मायाक मद आ जमक फँदा

स्वाध्याय-चिन्तन

– प्रवीण नारायण चौधरी

एखन २०१३ ई. केर लेखनीक पुनर्निरीक्षण करैत संग्रह योग्य समस्त बात-विचार केँ देखैत जरूरी कार्य कय रहल छी। एहि क्रम मे मित्र आ बंधु लोकनि सँ प्राप्त महत्वपूर्ण जानकारी सब सेहो सोझाँ आबि रहल अछि। सोशल मीडियाक सदुपयोग मे अपनहि द्वारा कयल गेल अन्तर्क्रिया केँ एहि तरहें पुनर्निरीक्षण सचमुच बहुत उपयोगी सिद्ध होयत, जँ अहाँ गम्भीरता सँ मूल्यवान योगदान देबाक लेल प्रतिबद्ध छी, आलतू-फालतू पोस्ट सभक कोनो माइन नहि होइत छैक। अपन समय सदिखन उच्च उपयोगी आ मानव-मानवता लेल बेस महत्व राखयवला अछि, तेकर लेखन आ प्रकाशन मे विश्वास राखब त जीवन एकटा अलगे दिशा मे अहाँ केँ जरूर प्रगतिशील राखत।
 
एखन एक गोट अति महत्वपूर्ण पंक्ति आध्यात्मिक गुरुदेव श्री परविन्दर कुमार लाम्बा जी द्वारा २७ दिसम्बर २०१३ केँ पोस्ट कयल गेल एहि तरहें सोझाँ आयल अछिः
 
प्रानी कछू न चेतई मदि माइआ कै अंधु ॥
कहु नानक बिनु हरि भजन परत ताहि जम फंध ॥२६॥
 
मायाक मदिरा सेवन कएने मनुक्ख केँ कोनो चेतना नहि रहि जाइछ जे ईश्वर के छथि, गुरु नानक कहैत छथि जे हरि नाम केर भजन नहि केनिहार केँ जमक फँदा मे फँसब निर्णीत अछि।
 
अरे! मरैत अछि सब। मृत्यु सभक तय छैक। तखन त जीवन मे जतेक समय भेटल अछि तेकरा सही काज मे लगा लेल जाउ। ‘हरि केर भजन’ सँ तात्पर्य जीवनक महत्व केँ बुझैत ‘हरि केर देल जन्म’ केँ सकारथ केनाय। जँ एहि धराधाम मे सिर्फ मायाजाल मे उलझब, लाइक्स-कमेन्ट्स लेल लिपिस्टिक आ साड़ीक प्रदर्शन करैत ई बुझब जे हम बड़का तीर मारि रहल छी त अहाँ भ्रम मे फँसल अपन समय त नष्ट करिते छी, अपना संग-संग एहने मायाजाल मे घेरायल आरो लोक केँ अपना संग गर्त केर दिशा मे लय जा रहल छी।
 
एक गोट महान अभियान चलाओल गेल। समाजक पिछड़ापन केँ दूर करबाक लेल नेतृत्वकर्ता सुन्दर तरीका सँ समाजक लोक केँ नीक-नीक शिक्षा आ सन्देश दैत आगू बढबाक लेल प्रेरित कयलनि। एक्के बेर शास्त्रीय वचन आ नीति अनुसार लोक केँ आगू नहि बढा क्रमशः छोट-छोट महत्वपूर्ण बात केँ बुझबैत बारिकी सँ काज करैत किछेक समय मे एकटा क्रान्तिकारी परिवर्तन सौंसे दुनिया मे दृश्य होमय लागल। चारूकात लोक प्रशंसाक झड़ी लगा देलक। कतय पिछड़ा आ अशिक्षित अन्हरिया मे डूबल लोक, आब दुनियाक विकसित धारा संग डेग बढबैत देखल गेल त स्वाभाविके प्रशंसा भेटतैक।
 
लेकिन कहबी छैक जे यदा-कदा प्रशंसाक मद उपरोक्त गुरवाणीक उक्ति मे कहल ‘मायाक मद’ जेकाँ अचानक नेतृत्वकर्ता केँ फँसा देलकैक। ओ बुझलक जे बाप रे, एतेक पैघ प्रशंसा भेटब साधारण बात नहि भेल… हम त वास्तव मे एकटा अलौकिक क्रान्तिक सूत्रपात कयलहुँ से सब कहि रहल अछि। एहि तरहें नेतृत्व द्वारा अपना किसिम केँ कय गोट निर्णय लेल गेलैक जे एहि क्रान्ति मे ई-ई नियम कठोरता सँ सब कियो पालन करू। नेतृत्व केनिहार साधारण लोक नहि भेलाह, हुनका भगवान् जेकाँ मानू। हुनकर मूर्ति अपन-अपन जेबी मे राखि कोनो विपत्ति पड़य ताहि समय जेबी सँ निकालिकय कम सँ कम ५ बेर प्रणाम करियौन। आदि।
 
एम्हर एहि तरहक विचित्र निर्णय सँ गोटेक समर्थकक कान ठाढ भेलैक। बाहरी लोक केँ कि पता जे नेतृत्व शैली मे कय तरहक आत्मालोचना योग्य कार्यविधि सब छैक, लेकिन समूह मे रहल गोटेक अन्य नेतृत्व करबाक हैसियत रखनिहार व्यक्तित्व एहि सब कार्यशैली पर जमिकय समीक्षा केलक आर ओकरा सब केँ एना बुझेलैक जे ई सब सिर्फ देखाबटी विकास थिकैक, गहिंराई मे एकर कोनो महत्व नहि छैक। नेतृत्व शैली मे गोटेक उच्छृंखल स्थिति केँ ओ सब उदाहरण मानिकय सवाल ठाढ करय लागल। लेकिन एहि उकसाहट केँ नेतृत्व द्वारा विवेकशीलता सँ शान्त नहि कय विद्रोही स्वभावक समर्थक-सहयोगी एवं सदस्य केँ सीधे ‘गलहस्तेन धोधरः’ यानि गला पर हाथ दय समूह सँ बाहरक रास्ता देखायल जाय लगलैक।
 
एहि तरहक प्रतिद्वंद्विताक भावना मे फँसैत ओहि समूह मे मायाक मद सँ बन्हायल कतेको रास नेतृत्व अपन-अपन वर्चस्व केँ अपना ढंग सँ स्थापित करबाक आन्तरिक लड़ाई मे ओझराकय आखिरकार ‘जमक फँदा’ फँसि गेल। गुरवाणीक कथन एहि तरहें प्रत्येक मनुष्य लेल चिन्तन योग्य अछि। चूँकि छोट जीवन मे सार्थक कार्य करैत सभक स्वतंत्र विचार केँ सम्मान दैत जीवमंडलीय पर्यावरण मे अपन भूमिका खेलायब त जरूर चित्त प्रसन्न रहत। नहि त अनावश्यक तनाव मे ओझरायल, ई जीवन ओहिना बीति जेबाक भय अछि। अस्तु! गुरवाणीक एक पाँति सँ आजुक दिन आरम्भ भेल, सभक लेल शुभे हे शुभे केर शुभकामना सेहो अछि।
 
हरिः हरः!!