नवतुरिया मैथिल सर्जक लेल सन्देश – सकारात्मक सृजनशीलता सँ सार्थक दिशा मे अग्रसर होउ

विचार

नवतुरिया मैथिली साहित्यकार (नेपाल) प्रति लक्षित संबोधन

– प्रवीण नारायण चौधरी

नेपाल सँ मैथिली लेखकक परिचय संकलन मे एक अनुज शिवम प्रशान्त मैसेज कय केँ बतेलथि जे भाइजी – अपन किछु रचना अहाँ केँ मेल पर पठेने छी। तहिना विगत २-३ दिन मे आरो बहुत रास रचनाकार लोकनि अपन-अपन रचना मेल द्वारा पठौलनि अछि। राम सोगारथ यादव समान अति लगनशील रचनाकार कइएक बेर अपन रचना पठबैत ओहि मे आवश्यक सुधार लेल सुझाव मंगलनि। भाइ वीरेन्द्र कुमार शाह (अमरदह निवासी हाल विराटनगर) सेहो मैथिलीभाषा मे लिखय सँ पहिने अनेकों हिचकिचाहट आ डर जे कहीं गलती नहि भऽ जाय से बात कहैत रहलाह अछि। कतेको नीक लिखनिहार मे पर्यन्त ई भय रहैत अछि। नारायण मधुशाला, बेचन महतो, विद्यानन्द बेदर्दी, विन्देश्वर ठाकुर सहित कतेको अन्य भाइ-बहिन मैथिली लेखनी मे रुचि लैत अपन-अपन रचना लिखिकय उत्तरोत्तर सुधार हेतु अपना सँ वरिष्ठ रचनाकार लोकनि सँ सुझाव-सल्लाह मंगैत अभरैत रहल छथि। आरक बात कि कहू जखन स्वयं एहि तरहक सलाह आ सुझाव लेल हम कइएक दिग्गज सब सँ समय मांगिकय थाकि गेलहुँ… लेकिन आजुक व्यस्त युग मे के केकरा कतेक समय दैत छैक से कहय योग्य बात नहि अछि।

अपन अनुभव

सच ई छैक जे कक्षा ९ आ १० मे मैथिली पढने रही, फेर इन्टरमीडिएट मे सेहो दरभंगाक चन्द्रधारी मिथिला महाविद्यालय सँ पढाई करबाक समय अहिन्दीभाषीक रूप मे ५०-५० मार्क्स केर क्रमशः मैथिली आ हिन्दी दुनू पढने रही। अंग्रेजी लैंग्वेज आ आ लिटरेचर केर रूप मे तथा कौमर्स केर अन्य विषय एकाउन्टैन्सी, मनी एन्ड बैंकिंग, इकोनोमिक्स, कमर्सियल एरिथमेटिक्स, बिजनेस मेथड एन्ड ओफिस आर्गेनाइजेशन, मार्केटिंग आ कमर्सियल कोरेसपोन्डेन्स सहितक आरो किछु सब्जेक्ट सब रहल होयत। ग्रेजुएशन मे विषय आरो सीमित भऽ गेल। एकाउन्ट प्रतिष्ठा विषय केर प्रधानता रहल। क्रमशः गणित केर अध्यापक बनबाक आ अपन जीवनक पेशाकर्म मे प्रवेश करबाक बाद अंग्रेजी भाषा मात्र रोजी-रोटीक भाषा रहबाक कारण नित्य नव-नव तरीका सँ सीखबाक बाध्यता देखलहुँ। अपन जीवनक महत्वपूर्ण २० वर्ष बितेलाक बाद अचानक कोनो मोड़ पर एना बुझायल जे पूरा संसार भटैक लेब तैयो आत्मसंतोष अपनहि मातृभाषा मे भेटत…. ताहि समय तक लेखनीक प्रभाव सँ व्यक्तित्व मे निखार एबाक सत्य आत्मसात कय लेने रही आ अंग्रेजी तथा हिन्दी मे विश्वस्तर, भारत स्तर धरिक कइएक फोरम पर लिखैत-लिखैत अपन एकटा नाम बना लेने रही। लेकिन, आत्माक पुकार पर मातृभाषा मैथिली मे लेखनीक अन्तिम प्रेरणा भेटल जे आइ जीवनक एकटा आरो नव पहचान तय कय देने अछि, सुखद कहैत छी एकरा जे समूचा हिन्दुस्तान, नेपाल आ विश्व भरिक ‘अप्पन लोक’ मैथिलीभाषी सँ एकटा लेखक रूप मे पहचान बनल अछि आइ। सामाजिक संजाल पर लेखनी सँ पाठकक कमी नहि अछि। गोटेक उच्चकोटिक सहयोगी अपन थोड़-बहुत समय दैत लेखनी केँ प्रभावशाली बनेबाक तरीका सिखौलनि, बाकी तऽ वैह कोरेस्पोन्डेन्स विषय केर टिप्स सहयोग केलक। एहि क्रम मे हम आदरणीय सियाराम झा सरस केँ आरम्भिक शिक्षा देबाक लेल आ आदरणीय अजित आजाद भाइ केँ हिम्मत बढेबाक संग-संग संपादन आ प्रकाशन दुनू मे सहयोग लेल आभार प्रकट करय चाहब जाहि सँ एकटा ‘टन्ना साहित्यिक कृति – प्राण हमर मिथिला’ प्रकाशित भऽ सकल अछि। बाकी, नाम नहि लेब लेकिन शिकायत बनल रहत जे कहलाक बादो – बेर-बेर याचनाक बादो कोनो समय वा सम्पादकीय सहयोग नहि देलनि। ओ हुनका लोकनिक अपन बाध्यता रहल हेतनि, लेकिन हमरा समान नवतुरिया लेखक लेल मोन झुझुआन करयवला छल। परञ्च शपथपूर्वक ई कही जे हुनका सँ हमरा कोनो शिकायत नहि अछि, उल्टा प्रतिस्पर्धात्मक भावना भीतर जागल अछि। मजाक नहि, जेना शतरंज सीखय समय सीखेनिहार केँ पटका मारलहुँ, तहिना अहाँ लोकनि केँ सेहो अपन प्रतिभा सँ पटकब…. ई धरि संकल्प लेने छी हम।

पुनः चलू विषय पर…

मैथिलीक पढाई सब बच्चा नहि कएने अछि, लेकिन अपन मातृभाषा लिखबाक ललक सब मे छैक। विशेष रूप सँ नेपाल केर विद्यालय मे मैथिली विषयक पढाई सरकारी नियमानुसार रहितो स्वयं छात्र, ओकर अभिभावक आ समय-काल-परिस्थिति मे मैथिलीक अध्ययन लेल बहुत आतुरता नहि देखि सकलहुँ अछि। विराटनगर दिश तऽ साफे नहि! राजविराज, लहान, जनकपुर, आदि मे गोटेक-आधेक बच्चाक ललक आ मिथिला स्टुडेन्ट नेपाल, आदरणीय देवेन्द्र मिश्र सर, निराजन भाइ,(मिथिलाक अनुपम डेग), आरती दीदी, विभाजी, श्यामसुन्दर यादवजी, साधना झाजी, जनानन्द मिश्र सर, करुणा झा मैडम आदि गोटेक-आधेक वीर महापुरूष लोकनिक प्रयास, तहिना जनकपुर मे आदरणीय भाइजी श्यामसुन्दर शशि आ सुनील कुमार मल्लिक संग अशोक दत्त, अनिल कुमार कर्ण, डा. आभास लाभ; संचारकर्मी सह कथाकार सुजीत झा, सांस्कृतिक संस्था मिनाप व अनेकों अग्रज लोकनि, आदरणीय जीवनाथ चौधरी, आदरणीय राम भरोस कापड़ि ‘भ्रमड़’, तहिना कुमार भास्कर, आदरणीय परमेश्वर कापड़ि सर, एकटा रंगदर्पण समूह केर रीतेश पाटलि, संस्कृतिकर्मी नवीन मिश्रजी, अवधेश कामत, घनश्याम विश्वकर्मा, शैलेन्द्र विश्वकर्मा, डोली सरकार, अंजू यादव, तेजू मैथिल, सुभाष वीरपुरिया, आदि अनेकों हस्ती सब केँ एहि दिशा मे सेवारत देखलहुँ। आर, एहि सभक मूल मे आदरणीय धीरेन्द्र प्रेमर्षि व श्रीमती रूपा झा द्वारा संयुक्त संचालित ‘हेलो मिथिला’ रेडियो कार्यक्रम, परमादरणीय स्रष्टा आ लोकसंस्कृतिक महान् शोधकर्ता रमेश रंजन झा, लेखक एवं सामाजिक अभियन्ता श्याम शेखर झा, मैथिली केँ बहुत रास नव आयाम मे योगदान दैत आगू बढेनिहार संचारकर्मी एवं विचारक धर्मेन्द्र झा, पुरातत्वविद् इं. गोपाल झा, व कतेको अन्य विद्वान् लोकनि केँ व्यक्तिगत रूप सँ जनैत हुनका लोकनिक काजक प्रशंसा करैत छी जे नेपाल मे मैथिली भाषा-साहित्यक और्दा बढा रहला अछि। भाषाविद् प्रा. डा. रामावतार यादव केर नाम जँ नहि लिखब तऽ ई हमरा लेल अभिशाप होयत, कारण हुनका सँ जतेक सम्मान मैथिली भाषा-साहित्यक बढल अछि तेकरा चलते आइ विश्व केर अनेकों नामी विश्वविद्यालय धरि एकर बौद्धिक सम्पदा पहुँचि चुकल अछि। आलोचनात्मक अध्ययन लेल, व्याख्या, समीक्षा आ समग्रता मे विद्वान् बनी तऽ डा. यादव जेहेन। जानल-अन्जानल मे नाम छुटियो गेल हो तऽ मैथिलीक सेवा मे निरंतर काज कयनिहार क्षमा करब हमरा – ई सब बात हम व्यक्तिगत क्षमता पर लिखि रहल छी। अहाँ लोकनिक योगदान सँ मैथिली दुरूह समय मे पर्यन्त जीबित रहल अछि। सब केँ हम प्रणाम करैत छी।

काज शून्ना आ बाज दून्ना

एहि समग्र स्वरूप मे किछु लोक द्वारा मैथिली प्रति अत्यन्त दुर्गन्धपूर्ण महकारी बात सब ‘कुतर्क’ सँ पसारल जाइत अछि। एहि सँ सावधान रहबाक जरूरत अछि। सोशल मीडिया मे गये दिन बड़का-बड़का पाकल परोर सब केँ लिखैत देखैत छी जे मैथिलीक फल्लाँ कार्यक्रम मे सिर्फ झा-झा केर भीड़ छल, ई भाषा सिर्फ बड़का कहेनिहारक रहि गेल, जनसामान्य केँ कियो कतहु पुछितो नहि अछि, आदि। माने जे मंच पर ‘पाहुन’ बना-बना अहाँ सब जाति, धर्म आदिक व्यक्ति केँ नहि बजेलहुँ ताहि लेल अहाँक कार्यक्रम ‘झाझा’ कहायत। गोटेक लोक अपना‍-आप केँ मान-सम्मान मे कमी देखि एहि तरहक कुतर्क आ अनाप-शनाप आरोप लगबैत मैथिली भाषा केँ जानि-बुझि विवादित बनेबाक काज करैत छथि। एतेक तक कि मैथिल जनसमुदाय चाहे एहि पारक हो या ओहि पारक, तिनकर राष्ट्रीयता स्वतः दुनू देश मे एक्के छैक, भाषा, इतिहास, सभ्यता, संस्कृति, सब आधार पर – ताहू ठाम नेपाली आ इंडियन टैग लगाकय आपस मे विखंडन तक करबाक वीभत्स कुकार्य करैत छथि…. आर फेर प्रतिप्रश्नक प्रत्युत्तर मे अपना केँ आलोचकवर्गक लोक कहिकय ‘शुद्धीकरण’ आदिक बात कहैत छथि। ई वर्ग मैथिलीक हितपोषण कोनहु कालखंड मे नहि कय सकल आ नहिये एकरा सभक बुत्ता मे आगाँ किछु संभव अछि। एकरा लोकनि केँ अपन सुविधाभोगी आ भत्ताभोग छोड़ि आन किछुओ सृजनकर्म सँ कनिको मतलब कहिओ नहि रहलैक। राजनीतिक कारण सँ भाषा पर प्रहार करबाक वीभत्स कार्य केँ अंजाम धरि लय चलबा मे कतेको एहेन नाम नेपाल मे लेल जा सकैत छैक जे अपन कुतर्क आ क्षुद्र अध्ययनक बलपर मैथिली केँ ‘सामन्तीवर्ग’ केर भाषा तक सिद्ध करबाक आ जनमानस मे विभाजन करबाक बिया बाउग करैत अछि जेकरा ‘जातिवादक भुमड़ी मे फँसल लोक’ आ ब्राह्मण-कायस्थ वा कोनो अन्य पढल-लिखल वर्गक कुशाग्रता आ सुसंस्कृत-सुशिक्षित अवस्था सँ घोर ईर्ष्या आ डाह करनिहार वर्ग द्वारा मल-जल देल जाइत छैक…. जाहि सँ राजनीतिक स्वार्थ यानि सत्ताभोग मे प्रयुक्त वोटबैंक पोलिटिक्स तऽ होइत छैक, लेकिन समाजक असल वांछा ‘साक्षरताक विकास’ संग ‘भाषा-साहित्य-संस्कृति’ केर संरक्षण-संवर्धन-प्रवर्धन बिना केने अपनहि समाजक कौचर्य मे हठात् समय बिताओल जाइत रहैत छैक। एहेन लोकक सहज पहिचान अहाँ एक लाइन मे कय सकैत छी – ओकर आलोचना कदापि अपनहि भाषा मे नहि भऽ सदिखन अनकर भाषा मे होइत छैक। एहेन आलोचक सँ हमरा-अहाँक समग्र मूल्य, मान्यता आ मिथिला सभ्यताक हितरक्षा तऽ बहुत दूर, ओकरा अपनो कल्याण तक संभव नहि छैक। अतः कर्महीन आ छूछ आलोचक सँ एकटा दूरी बनाकय अपन सृजनकर्म केँ पोषण दैत आगू बढैत चलू।

अन्त मे…..

उचित प्रशिक्षण केर वातावरण बनाकय हम सब आगू बढि सकब। लेखन वा वाचन मे दुविधा केँ दरकिनार कय केँ आगू बढि सकब। गलती सँ बिना डरेने आगू बढि सकब। जेहेन लिखैत छी, जएह बजैत छी, सएह मैथिली – ई नारा केँ अंगीकार कय केँ आगू बढि सकब। बिना कोनो भेदभाव रखने, अपन भाषाभाषी आ समाजक एक-एक व्यक्ति केँ डेन लगाकय उठौने संग लय केँ हमरा लोकनि आगू निश्चिते टा बढि सकब। अपन मौलिक पहिचान – भाषा, भेष, भूषण केँ सम्हारिकय बढब तऽ निश्चिते टा आगू बढि सकब आ अपन स्वाभिमान बचेलाक बादे नेपालदेश मे प्राकृतिक न्याय यानि समान नागरिक अधिकार आ पूर्ण समावेशिकता ओ स्वायत्तताक आनन्द उठा सकब।

हरिः एव हरः!!