सीता

स्वाध्याय

– प्रवीण नारायण चौधरी

मिथिलाक राजकुमारी – जनकसुता – जनकात्मजा – भूमिसुता – भूमिजा – जानकी आदि अनेकों नाम सँ जगविख्यात् सीता – रामभार्या केँ एहि मानवलोक मे के नहि जनैत होयत! सम्पूर्ण रामायण केर एकमात्र नायिका – स्वयं नारायणी (लक्ष्मीक अवतार) मानल जाइत छथि। राजा जनकक जेठ सुपुत्रीक रूप मे आ अबध नरेश राजा दशरथक जेठ बधूक रूप मे जानल जाइत छथि। अपन स्त्रीधर्म आ पतिव्रता धर्मक कारण हिनकर नाम अत्यन्त आदर सँ लेल जाइत अछि। मर्यादा पुरुषोत्तम रामचन्द्र केर भार्या सीता अपन पतिक अनुगामिनी बनिकय कठिन सँ कठिन परिस्थिति मे पर्यन्त एकटा साहसी नारीक परिचय त देबे केलनि, केहनो कठिन परिस्थिति यथा रावण समान योद्धा-पराक्रमी लंकापति द्वारा अपहरण मे पड़लाक बादो अपन नीति आ नैतिकता सँ कनिको टस्स सँ मस्स नहि होयबाक कारण हिनका प्रति लोकक श्रद्धा अगाध मात्रा मे बढि जाइत अछि। अन्ततोगत्वा रावणक वध करबाक संग-संग समस्त आसुरी सेना सँ देव, ऋषि, ब्राह्मण, संत आ समस्त मानव समाज केँ त्राण भेटैत अछि। रामायण केर मौलिक कथा एतहि धरि सीताक नायिकत्व मे संपन्न होएछ। गोटेक अंश विभिन्न कवि लोकनि अपना-अपना रुचि सँ वर्णन करैत छथि, परञ्च आस्थावान मानव समाज लेल अवतारी पुरुष-नारीक कथा असत्य पर सत्यक जीत संग सम्पन्न होएछ। ओना प्रकृति केर नियम छैक जे नीक संग बेजा सदिखन अबैत-जाइत रहत। भगवानक अवतार समय-समय पर होइत रहबाक विधान वेद-पुराण-श्रुति-स्मृति सब गबैत अछि। सीता समस्त मैथिलक अवलम्ब सदा-सनातन रहती, यैह त मिथिलावासीक परम सौभाग्य भेल। हमर-अहाँक जन्म एहि धरती मे भेटब निश्चित परम सौभाग्य थिक।

जन्म आ नाम
रामायण मे वर्णित कथ्य अनुरूप मिथिलाक राजा जनक द्वारा अकाल सँ निजात पेबाक लेल खेत मे हर जोतबाक समय एकटा घैल अभरल। एहि घैल मे सुन्दर कन्या सीता भेटल छलीह। हर केर फार केँ मैथिली भाषामे ‘सीत’ कहल जाएत ताहि कारण हिनकर नाम सीता पड़लन्हि। राजा जनक तथा रानी सुनयना द्वारा हिनकर पालन-पोषण भेल आर हिनके राजा जनक अपन जेठ सुपुत्रीक मान देलन्हि। 
 
राजा जनक केर सुपुत्री होयबाक कारण हिनका जानकी, जनकात्मजा, जनकसुता सेहो कहल जाइत छन्हि। मिथिलाक राजकुमारी होयबाक कारण हिनकर एक नाम मैथिली सेहो प्रसिद्ध अछि। भूमि मे भेटबाक कारण हिनका भूमिपुत्री या भूसुता या भूमिजा सेहो कहल जाइत छन्हि।
 
विवाह
अयोध्या नरेश दशरथ केर जेठ सुपुत्र रामचन्द्र अपन अनुज लक्ष्मणजीक संग गुरु विश्वामित्र केर यज्ञ केँ सफल करबाक उद्देश्य सँ रक्षक वीर धनुर्धर बनिकय असुर ओ दुर्जनादि सब सँ रक्षा करैत गुरुजीक संग मिथिलाक्षेत्र भ्रमण करय एलाह। एहि समय राजा जनक द्वारा अपन जेठ सुपुत्री सीताक विवाह लेल बड पैघ स्वयंवर केर आयोजन भेल छल। चूँकि जानकीक अद्भुत ऐश्वर्यपूर्ण शक्ति जे शिवधनुष केँ बाम हाथें उठाकय भगवतीक चौका नीपि देबाक प्रकरण रानी सुनयनाक ध्यानाकर्षण पर स्वयं राजा जनक कतेको बेर देखि चुकल छलाह, अतः एहि कन्या लेल ओ एहेन वर केर चयन करय चाहि रहल छलाह जे कम सँ कम ओहि शिवधनुष केँ भंग करबाक सामर्थ्य राखैत हो। मिथिला मे ई निस्तुकी मान्यता आइयो भेटैत अछि जे कन्या सँ वर बीस हो, अर्थात् उमेर-योग्यता-शक्ति-सामर्थ्य आदि सब किछु मे कन्या सँ बेसी सामर्थ्यवान् वर अवश्य हो। एहि तरहक परिकल्पना केँ साकार करैत राजा जनक द्वारा जानकीक विवाह लेल स्वयंवर जाहि मे उपरोक्त वर्णित शिवधनुष केँ भंग करबाक संकल्प लेल गेल छल तेकर आयोजन भेल आर एहि समय विश्वामित्र अपन दुनू प्रिय शिष्य राम आ लक्ष्मण सहित मिथिलाक्षेत्र आयल छलाह। हुनको एहि स्वयंवर यज्ञ केर दर्शनक इच्छा छलन्हि। महाराज जनक सीता स्वयंवर केर घोषणा कयला उत्तर ऋषि विश्वामित्र केर उपस्थिति लेल निमंत्रण पठौने छलाह। आश्रम मे राम तथा लक्ष्मण सेहो उपस्थित रहबाक कारण ओ हुनका सब केँ सेहो मिथिपलपुरी संग आनि लेलनि। महाराज जनक द्वारा उपस्थित ऋषि-मुनि लोकनिक आशीर्वाद सँ स्वयंवर केर लेल  शिवधनुष उठेबाक (भंग करबाक, प्रत्यंचा चढेबाक, आदि) नियम केर घोषणा कयल गेल। सभा मे उपस्थित कोनो राजकुमार, राजा वा महाराजा धनुष उठेबा मे विफल रहलाह। श्रीरामजी जखन धनुष केँ उठेलन्हि आर भंग कयलन्हि, एहि तरहें सीताक विवाह श्रीरामजी सँ निश्चय भेल। एहि संगे मिथिलाक राजा जनकक अन्य राजकुमारी सब मे ऊर्मिला केर विवाह लक्ष्मण सँ, मांडवी केर भरत सँ तथा श्रुतिकीर्ती केर शत्रुघ्न सँ विवाह होयबाक निश्चय भेल।
 
वनवास
विवाहोपरान्त राजा दशरथ जखनहि श्रीरामचन्द्रजी जेठ राजकुमार केँ युवराज बनेबाक औपचारिकता पूरा करबाक घोषणा कयलन्हि कि हुनक छोट रानी कैकेयी द्वारा अपन पुत्र भरत केँ राजा बनेबाक मति फिरि जेबाक कारण पूर्व मे पति सँ लेल वचन केँ पूरा करेबाक शर्त मुताबिक रामचन्द्रजी लेल १४ वर्षक वनवासक कठोर आज्ञा आ भरत केँ राज्याभिषेकक घोषणा करेबाक कारण सीतापति श्रीराम केँ वनवास भेलन्हि। एहि स्थिति मे नवविवाहिता सीता सेहो नीतिपूर्वक अपन पति संग वनगमन केर बात सबसँ मनबा लेलीह। पति रामजी संग दियर लक्ष्मण सहित सीताजी वनगमन कयलीह। वनवासक समय चित्रकूट पर्वत स्थित मंदाकिनी नदीक तट पर अपन नव निवास बनौलन्हि। रस्ता मे निषादराज, केवट, भरद्वाज मुनि आदिक संग भेंटघाँट आदिक प्रसंग सब रामायण मे वर्णित अछि। ओम्हर राजा दशरथ केँ पुत्र वियोग वर्दाश्त नहि भेलाक कारण ‘हा-राम, हा-राम’ करैत प्राणान्त भऽ गेलन्हि। कैकेयीपुत्र राजकुमार भरत अपन मातृक सँ वापसी भेलापर  अयोध्या मे बीतल एहि सब प्रकरण सँ परिचित भेलापर बहुत दुःखी भेलाह। ओ अपन प्रिय जेठ भाइ श्रीरामजी केँ मनौती करैत अयोध्या लय जेबाक लेल वन मे आबि गेलाह। मुदा श्रीरामचन्द्रजी द्वारा बहुते बुझेलाक बाद हुनकर चरण-पादुका लय केँ लौटि गेलाह। अयोध्याक राजगद्दी पर श्रीरामजीक चरण-पादुका विराजित कय स्वयं संन्यास जेकाँ जीवन व्यतित करैत अयोध्याक समस्त राजकाज केँ जेठ भाइ केर अनुपस्थिति मे पूर्ण नीतिवान् बनिकय चलबैत रहलाह। एहि समय राम-लखन-सीता सब कियो ऋषि अत्री केर आश्रम गेलाह। सीता ओतय देवी अनसूया केर पूजा कयलन्हि। देवी अनसूया द्वारा सीता केँ पतिव्रता धर्म केर विस्तारपूर्वक उपदेश करबाक संग चंदन, वस्त्र, आभूषणादि प्रदान कयल गेल। एकर बाद कतेको अन्य ऋषि व मुनि केर आश्रम जाएथ, दर्शन व आशिर्वाद पाबि ओ सब पवित्र नदी गोदावरी तट पर पंचवटी मे वास कयलन्हि।
 
अपहरण
पंचवटी मे लक्ष्मण सँ अपमानित शूर्पणखा अपन भाइ रावण सँ जखन व्यथा-कथा सुनेलीह आ ओकर कान भरैत कहलीह “सीता अत्यंत सुंदर अछि आर ओ अहाँक पत्नी बनबाक लेल सर्वथा योग्य अछि।” ताहिपर रावण अपन माम मारीच संग मिलिकय सीता अपहरण केर योजना बनेलक। ताहि अनुसार मारीच सोनाक हिरण केर रूप धय राम आ लक्ष्मण केँ वन मे एम्हर-ओम्हर दौड़ेलक। एम्हर हुनका लोकनिक अनुपस्थिति मे रावण सीता केर अपहरण कय लेलक। अपहरण केर बाद आकाश मार्ग सँ जाइत समय पक्षीराज जटायु केर रोकलापर रावण द्वारा ओकर पाँखि काटि देल गेल।
 
जखन दोसर कोनो सहायता नहि भेटलनि तऽ सीताजी अपन आँचर फाड़ि ताहि मे अपन आभूषण सब बान्हिकय खसा देलीह। नीचाँ वनमे किछु वानर सब एकरा अपना संग आनि लेलक। रावण सीता केँ लंकानगरीक अशोकवाटिका मे रखलक आर त्रिजटा नामक एक राक्षसीक नेतृत्व मे किछु आरो राक्षसी सभक देख-रेख केँ भार देलक।
 
हनुमानजीक भेट
 
सीताजी सँ बिछुड़िकय रामजी बहुत दु:खी भेलाह। लक्ष्मणजी सहित राम हुनका वने-वन खोजी करैत जटायु धरि पहुंचि गेलाह। जटायु द्वारा हुनका सीताजी केर अपहरण रावण केलक आ दक्षिण दिशा मे लय गेल से सूचना देलाक बाद प्राण त्यागि देलक। राम जटायुक अंतिम संस्कार कय लक्ष्मण सहित दक्षिण दिशा मे चलि देलाह। आगाँ चलैतकाल ओ दुनू हनुमानजी सँ भेटलाह जे हुनका सबकेँ ऋष्यमूक पर्वत पर स्थित अपन राजा सुग्रीव सँ भेंट करौलनि। रामजी संग मैत्रीक बाद सुग्रीव सेहो सीताजीक खोजी मे चारू दिस वानरसेनाक टुकड़ी पठेलनि। वानर राजकुमार अंगद केर नेतृत्व मे दक्षिण दिस गेल टुकड़ी मे हनुमान, नील, जामवंत प्रमुख छलाह आर ओ सब दक्षिण स्थित सागर तट धरि पहुंचि गेलाह। तटपर हुनका सब केँ जटायुक भाइ सम्पाति भेटलनि जे हुनका सब केँ सूचना देलकनि जे सीता लंका स्थित एक वाटिका मे छथि।
लंका समुद्रक बीच स्थित अछि। बानर-रीछ लेल ओतय जायब एकटा असंभव काज जेकाँ प्रतीत भऽ रहल छल। सब कियो चिन्तित छलाह। मुदा तखनहि धीर-गंभीर आ चिन्तनशील रीछ जामवंत हनुमानजी केँ प्राप्त आशीर्वाद, हुनक वीरता, बुद्धि, विवेक, विज्ञान आदिक अन्तर्शक्ति केँ स्मरण करबैत कहलन्हि
कहइ रीछपति सुनु हनुमाना । का चुप साधि रहेहु बलवाना ॥
पवन तनय बल पवन समाना । बुधि बिबेक बिग्यान निधाना॥
कवन सो काज कठिन जग माहीं। जो नहि होइ तात तुम्ह पाहीं॥
कहल जाइछ जे रीछपति जामवंत केर यैह वचन पवनसुत हनुमानजीक आन्तरिक शक्ति जे कोनो ऋषि-शापसँ विस्मृति भऽ गेल छलन्हि ओ पुनः स्मृति मे आबि गेलन्हि आर तेकर बाद…. हनुमानजी समुद्र लाँघिकय लंका पहुँचलाह, लंकिनी केँ परास्त कय नगर मे प्रवेश कयलन्हि। ओतय सब भवन आर अंतःपुर मे सीता माता केँ तकलनि, मुदा कतहु नहि पाबि ओ अत्यंत दुःखी भेलाह। एहि बीच पूरे लंका मे राम-नाम अंकित एकटा घर देखि ओ पक्का कोनो रामभक्त – संत केर होयत से सोचि ओतय पहुँचि जाइत छथि आर रावणक छोट भाइ विभीषणजी सँ परिचय होइत छन्हि। ओ हुनका सीताजीक अवस्थितिक यथार्थ जनतब दैत छथिन। पुनः अपन प्रभु श्रीरामजी केँ स्मरण व नमन कय अशोकवाटिका पहुँचलाह। ओतय राक्षसी सब सँ घेरायल तेजस्विनी स्वरूपा सीताजी केँ अत्यन्त शोकमग्न अवस्था मे देखि चिन्ह लेलनि।
 
सीताजी आ हनुमानजीक अशोकवाटिका मे भेंटक वर्णन एकटा स्वतंत्र लेख सँ किछु समय पूर्व मे केने रही। ओ पुनः द्रष्टव्य अछि। हनुमानजी सीताजी केँ बोल-भरोस दय जखन वापस रामजीक पास लौटैत छथि, ओतय राजा सुग्रीवक बानर-भालु केर सेना संग लंकापर चढाई कयलन्हि। घोर युद्ध उपरान्त रावण आ दलबल केँ जीति पुनः जानकी केँ अपहरण सँ मुक्त करा अयोध्या घुरि अयलाह जतय रामराज्यक स्थापना करैत समस्त प्रजा केँ सुखी कयलन्हि। एहि तरहें सीता द्वारा प्रस्तुत चरित्र केँ स्मरण-सुमिरण करैत हमरा लोकनि आइयो अपना केँ सौभाग्यशाली मानैत छी आ संग ‘सीताराम-सीताराम’ केर नाम-जप सँ अपन क्लेश-कष्ट केँ दूर करैत छी। कवि लोकनि सीता आ राम केर चरित्र केँ बहुविधि सँ कहैत-सुनैत आ गबैत छथि।
हरिः हरः!!