स्वाध्याय
दान-पुण्य
हमरा संसारक रस्ते तऽ चलबाक नहि अछि, हमरा तऽ धर्मक रस्ते चलबाक अछि, तखन एहेन रीति सँ जँ अहाँ अपन ‘हम’ केर त्यागि देब तऽ ई महादान भऽ गेल। अहाँक अन्दर जतेक मात्रा मे एहि त्याग केर बल आओत, ओतबहि मात्रा मे अहाँक बाहरी जीवन सफल होयत, शान्त होयत आर संसार सँ भय सेहो नहि लागत। भय केर स्वरूप कि छैक? भय केर ई स्वरूप छैक जे बाहर तऽ दुःखे दुःख अछि, दुःखक आगि जैर रहल अछि। लोकक बर्ताव सही नहि अछि। ई सब एहेन भाव कियैक होइत अछि? कियैक तऽ अपने सँ ठीक नहि बनि पबैत अछि, तखन ई बल प्राप्त कएने बिना बाहरो नीक जीवन नहि बनि पबैत अछि।
भगवती वन्दना
नमोऽस्तु सततं जगदम्बिकायैयस्याः प्रभावमखिलं न हि वेद धाता
नो वा हरिर्न गिरिशो न चाप्यनन्तः।
अंशांशका अपि च ते किमुतान्यदेवा-
स्तस्यै नमोऽस्तु सततं जगदम्बिकायै॥
यत्पादपङ्कजरजः समवाप्य विश्वं
ब्रह्मा सृजत्यनुदिनञ्च बिभर्ति विष्णुः।
रुद्रश्च संहरति नेतरथा समर्था –
स्तस्यै नमोऽस्तु सततं जगदम्बिकायै॥
जिनक सम्पूर्ण प्रभाव केँ ब्रह्मा, विष्णु, शिव तथा भगवान् शेष तक ढंग सँ नहि जानि सकलाह, जखन कि ओ हुनकहि अंशज सेहो छथि, तखन भले दोसर देवता हुनका केना जानि सकैत छथि? एहेन ओहि भगवती जगदम्बिका केँ हमर निरन्तर प्रणाम अछि। जिनकर चरण-कमल केर धूलि पाबिकय ब्रह्मा समस्त संसार केर रचना करैत छथि, भगवान् विष्णु निरन्तर पालन करैत छथि आर रुद्र संहार करैत छथि; दोसर कोनो उपाय सँ ओ अपन-अपन कार्य करने मे समर्थ नहि भऽ सकैत छथि – एहेन ओहि भगवती जगदम्बिका केँ हमर निरन्तर प्रणाम अछि।
हरिः हरः!!
