जीवनक किछु गूढ दर्शन सहज अनुभवक सोझ शब्द मे

जीवनक यात्रा
– प्रवीण नारायण चौधरी
 
जीवनक ४६म सालक यात्रा धरि कतेको रंगक अनुभव भेटल, समग्र मे एक मानव लेल मानवताक जीवन पद्धति पर चलैत रहब ‘जीवन यात्रा’ बुझायल। कतेको तरहक अनुभव, माता-पिता-परिजनक पालन-पोषण सँ लैत अपन पैर पर ठाढ होयबाक एकाकी मार्ग पर बढब… मार्ग मे कतेको कन्टक, अवरोधक, ऊभर-खाभर आ सपाट सड़क संग साक्षात्कार! जीवन यात्राक मार्ग पर दू-बगली रंग-बिरंगक भीड़ भरल, मनुष्य सँ लैत जानवर आ गाछ-वृक्ष अनेकों तरहक, जीवन भरल दृश्यक संग निर्जीव लेकिन ठोस आकृति, ऊँच-नीच कतेको प्रकारक निर्मित स्वरूप, मानवक बनायल सँ बेसी ईश्वर (प्रकृति) निर्मित वस्तुस्थिति सँ साक्षात्कार करैत मार्ग पर बढैत रहलहुँ। यात्रा मे अपन कहेनिहार सँ लैत आरो सहयात्री सज्जन-दुर्जन सब संग भेंट होएत रहल। जीवनक यात्रा मे असगर बहुत दूर धरि लोक नहि चलि सकैत अछि, गृहस्थी धर्मक निर्वाह लेल सहचरिणीक संग लेब आ फेर अबैत अछि छोट-छोट नवजात शिशु जेकरा पोसैत-पालैत पिता-माताक धर्म निभाबैत एक जीवन सँ कतेको आरो जीवनक यात्रा प्रारम्भ भऽ जाएत अछि। सब एक-दोसर सँ जुड़ल, बिल्कुल ऊपर उल्लेखित मार्ग पर बढैत रहैत छैक सब जीवन।
 
अन्तर्ज्ञान आ अन्तर्दृष्टि दू टा शक्ति जीवन यात्राक बड पैघ मित्र भेटैछ संभवतः हर जीव केँ, प्रकृतिक ई छटा हमरा बहुत प्रभावित करैत अछि आ देखा दैत अछि दृश्य जन्म सँ पहिलुका, मृत्यु केर बादहु धरि। यैह दुइ अदृश्य मित्र जीवन यात्रा मे ठिठैककय ठाढ होएत अछि एक निर्जीव आकृतिक सोझाँ, ओकरे कहैत अछि परमात्मा आ परमपिता। कल जोड़िकय प्रार्थना करैत मांगय लगैत अछि सद्गति। स्थूल आँखि केँ मुँदिकय सांगोपांग ओहि निर्जीव आकृति मे दर्शन करय लगैत अछि जीवनक सूक्ष्म शक्ति जे हमरा सजीव बनौने अछि, ई ता धरि सजीव रहत जा धरि एकर कर्तव्य एहि धराधाम मे अपन अलावे असंख्य जीवन आ स्थिति ओ अवस्था लेल पूरा करबाक छैक। बड़ा शान्ति सँ एहि रहस्य केँ बुझैत जीवन यात्रा अपन अन्य १५ गोट अभिन्न मित्रक संग आगू बढैत रहैत अछि। कर्म हेतु ५ टा मित्र चलब-फिरब, कोनो वस्तु केँ उठायब-पकड़ब, श्रम सँ संपन्न होमयवला कार्य करब आदि करैत अछि जेकरा ‘कर्मेन्द्रिय’ कहैत छी हम सब। तहिना ५ टा मित्र एहेन अछि जे देखिकर, छूबिकय, सुनिकय, चाखिकय आ सुंघिकय विभिन्न बात या स्थितिक जानकारी करबैत अछि, तैँ एकरा सभ केँ कहल जाएत अछि ‘ज्ञानेन्द्रिय’। आर, तहिना आर ५ टा मित्र अछि ‘प्राणेन्द्रिय’ – यानि स्वाँस-प्रस्वाँसक प्रक्रिया मे पाँच तरहक वायु नाक सँ फेफड़ा आ हृदयक मार्ग सँ सौंसे शरीर आ माथक प्रत्येक छोट सँ छोट ईंट (कोशिका) धरि पहुँचैत अछि, यैह वायू पर सब जियैत अछि, उर्जान्वित रहैत अछि आर तखन हम कुशलतापूर्वक यात्रा पूरा करैत रहैत छी।
 
आब, हम असगर नहि बल्कि कुल १७ टा मित्रक संग ई जीवन यात्रा मे अन्तिम मंजिल (मृत्यु) दिस बढैत जा रहल छी। जन्म सँ प्रारम्भ आ मृत्यु धरि अन्त होमयवला एहि जीवन यात्रा मे दर्शन भिन्न-भिन्न तरहक होएत अछि। किछु ओहिना जेना भोर मे वातावरण एक, दिन चढैत भिन्न-भिन्न आ निन्द्राक कोरा मे माथ राखि सुति रहबाक धरि अनेक! जीवन मे दर्शनक एहि विलक्षण संयोग सँ हम वास्तव मे कि सिखलहुँ से प्रश्न बेर-बेर हमर मोन (अन्तर्ज्ञान) आ बुद्धि (अन्तर्दृष्टि) हमरा सँ पूछि बैसैत अछि। ई सहज सवाल नहि थिक मित्र! दर्शनक सब विधा पर हम अहाँ केँ एक झटका मे वर्णन कय दी, ई हमरा वशक बात नहि अछि। एहि लेल हम पूर्व मे कतेको प्रकारक शरीर धारण कय केँ भिन्न-भिन्न दर्शन केलहुँ, वर्तमान शरीर मे सेहो कय रहल छी, तथा भविष्यहु मे हमर गति परमात्माक शक्ति-प्रकृति सँ कि होयत ताहि मे पर्यन्त अनुभव करब। हँ, चूँकि हमर भौतिक धर्म हिन्दू यानि सनातन धर्मक रूप मे वर्तमानक अछि – संगहि हम मानव रूप मे छी – हमरा मे विवेक अछि; नीक-बेजा सब बातक ज्ञान आ पूर्वजक परम्परा सँ लैत शास्त्र-पुराण-पद्धति आ आब त विज्ञानक उत्कर्ष, इन्टरनेट, गूगल देवता, आदि अनेकों तरहक सुविधायुक्त अध्ययनक स्रोत साधन मौजूद अछि – ताहि लेल हम एतबे कहब जे ‘वर्तमान जीवन’ आ एकर जीवन-यात्राक एकमात्र काज अछि जे ई पृथ्वीलोक, एकर प्रकृति, एकर विभिन्न आवरण आ संरचना – सब किछु मे हमर भूमिका, हमर भागक अदाकारिता बस एकरा अदा करैत जा रहल छी। १, २, ३ सँ लैत ४६ गोट बसन्तक दर्शन करैत निरन्तरता मे अपन जीवनक मार्ग पर बढैत जा रहल छी। हम, हमर १७ मित्र आ अहाँ सब कियो एक्के परमपिताक समान सन्तान…., यात्रा जारी रहत। बात करैत रहब। अस्तु! अपन बात अहाँ सेहो कहैत रहब, हमहुँ कहैत रहब, सब कियो संगे चलैत रहब, आइ, काल्हि, परसू आ एहि लोक सँ अन्यान्य अनेकों लोक धरि। शुभकामना! शुभे हे शुभे!! जय मिथिला – जय जानकी!!
 
हरिः हरः!!