राजनैतिक हिस्सेदारी मे मिथिलाक जनता-नेता सब पिछलग्गू, आगाँ रहबाक मादा कतहु नहि?

विचार-वार्ता

राजनैतिक तौर पर पिछलग्गू बनब मैथिल केर नियत आ नियति दुनू
 
(वार्ता)
 
धीरेन्द्रजी (धीरेन्द्र कुमार झा, पेशा सँ चार्टर्ड एकाउन्टेन्ट आ मुम्बई मे सेटल्ड) आजुक अखिलेश यादवजी द्वारा मिथिला समाज सँ जुड़बाक विषय पर एकटा बड़ा चोखगर विचार रखलनिः
 
“हम मैथिल सदा स राजनीति पिछुआ बनल रहलहुँ… जगन्नाथ किछु नहि करैथ त मैथिल होबाक नाते हुनके समर्थन (ऊर्दू बिहारक द्वितीय राजभाषा हुनकहि देन छैन), लालूजी मैथिली केँ बाभनक बोली कहि प्राथमिक शिक्षा तक सँ मैथिली निकालि देलनि, मुदा राबड़ी मिथिला राज के बारे मे सदन मे बाजि देलीह त हम हुनकर पाछाँ, कीर्ति आजाद जा धरि बीजेपी मे छलाह, किछु नहि केलाह, मुदा पार्टी सँ निकाललाक बाद संसद मे एक सवाल आ हम सब हुनकर समर्थक…. ई लाल टोपी सालों-साल सरकार चलौलक तखन नहि बुझने गेलय, आइ हारलाक बाद लौलीपोप देखौलक आ हम सब पिछुआ….!!!”
 
हालांकि धीरेन्द्रजीक गोटेक बात पुख्ता-प्रामाणिक एकदम नहि… तथापि कहबाक शैली हमरा बेस प्रभावित केलक। कहलियैन –
 
“बड़ा सटीक अवलोक अछि। त कि हम मैथिल केर यैह नियत आ नियति थिक? आर पाछाँ नहि जायब त आर विकल्प कि अछि? घरहि केर मुखिया, सरपंच, समिति, वार्ड सदस्य, जिला पार्षद, जिला परिषद् सभापति, विधायक, सांसद, – कि ई सब जे चुनाइत अछि किंवा हम-अहाँ चुनैत छी तऽ ओहो सब अहिना पछुवे-पछुवा बनिकय हमरा-अहाँ लेल प्रतिनिधित्व करैत छथि पंचायत, विधासभा, संसद इत्यादि मे? हम-अहाँ कतेक आवाज उठा पबैत छी? आ कि सच मे हमरा-अहाँक बौद्धिकता अछि गुलामे रहिकय जीवन जियबाक?”
 
ताहि पर फेर ओ कहला, “बिल्कुल नहि… मैथिली केँ सम्मान जहिना भेटलैक तहिना मिथिला केँ सम्मान सेहो भेटत, हमर सतत प्रयास रहबाक चाही, मुदा पिछलग्गू बनि नहि… लालटोपी भाइसाहब सँ प्रश्न होयबाक चाही जे अहाँ कि केलियैक मिथिलाक हेतु?”
 
पुनः हुनकहि कथन पर टोकैत कहलियैन, “मैथिलीक सम्मान त वास्तव मे भेलैक। लेकिन सम्मान उपरान्त मैथिली एखन धरि राज्यहु केर दोसर राजभाषाक दर्जा नहि पेलक… मैथिली पढौनीक कोनो इन्तजाम आदि नहि, स्वयं मैथिलीभाषी मे अपन भाषा प्रति कोनो लगाव नहि, चारूकात नैराश्यता, उदासीनता, समाजिकता हेराइत, अस्मिता बौआइत… कि थिकैक ई सब?”
 
धीरेन्द्रजी कहैत छथि, “सत्य, मुदा इतिहास गवाह छैक जे जा पछुआ बनल रहलहुँ शोषित रहलहुँ। जाहि दिन हुंकार भरल, इन्सान केँ अधिकार भेटल। आब समय जे हुंकार भरल जाय आ जिनकर अधिकार क्षेत्र मे जे कार्य छैक, हुनका अपन शक्तिक आभास कराओल जाय…।”
 
ई हुंकार केर बात पर हमरा याद आबि गेल मैथिल केर वस्तुस्थिति, वास्तविकता आ यथार्थ सामाजिक-राजनीतिक परिवेश। पुनः टोक मारल, “धीरेन्द्रजी, हुंकार कोन बल पर भरबैक? कतय अछि लोक? पलायन केर दंश जाहि समाज केँ छहोंछित कय देलक, ओ हुंकार भरत? किछु प्लान हो तऽ सूचित करू।
 
आर, पलायन तऽ दूर… एतय वैमनस्यता जाति आधारित, धर्म आधारित आ आब तऽ जमीन आ जायदाद केर विवाद मे भाइ-भाइ मे कटुता पसैर गेल अछि मिथिला समाज मे – अहाँक हुंकार मे कोन बातक सम्बल अछि? हमरा कनेक जनतब देल जाउ!”
 
धीरेन्द्रजी सेहो स्वीकार करैत कहैत छथि, “ई बहुत कठिन विषय अछि प्रवीण बाबू! एकर बौद्धिक विश्लेषण होयबाक चाही। प्रथमदृष्ट्या विश्लेषण ई अछि जे समर्थ प्रवासी केँ संगठित कयल जाय आ मिथिला निवेशक शंखनाद।”
 
पुनः हुनका द्वारा समाजवादी पार्टीक राजनेता अखिलेश यादव लेल बेर-बेर लगाओल गेल अपील जे पुछियौन सत्ता मे रहैत ओ कि-कि केलनि, तेकरे कनेक सन्दर्भ बदलि केँ हुनका सँ कहलियैन, “अहाँ केँ एकटा बात बुझल होयत – सुदीप बन्दोपाध्याय सनक बंगाली नेता अहाँक मैथिली लेल समर्थन कएलनि। मिथिला सँ बाहरक नेता १९४७ मे मिथिला राज्यक पक्ष मे सदन मे बजलाह। मैथिली हो वा मिथिला हो – गैर-मैथिल केर योगदान कतहु न कतहु सम्मानित अछि, हम स्वयं मैथिल कतय छी?
 
तहिना जँ आइ एक राष्ट्रीय राजनीति मे छक्कल-बक्कल-पक्कल-ठक्कल जेहने-तेहने स्थान रखनिहार जँ हमरा लोकनिक सरोकार लेल आगू आयल अछि तँ हमरा लोकनि एतेक पैघ नीतिवान् कोन आधार पर बनि रहल छी? जस्ट क्युरियस!!”
 
धीरेन्द्रजी कहलनि, “सत्य! मुदा बैकग्राउन्ड चेक मस्ट – आवाज जे उठेताह हुनकर सम्मान, मुदा ६-९ महीना बाद कि ओ ओहिना आवाज उठबैत रहताह? से विचार जरूर हो।”
 
सही बात छैक। चुनाव केर बेर मे मात्र मैथिली-मिथिला विशेष मोन पड़तनि कोनो राजनेता केँ तऽ आम मैथिलजन मे शंका-आशंकाक स्थिति बनबे करत। तथापि, हमर त जोर अपनहि लोकक रवैया मे सुधार लेल बेसी रहैत अछि। कहलः
 
“Let’s not be too speculative. Let us realize our own poverty. We have developed a tendency that somehow ‘I’ must live a standard life and for that ‘I’ must do hard labor, studies, preparations, etc. Indeed we achieve too. We are in achiever class today. At least, we the learned people of Mithila. But as soon as the political stature of Mithila and our stand for this come, we immediately run away from doing our duties. None of us have developed any attitude to face, to defend, to fight and to claim and to establish ourselves. A very few people – simply to be counted on our fingers, they cry, they shout and they pretend that they are working for Mithila – brother! imagine! Who could achiever politically in such an idle way in India or world? Are we able to regain our status today?
 
क्षमाप्रार्थनाक संग अंग्रेजी मे ई किछेक लाइन हम पढल-लिखल लोक केँ लिखैत छियन्हि। कृपया अपना सब पहिने स्वयं केर मुंह आईना मे देखी जे हमरा अपन हृदय मे अपन मातृभूमिक राजनीतिक हैसियत केँ देशक संविधान मे स्थापित करबाक लेल कतेक रहल अछि।”
 
जेकर जबाब मे धीरेन्द्र बाबू लिखलनि अछिः
 
“Sorry Pravinji if you felt bad of any of my comments… We must watch what we support, we support with our benefit or just for the benefit of the person we support… after defeat in LS, Mr. Yada constituted Bhojpuri Academy and till his defeat in VS, he has not yet been able to create even a website for this where public can raise their concern about the language… Now before another LS election if he calls for any such demand, is he realy going to stand by with his own demand remain questionable. At the end of the day we need our rights of state based on language which is part of the constitution of India, and I am optimistic in getting the same with rightful means and at right time as well. I do not say to oppose Mr. Yadav, instead I Just say, lets ask him what did you do for Maithili till you were in government with full majority?”
 
अन्त कयल एनाः
 
“अहाँ एखनहुँ ओही बात पर अडिग छी जे एकरा सँ पुछू… यौ जी, हमर एकमात्र बात ई अछि जे जखन अपन घरहि केर लोक – हमरा लोकनि स्वयं अपन रवैया – एटीच्युड मे सुधार नहि आनब त पोलिटिकली ढोढाइ, मंगनू, असेरी, पसेरी केकरो पिछलग्गू बनहे टा पड़त। यैह हमरा सभक नियति आ नियत दुनू अछि। अस्तु!”
 
सहमति-असहमति वा फरक मत अपन-अपन सब राखि सकैत छी।
 
हरिः हरः!!