मिथिला परम्परा – पाबनि आ लोकजीवन
जितिया पाबनि: मातृत्व केर आदर्शक प्रतीक
– कुमुद मोहन झा, विराटनगर, नेपाल ।
मिथिला संस्कृति सदैव सजीब रहल अछि — एहि संस्कृति के आत्मा ओकर पारंपरिक रीति-रिवाज, लोकपर्व आ लोकविश्वास मे गहीर रूप सँ बसल अछि । एहि संस्कृति मे कतेको लोकपर्व अछि मुदा ताहि मध्य जीतिया एहेन पर्व थिक जकर मूल मे मातृत्वक निःस्वार्थ प्रेम, त्याग आ संरक्षणक भावना समाहित अछि ।
“जितिया” वा “जीवित्पुत्रिका व्रत” केवल धार्मिक अनुष्ठान नहि, बल्कि एक सामाजिक-सांस्कृतिक उत्सव छी जे पीढ़ी दर पीढ़ी मिथिला के लोकजीवन मे अपन विशेष स्थान रखैत आयल अछि ।
जितिया मिथिला क्षेत्रक महिला बीच एक विशेष श्रद्धा आ भक्ति सँ मनाओल जाइत अछि । ई व्रत मातृत्वक संकल्प छी — एक माँ अपन संतानक दीर्घायु, स्वास्थ्य आ सुख-समृद्धिक लेल कठोर व्रत रखैत छथि । ई पाबनि मातृत्व प्रेम आ संतान-संरक्षण केर प्रतीक रूप मे मनाओल जाएत अछि ।
एहि पर्व मे माताक तपस्या, प्रेम आ करुणा जिमूतवाहन राजा केर आदर्श सँ जुड़ल अछि — जे अपन प्राण देबाक लेल तैयार भऽ गेलाह, मुदा एक निर्दोष प्राणीक रक्षा कयलाह । तीन दिनक पावन यात्रा निम्नानुसार होइत अछि:
नहाय-खाय : आश्विन मासक कृष्ण पक्षक सप्तमी तिथि सँ एहि व्रत केर आरंभ होइत अछि । एहि दिन व्रतधारी स्त्री स्नान करैत छथि, शुद्ध भोजन ग्रहण करैत छथि । एहि दिन शुद्धता आ सात्विकता पर विशेष ध्यान देल जाइत अछि । मैथिल समाज मे एहि दिन घुघुनी, कद्दू-भात आदि पारंपरिक भोजन बनाओल जाइत अछि ।
निर्जला व्रत : दोसर दिन अष्टमी तिथि केँ व्रती बिना जल ग्रहण कएने उपवास करैत छथि । ई दिन कठोर तपक दिन छी । व्रती अपन संतानक दीर्घायु, आरोग्य आ सुख-समृद्धिक कामना सँ डाला भरैत छथि । एहि डाला केँ नारियल तथा अन्य फल आ पात सभ सँ सजा केँ नव कपड़ा सँ झांपल जाइत अछि । रात्रि मे श्रद्धा आ भक्ति पूर्वक जिमूतवाहन राजाक लोककथा सुनल जाइत अछि जे मातृत्व केर आदर्शक प्रतीक अछि ।
पारण : तेसर दिन नवमी तिथि केँ उपवास तोड़ल जाइत अछि । पारण विशेष विधिक संग होइत अछि — ई विधि क्षेत्र विशेष आ पारिवारिक परंपरा पर निर्भर कऽ किछु भिन्न भऽ सकैत अछि । सब सँ पहिले व्रती नहा-धोके शुद्ध भऽ जाइत छथि तत्पश्चात पुत्रवती स्त्री अपन पुत्र केँ डाला उघारए कहैत छथिन्ह । डाला फल प्रसाद के रूप मे जीवितपुत्रिका देवी केँ अर्पण कएल जाइत अछि । एहि प्रसाद केँ ग्रहण कएलाक उपरांत व्रती सात्त्विक भोजन करैत छथि । उपवास तोड़बाक लेल परंपरागत भोजन लेल जाइत अछि जेना दालि, भात, नोनी साग आ बिना लहसुन-प्याज वाला अन्य व्यंजन ।
पौराणिक कथाक पृष्ठभूमि मे जीमूतवाहन नामक एकटा परम प्रतापी आ धर्मनिष्ठ राजकुमार रहथि । हुनकर राज्यमे न्याय, करुणा आ सत्कर्मक दीप सदिखन प्रज्वलित रहैत छल । जीमूतवाहन स्वयं सिंहासन त्यागि वनमे चलि गेलाह । ओतए हुनकर भेंट एक वृद्ध नागक संग भेल । जे अपन दुःख कथा सुनबैत कहैत अछि — हम नागवंशक छी । प्रतिदिन एकटा नागकेँ गरुड़ लेल बलिदान देल जाइत अछि । हमर पुत्रक बारी आबि गेल अछि । ई सुनि जीमूतवाहनक अंतरात्मा काँपि उठल । करुणा सँ ओतप्रोत ओ राजकुमार भाव विह्वल भऽ प्रण करैत बजलाह — “हे पितातुल्य ! दुःखी जुनि होउ, हम स्वयं गरुड़ केर भोजन बनि अहाँक पुत्रक रक्षा करब, आश्वस्त रहू ।
ऐगला भोर जीमूतवाहन स्वयं पिपरक पात मे लिपटल चुपचाप गरुड़क बाट जोहए लगलाह । सूर्यक अरुण किरण जखन गगनाकाश केँ आच्छादित कएलक, गरुड़ आबि गेल । गरुड़ तेज, बल आ क्रूरताक प्रतीक मानल जाइत अछि । ओ अपन लोल (चोंच) सँ जीमूतवाहन केँ उठबए लागल । सम्भवतः ओकर लोल जीमूतवाहन के हृदय पर आघात करैत अनुभव कयलक जे ई कुनु साधारण जीव नहि । एहि हृदय मे प्रेम, शांति, आ समर्पण के अथाह सागर समाहित छै । गरुड़ चौंकल आ विचार करए लागल जे कोन एहेन जीव थिक जे अपन प्राण दोसरक लेल उत्सर्ग कऽ रहल अछि ? ओ पूछलक—”के छी अहाँ ?”
जीमूतवाहन अपन नाम बतौलन्हि, अपन धर्म बतौलन्हि, अपन करुणा देखौलन्हि । गरुड़ हुनकर परोपकार के भावना, दया, आ त्याग पर भावविह्वल भऽ गेलाह । जीमूतवाहन केँ अपन चोंच सँ मुक्त कऽ प्रण कएलक जे — “आब कोनो नाग केँ नहि खायब । गरुड़ केँ समर्पण, बलिदान आ प्रेम के महत्वक बोध भेलै । एहि तरहें, जीमूतवाहन के निःस्वार्थ बलिदानक प्रयास सँ नागकुल भय मुक्त भऽ गेल आ संसार केँ एक नवीन आदर्श भेटल — त्याग, करुणा आ मातृत्वक रक्षक “जीमूतवाहन” ।
मिथिलाक एक-एक पाबनि मे समाज केँ शिक्षण, संवेदनशीलता, अनुशासन आ लोकमूल्य केर गूढ़ पाठ नुकायल रहैत अछि । एहि शृंखलाक एकटा विशिष्ट पर्व थिक जितिया जे धार्मिक परंपरा मात्र नहि अपितु, एक जीवंत लोकपाठशाला थिक । एहि पाबनि मे जेहन रीतिरिवाज, कथा-कहानी, गीत-संगीत, सामूहिकता आ स्त्री-शक्तिक महिमा समाहित अछि, से अन्य ठाम विरले दृष्टिगत होइत अछि ।
मातालोकनि जीमूतवाहन केर कथा संतान सभ केँ सुनबैत छथि । जाहि मे त्याग, करुणा आ सहानुभूति केर आदर्श स्थापित छैक । बच्चा सभ बिना किताब पढ़ने कथा मात्र सूनिकय नैतिकता आ जीवनक आदर्श मूल्य केँ बुझैत अछि । कथा मे निहित ज्ञान बिना कुनू औपचारिक शिक्षाक एक पीढ़ी सँ दोसर पीढ़ी तक संचारित होइत अछि ।
मैथिल समाज मे महिला सभक योगदान सदैव केंद्रीय रहल अछि । जितिया मे महिला द्वारा निर्जला उपवास, पूजा-पाठ, कथा-वाचन, संतान लेल शुभकामना एकटा शिक्षण प्रक्रिया छी । बच्चा सिखैत अछि जे माँ केवल जननी नहि अपितु, प्रबल संरक्षक आ संसारक प्रथम गुरु छथि । जितिया व्रत स्त्रीक आत्मबल, संकल्प शक्ति आ संयमक परिचायक थिक । निर्जल उपवास करब आ धार्मिक विधि-व्यवस्था केर पालन करब, आधुनिक समय मे महिला सशक्तिकरणक एकटा सांस्कृतिक रूप मानल जा सकैत अछि ।
जितिया केर लोकगीत सभ लोकसंस्कृतिक अभिन्न अंग थिक । महिला लोकनि पारंपरिक राग मे जे गीत गबैत छथि, ताहि सँ बच्चा सभ अपन भाषा, उच्चारण, आ सांस्कृतिक धरातल सँ जुड़ल रहैत अछि । ई गीत केवल मनोरंजन नहि, बल्कि समाजक गूढ़ सत्य आ शिक्षाप्रद बात केर संवाहक होइत अछि ।
डाली सजौनाइ, विशेष पकवान जेना – नोनी साग, पटुआ, मड़ुआ, माछ आदि बनौनाइ, सफाइ एवं अन्य परंपरा मे बच्चासभ केँ सहभागी बनाओल जाइत अछि जाहि सँ घरक कार्य, पोषण पद्धति, पर्यावरणीय संतुलन जेहेन महत्वपूर्ण बात केर सहज ढंग सँ सिखबाक अवसर भेटैत छैक । ई ज्ञान पुस्तक सँ नहि जीवन सँ भेटैत अछि ।
जितियाक दिन स्त्रीगण सामूहिक रूप सँ एकजुट होइत छथि, कथा सुनैत छथि, गीत गबैत छथि, एक-दोसर सँ अपन भावना साझा करैत छथि । पाबनि समाजक एकता, मेलजोल आ सामूहिक चेतना केँ मजबूत करैत अछि आ सामाजिक समरसता केँ बढ़ावा दैत अछि । एहि सँ शिक्षा भेटैत अछि जे समाज मे सहअस्तित्व कतेक आवश्यक छैक ।
ई व्रत स्थानीय परंपरा, वनस्पति आ भोजनक महत्व सँ अवगत करबैत अछि । एहि सँ प्राकृतिक संसाधन, मौसमी भोजन आ स्थानीयता केर महत्व उजागर होइत अछि । ई एकटा मौलिक टिकाउ (सस्टेनेबल) जीवनशैलीक शिक्षा थिक ।
आजुक समय मे एकल परिवार आ व्यस्त जीवन शैली मे पारिवारिक मूल्य मे ह्रास देखल जाइत अछि । जितिया व्रत, माता आ संतान बीचक संबंध केँ आओर प्रगाढ़ करैत अछि । ई व्रत मातृत्व केर महत्ता, त्याग आ करुणा सँ परिचित करबैत अछि । व्रत केर माध्यम सँ व्यक्ति मे संयम, अनुशासन आ आत्मनियंत्रणक भावना उत्पन्न होइत अछि, जे आजुक तनावग्रस्त जीवन मे मानसिक शांति प्रदान करबाक एक उपाय भऽ सकैत अछि ।
आधुनिक शिक्षा व्यवस्था मे नैतिकता, पर्यावरण, सामाजिक चेतना आ सांस्कृतिक मूल्य केर पाठ अलग सँ पढ़ेबाक प्रयास कयल जा रहल अछि । एहि परिप्रेक्ष्य मे जितिया जेहेन पाबनि एकहि मंच पर सब शिक्षा सहज रूप सँ देबाक कार्य कऽ सकैत अछि । आधुनिक जीवन मे जखन पारिवारिक मूल्य, संबंध आ सांस्कृतिक चेतना कमजोर पड़ैत जा रहल अछि, तखनहुं जितिया अपन प्रासंगिकता बरकरार रखने अछि । वर्तमान पीढ़ी केँ चाही जे ओ एहन पाबनिक मर्म केँ बुझए आ अपन सांस्कृतिक पहचान सँ जुड़ल रहय ।
एहि व्रत केर माध्यम सँ ई संदेश भेटैत अछि जे माता जिमूतवाहन बनि अपन संतानक जीवन लेल हर संभव बलिदानक हेतु तैयार रहैत छथि । एहि उत्सव मे स्त्री नहि केवल त्यागक प्रतिमूर्ति बनैत छथि अपितु समाजक एकजुटता आ सांस्कृतिक चेतना केर धूरी सेहो बनि जाइत छथि । जितिया केवल पर्व नहि ई मातृ हृदय केर धड़कन थिक जेकर मूल मे ममता केर मूक भाष्य, करुणाक सजीब दर्शन आ मातृत्वक गरिमा नुकायल अछि ।
