मिथिला – इतिहास सँ वर्तमान धरि

मिथिला – इतिहास सँ वर्तमान धरि

हे मिथिला – बेर-बेर प्रणाम – मातृभूमि स्तवन

ईश्वर प्रति सम्पूर्ण आस्थावान् रहैत अपन जन्म एहि मिथिला नामक तीर्थभूमि – तंत्रभूमि -सिद्धभूमि मे होयबाक लेल पुनः-पुनः आभार प्रकट करैत छी।

मिथिलाक स्तवन करब केहेन कल्याणकारी अछि से त देखू – म सँ मकार ब्रह्मा आर ताहि मे इकारान्त स्त्री यानि ब्रह्माणी (सरस्वती विराजित छथि, थ सँ थकार विष्णु सभक पालक आर संगहि इकारान्त स्त्री लक्ष्मी सहित छथि, ल सँ लयकर्ता महादेव आ संगमे आकारान्त स्त्री यानि पार्वती विराजैत छथि – एहि तरहें त्रिदेव अपन विशिष्ट त्रिशक्ति सहित समस्त परमात्माक संछिप्त परिचायक शब्द ‘मिथिला‘ केँ हम पुनः प्रणाम करैत छी।

वृहद् विष्णुपुराण एहि मिथिलाक माहात्म्य गान करैत लिखैत अछि –

गंगाहिमवतोमध्ये नदी पंचदशान्तरे।
तैरभुक्तिरिति ख्यातो देशः परमपावनः॥
कौशिकीन्तु समारभ्य गण्डकीमधिगम्य वै।
योजनानि चतुर्विंशत् व्यायाम परिकीर्त्तितः॥
गंगाप्रवाहमारभ्य यावद्धैमवतं वनम्।
विस्तारः षोडशः प्रोक्तो देशस्य कुलनन्दन॥
मिथिला नाम नगरो नामस्ते लोकविश्रुतः।
पंचमिः कारणैः पुण्या विख्याता जगतीव्रये॥

तदनुसार, हिमालयसँ गंगा धरि (उत्तर-दक्षिण) तथा कौशिकीसँ गण्डकी धरि (पूरब-पश्चिम) केर सीमामे अवस्थित अछि मिथिला भूमि। मिथिलाक सीमा २४ योजन लम्बा आ १६ योजन चौड़ा कहल गेल अछि, तदनुसार १९२ मील आ १२८ मील होएत अछि।

मिथिलाक गौरव-गरिमा अनन्त आ महिमामण्डित अछि। मिथिला-स्तुति विषयक निम्नांकित श्लोक केँ आत्मसात करैत पुनः प्रणाम करैत छी।

नित्यस्थली नित्यलीले नित्यधाम नमोऽस्तु ते।
धन्या त्वं मिथिले देवि ज्ञानदे मुक्तिदायिनी॥
रामस्वरूपे वैदेहि सीताजन्मप्रदायिनी।
पापविध्वंसिके मातर्भवबन्धविमोचिनी॥
यज्ञदान-तपोध्यान-स्वाध्याय फलदे शुभे।
कामिनां कामदे तुभ्यं नमस्यामो वयं सदा॥

अनुपम मिथिला नित्यलीला-भूमि, नित्यधाम तथा मोक्षदायिनी होयबाक कारण धन्य अछि। ई साक्षात् रामस्वरूपा विदेहपुरी, जानकी जन्मभूमि, पापमोचिनी एवं भवबन्धनसँ त्राण दियाबयवाली अछि। हे मिथिले! अहाँ यज्ञ-दान, तप-ध्यान आ स्वाध्यायक शुभफल देबयवाली आर भक्तक सब कामना पूरा करयवाली छी। ताहि सँ हम सभ क्यो अपनेकेँ प्रणाम करैत छी।

विदेहदेश यानि मिथिलादेश केर चौहद्दी:

वृहद् विष्णुपुराण सँ ज्ञात होइत अछि जे कौशिकी नदीसँ गण्डक धरि विदेह अथवा मिथिलाक लम्बाइ २४ योजन अथवा ९६ कोश तथा गंगा सँ हिमालय पर्यन्त एक चौडाइ १६ योजन वा ६४ कोश छलैक। (वृहद् विष्णुपुराण, दरभंगा संस्करण) पृ. १६।

मिथिला-राजधानी वैशाली सँ करीब तैँतीस मीलक दूरी पर छल। सुरुचि जातक सँ ज्ञात होइत अछि जे मिथिलापुरी २१ मील मे व्याप्त छल तथा समस्त विदेह राज्यक परिमाप नओ सय (९००) मील छलैक। गान्धार जातकक अनुसार “मिथिलाक विस्तार २१ मीलमे छलैक तथा विदेह राज्यक व्याप्ति ९०० मील मे छलैक जाहि मे सोरह हजार गाँव, सोरह हजार नर्तकी तथा अपार सम्पत्तिसँ परिपूर्ण कोषागार छल।” महाजनक जातकमे मिथिलाक समृद्धिक एहने वर्णन भेटैत अछि। महानारदकस्सप जातकमे विदेह राजक शोभा, सुरुचि तथा ठाठबाटक चित्र प्रस्तुत कयल गेल अछि। माहउम्मग्ग जातकमे मिथिलाक चारूद्वार तथआ एक पूव, पच्छिम, उत्तर तथा दक्षिणमे स्थित विपणि-पत्तनक वर्णन कयल गेल अछि। उवासगदसाओमे महान विदेह देशक बहुधा उल्लेख पाओल जाइछ।

महाभारत मे मिथिलाक रोचक वर्णन भेटैत अछि। शुकदेव राजा जनक सँ ब्रह्मविद्याक शिक्षा प्राप्त करबा लेल मिथिला गेल छलाह आ ओही नगरक शोभा-सम्पन्नता देखि आश्चर्यचकित भऽ गेल छलाह।

(मिथिलाक इतिहास – डा. उपेन्द्र ठाकुर, मैथिली अकादमी, पटना द्वारा प्रकाशित पुस्तक सँ लेल गेल)

मिथिलाक चर्चा मे सन्दर्भ-सामग्रीक प्रचुरता

वैह अंग्रेज भारत पर शासन सेहो केलक आ ओकर अनेको विद्वान् विभिन्न तरहक शोध करैत विश्व लेल कीर्तिमान बनेलक मुदा भारतीय विद्वान् केँ पंगू बनेबाक लेल भारतीयताक अध्ययन करबा लेल अपन नाम बीचमें बिना लेने पूर्ण नहि होवय देबाक मानू सिद्धि हासिल कय लेलक। दोष केकर? अंग्रेज के? कदापि नहि! दोष हमरे लोकनिक जे आइयो सभ किछु बुझितो मजबूर छी आ अंग्रेजिया शिक्षा पद्धतिके सहारे पेटपोसा पढाइ करैत छी आ आपस में कटिंग-कटर (खण्डी मैथिल) बनैत छी। ईहो कारण संभव जे आजुक मैथिल विद्वान् में उद्योतकर (७०० ई.), मंडन (८०० ई.), वाचस्पति (८४० ई.), उदयन (९५० ई.), गङ्गेश (११०० ई.), विद्यापति (१३५० ई.), पक्षधर (१४५० ई.) आदि तऽ नहिये टा उत्पत्ति भऽ रहल छथि; जनक, याज्ञवल्क्य, न्यायसूत्रक प्रणेता गौतम, वैशेषिक दर्शनक जनक कणाद, मीमांसाक प्रस्तोता जैमिनि तथा सांख्य दर्शनक संस्थापक कपिलक जन्मभूमि रहल मिथिलामें ई महान् विद्वात्माक पुन: अवतरण एहि कलियुग में एकदम संभव नहि बुझा रहल अछि। विद्यागारा मिथिला केकरा नहि सिद्ध केलक – पग-पगपर आध्यात्मिक स्वरूपक प्रत्यक्ष दर्शन आइयो यदि संसारमें कतहु संभव अछि तऽ ओ छी मिथिला – लेकिन शापित भूमि समान बिना कोनो राजनीतिक संरक्षणके ई पूर्वक प्रथम गणतंत्र – पूर्ण देश – महान् विदेहराजक राज्य उपेक्षित कतहु भऽ के नहि अछि।

विराटनगरक एक समारोह में सुप्रसिद्ध भाषा वैज्ञानिक डा. रामावतार यादव केर ओहि उक्ति केँ स्मृति में आनि रहल छी जे आजुक विद्वान् बेसीतर बिना शोधकार्य कएने मनमर्जी व्याख्या सँ मिथिलाक असल स्वरूप केँ नष्ट कय रहल छथि। हुनकर आरोप या आलोचना बहुत हद तक सही बुझाएत अछि कारण फेसबुक पर हजारों मैथिल लोकनि केँ खन्डन-मन्डन मे लागल देखैत छी, अध्ययन तरफ विरले कियो झुकल अछि। अध्ययनक सामग्री सभ में सेहो बहुतो तरहक बात कचैल देखैत छी – अंग्रेजक संग्रहित शोधकेँ आधार बनाय आजुक शिक्षा पद्धति अनुरूप मिथिलापर सेहो लगभग २०० वर्ष सँ अनेको कार्य भेल जेना अनुभूति होइत अछि। आउ, डा. उपेन्द्र ठाकुर लिखित मैथिली अकादमी, पटना द्वारा प्रकाशित ‘मिथिलाक इतिहास’ १९८०, १९९२ तथा २०११ में तीन संस्करण द्वारा हमरा सभ लेल कैल गेल अनमोल कार्यक किछु अति महत्त्वपूर्ण जानकारी हम सभ ग्रहण करी; कनेक फुर्सत सँ।

डा. उपेन्द्र ठाकुर द्वारा संदर्भ में लेल गेल ग्रन्थक सूची जे मिथिला वर्णन करैत अछि तेकर विवरण हम प्रस्तुत करय लेल चाहब:

१. अथर्बवेद (पैप्पलवाद शाखा): सम्पादन रघुवीर, लाहोर, १९३६-४१, सम्पादन आर. रौथ तथा डब्ल्यु. डी. ह्विटनी, बर्लिन, १८५६.

२. अर्थशास्त्र (कौटिलीय): सम्पादन आर. शामशास्त्री, मैसूर, १९१९. सम्पादन गणपति शास्त्री, त्रिवेन्द्रम, १९२४-२५. सम्पादन आर. पी. कांगले, बम्बइइ, १९६३-६६. अनुवाद आर शामशास्त्री, मैसूर, १९२९.

३. आष्टाध्यायी (पाणिनी-कृत): मद्रास, १९१७.

४. ऋग्वेद: अजमेर संस्करण, १९१७ (अनुवाद) एम. एन. दत्त, कलकत्ता, १९०६.

५. ऐतरेयब्राह्मण: सम्पादन मार्टिन हाँग, बम्बइ, १८६३.

६. कात्यायन श्रोतसूत्र: गीता प्रेस, गोरखपुर.

७. कीर्तिलता: सम्पादन महामहोपाध्याय हरप्रसाद शास्त्री, कलकत्ता. सम्पादन बी. आर. सक्सेना, नागरी प्रचारिणी संस्करण, काशी।

८. कृत्यकल्पतरु (लक्ष्मीधर-कृत): गायकवाड ओरिएंटल सीरिज, बडौदा।

९. कौशीतकि उपनिषद्: गीता प्रेस, गोरखपुर।

१०. कौशीतकि ब्राह्मण: गीता प्रेस, गोरखपुर।

११. खुलसत-उत-तबारीख: महाराजा कल्याण सिंह (कृत)। (फारसी).

१२. गउडबहो: सम्पादक एस. सी. पण्डित, बमबइ (१९२७).

१३. गरूडपुराण: सम्पादक पंचाननतर्करत्न, कलकत्ता १३१४ बंगाल संवत।

१४. गिलगिट मैनुसक्रिप्ट्स: सम्पादक नालिनाक्ष दत्त, कलकत्ता।

१५. गौडराजमाला: सम्पादक आर. पी. चंदा।

१६. गौडलेखमाला: सम्पादक आर. पी. चंदा।

१७. छान्दोग्य उपनिषद्: सम्पादक यू. टी. वीरराघवाचार्य, वेंकटेश्वर ओरिएन्टल इंस्टीच्युट तिरुपति, चित्तूर, १९५२.

१८. जातक: सम्पादक: सम्पादक ह्वी. फौसबाल, लंदन, १८७७-९७. अनुवाद ई. बी. काबेल कैम्ब्रिज, १८९६-१९१३.

१९. जैमिनीय उपनिषद् ब्राह्मण: सम्पादक रामदेव, लाहोर, १९२१.

२०. डिसक्रिप्टिव कैटलाग आफ मैनुसक्रिप्ट इन मिथिला: ए. बनर्जी-शास्त्री, बिहार रिसर्च सोसाइटी, पटना।

२१. तबाकत-इ-अकबरी (फारसी)

२२. तबाकत-इ-नासिरी (फारसी)

२३. ताण्ड्य ब्राह्मण: सम्पादक चिन्नास्वामी शास्त्री, बनारस, १९३५.

२४. सारनाथ: अनुवाद एफ. ए. वोन; अनुवाद अलक चट्टोपाध्याय तथा लामा चिम्पा।

२५. तैत्तिरीय ब्राह्मण: सम्पादक आ. एल. मित्र, कलकत्ता, १८५५-७०.

२६. तैत्तिरीय संहिता: सम्पादक बेबेर, बर्लिन, १८७१-७२.

२७. न्यायसूत्र (गौतम-कृत): सम्पादक जे. तर्कपंचानन, कलकत्ता.

२८. पचविंश ब्राह्मण: अनुवाद डब्ल्यु. कैलंड, कलकत्ता, १९३१.

२९. पुरुष-परीक्षा (विद्यापति-कृत): सम्पादक चन्दा झा, अनुवाद जार्ज ग्रियर्सन, सम्पादन रमानाथ झा, पटना विश्वविद्यालय प्रकाशन।

३०. बृहदारण्यक उपनिषद्: सम्पादक ई. रोएर (सैक्रेड बुक्स अफ दि ईस्ट, भाग १५).

३१. ब्रह्माण्ड पुराण: प्रकाशक वेंकटेश्वर प्रेस, बम्बइ, १९१३.

३२. भागवत पुराण: सम्पादक बुर्नोफ, अनुवाद एस. सुब्बाराव, दू भाग, तिरुपति, १९२८.

३३. महाभारत: पूना संस्करण, १९२७.

३४. महावंश: सम्पादक डब्ल्यु. गीगर, पालि टेक्स्ट सोसाइटी, लंदन, १९०८.

३५. मानवधर्मशास्त्र (मनुस्मृति): सम्पादक जी. बहुलर, सम्पादक जे. जोली, लन्दन, १८९७.

३६. रागतरंगिणी (कल्हण-कृत): सम्पादक एम. ए. स्टाइन, बम्बइ, १८१२. अनुवाद एम. ए. स्टाइन।

३७. राजनीति-रत्नाकर (चन्देश्वर-कृत): सम्पादक के. पी. जायसवाल, बिहार रिसर्च सोसाइटी, पटना, १९३६.

३८. रामायण (वाल्मीकि-कृत): सम्पादक रघुवीर, लाहौर, १९३८, बनारस, १९५१; अनुवाद ग्रिफिक्स, अनुवाद: एम. एन. दत्त, कलकत्ता, १९९२-९४.

३९. रियाज-उल-सलातीन (फारसी): लेखक गुलाम हुसैन सलीम, अनुवाद ए. अब्बास सलीम.

४०. वर्ण-रत्नाकर (ज्योतिरिश्वर ठाकुर-कृत): सम्पादक एस. के. चटर्जी तथा श्रीकान्त मिश्र, कलकत्ता।

४१. वाजसनेयिसंहिता: सम्पादक वेबर, लंदन, १९५२.

४२. वायुपुराण: सम्पादक आर. एल. मित्र, २ भाग, बिब्लियोथिका इंडिका, कलकत्ता, १८००-१८८८.

४३. विष्णुपुराण: सम्पादक जीवानन्द, विद्यासागर, कलकत्ता, १८८२. अनुवाद एच. एच. विल्सन, ५ भाग, लंदन, १८६४-७०.

४४. शतपथ ब्राह्मण: सम्पादक ए. वेबर, लन्दन, १८८५; अनुवाद जे. एगलिंग (सेक्रेड बुक्स अफ दि ईस्ट, भाग १२, २६ आदि), आक्सफोर्ड, १८८२-१९००.

४५. सीर-उल-मुतखेरीन (फारसी): लेखक गुलाम हुसैन खाँ, अनुवाद रेमण्ड।

४६. सूक्ति-मुक्तावली: सम्पादक रमानाथ झा।

४७. हरिवंश: सम्पादक आर. किंजवडेकर; सम्पादक डब्ल्यु. गीगर, पालि टेक्स्ट सोसाइटी, १९०८.

एकरा सभक अतिरिक्त लगभग ५७ अन्य अंग्रेजी, हिन्दी विद्वान् केर सैकडों रचना आ करीबन २१ टा अति महत्त्वपूर्ण शोध-पत्रिका एवं सामयिकीके अध्ययनक आधारपर डा. उपेन्द्र ठाकुर ‘मिथिलाक इतिहास’ प्रस्तुत केने छथि।

हमर कहबाक तात्पर्य यैह अछि जे अध्ययन बिना हवाबाजी सऽ बाज आयब जरुरी – खण्डी-खण्डी खेल अधजल गगरी धारण करनिहार लेल मात्र होइत छैक। पुरखा तऽ महान् छलाह, ऋषि-मुनि छलाह… संतानमें ओ समस्त गुण रहितो आनुवंशिकी सिद्धान्त अनुरूप घसलहबा बुद्धि बेसी प्रयोग करबाक आदति पडला सँ समस्या बढि गेल अछि आ ताहि चलते समृद्ध इतिहास रहितो विपन्नताक पराकाष्ठा सँ गुजैर रहल छी हम सभ आ चेतबाक समय सीमा आबि गेल बुझैत अछि।

मैथिल
(पौराणिक पहिचान)

शुक्लां ब्रह्मविचारसारपरमामाद्यां जगद्व्यापिनीं
वीणापुस्तकधारिणीमभयदां जाड्यान्धकारापहाम्।
हस्ते स्फटिकमालिकां विदधतीं पद्मासने संस्थितां
वन्दे तां परमेश्वरीं भगवतीं बुद्धिप्रदां शारदाम्॥

मा सरस्वतीक चरणकमल मे बेर-बेर प्रणाम करैत एकटा छोट संस्मरण लिखय लेल चाहब। एहि संस्मरण यात्रा पर पाठक वर्ग केँ आनबाक एकमात्र उद्देश्य यैह अछि जे हमरा लोकनिक उद्गमविन्दु (मातृभूमि) मिथिला एक सिद्धक्षेत्र केर रूप मे प्रचलित रहल अछि आर हम सब कोन हिसाबे मैथिल छी। मैथिल कथमपि कोनो खास जाति या वर्ग या समुदाय लेल नहि, अपितु मनुस्चरित केर एक सर्वश्रेष्ठ रूप मे सुपरिभाषित अछि। आउ बुझबाक प्रयत्न करी।

विष्णुपुराण मे वर्णित निमि-चरित्र तथा निमि-वंशक वर्णन करैत चतुर्थ अंशक पाँचम अध्याय, श्लोक ३२-३४ मे श्री पराशर द्वारा निर्णय देल गेल अछि:

कृतौ सन्तिष्ठतेऽयं जनकवंश:॥३२॥
इत्येते मैथिला:॥३३॥
प्रायेणैते आत्मविद्याश्रयिणो भूपाला भवन्ति॥३४॥

कृति नामक राजा मे जनकवंश केर समाप्तिक घोषणा कैल गेल अछि। इक्ष्वाकुपुत्र निमि सँ प्रारंभ मिथिलाक मैथिल भूपालगण केर पूर्ण चर्चा मे निमि द्वारा एक सहस्रवर्षमे समाप्त होवयवला यज्ञ केर आरम्भ सँ अन्त धरिक समस्त वर्णन, वसिष्ठ द्वारा निमि केँ शाप देबाक बात, पुन: निमि द्वारा वसिष्ठकेँ शाप, ऋत्विगण केर प्रार्थना पर दुनू केँ वरदान देबाक लेल देवगण द्वारा स्वीकृति, निमि द्वारा शरीर छोडबाक कष्टकेँ सब सऽ दु:सह दु:ख मानि पुन: शरीर ग्रहण करबा सँ मना कय देबाक प्रसंग, तदोपरान्त हुनकहि शरीरकेँ शमीदण्ड (अरणि) सँ मथैत एक बालक केर जन्म, विदेह सँ वैदेहक उत्पत्ति रूप मे नामकरण, मन्थन सँ उत्पत्ति हेतु अन्य नाम ‘मिथि’ आ हुनका द्वारा शासित भूमण्डल केर नाम ‘मिथिला’ मानल गेल अछि।

तदोपरान्त भूपालमण्डल एहि क्रम मे वर्णित अछि:

मिथि – उदावसु – नन्दिवर्धन – सुकेतु – देवरात – बृहदुक्थ – महावीर्य – सुधृति – धृष्टकेतु – हर्यश्व – मनु – प्रतिक – कृतरथ – देवमीढ – विबुध – महाधृति – कृतरात – महारोमा – सुवर्णरोमा – ह्रस्वरोमा – सीरध्वज – भानुमान् – शतद्युम्न – कृति – अञ्जन – कुरुजित् – अरिष्टनेमि – श्रुतायु – सुपार्श्व – सृञ्जय – क्षेमावी – अनेना – भौमरथ – सत्यरथ – उपगु – उपगुप्त – स्वागत – स्वानन्द – सुवर्चा – सुपार्श्व – सुभाष – सुश्रुत – जय – विजय – ऋत – सुनय – वीतहव्य – धृति – बहुलाश्व – कृति।

मूल मनन योग्य पाँति अछि – इत्येते मैथिला:। प्रायणैते आत्मविद्याश्रयिणो भूपाला भवन्ति।

अर्थात् ई समस्त मैथिल भूपालगण छथि। प्राय: ई समस्त राजा लोकनि ‘आत्मविद्या’ केँ आश्रय देबयवला छथि।

तऽ एहि लेख मे हमर ध्यान ओहि विन्दु पर जाइत अछि जे आब जखन कलियुग आबि गेल अछि, युगकालीन परिवर्तन मे मैथिल कतय छथि। मिथिला किऐक हेरायल-भोथियायल अछि। समाधान लेल विष्णुपुराण केर चतुर्थ अंशक अध्याय २० जतय कुरु वंशक चर्चा उपरान्त अध्याय २१ मे भविष्य मे होवयवला इक्ष्वाकुवंशीय राजा केर चर्चा शुरु भेल अछि। अध्याय २३ आर २४ पर विशेष ध्यानाकर्षण भऽ रहल अछि। अध्याय २३ मे मगधवंशीय राजा द्वारा भूमण्डल पर शासनक चर्चा अछि। अध्याय २४ मे कलियुग मे आर के सब राज्य संचालक भूपालगण हेता तिनकर विषय मे भविष्यवाणी अछि। कलियुगी राजा व प्रजाक आचरण पर नीक प्रकाश देल गेल अछि। आर अन्त मे कल्कि अवतार भेला उपरान्त पुन: धर्माचरण केर प्रतिष्ठापन होइत सूर्य, वृहस्पति आ चन्द्रमा पुष्य नक्षत्र मे एक संगे एके राशि मे अबिते सत्ययुग केर प्रारम्भ होयत कहल गेल अछि। हम पाठक सँ अनुरोध करय लेल चाहब जे एहि समस्त अध्याय पर अपन स्वाध्यायकेँ जरुर केन्द्रित करैथ आ स्वयं निर्णय करैत जातीय अभिमान सँ नितान्त दूर निज मानवीय कर्म सँ अपनाकेँ मुक्त बनबैथ।

स्मृति मे रहय, मैथिलक सन्तान सदिखन ‘आत्मविद्या’ केँ आश्रयदाता रहला अछि। माता सरस्वतीक कृपा एतय बनल रहय, मिथिलाक सन्तान केँ बिहारी खिचडी सँ बर्बाद कैल जा रहल अछि, एहि पर वर्तमान कलियुगी भूपालगण केर ध्यानकेन्द्रित हो तथा सबहक आभूषण विद्याकेँ पुनर्स्थापित कैल जाय।

मिथिला देश से मिथिला राज्य आ आब मिथिला राज्य सऽ बनि गेल मिथिला अँचल!! (मिथिलाँचलपर विशेष)

भारतवर्ष समस्त संसारके द्योतक थिकैक, कारण भारतवर्षमें विदेश केकरो नहि कहल गेलैक अछि। वसुधैव कुटुम्बकम् समान अति उच्च संस्कार के ग्रहण करैत मानव-कल्याण संग हर जीवपर दयाक बात कैल गेल छैक। करुणा सँ पैघ प्रेमक दोसर कोनो रूप नहि! ताहि भारतीय संस्कृतिमें मिथिलाक अपन अलग संस्कार रहलैक अछि। आइ जे भारतदेशक सीमा छैक ताहिमें कतहु कोनो विद्वान सँ एहि बात के मर्म जानल-बुझल जा सकैत छैक जे आखिर मिथिलाक अपन वैशिष्ट्य व्यवहार अलौकिक होयबाक रहस्य कि! एक पाँतिमें जबाब एतबी सऽ भेटि जाइत छैक जे स्वयं जगज्जननी सिया एहि मिथिलाक माटिसँ अवतरित भेलीह। एहि ठाम ईश्वर आराधना लेल विशेषाधिकार छैक जे बस एक केराक पातो पर चौदहो भुवनके देवताके आवाहन केलापर देवतागण प्रसन्नतासँ अपन हव्य ग्रहण करबाक लेल अबैत छथि।

कुमुदजी एक न्युजक्लीप शेयर कयलाह छथि “वैदिक रीति से होता सत्कार” – अतिथिक सत्कार के परंपरा एहिठाम वैदिक रहल अछि ताहि बातक आलेख आ कामेश्वर सिंह संस्कृत विश्वविद्यालयक वेद विभागाध्यक्छक उक्ति सहित एहि समाचार-आलेखमें अतिथि-सत्कारक महत्त्व आ मिथिलाक विधानपर विशेष चर्चा केकरहु नीक लगतैक। मैथिलकेँ खास कऽ के बेसी नीक लगतैक कारण ई हुनक संस्कार के दुनियाँक सोझाँ विदित कय रहल छैक। स्मृतिमें आनय चाहब एक विशिष्ट विद्वान् केर ओहि उक्तिकेँ जाहिमें कहल गेल छलैक कि संसार सँ वेद विलुप्त होयबाक समय मिथिलामें लौकिक व्यवहार देखि पुन: वेदक स्मृति होयब संभव छैक। अवश्य!

लेकिन स्वतंत्रता प्राप्ति आजुक भारतमें मिथिला प्रति विद्वेष-भावना चरम पर अछि। काल्हिक लेखमें अपने लोकनि पढलहुँ जे कोना-कोना मिथिलाक हक केँ राजनतीसँ लूटैत आइ मैथिलकेँ दर-दर भटकैत अपन रोजी लेल बेहालीक हाल में धकेलल गेल आ क्रमश: ईहो स्पष्ट होयत जे बिहार राज्य सेहो दिन ब दिन मिथिलाक अस्मिता संग केवल खेलवाड करैत अछि आ जहिना पूर्वहि सऽ जाति-पाँतिमें तोडैत मिथिला लेल एक-स्वरबद्धताक भंग करैत घोर षड्यन्त्र करैत अछि। आइ देशमें तीन राजनीतिक धार मूलत: चलि रहल छैक, लेकिन एकरा समयक खेल कहि सकैत छी जे तिनू धार (संप्रग सत्ताधारी, राजग मुख्य विपक्छी आ तेसर मोर्चा विपक्छी) मिथिलाक समुचित माँग – एक अलग राज्य लेल चुप अछि कारण भारतीय प्रजातंत्रमें वोट पेबाक लेल मूल्य, इतिहास, संस्कृति, भाषा, साहित्य, आदिक संरक्छणक जिम्मेवारी कम आ जातियता-भावना भडकाबैत बस वोट-बैंकके राजनीति ज्यादा छैक। नहि जानि गाँधी, पटेल, मालवीय, शास्त्री, भावे, आ कतेको महान् राष्ट्रसपुत सभ रहैत नेहरुजी अपन जिद्द सँ मिथिलाके ध्वस्त केला, स्वतंत्र भारतमें गलत राजनीतिके नींव रखलाह आ आब देश बस वोटबैंक पोलिटिक्समें लूटो और राज करो के सिद्धान्त पर अग्रसर अछि। आर तऽ आर, आपसी विद्वेष-भाव एहेन प्रतिद्वंद्वी छैक जे आपसी सहकार्यके जगह एक-दोसरके अस्मिताहरण लेल भाषा राजनीति सँ सेहो मैथिलीपर आक्रमण पडोसी अन्य संस्कृत (जेना भोजपुरी, अवधी, बंगाली, आसामी, नेपाली, संथाली, ओडिशी, आदि) द्वारा होयब स्वाभाविके छैक।

मिथिलाक कर्णधार चिन्तक आब विदेह नहि, नागपुरी नारंगी पैटर्नपर उधारी सिद्धान्त सऽ मिथिला निर्माण करय लेल चाहैत छैक। घरे बैसल तरे-तरे सभटा हेतैक से बुझैत छैक। वनभोज पर चर्चा आ चिन्तन होइत छैक लेकिन आम जनमानसकेँ सभ बात बुझाबय लेल आइ धरि कतहु कोनो आमसभा पर्यन्त नहि कैल गेलैक अछि। खुइल के कियो नहि बाजय चाहैत छैक जे हमरा सभ संग कैल गेल दुर्व्यवहार सऽ हम समस्त मिथिलावासी दु:खी छी। अपनहिमें ढुइसबाजी रहतैक तऽ भले साधारण आ पिछडल जाति-जनजातिक-बौद्धिक जनमानस कि बुझि सकतैक जे मिथिला देश सऽ मिथिला राज्य आ आब मिथिला राज्य सऽ मिथिलाँचल में परिणति सीधा-सीधा सूचक थिकैक जे कनेक वर्षक बाद कहीं लोक हैँसिके मजाक में नहि कहैक कि ‘एक मिथिला था…..’!

 

मिथिलाक इतिहास आ वर्तमान समाज: शास्त्र-पुराण सँ वर्तमान धरि

अतीत स्वर्णिम – वर्तमान दयनीय

इतिहास मिथिला के अत्यन्त समृद्ध लेकिन वर्तमान अन्जान अन्हरिया के चपेट में अछि जतय डिबिया के भुकभुक्की इजोतसँ बस थोड़ मैथिल जन पहचान के पहाड़ ठाड़्ह करय लेल चाहैत अछि। समस्त संसार सँ अलग विधि-विधान-कर्मकाण्ड के रीति सँ भरलमिथिलाक व्यवहार आइ सहसा आडंबर ओ मिथ्यापूर्ण बुझैत अछि  तैयो पौराणिक प्रथा अनुरूप किछु शौखिया मिथिलांग बचाबय चाहैत अछि। जाहि समाज के हरेक महत्त्वपूर्ण पावैन वा उत्सवमें हरेक जातिके सहभागिता-समन्वयसँ मनेबाक नियम रहल अछि, आइ परंपराके विरोधमें तथाकथित होशियार गृहद्रोही ओहि आक्रमणकारी विदेशी संस्कृतिके पालन केनिहार घूसपैठियाक विद्वेषकारी नीतिके जाल में फंसल हरेक जातिमें आपसी झगड़ा लगाय मिथिलाके विशिष्टता के सर्वनाश करयपर उतारू अछि। समयक गति निरन्तर बहैत पाइनिक धारा सुख व दुःख नामक दू तीर के सहारे बढैत रहैत अछि, मुदा विडंबना एना ताण्डव करत जे स्वयं मैथिल अपन संस्कृति केर अवहेलना करता मिथिलाक सुन्दरता के घृणास्पद – हास्यास्पद बनाबय लेल जयचन्दके उपाधि पौता से शायद विज्ञ मिथिला-निर्माता ऋषि-मुनि कदापि नहि सोचने हेताह। तखन तऽ स्थिति दयनीय तखनहि बनैत छैक जखन अपन सम्पत्तिके लोक सहेजय में असमर्थ बनय, किछु तहिना एतहु भेलैक अछि।

देखल जाय तऽ नैतिकता के पाठ अनुरूप रमण करनिहार कदापि नहि खसैत अछि, लेकिन जहिना नीति सँ डिगल, ओ भ्रष्ट भेल  फेर कतहु भऽ के नहि रहैछ। गीतामें सेहो श्रीकृष्ण अर्जुन केर जिज्ञासा के शान्त करैत कहने छथि जे अपन धर्म सऽ डिगल लोक के कोनो ठेगान नहि रहि जाइत छैक, ओ कतहु भऽ के नहि रहि पबैत अछि। जे गुण आ संस्कार एतय साधना करैत महर्षि समाज पबैत छलाह से समूचा संसार लेल सहारा के नव-नव स्तम्भ निर्माण करैत छल, वर्तमान में सेहो किछु खास एहि मादे बिगैड़ गेल सेहो नहि छैक, लेकिन मूल विन्दु सऽ खसैक जरुर गेल आ स्वार्थक घनघोर घटा सऽ घेरायल आजुक विद्वान्‌ मैथिल अपनहि सऽ अपन धर्म भ्रष्ट करबामें लागल छथि। कौआ कतबो मयुरक पाँखि लगाय मयुर संग मेघ देखि नाचय लेल जायत तऽ ओ मयुर नहि बनि सकैत अछि, लेकिन ई सहज ज्ञान के जाइन-बुझि हम सभ देखावाके धुरखेल में उड़ियाबैत छी आ लगैत छी रंगीन बैलून फूलाबय आ सभ तरफ फूसिये के हैप्पी-हैप्पी देखैत छी।

नीतिकथन छैक – अभ्यास सऽ विद्या – विद्वता सऽ पात्रता – पात्रता सऽ विनयशीलता – विनयशीलता याने अभिवादनशील – सभक प्रेम के जितनिहार। आइयो मिथिलाके लोकजन कतहु रहैथ, रोटी अपन बौद्धिक राग सँ पबैत छथि। दरिद्रता के माइर सँ कोना मैथिल लड़लाह एकर प्रत्यक्ष उदाहरण पैछला ६० वर्ष के इतिहास में देखैत अछि। जमीन्दारी प्रथाके अन्त – सामन्तवादी सोच के समाधान आ रोजगार बिना रोजी नहि भेटत, बबुआनी अगबे नहि छजत, बाप-दादाके अकूत संपत्ति राजा-महाराजा के सेहो ध्वस्त भऽ गेलैक… आदि मनोदशा सँ मैथिलमें एक दबल शक्ति जाग्रत भेल आ समूचा संसार पसैर गेलाह आ रोजी कमैत घर के फूसक चार के खपड़ैल बनेला, पुनः खपड़ैल के पिटुआ छत आ पुनः पिटुआ छत के आब पिलरवाला ढलैया छत में परिणत करैत अपन विकास के अपनहि कारक बनि गेलाह। एहि में कतहु दू मत नहि जे गरीबी मिथिलामें आबय सऽ पहिने दस बेर सोचत, कारण जे औझका प्रवृत्ति छैक कि व्यक्तिगत पोषण सर्वोपरि ताहि में मैथिल कोनो अन्य प्रजाति सँ बहुत आगू छथि। लेकिन जे अधोगति अपन भाषा-संस्कृति-व्यवहारकेर आइ अपना रहल छथि तेकर दुष्परिणाम धिया-पुता भुगततैन आ अगिला २० वर्षक बाद मिथिला पुनः एक अजीबोगरीब संक्रमण सँ जूझत जे शायद एहि महत्त्वपूर्ण संस्कृति के अन्तकारी नहि बनि जाय। सहारा दैवे टा! सनातन आ एतेक लंबा इतिहास के समेटने आखिर मिथिला २० वर्ष बाद समाप्त भऽ जाइत से संभव नहि, लेकिन आशंका के नहि टारल जा सकैत अछि। कारण एकहि टा – गृहद्रोही स्वभाव जे अपन भाषा आ अपन संस्कृतिकेँ अपनहि तुच्छ मानयवाला के संख्या दिन-ब-दिन बढल जा रहल अछि। तखन सहारा के बनत एहि मिथिला लेल? कि सीता फेर औती?

मिथिलाक नव विकसित धारा सँ बढल अछि आशा

जाहि मिथिलाक नाम मिथिलादेश – मिथिलाधाम सँ वर्तमान समय संकुचित होइत मात्र मिथिलांचल धरि पहुँचि चुकल अछि। ताहि ठामक आर्थिक पूर्वाधार ओ कारोबार आत्मनिर्भरताक मामिला मे अत्यन्त कमजोर भऽ चुकल अछि। स्वतंत्र भारत मे जाहि संविधान केर शासन सँ भारतीय संघ संचालित अछि, ताहि मे पूर्वक सामन्तवाद सँ निजात पेबाक लेल जाति-पाति आ छुआछुत केँ खत्म करबाक लेल आरक्षण तथा विभिन्न विशेषाधिकार आदिक तात्कालिक व्यवस्था कयल गेल जे कालान्तर मे वोट-बैंक पोलिटिक्स मे परिणति पओलक। मिथिलाक्षेत्र मे किंवा पूरे बिहार मे राजनीतिक शक्ति द्वारा सत्ता संचालन पद्धति अंग्रेजहु वा अन्य विदेशी सल्तनत द्वारा चलायल गेल सामन्ती व्यवस्था सँ बदतर आ लोक-समाज केँ आपस मे विखंडित कय जाति-आधारित वोट-बैंक मार्फत सत्तारोहण करब लेकिन अपन कार्यकाल मे कोनो उपलब्धिपूर्ण कार्य नहि कय लूट-भ्रष्टाचारी आ जातीय तुष्टीकरण मे बेसी लागि अपन सत्तालोलुपताक कार्य मात्र करबाक कारण सँ एहि क्षेत्रक जनता दिनानुदिन पिछड़ैत चलि गेल। ताहि ऊपर सँ बाढि आ सुखाड़ समान क्रूर प्राकृतिक आपदा, ताहू केर नाम पर सरकारी व्यवस्था द्वारा स्थायी राहत आ समाधान मे सिर्फ लूट-भ्रष्टाचार बेसी। विडंबनापूर्ण स्थिति तँ एहेन अछि जे मूल मिथिला धरातल पर सरकार आ जनता बीच नुका-चोरीक खेल आइयो सरेआम देखय लेल भेटैत अछि। लोकक मानसिकता एहेन छैक जे पब्लिक रास्ताक जमीन हो वा सरकारी गैर-मजेरुआ आम या खास – अतिक्रमण करब, सरकारी सम्पत्ति केँ पराया मानिकय ओकरा सुरक्षा नहि दय उल्टा नुकसान करब, काठक पूल जाहि पर सँ अपने आवागमन करैत छी तेकर लकड़ी चोराकय घरक धरैन आ कड़ी बनेबाक मनोदशा, आदि एतुका जनता मे विद्यमान् भेटैत अछि। अत्यल्प जनसंख्या राज्य केर हित आ राष्ट्रक हित लेल चिन्तन करैत अछि। अशिक्षा, गरीबी, भुखमरी, कुपोषण, बेरोजगारी – यैह सब बनि गेल मिथिलाक लोक केर नियति।

ऐतिहासिक समृद्धि, सुसंस्कार, सुशिक्षा, सुशासन, सुव्यवस्था आदिक बात सपना समान आ मात्र साहित्यक पोथी मे सिमैट गेल। भाषा-साहित्य त दूर अपन मातृभाषा तक प्रयोग करय मे एहि ठामक लोकमानस केँ लज्जाबोध होबय लागल अछि, लोक अपन बाल-बच्चा केँ हिन्दी आ अंग्रेजी सीखबय लागल। विद्यालय केर स्थिति ओतबा बदतर, सब तरहें जीवन पद्धति वैदिक आचार-विचार सँ उल्टा आ हतोत्साहित करयवला। जातीय सद्भावना आ सौहार्द्रक स्थान पर वैमनस्यता आ आपसी ईर्ष्या-डाह मे लोक दिन-राति जरि रहल अछि। एहेन चुनौतीपूर्ण माहौल मे विभिन्न कारण सँ लोकपलायन केर नियति मिथिला जनमानस पर हावी भऽ गेल अछि। आइ करीब ४ दशक सँ लोकपलायन मे तेजी सँ वृद्धि भेल तथ्यांक भेटैत अछि, घरही कमासुत निज मातृभूमि सँ दूर जा अपन परिवारक जीविकोपार्जन कमेबाक लेल बाध्य भेल अछि। वर्तमान पलायन केर युग हतोत्साहित करयवला अछि, लेकिन नव विकसित धारा सँ बहुतो रास नव-नव आशा सेहो बन्हाइत अछि। आइ मिथिला मे भुखमरी आ आर्थिक दयनीयता नगण्य अछि। चुनौतीपूर्ण जीवन जियैत एतुका लोकमानस काफी सबल बनि गेल कहि सकैत छी। स्वरोजगार दिश शत-प्रतिशत सक्षम लोक उन्मुख देखल जाइछ। बेरोजगार आ कोढि लोक केँ समाज तिरस्कृत दृष्टि सँ देखैत अछि जाहि कारण आत्मबोध भेल व्यक्ति लोकलज्जा सँ पर्यन्त अपना लेल रोजी-रोटी कमेनाय अनिवार्य बुझैत स्वदेश (मिथिला) अथवा परदेश (प्रवासक स्थल) मे कोनो न कोनो तरहें अपना केँ स्थापित करैत दुनू ठामक सामाजिक उत्तरदायित्व निभेबाक भरपूर चेष्टा कय रहल अछि।

मैथिल जनसमुदाय केर वैह प्राचीन-पौराणिक पहिचान ‘आत्मविद्याश्रयी’ जेकाँ वर्तमान चुनौती सँ लड़बाक कौशल आइ नीक ढंग सँ विकसित भेल देखैत छी। मिथिलाक माटि-पानि आ संस्कारक प्रभाव सँ प्रवासक कोनो स्थल मे मैथिल प्रजा प्रति अन्य समाज आ समुदाय बहुत सुख आ शान्ति सँ जुड़िकय आ देशक आर्थिक प्रगति कय रहल छथि। बौद्धिक कुशाग्रताक संग ईमानदारी आ निष्ठा सँ अपन १००% योगदान देनाय मैथिल श्रमिक सँ साहेब धरिक लोक लेल चिर-परिचित छैक। ओ कहबी ‘विद्याधन सर्वधनं प्रधानम्’ आइयो मिथिलाक लोक लेल पहिल आ अन्तिम सहारा कहि सकैत छी। भले आजुक दौर मे आध्यात्मिक शिक्षा, वेद-वेदान्त ओ कर्मकाण्ड संग तंत्र विद्या, मंत्र विद्या आदिक साधना मे मिथिला लगभग गौण भऽ गेल देखाइत हो, मुदा मेटेरियलिज्म (भौतिकतावाद) युग मे मेटेरियल शिक्षा आइयो मैथिल अपन प्रबल विद्या गुणसूत्र सँ ओतबे प्रखरता सँ हासिल करैत अछि ई बात टौप-टु-बौटम आ डिप्लोमैटिक्स, एरिस्टोक्रेटिक्स, शासक, प्रशासक, प्रबन्धक, निर्देशक, विशेष प्रभारी किंवा सूपरवाइजर वा लेबर – हर स्तर मे मिथिलाक जनशक्ति दक्ष आ योग्य हेबाक कारण अपन अलग अस्तित्व बनौने अछि। आर, यैह आत्मबल सँ मिथिलाक आर्थिक दयनीयता आइ सबलता मे परिणत भेल देखि रहल छी।

हालक किछु वर्ष मे पूर्वाधार विकास मे राज्य सरकारहु केर योगदान सराहनीय रहल अछि। शासन व्यवस्था मे उल्लेखनीय सुधार भेल अछि। सरकार द्वारा औद्योगिक विकास लेल जमीन अधिग्रहण, उद्योग क्षेत्र केर रूप मे परिणति तथा आकर्षक औद्योगिक नीति, टैक्स रिबेट्स आ कैपिटल सब्सिडीज आदि आफर कय केँ उद्योग लगेबाक वास्ते भूमि (प्लौट्स) आबंटन करैत रोजगारहु सृजनक दिशा मे नीक माहौल बनल अछि। आन-आन राज्य मे प्रवास कय नव-नव शिल्प आ दक्षता सीखिकय अपन राज्य मे लगानी करबाक नीक सुअवसर देखल जा सकैछ। पैघ-पैघ औद्योगिक घराना केँ सेहो कृषि उत्पाद आधारित उद्योग लगेबाक लेल, सामुदायिक स्तर पर माछ, मखान आदिक कृषिक संग-संग व्यवसायिक स्तरपर पशुपालन आदिक क्षेत्र मे सेहो नीक संभावना देखल जाइछ। मिट एक्सपोर्ट, प्रोसेस्ड फूड्स, कोल्ड स्टोरेज, आदि मे नीक लगानी सेहो कयल गेल अछि पैछला किछु वर्ष मे। कृषक केर पैदावार केँ सुरक्षा देबाक लेल आ नीक मूल्य भेटबाक लेल राज्य योजनाक विकास कयलक अछि। तहिना उन्नत बीज आ खाद केर उपलब्धताक संग ऋण आ बीमा केर व्यवस्था सँ लोक नगदी फसल उपजेबाक दिशा मे अग्रसर भेल देखाइत अछि। आजुक आर्थिक युग मे आर्थिक सबलता सँ दरिद्रता सँ निजात भेटि रहल अछि, निष्कर्षतः ई कहबा मे कोनो अतिश्योक्ति नहि। आर, एहि सब मे प्रवासी मैथिल लोकनिक योगदान – रेमिटैन्स इनकम सँ पूँजी निर्माण सेहो महत्वपूर्ण भूमिका खेला रहल अछि। प्रवासक जीवन बेस कठिनगर होइतो चुनौती सँ नव संभावनाक विकास केर अवसर बनल। प्रसन्नताक सीमा नहि रहि जाइछ जखन प्रवासक क्षेत्र मे मैथिल जनसमुदाय द्वारा भाषा, साहित्य, संस्कृति, आपसी सौहार्द्र आ सामाजिकताक विकास संग राजनीतिक एकजुटता बनेबाक विभिन्न उपक्रम ओ आयोजन होइत देखैत छी। मिथिलाक समग्र सभ्यता केँ सनातनजीवी होयबाक पुख्ता प्रमाण भेटैत अछि एहि संघर्षमय परिस्थिति मे जीतक दिश बढल डेग देखिकय। ई संभावना सब मे दिनानुदिन वृद्धि होइत जा रहल अछि आर जनजागरण स्वराज्य प्राप्तिक दिशा मे सेहो बढब ‘जनक-जानकीक मिथिला’ फेरो संविधान मे सम्मानित ढंग सँ स्थान पाओत, ई संकेत भेटि रहल अछि।

हरिः हरः!!