यदुवंश (यादव) आ मिथिला

मैथिली जिन्दाबाद पर पढू मिथिला मे यदुवंशी समाजक इतिहास।

मिथिलाक ऐतिहासिकता मे यदुवंशी समाजक परिचय

– प्रवीण नारायण चौधरी

यदुवंश (यादव) आ मिथिला
 
राजा ययातिक धर्मपत्नी देवयानीक पुत्र आ दैत्यगुरु शुक्राचार्यक नाती छलाह यदु। अपन राजा पिता ययाति द्वारा विशेष प्रसंगवश युवावस्था सौंपबाक मांग केँ यदु द्वारा नकारबाक कारण हुनका राज्याधिकार सँ वंचित कएल गेल, संगहि वंश-गौरव अर्थात् चन्द्रवंशी राजपूत कहेबाक अधिकार सँ वंचित करैत स्वतंत्र जीवन-यापन हेतु राज्य-निकाला देल गेल छल। यादव कुलक आदिपुरुष ‘यदु’ यथार्थतः चन्द्रवंशी क्षत्रिय छलाह।
 
यदुवंशक पौराणिक कथा
 
पौराणिक गाथा अनुसार यदुक चर्चा ऋग्वेद मे वर्णित पाँच भारतीय आर्य जन (पंचजन, पंचक्षत्रिय या पंचमानुष) मेँ सँ एक मानल गेल अछि। हिन्दू महाकाव्य महाभारत, हरिवंश एवं पुराण मे यदु केँ राजा ययाति व रानी देवयानीक पुत्र कहल गेल अछि। राजकुमार यदु अत्यन्त स्वाभिमानी व सुसंस्थापित शासक छलाह। विष्णु पुराण, भगवत पुराण व गरुड़ पुराण अनुसार यदु केर चारि पुत्र छल, अन्य पुराण मे कएल गेल चर्चाक अनुसार हुनक पाँच पुत्र छल। बुध एवं ययातिक मध्य केर सब राजा केँ सोमवंशी या चंद्रवंशी कहल गेल छन्हि। महाभारत व विष्णु पुराण केर मुताबिक यदु अपन पिता ययाति केँ अपन युवावस्था प्रदान करब स्वीकार नहि केने छलाह जेकरा चलते ययाति यदु केर कोनो वंशज (संतति) केँ अपना वंश ओ साम्राज्य मे शामिल नहि भऽ पेबाक श्राप देने छलाह। यैह चलते यदु केर वंशज सोमवंश सँ प्रथक भऽ गेलाह आर मात्र राजा पुरू केर वंशज कालांतर मे सोमवंशी कहेलाह। एकर बाद महाराज यदु ई घोषणा कयलनि जे हुनकर वंशज भविष्य मे यादव या यदुवंशी कहेता।] यदु केर वंशज अभूतपूर्व उन्नति केलक मुदा बाद मे ओ सब दुइ भाग मे विभाजित भऽ गेल। (स्रोतः विकिपेडिया)
 
मिथिला मे यदुवंशक इतिहास
 
मिथिला मे सेहो यदुवंशी समाजक विभिन्न शाखा भेटैत अछि। एहि सब मे विशेष प्रसिद्ध अछि कृष्णौट – कृष्णक वंशज, मझरौट – उग्रसेन वंशज, जाट, जट तथा धोसिन आदि – यैह शाखा मिथिलाक्षेत्रक यदुवंशी समाजक बेसी प्रचलित अछि।
 
यादवक धोसिन शाखा सहरसा (उत्तरी) एवं मधुबनी जिलाक अतिरिक्त नेपालक तराई एवं गोड्डा (बिहार) मे सेहो बसैत अछि। एकर ३६० टा उपाधि कहल जाएत अछि। टिथवाड़, चौड़वाड़, खेरवाड़, भिन्डवार, लगरवार, बनेवार, कैबाड़, गुरमैत, सलहेता, मड़वैता, बरियैत, बड़खेड़, मरीक, मुस्कुलिया, विराजी, बुधलगड़िया, कौरगिया, रान, पैकरा, परसैला, खड़गा, मटियैत, कुसियैत, सुरैत, सुनरैत, गोरहान, महात्मन, गिठिया, सिपलिया, मसैता, धनखोड़ी, पड़पड़ी, सनौत, बनैत, लहोटिया, गोहितमान, निजपुरिया, कापरि, माझी, टरैत, नाहब, आब, कहब, नौह, हजरा, गोइत, भदेसवार, सतरा, धुरझार, पधैय्या, मखुलिया, खिरहरि, रोहिता, सिहमैता, महरान, राम, उपझरिया, मंगरदैता, घोष, फरकार, कड़ोरिया, बटहा, छजनैत, सुरा, बहकुलिया, बिसनपुरिया, अधिकारी, महतो, मधुकरिया, सदा, आदि मुख्य अछि।
 
गोइत शाखाक सेहो ७ गोट उपशाखा अछिः बहुकुलिया, सुरा, छजनैत, बिसनपुरिया आदि।
 
भिन्डवार केर २ शाखा अछिः अधिकारी तथा महतो।
 
यादवक मुख्य आजीविका पशुपालन तथा कृषि-कार्य थिक। विगत ८-९ दसक सँ शिक्षा, नौकरी, व्यवसाय एवं राजनीति मे सेहो एहि समाजक वर्चस्व तीव्र गति सँ बढल देखाएछ। कर्मठता तथा बाहुबल लेल एहि जाति केँ प्रतिमान मानल जाएछ। पुराणैतिहासिक विश्लेषण सँ यादव राज्य शासन केर सेहो प्रमाण भेटल अछि। भारतक स्वतंत्रता संग्राम मे सेहो मिथिलाक शेर कहेनिहार रासबिहारी लाल मंडल केर चर्चा कयल जाएछ, ओ मधेपुराक मुरहो स्टेटक जमीन्दार होयबाक संग-संग देशक स्वाधीनताक लड़ाई मे अपूर्व योगदान देनिहार व्यक्तित्वक रूप मे मानल जाएत छथि। वर्तमान मधेपुरा ओ अन्य जिला सँ यादव समाजक एक सँ बढिकय एक नेतृत्वकर्ता अपन क्षेत्र, राज्य ओ देश लेल विशिष्ट योगदान दैत रहला अछि। तहिना नेपालक मिथिलाक्षेत्रक यादव समाजक एक सँ बढिकय एक विद्वान् तथा राजनीतिज्ञ अपन लोकसमाजक हित लेल विशिष्ट योगदान दैत आबि रहला अछि। राजनीति मे एहि समाजक भूमिका सर्वथा सर्वोपरि गानल जाएछ। 
 
यदुवंश राज्य आ भारत
“मत्स्यपुराण” मे कएल गेल उल्लेख मुताबिक आभीर (अहिर) केर १० पीढी द्वारा कलियुग मे ६७ वर्ष धरिक शासन रहल।
 
सप्त षष्ठिस्तु वर्षाणि, दशाभीरास्तथैव च॥
तेषुवर्षेषु कालेन ततः कलिकालनृपाः॥
 
सालवाहन राजाक समय आभीर (अहीर) द्वारा ईश्वर सेन केर नेतृत्व मे एक राज्य (दक्षिण भारत) केर स्थापनाक चर्चा भेटैत अछि, एकर प्रमाण नासिक (महाराष्ट्र) सँ भेटल प्राचीन शिलालेख मे विद्यमान छैक। यादव राजवंशक उल्लेख “भिल्लय वृतान्त” (१०१९ ई.) मे अंकित अछि। देवगिरी (दौलताबाद) मे राजा भिल्लय अपन राजधानी बनौने छलाह। हिनक पौत्र (सिंघन) एहि वंशक सबसँ प्रतापी राजा भेलाह। ओ १२१० ई. मे गद्दी पर बैसलाह। ओ गुजरात तथा आस-पड़ोसक दोसरो राज्य जितने छलाह। १२९४ ई. मे अलाउद्दीन खिलजी यादव राजा रामचन्द्र केर राज्यपर आक्रमण कय देवगिरी केँ लूटलक। ओहि लूट मे ६०० मन मोती, २०० मन हीरा, माणिक्य, मरकत-मणि, नीलम, स्वर्ण एवम् हाथी आदिक उपहार लेलाक बाद राजाक जान बखैस देल गेल छल। मलिक काफूर (अलाउद्दीनक सेनापति) द्वारा १३०९ ई. मे फेरो आक्रमण कय रामचन्द्र देव केँ सुल्तानक अधीनता स्वीकार करौलक। रामचन्द्र देवगिरीक स्वतंत्र राजा छलाह। हुनका बाद हुनक जमाय तथा उत्तराधिकारी हरपाल देव द्वारा १३१९ ई. मे दिल्ली सुल्तानक विरुद्ध विद्रोह कयलनि, मुदा ओ हारि गेलाह। अन्ततः ओ पकड़ा गेलाह आर जीबिते हुनकर खाल खींचलाक बाद गर्दैन काटि लेल गेलनि आर एहि प्रसंगक संग तत्कालीन यादव वंशक राज्य केर अन्त भऽ गेल इतिहास मे चर्चा भेटैत अछि। एहि वंशक राजा हिन्दू धर्म, संस्कृत भाषा तथा संत लोकनिक संरक्षक छलाह। प्रसिद्ध धर्मशास्त्री हेमाद्रि रामचन्द्र देव केर राज्यकालहि मे भेल छलाह।
 
यदुवंशी समाजक लोकदेव ‘लोरिक’ ओ मिथिला
मिथिलाक यदुवंशी समाज मे लोरिकदेव केर वीरगाथा लोकगीतक माध्यम सँ गेबाक परम्परा अछि। एहि गीत केँ लोरिकायन कहल जाएत अछि। उपरोक्त इतिहास व यदुवंशी समाजक अन्य विभिन्न विशेषता सभक चर्चा एहि प्रसिद्ध लोरिकायन मे सेहो भेटैत अछि। “यदुवंशीय लोकदेव लोरिक और लोरिकायन” केर लेखन डा. लक्ष्मी प्रसाद श्रीवास्तव एहि सन्दर्भ मे विभिन्न शोध आ विश्लेषणक बात कहलैन अछि। एहि लेखक मूल भाव सेहो हिनकहि रचना “लोक-संस्कृति-कोश (मिथिला खंड) सँ लेल गेल अछि।
 
हरिः हरः!!