गजल
रौ मिता, रौ सङ्गी, हेरौ यार
स्वार्थ बिना दुनिया छै बेकार॥
झुठेके बिया बुनि, झुठेके करै खेती
दुनिया त छी झुठ-फुसके ब्यापार॥
क्षणभरि मे बाजी मारिलै, पतो नै होय
जेना चलाक नढिया निकलै धारे-धार॥
ऐ कोठीके चाउर, करै ओइ कोठीमे
रामवरण-प्रचण्डके लीला अपार॥
आहिरो बा देखही कोइ बिना खेनै मरै
कोइ खाइत-खाइत करै ढेकार॥
हिमालिये-पहाड़ियेके राज चलै सगठे,
कह मधेशीकऽ किए नै भेटै अधिकार?
रौ के बुझतै जे बनिकऽ बिच्छू
जनताके खुन चुसैय जाली सरकार॥
– विद्यानन्द बेदर्दी
राजविराज, सप्तरी (नेपाल)
