मिथिला मे जलसंकट – विज्ञ विचार-२ – सरस्वती नदीक उदाहरण सँ सीख लेबाक आवश्यकता

२ जून २०१९. मैथिली जिन्दाबाद!!

मिथिला मे जलसंकट केर गम्भीर स्थिति पर निरन्तर लेख प्रकाशित करबाक क्रम जारी अछि। काल्हि एहि सन्दर्भ डा. लीना चौधरीक एक गोट चिन्तनयुक्त लेख प्रकाशित भेल छल। आइ हुनकर दोसर लेख पुनः आयल अछि। आउ पढैत छी आर पढिकय सुधारोन्मुख गतिविधि लेल सेहो किछु कार्यक्रम योजना संग क्रियान्वयनक दिशा मे बढैत छी।

बिहार में जल समस्या – सरस्वती नदीक लोप हेबाक केस-स्टडी

– डा. लीना झा चौधरी

बिहार मे, विशेष कय मिथिलाचंल मे पाइन केर जे हाहाकार अइछ ओहि केँ देखिकय सवाल उइठ रहल अइछ हमरा मन में। गंगा, गंडक, बुढ़ी गंडक, कोशी, बलान, बागमती, कमला, महांनदा, सरयु केर संग डेग-डेग पर पोखरि और इनार सँ भरल प्रदेश केर एहि दुर्दशाक कारण कहीं हम सब अपने त नहि छी?

हम सब अपन संपदा केँ नष्ट कय रहल छी। हमर पूर्ण संस्कृति नदी केर किनारे (तीरे-तीरे) बसल अइछ, ताहि लेल मिथिलाक एक नाम ‘तीरभुक्ति’ सेहो पड़ल। तैयो हम अपन जल संसाधन केर बचावक बदला ओकरा नष्ट क रहल छी। भारत मे तीन गोट धार्मिक महत्व केर मानव-पूज्य नदी मानल जाइछ – गंगा, यमुना और सरस्वती। एहि तीन मे सँ एक नदी सरस्वती समाप्त भऽ गेल। एक जीवन सँ भरल नदी केर सुखेनाय, एकर कतेको कारण अइछ। गाछ-वृक्ष केर कटाई सँ सरस्वती नदीक प्राकृतिक बहाव केर बाट मे बाधा उत्पन्न भेल। जाहि अलग-अलग स्रोत (फीडर रिवर्स) सँ पाइनिक बहाव ओही नदी मे सम्मिलित होइत छल आर जल संग्रहण होइत छल से बाधित भेल। जमीन केर लोभ मे फँसि मानवीय समुदाय द्वारा नदीक बहाव वला भाग केँ माटि सँ भरिकय नदीक चौड़ाई केँ कम क देबाक दोसर प्रमुख कारण घटित भेल जाहि सँ ओहि नदी मे जल संग्रहण क्षमता कम भ गेल।

सरस्वती नदीक रस्ता मे पड़यवला गाछ-वृक्ष केर कटाई केँ सब सँ पैघ कारण मानल जाइछ एकर विलुप्त होइ मे। सरस्वती नदीक एहि तरहें विलुप्त होयबाक परिणाम सँ ओ प्रदेश धीरे-धीरे रेगिस्तान (मरूभूमि) मे बदलि गेल। अगर भूतकाल केर गलती सँ सबक लय केँ एखनहुँ हम सब सजग नहि होयब तँ भविष्य बहुत भयावह होवयवला अइछ। एहि स्थिति मे सुधार केर लेल जतबे सरकारी स्तर पर काज करबाक जरूरत अइछ ओतवे स्थानीय बासिन्दाक जनजीवन मे सेहो जागरूकता केर जरूरत अइछ। सरकारी स्तर पर मनरेगा केर तहत पुरान पोखरि, इनार व अन्य जलजमावक क्षेत्र मे पुनः उचित देखभालक संग नव पोखरि ओ जलसंग्रहणक अन्य स्वरूप केर खुदाई करबेनाय जरूरी अछि। स्थानीय जनता जहिना पहिने कलम-गाछी अनिवार्य रूप मे लगबैत छल, तहिना कालान्तर मे ई प्रक्रिया कम हेबाक क्षतिपूर्तिक रूप मे फेरो सँ वृक्षारोपण कय घटैत जल-स्तर केर संरक्षणक दिशा मे अपन योगदान देनाय तत्काल आरम्भ करी। जँ एहि दिशा मे जनचेतना आबहु नहि जागत तँ ओ दिन दूर नहि जे बिहार दोसर राजस्थान मे बदलि जायत।