दहेजरूपी कुष्ठरोग सँ समाज केँ मुक्त करबाक सहज उपाय, बस अनुकरणक एक डेग बढाउ

मधुबनी मे भेल एक आरो दहेज मुक्त विवाह
प्रिय शंभू झाजी,
 
मधुबनी मे भेल एक आरो दहेज मुक्त विवाह

अपनेक अनुरोध जून २४ तारीख वला आइ ध्यान मे आबि गेल। क्षमाप्रार्थना जे हमर दिमाग सँ ई उतैर गेल छल। लेकिन आजुक दोसर दहेज मुक्त विवाह जे समस्तीपुर जिला मे भेल अछि ताहि खबैर सँ मोन पड़ल जे अपने गोटेक जरूरी आ महत्वपूर्ण प्रश्न केर उत्तर (हमर विचार) जानैत ओकरा आमजन धरि लेख केर माध्यम सँ पहुँचेबाक बात कहने रही। तदनुसार अहाँक प्रश्नक नीचाँ हमर जबाब दैत ई लेख प्रस्तुत कय रहल छी।

 

१. दहेज प्रथा विद्यमान किएक अछि ?

 
उ. मनुष्यरूपी जीव केर अस्तित्वक निरंतरता लेल अनिवार्य वैवाहिक कर्म आर ताहि विवाह लेल उचित जोड़ी मिलानी, तदोपरान्त वैवाहिक सम्बन्धक निर्धारण – एहि लेल दुनू पक्ष द्वारा विभिन्न व्यवहार, एहि व्यवहारक बिगड़ल रूप केँ कहल जाइछ दहेज प्रथा। दहेज प्रथा विद्यमान हेबाक एकमात्र कारण अछि लैंगिक विभेद। स्त्री समाज केँ कमजोर आँकबाक परिणाम थिक ई प्रथा। जाहि समाज मे स्त्री केँ सेहो प्रधानता देल जाइत अछि, ओतय दहेज प्रथा कोनो रूप मे नहि देखाइत अछि। यथा, पहाड़े समुदाय (नेपाल) केर स्थिति देखू। एहि समुदाय मे वधू केर मांग होइत छैक, दहेज त दूर विवाह सम्बन्ध निर्धारण तक अति सहज आ साधारण खर्चा मे निबटैत छैक।
 

२. एकर फायदा बेफायदा कि कि थिक ?

 
उ. फायदा किछ नहि, सबटा बेफायदे-बेफायदा कहब त अतिश्योक्ति नहि होयत। दहेज एकटा अप्रतिष्ठासूचक शब्द बनि गेल अछि। जहिया कहियो लोक एकर व्यवहार शुरू केलक, जे कियो शुरू केलक, ओ बस अपन स्वार्थ सिद्धिक एकटा सुरेबगर माध्यम ताकि अपन बेटी-बहिन लेल ‘नीक घर-वर’ टका बले अनबाक सोच राखि ई प्रथा शुरू केने होयत – ई सहजहि अनुमान लगा सकैत छी। जाहि तरहें ई ‘प्रदर्शनक वस्तु’ बनिकय समाज मे कोनो समय यश-प्रतिष्ठा जेकाँ देखायब शुरू भेल, वास्तव मे तहिये बड पैघ भूल केलक समाज। लेकिन देखय-सुनय मे ई सब लोक केँ ततेक नीक लागि जाइत छैक जे एकर खराब असर कोन रूप मे आ कतय केहेन हेतैक, समाजक लोक उत्साह आ जोश मे ओतेक सोच नहि बना पबैत अछि। आइ देखादेखी ई बीमारी समाज मे कोंढ-कुष्ठ जेकाँ तेहेन भयावह रूप मे पसैर गेलैक अछि जे एकर समाधान लेल राज्य, कानून, प्रशासन, समाज, अभियान, सब किछु लाचार बनि गेल अछि। जेकरा पास पैसा छैक, ओकरा लेल एखनहुँ ई दहेज गानि बेटी लेल नीक घर-वर तकबाक कल्पना आ नीति ओहिना कायम छैक। तखन, ओकरा लेल ई प्रथा फायदे-फायदा जेकाँ लगैत छैक, लेकिन ओकरो ई बुझक चाही जे एहि तरहें अपवित्र वैवाहिक गठबंधन मे पड़ल जोड़ी कथमपि सुडौल आ शुभकारी सन्तानक जन्म नहि दय सकैत अछि। जतय कतहु दहेजक लोभ रहत, ओतय कहू जे शुभ कार्य कखनहुँ संभव होयत! हँ, जे स्वेच्छा सँ अपन बेटी-जमाय लेल सुहृदयतापूर्वक लेन-देन करैत अछि, तेकरा हम-अहाँ ‘दहेज’ केर परिभाषा सँ बहुत ऊपर ‘उपहार’ या ‘पारिवारिक आशीष’ केर रूप मे स्वीकार करब आर ओकर फायदे-फायदा देखब।
 

३. कोन कोन वर्ग लाभान्वित आ शोषित अछि ?

 
उ. स्पष्टतः लाभान्वित पायवला आ शोषित कर्जो कय केँ भरयवला यानि जेकरा पास अर्थ या सम्पत्ति या आयक विभिन्न स्रोतक कमी छैक, जे खर्च करय लेल १० बेर सोचैत अछि जे कतय सँ आयत। विपन्न वर्ग लेल ई ताहि कारण महापापी दैत्य जेकाँ सिद्ध भऽ रहल अछि। बेटीक जन्म पर लोक आइ माथ हाथ दैत अछि, कारण बेटीक विदाई केनाय एहेन खर्चीला आ चुनौतीपूर्ण भऽ गेलैक अछि जे लोक बेटीक जन्म तक देबय सँ कतराय लागल अछि। पहिनो कहल जे पैसावला लोक लेल तथाकथित नीक घर-वर कीनबाक लेल दहेज एकटा ‘मुद्रा’ केर कार्य करैत छैक, लेकिन यैह मुद्रा जेकरा पास नहि छैक ओकरा लेल जानलेवा सिद्ध भऽ रहलैक अछि। आइ यैह दहेजक लोभ मे पड़िकय कतेको विपन्न वर्गक बेटी केँ जिन्दा जरा देल जा रहलैक अछि। महिला पर हिंसाक अनेकों रूप मे ई दहेज एकटा मुख्य दरिंदा जेकाँ शोषक थिक।

४. एकर शुरूआति कोना भेल ?

 
उ. शुरुआत भेलैक प्रतिस्पर्धा सँ, एक्के टा वर-घर लेल दस टा घटक आ दसो घटक मे आपसी प्रतिस्पर्धाक लाभ उठबैत दहेज मे नगद टका, सर-समान, साँठ-भार, गहना आदिक माँग अपना तरहें धीरे-धीरे बढैत चलि गेल। बात त सिर्फ विवाह केर होएत छैक, मुदा से विवाह लेल अनेकों शर्तक रूप मे माँग राखब, एकरे त दहेज कहल जाइत छैक। एकर शुरुआत सम्पन्न वर्ग द्वारा अपन मनमानीपूर्वक कुटमैती फाइनल करय सँ शुरू होयबाक अनेकों उदाहरण देखाइत अछि। मिथिलाक सुशिक्षित-सम्पन्न समुदाय सब मे ब्राह्मण, भूमिहार, राजपुत, देव, यादव, आदि मे ई प्रथा शुरू भेल आ आब धीरे-धीरे सब समुदाय मे ई एकटा अनिवार्य व्यवहारक रूप मे अपना केँ स्थापित कय लेने अछि।
 

५. एकर अन्तसं समाजमे पड़यवला प्रारम्भिक असर कि-कि पड़त आ निर्मूलक उपाय कि होयत ?

 
उ. एकर अन्त पूर्णरूपेण कहियो नहि संभव होयत। लेकिन समाजक हरेक वर्गक लोक केँ एकर असर सँ अवगत करेला सँ एकर असर घटत आ ई एखन जेना प्रतिष्ठाक विषय समाज मे बना देल गेल अछि से उल्टा कलंकक विषय, गैर-कानूनी, नुका-चोराकय कयल जायवला व्यवहारक रूप मे बदैल जायत। एकर खराब स्वरूप आब कतेको ठाम उजागर होमय लागल अछि। जेना बिहार, एतुका मुखिया शराबबन्दीक कानून बनाकय आइ करोड़ों गरीब लेल कल्याणक मार्ग प्रशस्त कयलनि, बड़का लोक सब एखनहुँ चोरा-नुकाकय थाना आ प्रशासन मैनेज कय केँ १ के बदा ३ खर्चा कय केँ अपन सुरापान करबाक मर्यादापालन जेना कय रहल अछि, ठीक तहिना सम्माननीय मुख्यमंत्री नीतीश कुमार द्वारा दोसर बेहतरीन कार्य कयल गेल जे राज्य केँ दहेज मुक्त बनेबाक घोषणा कय एहि दिशा मे कड़ा कानून बनाकय समाज केँ दहेज प्रथा बन्द कय देबाक कड़ा सन्देश देल गेल अछि। आइ, बिहार मे लोक जे दहेज प्रथाक पालन कय रहल अछि ओ चोरा-नुकाकय लेन-देन करैत अछि। आब दहेजक प्रदर्शन नहि, बल्कि बाध्यताक रूप मे नुकाकय व्यवहार कयल जा रहल अछि। दोसर उदाहरण अहाँ लय सकैत छी नेपाल केर, जतय सामाजिक व्यवहार मे कोन मद मे कतेक खर्च कयल जा सकैत छैक, भोज-भात सँ लैत बरियातीक संख्या आ विभिन्न मद मे खर्चक सीमा तय कयल गेल छैक। हलांकि सिर्फ कानून टा बना देबैक आ ओकरा पालन लेल प्रशासन केँ कड़ा निर्देशन नहि देबैक, लोक धड़ल्ले सऽ कानून तोड़त आ दण्डहीनताक अवस्था रहत तऽ शायद कानून ब्यर्थे बनल तेहेन लागत। नेपाल मे बनल कानून पर प्रशासन आँखि मुनने देखा रहल य, तैँ समाज सँ ई निर्मूल नहि भऽ पाबि रहल य।
 

६. पूर्व निर्धारित योजना कोना बनाओल जा सकैछ ?

 
उ. अहाँक प्रश्न हम नहि बुझि पेलहुँ…..! पूर्व निर्धारित योजना सँ कि तात्पर्य? कहीं ई त नहि जे अहाँ दहेज मुक्त समाजक निर्माण लेल किछु योजना निर्धारणक ध्येय राखल अछि? जँ से, त ई कहि दी – दहेज प्रथा सँ व्यक्ति सिर्फ अपना केँ मुक्त करय। ओ ई तय करय जे हम एहि गन्दगी सँ अपना केँ स्वच्छ राखी। अपन धिया-पुताक विवाह मे लेन-देन केँ बढावा नहि दी। जतबे आवश्यक खर्च छैक ततबे मे निमाहयवला कुटुम्ब पक्ष केँ समर्थन दी, अन्यथा वला कुटुम्ब सँ दूरी बनाबी। विवाह हेतैक त किछु खर्च जरूरी छैक, दुनू पक्ष केँ एहि लेल आपस मे खुलिकय बात करक चाही। खर्च केर भरपाई दुनू परिवार मिलिकय, एक-दोसरक स्थिति केँ बुझिकय आ विवाह करयवला जोड़ीक भविष्य केँ सुन्दर आ सुखमयी बनेबाक दृष्टिकोण सँ सब योजना बनाकय शुभ-शुभ विवाह जेहेन पवित्र सम्बन्ध तय करक चाही।
 

७. अगुवा किनका कयला सँ सर्वोत्तम रहत ?

 
उ. एतहु हम अहाँक सन्दर्भ नीक सँ नहि बुझि पेलहुँ…. पूरा प्रश्न लिखितहुँ जे कोन काज, कि उद्देश्य, कथीक अगुआ… तखन पूरा बुझि पबितहुँ। ओना चर्चा दहेज मुक्त मिथिला निर्माण केर भऽ रहल अछि, निश्चितप्राय अहाँक सवाल ओहि अभियान सँ सम्बन्धित अछि। ताहि अनुमान संग ई कही जे समाजक विभिन्न वर्ग आ समुदायक लोक केँ आपस मे एहि गंभीर विषय पर एकजुटता बनाकय एकटा आदर्श सिद्धान्त पर आम सहमति बनेबाक चाही। हरेक गाम या पंचायत या वार्ड – यानि प्रशासकीय ईकाई केर न्युनतम स्तर पर सब जाति, धर्मक १-१ टा प्रतिनिधि केँ राखिकय उपरोक्त आदर्श सिद्धान्त पर संयुक्त हस्ताक्षर सहित समूचा ईकाई-वासिन्दा केँ ओहि तरहक व्यवहार करय लेल सहमति मे अनबाक चाही, अन्यथा लेल दण्डात्मक कार्रबाई केर सिफारिश हेबाक चाही। एहि तरहें दहेज निर्मूलन संग-संग अपव्ययी-आडंबरी व्यवहार मे कमी आयब सुनिश्चित होयत।
 

८. कोष जरूरी आवश्यक अछि आ कि नञ ?

 
उ. कोनो अभियान लेल ५ गोट ‘क’ केर आवश्यकता अत्यन्त जरूरी अछि।
क – कार्यक्रम
क – कार्यकर्ता
क – केन्द्र
क – कोष
क – क्रियान्वयन
 
एहि ५ क केर अनुरूप कोषम चारिम अनिवार्यताक विषय थिक। जखन कोनो कार्यक्रम केर योजना बनि गेल, कार्यकर्ताक जुटानी भऽ गेल, कार्यक्रम करबाक केन्द्र निर्धारित भऽ गेल, त कोष संग्रह स्वतः आपसी योगदान सँ पूरा होएत अछि आर तखनहि क्रियान्वयन सेहो संभव होएत अछि।
 
ऊपर मे कहने छी जे प्रशासनिक ईकाई केर न्युनतम् स्तर पर ‘निगरानी समिति’ बनाकय ‘आदर्श सिद्धान्त’ अनुरूप ‘दहेज मुक्त समाज निर्माणार्थ’ व्यवहार करबाक अछि, ताहि मे उपरोक्त पाँचो टा क लेल सेहो सहमति बनाउ आ कोषक संग्रह सँ लैत खर्च कतय आ कियैक कयल जायत, हिसाब-बही के राखत, आदि बात तय करय जाउ।
 
कोषक सन्दर्भ मे ईहो कहि दी – राज्य द्वारा सामाजिक व्यवहार-व्यवस्थापन लेल सेहो समुचित धनराशिक प्रबन्धन कयल जाइत छैक। अपन ईकाई केर योजना निर्माण समिति सँ एहि सन्दर्भ उचित आवेदन दय अपन-अपन क्षेत्रक संयुक्त आवश्यकता केँ पूरा करबाक काज कयल जा सकैत छैक। जेना, विवाह वा कोनो यज्ञादि मे टेन्ट, कैटरर, लाईट्स, डेकोरेशन, बैन्ड बाजा, आदिक फैशन आइ-काल्हि अनिवार्यताक रूप मे देखाय लागल अछि आर दहेजक जैड़ मे ई खर्चा सब सेहो पड़ैत छैक… बेटावला कहत जे छहर-महर सबटा चाही, मुदा ई खर्चा हम कर्जा लय केँ त नहि करब… माने बिल भरय खाली बेटीवला…. बेटीवला त सभक कर्जा खेने रहैत छैक… तखन जँ ई खर्चा अनिवार्ये भऽ गेलैक अछि त ओकरा सामुदायिक स्तर पर पूँजी प्रबन्धन करैत एकटा न्युनतम् खर्चा सँ पूरा कयल जा सकैत छैक। सामूहिक विवाह केँ बढावा देला सँ १० गो परिवारक खर्चा एक्के गो खर्चा सँ पार लागि सकैत छैक। आदि।
 

९. राज्य सँ कानून मे कि कोना होयावाक चाही ?

 
उ. राज्य द्वारा दोषी लेल आर्थिक दण्ड, जेल चलानी, आदिक व्यवस्था होबक चाही। जे किछु कानून बनल छैक तेकरा पालन करबाक लेल ऊपर वर्णित निगरानी समिति सँ सहकार्य कय गुप्त सूचना आदान-प्रदान करैत दोषी पर कार्रबाई करबाक चाही। एहि तरहक कानून केर तोड़बाक केस लेल जनता अदालत पंचायत स्तर पर लगाकय दण्डाधिकारी पर्यन्त ओहि समाजक ५ पंच केँ बनबैत सब बात तय करबाक चाही।
 

१०. अभियानमे स्त्रीगण केँ कोना सम्मिलित कयल जाय ?

 
उ. बेर-बेर जाहि निगरानी समिति केर बात हम केलहुँ अछि ताहि मे महिला आ पुरुष केर बराबर संख्या राखि लोकतांत्रिक निर्णय पद्धति, यानि बहुमत सँ निर्णय करबाक नीति राखक चाही। स्कूली छात्रा केँ दहेज कूरीति विरुद्ध कोना लड़ल जाय तेकर प्रशिक्षण देला सँ बाद मे ई सब बहुत प्रभावकारी भूमिका खेला सकैत छथि। महिला पर जे आरोप लगैत छन्हि जे पति केर चाभी अपना खोंइछ मे रखैत छथि आ बेर-पर हुनकर माथा घुमाकय अपन घर मे आबयवाली लक्ष्मी लेल अनेकों बंधेज आदि लगबैत छथिन, ताहि लेल महिला लोकनि केँ स्वयं पारदर्शी बनिकय निगरानी समितिक सक्षम सदस्य बनि दहेज मुक्त समाज निर्माण मे जोरदार सहभागिता देनाय आवश्यक अछि।
 
अस्तु! पुनः धन्यवाद शंभूजी। अहाँक १० गोट महत्वपूर्ण प्रश्न पर अपन विचार राखि हृदय मे काफी प्रसन्नता भेटल। एहि पर बहस हो, आरो कोनो जिज्ञासा होयत तँ पुनः विचार आदान-प्रदान करब।
 
हरिः हरः!!