मिथ्याचार सँ जीवन मे शान्ति आ सुख कहियो नहि भेट सकैत अछिः आध्यात्मिक सीख

स्वाध्याय
– प्रवीण नारायण चौधरी
कनी टा ध्यान देबय!
 
वन्दे वन्दनतुष्टमानसमतिप्रेमप्रियं प्रेमदं पूर्णं पूर्णकरं प्रपूर्णनिखिलैश्वर्यैकवासं शिवम्।
सत्यं सत्यमयं त्रिसत्यविभवं सत्यप्रियं सत्यदं विष्णुब्रह्मनुतं स्वकीयकृपयोपात्ताकृतिं शङ्करम्॥
 
वन्दना केला सँ जिनकर मोन प्रसन्न होएत छन्हि, जे प्रेम टा केँ अत्यन्त प्रिय मानैत छथि, जे प्रेम प्रदान करैत छथि, पूर्ण आनन्दमय, भक्त लोकनिक अभिलाषा पूर्ण करैत छथि, सम्पूर्ण ऐश्वर्यक एकमात्र आवासस्थान आर कल्याणस्वरूप थिकाह, सत्य जिनक श्रीविग्रह थिक, जे सत्यमय छथि, जिनक ऐश्वर्य तिनहुँ काल मे अबाधित अछि, जे सत्यप्रिय एवं सत्यप्रदाता छथि, ब्रह्मा आर विष्णु जिनक स्तुति करैत छथि, स्वेच्छानुसार शरीर धारण करनिहार ताहि भगवान् शङ्कर केर हम वन्दना करैत छी।
 
उपरोक्त वन्दना करैत भगवान् भोलेनाथ केँ प्रसन्न करैत एकटा बात कहबः
 
हम देखाबा मे नीक लोक कतेक बनू? जँ हमर आचरण आ कुविचार हमरा बेर-बेर अपराध करबाबैत अछि तऽ हम कोन विवेक सँ अपना केँ सही कहू? आर ई जनैत जे हम सहस्रो पापाचार आ व्यभिचार केँ एहि शरीर आ जीवन मे धारण कएने छी तऽ फेर हम अपना केँ स्वच्छ, स्वस्थ आ सुन्दर आदि कोना कहू?
 
खैर, ई मनोभाव हमरा बेसिये नीचाँ खसा दैत अछि। ई जे ‘हम’ हमर भीतर छी, से अहाँ सँ ‘कम’ नहि छी – एहि कारण बेर-बेर अपना केँ उच्च आ बाकी केँ निम्न देखेबाक कुचेष्टा मे लागल छी। तैँ हमर बात अहाँ कान धरू ई कदापि नहि कहब। मुदा जे बात – जे धर्म आ अनुकरणीय कर्म केर शिक्षा हमरा लोकनि केँ अपन विज्ञ पुरुखा वा गुरुजन आदि सँ प्राप्त भऽ रहल अछि ताहि पर बेर-बेर विचार करू। एतबा बात जानि-बुझिकय अनैत छी जे अपन गान कि करब जखन हजारों गलती अपनहि मे देखि रहल छी।
 
गीताक तेसर अध्याय मे कृष्ण कहलनि अछिः
 
कर्मेन्द्रियाणि संयम्य य आस्ते मनसा स्मरन् ।
इन्द्रियार्थान्विमूढात्मा मिथ्याचार: स उच्यते ॥
 
Those who restrain the external organs of action, while continuing to dwell on sense objects in the mind, certainly delude themselves and are to be called hypocrites.
 
कर्मेन्द्रिय (हाथ-पैर आदि) केँ बाहर सँ रोकिकय ई देखाबी जे हम फल्लाँ काज नहि कय रहल छी, मुदा भितरे-भीतर हम ओहि काजक विषय मे मोन केँ नचा रहल छी, फिरा रहल छी, तँ एना मे हम स्वयं केँ धोखा दय रहल छी आर हमरा ‘मिथ्याचारी’ कहल जाइत अछि।
 
आजुक स्वाध्याय मे ई बात बेर-बेर उचैर कय आबि रहल अछि जे ‘निश्छल प्रेम सत्य थिक’। मुदा प्रेम कि थिक ई सवाल बड पैघ छैक। जाहि ईश्वर सँ हमर निवारण भऽ रहल अछि, जे हमर अस्तित्वक निर्माण कयलनि, जे एक माय केर कोखि सँ हमर जन्म देलनि, कहाँ दिना जन्म होइते आबि रहल अछि…. कतेको संसार मे विचरण कय लेला उपरान्त हमरा मनुष्य तन भेटल अछि जेकरा तुलसीदास बड़ा दुर्लभ कहैत सदुपयोग लेल उपदेश रामचरितमानस मे अनेकों बेर कयलनि अछि….
 
बड़े भाग मानुष तन पावा । सुर दुर्लभ सद् ग्रन्थन्हि गावा ॥
साधन धाम मोक्ष कर द्वारा । पाई न जेहिं परलोक सँवारा ॥
 
– रा०च०मा०/उ०का०/४२
 
अर्थात् मनुष्यक शरीर बड़ा भाग्यहि टा सँ प्राप्त होएछ कियैक तँ मानव शरीर पेनाय देवतहु लेल दुर्लभ छन्हि। यानि मानव शरीर वास्ते देवतागण सेहो तरसैत रहैत छथि – लालायित रहैत छथि। आर से एहि लेल जे मानव शरीर एक एहेन शरीर थिक जे जीव केँ मोक्ष केर बाट मे पहुँचा सकैत अछि, जीव केँ मोक्ष केर दरबाजा धरि पहुँचेबाक लेल समस्त मोक्ष साधनक धाम या घर थिक मनुष्य शरीर। ई मानव शरीर केँ पाबिकय पर्यन्त जे मनुष्य अपन परलोक नहि सम्हारि लैछ यानि जे जीव अपन उद्धार तथा मुक्ति-अमरता नहि पाबि लैछ ओ परलोक मे और एहि लोक मे अपार दु:ख कष्ट पबैत अछि। मर्यादा पुरुषोत्तम राम केर सम्पूर्ण जीवनक कथा-गाथा सँ हमरा लोकनि केँ यैह कारण अनुपम सीख भेटैत अछि। जँ अपना केँ नहि सम्हारब-सुधारब आ अपन रावणी अहंकार मे डूबल रहब त कियो काज नहि देत।
 
मैथिली मे एकटा बड़ नीक निर्गुण लिखने छथि प्रेमी बाबाः
 
जँ सुगना हर-हर नहि रटमे
हेतौ परम अकाज
लोक तथा परलोक बिगड़तौ
दंड देतौ यमराज
रे सुगना! हर हर हरदम बाज
 
मुदा हर-हर हरदम बाजिकय केकरो नारी पर कुदृष्टि राखब, सोझाँ सँ नटवर कन्हैया जेकाँ गोपियन सब संग निश्छल आ निष्कपट प्रेमक प्रदर्शन करैत सरोवर मे स्नान कयनिहाइर गोपियन सभक वस्त्र नुका देब आ कृष्णहि जेकाँ सभक प्रेमी बनिकय प्रेमक पराकाष्ठा पर अपना केँ देखेनाय शुरू करब, मुदा भीतर सँ रहब महान घाती, हिंसक, पशुवत् – भाइ, क्षमा करब, ई घोर पाप लेल घोर नरक यैह पृथ्वी पर अही जीवन मे प्राप्त करब, आ से सम्पूर्ण समाज देखत। सावधान!
 
हमर मिथिला मे लोक कहितो छैक ‘रे पील फरतौक!’ करनी देखब मरनी गुणे! आदि। तैँ, प्रवीण! मिथ्याचार सँ बचू। बेस तऽ, आब फेर भेटब, ६ बजे संध्याकाल लाइव मे।
 
हरिः हरः!!