आततायी केर हत्या मे कोनो पाप नहिः अर्थशास्त्र

विचार

– प्रवीण नारायण चौधरी

मिथिलाक आततायी केँ समाप्त करू

आततायी केँ मारला सऽ कोनो पाप नहि! आततायी के?

१. जे दोसरक घर मे आगि लगाबय
२. जे दोसरा केँ जहर खुआबय
३. जे दोसर पर तलवार लय हमला करय
४. जे दोसरक धन, जमीन आर पत्नीक चोरी करय

दुर्योधन ई चारू काज पाण्डव भ्राता संग केने छल। अर्थशास्त्र (हिन्दू दर्शन) अनुसार एक आततायी केर हत्या मे कोनो पाप नहि अछि भलेहि ओ सम्पूर्ण वेदान्तक ज्ञाता कियैक नहि हो।

परञ्च, वीर धनुर्धर महारथी अर्जुन भगवान् कृष्ण केँ सारथि पाबि महाभारत युद्ध मे युद्धकर्म करय सँ मना करैत तर्क राखि देने छलाहः

निहत्य धार्तराष्ट्रान्नः का प्रीतिः स्याज्जनार्दन॥
पापमेवाश्रयेदस्मान्हत्वैतानाततायिनः॥१-३६॥
तस्मान्नार्हा वयं हन्तुं धार्तराष्ट्रान् स्वबान्धवान्॥
स्वजनं हि कथं हत्वा सुखिनः स्याम माधव॥१-३७॥

“हे जनार्दन! हमरा सब केँ एहि मे केहेन प्रीति जे धृतराष्ट्रपुत्र सभक हत्या करी? एहि आततायी सबकेँ मारिकय हमरा सबकेँ पापे टा लागत। तैँ एहि धृतराष्ट्रपुत्र समान स्वबान्धवक हत्या हमरा सबकेँ नहि करक चाही। हे माधव! अपन स्वजन्य केँ मारला सँ आखिर हमरा सबकेँ केहेन सुख भेटत?”

आर एहि तरहें बहुत रास तर्क आदि प्रस्तुत करैत अर्जुन अपन स्वधर्म यानि युद्ध करय सँ कृष्ण केँ साफ मना करैत छथि। परञ्च श्रीकृष्ण हुनका बड़ा जबरदस्त जिरह करैत ई बुझबय मे सफल होएत छथि जे अहाँ अपन धर्म (कर्तब्य) निभाउ आ युद्ध करू। ई सब सोचबाक बेर जखन छल तखन सोचने रही हमरा लोकनि। गेल रही वार्ता करय लेल धृतराष्ट्रपुत्र सभक संग। राजा धृतराष्ट्र व हुनक योग्य मंत्रिमंडल केँ पर्यन्त सचेत कएने रही। परञ्च आततायी दुर्योधन राज्यक सेना आ राजाक सामर्थ्य अपन पिता या कहू जे अपन पक्ष मे देखिकय ई सब प्रस्ताव, शान्ति-समझौता, युद्ध विराम आदि पहिनहि तोड़ि चुकल अछि। आर, हे अर्जुन! शास्त्रसम्मत नीति कहैत छैक जे यदि कियो केकरो संग उपरोक्त चारि प्रकारक अत्याचार करय त ओकरा मारला सँ कोनो पाप नहि लागत। भले ओ पापी कतबो ज्ञानी – वेदान्तविद् कियैक नहि रहय।

स्पष्टे छैक – वेदान्तविद् कहैत भगवान् एतय ब्राह्मणहुवर्गकेँ आततायी बनलाक बाद हत्या कयल गेलापर कोनो पाप नहि लिखलनि अछि।

त, आब हमर जिज्ञासा ई अछि जे आइ जे मिथिला भूमिपर रहिकय एकर सतीत्व संग खेलबाड़ कय रहल अछि, एकर सम्पदा चोरी कय रहल अछि, जाति-पाति मे झगड़ा करा घर मे आगि लगा रहल अछि, मिथिलाक निजत्वरूपी पहिचान यानि स्त्रित्व केर अपहरण कय रहल अछि – ओ के भेल? ओ निश्चित आततायी थिक आर ओकर हत्या मे कोनो पाप नहि लागत। हत्या केहेन हो? ओकर प्राण लेबाक बात ओकर हत्या हेतैक से नहि। ओकर वर्चस्व समाप्त करबाक लेल जनमानस मे एकता हो। हरेक मैथिलक भीतर रहल अर्जुन आ कृष्ण ई विचार करथि आर एहेन आततायी केँ समाप्त करथि मिथिला सँ, मिथिला मुक्त तखनहि टा होयत।

हरिः हरः!!