेलहुँ । मगर इहो बर्दास्त नहि भेला सँ हमरा घर सँ बच्चा सहित बाहर निकालि देल गेल । आ हमरा सभक गृहस्थी व उद्यम (प्रकाशनक कार्य) केर सारा सामान सहित अन्य शहर शिफ्ट भ’ गेलाह हमर पतिदेव ।

आब फेर सँ एकटा विचित्र परिस्थिति मे कठिन निर्णय लेबाक चुनौती आबि गेल हमर सोझाँ । एकटा नीक संस्था मे नौकरी लागि गेल । कंप्यूटर के जानकारी रहय । हिन्दी इंग्लिश टाइपिंग के नीक जानकारी रहय । पढ़ाई-लिखाई पटने सँ भेल रहय हमर । जान पहचान रहबे करय । नौकरी भ’ गेल । मगर ओ अभिमानी पुरुष के ओहो नहि पचल। ओहो कार्यस्थल पर अपन मित्र सबकेँ भेजय लगलाह । सब ओतह हिनक किरदानी कहय लागल। सबके पता नहि रहय जे हम सिंगल मदर छी । लेकिन हिनका कारण सब कियो इहो बात जानय लागल । सब कियो किछ-किछ कहय लागल । डिप्रेशन मे चलि गेल रही । जकर जिक्र हम अपन पिछला लेख मे केने छी ।

माँ, भाइ के आ बच्चा सभक नोर देखि फेर सँ अपन अन्तर्शक्ति समेटिकय ठाढ़ भेलहुँ आ जॉब छोड़िकय अपन स्वरोजगार शुरू केलहुँ । और आइ आर्थिक आत्मनिर्भर भेलाक बाद अपना-आप मे एकटा अलग अनुभव आ आत्मशक्ति के बोध हाेइत अछि । आर संगहि मुखपोथी (फेसबुक) पर अपन शुभचिंतक सभक सपोर्ट देखि आर आगू बढ़बाक आर अपन एकटा बड़का कम्पनी ठाढ़ करबाक प्रेरणा भेटि रहल अछि । एखन हम एकटा माली बनिकय अपन बगिया (संतान सब) केँ सजा रहल छी ।

और अंत मे एतबे कहब “खुद केँ एतेक काबिल बनाउ जे अहाँ केँ अपन लोक ठुकरैयो देने अछि त वैह फेर सँ अहाँक एकटा झलक देखबाक लेल तरसत।”

लेख पढ़ि अपन प्रतिक्रिया अवश्य राखब । हमरा बुझल अछि जे ई पीड़ा सिर्फ हमरहि टा नहि, बहुतो घर-परिवार मे आजुक स्थिति-परिस्थिति मे कतेको तरहक असह्य दुःख-पीड़ा टांग पसारने अछि । लेकिन हमर लिखबाक उद्देश्य यैह अछि जे एहेन पीड़ा सँ पीड़ित केँ घाव पर मरहम-पट्टी कय सकी आ संगहि समाज केँ इहो देखा सकी जे ‘भाइजी’ कहेनिहार आ ‘बहिन’ के नाटक केनिहाइर भाइ-बहिन के सम्बन्ध केँ कोना कलंकित करैत अछि केना वैह व्यक्ति सब समाज मे उल्टे नीतिवान्-चरित्रवान् बनबाक लेल साहित्योपदेश मे लागल अछि । समाज लेल लिखल जायवला साहित्य जँ सही दिग्दर्शन नहि करत त ओ साहित्य सेहो कलंकित होयत, बस एहि भाव मे ई लेख-रचना सब केँ स्वीकार करय जायब । धन्यवाद ।