मैराथन २०१७ – रन फोर दहेज मुक्त मिथिला का एक अविस्मरणीय पल, महादेव की कृपा

ये हुई न बात!
 
“दहेज मुक्त मिथिला के लिये मैं दौड़ लगाऊँगा, मेरे पिताजी ने यही सपना देखा था कि जीवन में अपने समाज के लिये कोई एक शुभ कार्य करो तो इसे दहेज कूप्रथा से मुक्ति दिलाओ।” पूणे में रहकर होटल तथा फिल्म उद्यमी आर के दीपक ने पिछले साल मुझसे यही कहा था। और जब युवाओं में हम कुछ करने की प्रतिबद्धता देख लेते हैं तो अपना जी-जान एक करके भी उनके प्रतिबद्धता को धरातल पर उतारने के लिये सब कुछ करने के लिये तैयार रहते हैं। फिर क्या था! आर के दीपक ने जब अपनी विचारधारा में पूज्य पिता के सपनों को साकार करने के लिये, अपनी मातृभूमि मिथिला के सभी वर्ग, समुदाय, धर्म और समाज के लोगों से दौड़ लगाकर दहेज मुक्त मिथिला बनाने के लिये मुझसे कहा तो हम सारे डीएमएम समर्थक उसके पीछे हो लिये। और, वगैर कोई तैयारी, बस अपने कुछ मित्रों और सहयोगियों के साथ कुणाल ठाकुर, सन्दिप युनिवर्सिटी के संयोजक धनंजय झा, अंकित राय, जय राम यादव यदुवंशी, मनोज शर्मा आदि के साथ सब कुछ प्लानिंग करके बिरौल अनुमंडल पदाधिकारी तथा भवानीपुर-नवटोल के मुखिया संतोषजी, जेके कालेज के प्राध्यापक व अन्य ग्रामीणों-स्थानीय व्यक्तित्वों के साथ रात ११ बजे दौड़को हरी झंडी दिखाकर औपचारिक रवाना करके सुबह ४ बजे से दौड़ को प्रारंभ करते लगभग १० बजे के आसपास लगभग ६० किलोमीटर दौड़ पूरा करके पहुँच गये। रास्ते में कई जगह नुक्कड़ सभा हुआ। घर से अत्यन्त गरीब और पीछड़े लोग भी निकलकर हमारे मुहिम की सराहना करते हुए स्वतःस्फूर्त हमारे नारा को आत्मसात किये, सभी ने कहा “दहेज भगाउ, बेटी बचाउ!! न दहेज लेबय, न दहेज देबय!! बेटा-बेटी एक समान, दुन्नूक होइ एक्कहि सम्मान!!”।
 
विश्वास नहीं होता उस पल पर, जब रास्ते में महादेव की कृपा साक्षात् देखने को मिला था। दौड़ते हुए धावक आर के दीपक का शरीर पसीना से तर-बतर तो था ही, ग्लुकोज, लेमन, केला, फ्रूट ड्रिंक्स आदि पीते रहने के बावजूद इस प्रकार लगातार ५ घंटे दौड़ लगाते रहने से एक ऐसा वक्त आया जब वो पूरा बेहोश होकर गिर पड़ा था। एक छायादार आम के पेड़ के नीचे उसका इस तरह गिरने और जमीन पर लेटने से हमलोग घबरा गये थे। बाबाधाम आते-जाते रहने से मुझको इस तरहका बेहोशी का एकमात्र उपचार याद आया वो था बाबा का भजन, मैंने धावक का हौसला बढाने के लिये सीधे अपना फेवरेट बाबा भजन “बड़ नीक लागय छै हो-हो-हो… बड़ नीक लागय छै बाबा के डगरिया, लाल रंग कामर छै लाल रंग कहरिया” गाने लगे। कुछ ही देर में उस पेड़ के नीचे भजन गा-गाकर बेहोशी तोड़नेवालों की संख्या लगभग १०० के आसपास पहुँच गई थी। मेरे साथ सभी लोग गाने लगे थे। धावक के मुंहपर पानी का छींटा मारा जा रहा था, भजन शुरू करते कुछ ही देर में धावक ने आँखें खोलकर हम सभी का शुक्रिया किया और फिर से दौड़ने के लिये उत्साह दिखाया। फिर भी कुछ देर रुककर जाने के लिये भजन पूरा करने तक आराम करने के लिये कहे, तभी कहाँ से अचानक दरभंगा के मीडियाकर्मियों का हुजुम उसी रास्ते किसी मिशन पर जाते हुए यह दृश्य देखकर जिज्ञासावश हमारे पास आ गये। और, उसके बाद जिस तरह उनलोगों ने हमारे मुद्दे की सराहना करते हुए साथ दिये, इसके लिये धन्यवाद देने का शब्द मुझे नहीं मिल रहा है। हमारी कोई तैयारी नहीं थी परन्तु जमीन से जुड़े आम लोगों में जनजागरण करने का संकल्प भर था। हाँ, हम बार-बार अपनी असमर्थता कि मीडिया मैनेजमेन्ट भी जरूरी होता है यह चर्चा करते, परन्तु हमलोग कभी भी सरकारी कोष अथवा किसी के मोटे फाइनेन्स पर कभी कोई कार्य नहीं करने का सैद्धान्तिक संकल्प के कारण मीडिया मैनेजमेन्ट की आधुनिक उपाय नहीं कर पाये थे। तो दरभंगाके मीडियाकर्मियोंका इस प्रकार शहर से काफी पहले ही विराने से जगह पर पहुँचकर हमारे अभियान को कवर करना, वहाँ से लेकर सारे शहर के रास्ते तक उनके द्वारा कवरेज देना, लाइव करना, यह सब ईश्वरीय मैनेजमेन्ट नहीं तो और क्या हो सकता था! हम आज भी आभार प्रकट करते हैं उनलोगोंका और निस्सन्देह ईश्वर का भी। चूँकि हमलोग मिथिला के लिये कार्य करने में साक्षात् जानकी की प्रसन्नता का एहसास बहुत पहले से करते रहे हैं, तो महादेव हमसे प्रसन्न न हों यह हो ही नहीं सकता है। सब कुछ आपलोगों ने खुद कर दिये जो हम नहीं कर सकते थे।
 
अबकी १७ जून को हम वापस आपके बीच आ रहे हैं। फिर से हमारी स्थिति पहले की ही तरह है। फिर से बता दें, हम झूठे नाम या शान के लिये कभी कोई कार्य नहीं करते हैं। हम मिथिलावासी सदैव दुनिया को अपने सुसंस्कार से कुछ न कुछ दिये ही हैं। परन्तु आज हमारे समाज में बहुत सारी कमजोरियाँ इस कदर हमलोगों को घेर लिया है कि इसको काटने के लिये हममें सामर्थ्य बचा ऐसा नहीं दिख रहा है। जिस मिथिला में सभी जाति-वर्ग-समुदाय के लोगों का श्रमदान से जीवन-प्रणाली चलाने का स्वसंचालित आर्थिक व्यवस्था और सामाजिक समरसता का अकाट्य विदेह पद्धति प्रचलित था, आज वहाँ लोग राजनीतिक परिस्थितियों से जातपात और धर्म के नाम पर विभाजित हो गये हैं। उन्हें फिर से जोड़कर एकजुट बनाना हमारे लिये बहुत बड़ा चुनौती का कार्य लगता है। चलो, प्रयास तो कर ही सकते हैं। दहेज कूप्रथा भले सम्पन्न लोगों के द्वारा दिखावा करने और आडंबरी दम्भ का प्रदर्शन के लिये शुरू हुआ हो, परन्तु आज यह कूरीति गरीबों के लिये जानलेवा सिद्ध होने लगा है। इसीलिये हमारा ध्येय उन साधारण और निम्न तवके के लोगों में इस कूप्रथा से दूर रहने, बेटियों को भी शिक्षा दिलाने तथा लैंगिक विभेद का अन्त करने के लिये इस तरह मुहिम चलाना जरूरी समझते हैं। अतः आप सभी हमलोगों के इस अभियान में यथाशक्ति ‘वस्तुगत सहयोग’ देते रहें, हमें नगद-सहयोग बिल्कुल ना करें।
 
अभी-अभी जानकारी मिली है कि १७ जून को रन फ़ॉर दहेज मुक्त मिथिला के सहयोग में वाई ऐक्सिस इंस्टीट्यूट के संस्थापक सह निदेशक श्री अमित सिंहराज भी आगे आये हैं। उन्होंने धावकों के लिये १० किलो ईनर्जी ड्रिंक तथा साथ में कैप देने का वादा किये हैं। हमलोग आप सभी सहयोगी हाथों को हृदय से धन्यवाद देते हैं। अभीतक कितने सारे लोगों ने इस जनजागरण अभियान में हमारे साथ आगे आये हैं, हम व्यक्तिगत तौर पर उन सबों को पूरे मुहिम में स्थानीय लोगों से सीधे जुड़ने के लिये, अपनी बात समाज के लिये रखने के साथ-साथ आपके प्रतिष्ठान और व्यवसायिक योगदान का भी उचित प्रचार-प्रसार करने के लिये उपस्थित रहने का आमंत्रण दे रहे हैं। बहुत अच्छा लगेगा जब आप गाँव के सीधे-सादे लोगों से सीधा बात करेंगे। उन्हें अभी तक बहुत बातें सिस्टम के द्वारा जानने नहीं दिया गया है, आयें, अपनी सशक्त संबोधन से उनके लिये सम्बल बनें। हो सके तो कुछ गरीब बच्चों को उचित शिक्षा दिलाने के लिये उन्हें गोद भी लें। आपलोग अपनी दानशीलता से बहुत कुछ कर सकते हैं।
 
पुनः आपलोगों का शुक्रिया, मिलते हैं १७ जून – फाइनली दरभंगा के पोलो मैदान में तो जरूर मिलियेगा ही, साग्रह निवेदन!
 
हरिः हरः!!