कि आइ धरि हम मिथिलावासी चाकरी-चापलूसी रवैया सँ ऊपर उठि सकल छी?

बहस
 
१९५५ ई. मे अपन पोथी ‘द नार्दर्न बोर्डर’ मे महान् विद्वान् तथा राष्ट्रसेवक – भारतीय स्वतंत्रताक अगाध सेनानी डा. लक्ष्मण झा लिखने छथिः
 
हम सब मिथिला मे सड़ल-गलल लोक थिकहुँ। ई सड़न हमरा सभक अभावक जीवनस्तर तथा दुनू ब्रिटिश या काँग्रेस द्वारा अपनायल गेल शासन नीति (शासक) प्रति हमरा सभक रवैया सँ सिद्ध भेल अछि। पेशावर सँ मेरठ धरिक क्षेत्र पर नियंत्रण लेल सेनाक ५ टा डिविजन (टुकड़ी) जतय आवश्यक मानल गेल ततय हिमालय सँ ऊड़ीसाक समुद्र धरि तथा पूब मे मणिपुर धरिक लोक पर पकड़ स्थापित करबाक लेल लखनऊ केर एकमात्र सेनाक डिविजन (टुकड़ी) केँ पर्याप्त मानिकय स्थापित कयल गेल। हमरा लोकनिक कायरता हमरा सभक शासक लेल वरदान बनि गेल। हमरा सभक आसान जीवन हमरा लोकनिक चरित्र केँ तेनाकय बर्बाद कय देलक जे हम सब सिर्फ गुलाम अथवा चापलूस केर चाकरी टा कय सकैत छी।
 
– डा. लक्ष्मण झा
 
गौर करू, कोनो द्रष्टा आइ सँ ६३ वर्ष पूर्व भारतक स्वतंत्रताक तुरन्त बाद ई बात स्वजन्य मिथिलावासी पर तंज कसैत तखन लिखलनि जखन भारत सरकार हुनकर दल “मिथिला सोशलिस्ट पार्टी” द्वारा राखल गेल मिथिला राज्य गठनक प्रस्ताव केँ नकारि रहल छल। ओ संघर्ष कय रहल छलाह। हुनकर दल आ कामरेड सब निरन्तर आन्दोलन कय रहल छलाह। मुदा गोटेक ताहि युगक प्रभावशाली बिहारी काँग्रेसी नेताक संग चाटुकार मैथिल काँग्रेसी चापलूस सभक दबाव मे नेहरू सरकार एहि माँग केँ नकारि रहल छल। १९५२ केर पहिल आम चुनाव मे मिथिला सोशलिस्ट पार्टीक नेता जाहि मे राष्ट्रीय अध्यक्ष स्वयं लेखक डा. लक्ष्मण झा पर्यन्त चुनाव हारि गेल छलाह। ताहि पर प्रतिक्रियाक रूप मे एक सँ बढिकय एक तथ्यक संग सम्माननीय लखन बाबू अनेकों पोथी सब लिखलनि। एखन धरि हुनकर दर्जनों पोथी अप्रकाशिते अछि।
 
ओ मिथिलाक जनमानसक बहुसंख्या लोकक भोलापन आर बौद्धिक वर्गक मानसिकता मे गैरवाजिब तर्कक झंझटि, अन्तर्द्वन्द्व आ आपसी रारपनी सँ ब्यर्थक बहस आदि केँ पर्यन्त ‘गोलायसी’ केर संज्ञा दैत परचा तक बँटबबैत छलाह से १९५३ केर हुनक नेतृत्व मे गोरखा पाया विरोधक आन्दोलन केर परचा सँ स्पष्टे अछि। अपन संघर्ष लगभग एक दशक धरि जारी रखलन्हि, तदोपरान्त चुप्पे टा नहि अपना केँ आम जनमानस सँ कात तक कय लेलनि। आजीवन ब्रह्मचर्यक नियम पालन करैत बाद मे मिथिला विश्वविद्यालयक कुलपति पद त स्वीकार कयलन्हि, मुदा सरकारक तनख्वाह सिर्फ नाम लेल १ टका मात्र लेलाह।
 
एहि पोथीक आरो भाग आदरणीय Bhavanath बाबू सँ मांगल अछि। एतेक दिन पिता-पितामह सँ डा. लखन बाबूक खिस्सा सब मात्र सुनने रही। मुदा पोथी सँ उद्धृत मात्र एक पैराग्राफ पूरा पोथीक भाव केँ व्यक्त कय रहल अछि। यथार्थतः हम मिथिलावासी चाकरी प्रवृत्ति मे रत छी, या फेर विदेह छी। कोहुना जीवन जियब हमरा सभक नियति थिक। स्वतंत्रताक ७ दशक बितलोपर स्थिति जस के तस अछि। ब्रिटिशकाल मे तँ उद्योगक अवस्था बरु आइ सँ बेसी नीक छल। तखन डा. लखन बाबूक कहल बात जे हमरा लोकनि विद्यमान व्यवस्था मे १० गदहाक वजन देह पर उघि लेब, लेकिन मुंह सँ ऊफ्फ तक नहि बाजब, यैह प्रवृत्ति आइयो हावी अछि। आब त ओहि दिनक स्थिति-नियति सँ बेसी बदतर स्थिति बनि गेल अछि। राजनीतिक दिशा-दशा मे आब एकटा काँग्रेस नहि, बल्कि जाति आ धर्मक ठीकेदार सब सेहो हमरा सभक शासक बनि गेल अछि। कहय छै न – माछ कोल्ड बल्डेड होएत छैक, कटाएत छैक त आवाजो नहि करैत छैक। बिल्कुल तहिना हम मिथिलावासी आइयो छीहे। डा. लखन बाबूक उपरोक्त दृष्टि मे कनिको परिवर्तन जँ कतहु सँ बुझाय त उत्साह बढय!
 
हरिः हरः!!