बेरोजगारीक सर्वोत्तम निदानः स्वरोजगार

लेख

– प्रवीण नारायण चौधरी

स्वरोजगार सर्वोत्तम आ सहज

वर्तमान युग मे स्वरोजगारक अनेकों अवसर खुलेआम उपलब्ध अछि। बस, कनेक होशियारी, कनिके हिम्मत, कनिकबा जोखिम आ बहुते रास धैर्य, उचित मात्रा मे परिश्रम आ पूर्णरूपेण तत्परता सँ स्वरोजगार मे सफलता भेटब निश्चित होयत। आर्थिक युग मे अर्थ उपार्जनक महत्व कतेक बेसी छैक से सर्वविदिते अछि। लेकिन सीमित अवसर आ सीमित कार्यक्षमता-दक्षताक कारण रोजगार बड पैघ चुनौती बनि गेल अछि। रोजगारक समस्या सँ बड़का-बड़का देश संघर्ष कय रहल अछि, सरकारक एकटा प्रमुख चिन्ता यैह होएत छैक जे रोजगारक मात्रा (अवसर) कोना बेसी सँ बेसी उपलब्ध कराओल जाय। रोजगारक अवसर बढेबाक लेल कतेको राज्य मे टैक्स फ्री जोन बनाकय औद्योगिक प्रतिष्ठान लगायल जाएत अछि। आरो नव-नव तौर-तरीका अपनाबैत सरकारी तथा गैर-सरकारी संग निजी प्रतिष्ठान सब मे रोजगारक भरपूर अवसर निर्माण कयल जाएछ, तथापि जनसंख्याक तुलना मे रोजगार उपलब्ध करेनाय दुनियाक बहुत रास देश मे संभव नहि भऽ पबैत छैक। कम विकसित आ विकासशील देश मे ई समस्या आरो बेसी छैक। कतेको गरीब मुलुक केर लोक वैदेशिक रोजगार लेल अपन घर-परिवार सँ बहुत दूर जा कय अपन जीविकोपार्जन करैत अछि।
 

बेरोजगारी दूर करबाक सर्वोत्तम साधन

प्रारम्भिक शिक्षा पूरा केलाक बाद हरेक मानव केँ अपन जीवन लेल एकटा लक्ष्य निर्धारित करय पड़ैत छैक। रोजगार पेबाक लेल स्कुली शिक्षा संग-संग कमेबाक कला सेहो सीखय पड़ैत छैक। स्वरोजगार केँ सर्वोत्तम आ सब सँ बेसी सहज मानल जाएत छैक। कतेको देश मे व्यवसायिक शिक्षा मार्फत हरेक मनुष्य केँ अपन जीवन निर्वाह लेल उचित रोजगार करबाक आत्मबल प्रदान कयल जाएछ। राज्य द्वारा विभिन्न तरहक स्वरोजगार योजनाक विकास करैत उचित पूँजी प्रबन्धन आदिक व्वयस्था सेहो कयल जाएत छैक। स्वरोजगार लेल जनता केँ विशेष प्रशिक्षण (तालिम) देल जाएत छैक। बैंक केँ सहुलियत दरक ब्याज पर स्वरोजगारी सभ केँ ऋण उपलब्ध करेबाक लेल सरकार द्वारा आदेश जारी कयल जाएत छैक। अपन भाग्यक निर्माता मनुष्य स्वयं बनय, स्वतंत्रता सँ अपन कारोबार चलाबय, ई सब स्वरोजगार केर विशेषता होएछ। अपन जीविकोपार्जन लेल किछु न किछु कार्य करैत अछि। कार्यक बदला मुद्रा अर्थात रूपया-पैसा कमाय होएत छैक। अर्थ प्राप्ति लेल लोक स्वयं रोजगार करैत अछि। यैह स्वरोजगार होएत छैक। छोट-छोट दुकान, किराना समान या दूध, सब्जी, अनाज, कपड़ा, श्रृंगार-प्रसाधन, इत्यादि जे किछु बेचिकय हो या दर्जी बनि सिलाई-कढाई कयकेँ हो, सैलून, पार्लर, मसाज सेन्टर, जिमखाना, या कोनो भी सेवा वा वस्तु उपलब्ध करेबाक लेल स्थानीय बाजार केर मांग अनुरूप अपन प्रतिष्ठान चलाउ, एक या अधिक तरहक काज करू, खेतीबारी करबाक संग-संग उद्यमिता सँ सेहो ई प्रतिष्ठान सब चलाकय अर्थ उपार्जन कयल जा सकैछ। एहि तरहें अहाँ अपन रोजगार अपने चला सकैत छी।
 

जीवन निर्वहन लेल धनोपार्जन आवश्यक

शास्त्रक उपदेश मे सेहो यैह उल्लेख अछि जे हरेक मनुष्य लेल चारि टा बातक उपलब्धि अनिवार्य अछि। ताहि मे अर्थ सब सँ पहिल नंबर पर अछि। एकर अतिरिक्त धर्म, काम आ मोक्ष पड़ैत छैक। जीवन जियय लेल धनोपार्जन आवश्यक अछि। धनोपार्जन हेतु लोक मेहनत मजदूरी तथा नौकरी पेशा आदि कार्य करैत अछि। मुदा स्वयं केर व्यवसाय आरम्भ कय ओकर प्रबन्ध केनाय आर तन मन सँ सफलता पूर्वक संचालन करब एवं लाभ हानि केर भागीदारी स्वयं होयब – यैह स्वरोजगार कहाइत अछि। अर्थात् स्वयं केर कार्य कयकेँ धनोपार्जन करब स्वरोजगार थिक।
 

स्वरोजगार केर विशेषता

व्यवसाय केर प्रबन्ध एक्के व्यक्ति द्वारा होयब, जरुरत पड़ला पर सहायक केर रूप मे एक या दुइ व्यक्ति केँ राखब – एहि तरहें एक लेल स्वरोजगार दोसरो लेल रोजगारक अवसर ठाढ करैत अछि। स्वरोजगार मे आय कतेक होयत से कोनो निश्चित नहि छैक। ई सब वस्तक उत्पादन, कय्र-विक्रय या फेर मूल्य केर बदला दोसर केँ सेवा प्रदान कयला सँ प्राप्त आय पर निर्भर करैत अछि। स्वरोजगार मे स्वामी लाभ स्वयं लैत अछि और हानि केर जोखिम सेहो स्वयं उठबैत अछि। एहि तरहें स्वरोजगार मे प्रयत्न एवं पारितोषिक बीच प्रत्यक्ष सम्बन्ध होएछ। स्वरोजगार वास्ते पूँजीक आवश्यकता होएत छैक चाहे ओ छोट मात्रा मे कियैक नहि हो। स्वरोजगार मे व्यक्ति, व्यवसाय केँ सफलतापूर्वक चलेबाक आ व्यवसाय केर विस्तार सँ भेटयवला अवसरक लाभ उठेबाक निर्णय लेबाक लेल स्वतंत्र रहैछ। एहि मे व्यक्ति केँ अपन इच्छानुसार कानूनक परिधि मे कार्य करबाक पूर्ण स्वतत्रंता रहैत छैक।
 

स्वरोजगार केर महत्व

जीवनवृत्ति जीविकोपार्जन केर एक तरीका थिक। स्वरोजगार सेहो जीवनवृत्ति थिक कियैक तँ कोनो व्यक्ति व्यवसाय या सेवा कार्य सँ अपन जीविकाक लेल कमा सकैत अछि। बरोजगारी मे वृद्धि तथा नौकरीक पर्याप्त अवसर नहि भेटबाक कारण स्वरोजगारक महत्व अधिक भऽ गेल अछि। स्वरोजगार केर महत्व केर अंतर्गत निम्नलिखित बात गानल जा सकैत अछि।
 
छोट व्यवसाय केर लाभ – पैघ व्यवसायक तुलना मे छोट व्यवसाय केर अनेकों लाभ छैक। ई छोट पूँजीक निवेश सँ प्रारम्भ कयल जा सकैत छैक तथा एकरा आरम्भ करब सेहो सरल छैक। छोट स्तरक क्रियाकलाप वला स्वरोजगार पैघ स्तरक व्यवसाय केर नीक विकल्प होएछ जाहि मे वातावरण प्रदूषण, गंदा बस्तीक विकास, कर्मचारी लोकनिक शोषण जेहेन कतेको रास खराबी आबि गेलैक अछि।
 
नौकरीक स्थान पर प्राथमिकता – नौकरी मे आय सीमित होएत छैक जखन कि स्वरोजगार मे एकर कोनो सीमा नहि छैक। स्वरोजगार मे व्यक्ति अपन प्रतिभा केँ अपना लाभ लेल प्रयोग कय सकैत अछि। ओ निर्णय जल्दी एवं सरलता सँ लय सकैत अछि। ई ओ ठोस प्रेरक तत्व थिक जेकर कारण कोनो व्यक्ति नौकरीक स्थान पर स्वरोजगार केँ प्राथमिकता देत।
 
उद्यमिताक भावनाक विकास – उद्यमिता जोखिम उठबय केर दोसर नाम थिक कियैक तँ उद्यमी नव उत्पाद तथा उत्पादन तथा विपणन केर नव पद्धति खोजैत अछि। जखन कि स्वरोजगार मे या तऽ कम अथवा कोनो जोखिम नहि होएत छैक। लेकिन जेनाही स्वरोजगार मे लागल व्यक्ति किछु नया सोचैत अछि तथा अपन व्यवसाय केर विस्तार करबाक लेल डेग बढबैत अछि त ओ उद्यमी बनि जाएत अछि। एहि तरहें स्वरोजगार उद्यमिताक लेल अवतरण मंच बनि जाएत अछि।
 
व्यक्तिगत सेवाक प्रवर्तन – स्वरोजगार मे व्यक्तिगत सेवा जेना दर्जीक काज, कारीगरी, दवाइ केर बिक्री, आदि कार्य सभ सम्मिलित अछि। ई सेवा उपभोक्ता सन्तुष्टि मे सहायक होएत छैक। ई लोक आसानी सँ शुरू कय निरंतर चला सकैत अछि।
 
सृजनता केर अवसर – स्वरोजगार मे कला एवं कारीगरी मे सृजनात्मकता तथा कलात्मकता केर विकास केर अवसर भेटैत छैक जे राष्ट्रक सांस्कृतिक विरासत केँ सुरक्षित राखय मे सेहो सहायक होएत छैक। उदाहरणक लेल हस्तकला, हस्तशिल्प, इत्यादि मे हम सृजनात्मक विचार केर स्पष्ट झलक देखि सकैत छी।
 
बेरोजगारी केर समस्या मे कमी – स्वरोजगार कयला सँ बेरोजगारी दूर होएत छैक, संगहि आय मे वृद्धि होएत छैक। राष्ट्रीय आय मे सेहो वृद्धि होएत छैक।
 
उच्च शिक्षाक सुविधा सँ वंचीत लोक लेल वरदान ‍- कम पढ़ल लिखल लोकक लेल स्वरोजगार एक तरहक वरदान होएछ।
 

मिथिला क्षेत्र मे स्वरोजगारक परम्परा

श्रम आधारित जाति-समुदाय मे बँटल मिथिलाक समाज परापूर्वकाल सँ स्वरोजगार केँ हर मानवक धर्म मानि जीवननिर्वाहक पद्धति पर चलैत आयल अछि। घरैया लूरि सँ दक्षता लगभग हर मनुष्य मे रहैत अछि। कृषि प्रणाली पर आश्रित मिथिला समाजक लोक अपन पुरुखा सँ सब लुरि सीखैत अछि। मुदा वर्तमान युग मे अपन पारम्परिक पेशा सँ लोक दूर होयबाक कारण परदेश जा कय मेहनति-मजुरी कय जीविका चलबय लेल बाध्य भऽ गेल अछि। बाहरी बाजारवाद केर हावी होयबाक कारण लोकक आवश्यकता सेहो बदैल गेलैक अछि। आब अपनहि गाम-समाज मे सब व्यवहार निर्वाह करब संभव नहि रहि गेलैक। जतय पहिने लोक ‘बेसाह’ केर अन्न तक खायब पापाचार मानय, ताहि ठाम आब खेत परती रहि जाय धरि खेती नहि करत आ बेसाहेक अन्न पर सब आश्रित रहत। एहि सब तरहक परिस्थिति सँ बहुतो रास समस्या आजुक समाज मे आर्थिक परतंत्रता कायम केलक कहय मे कोनो हर्ज नहि।
 
युग अनुरूप स्वरोजगारक अवसर – दोसर लेख मे!
 
हरिः हरः!!