लेख विचार
प्रेषित: कीर्ति नारायण झा
श्रोत: दहेज मुक्त मिथिला समूह
लेखनी के धार ,बृहस्पतिवार साप्ताहिक गतिविधि
विषय :- पावनि तिहार मे महिलाक योगदान
मिथिला संस्कृति मे पावनि-तिहार मात्र एकटा धार्मिक अनुष्ठान नहि, बल्कि जीवनक उल्लास आ सामाजिक समरसताक उत्सव थीक। आ एहि उत्सव केँ जीवंत, व्यवस्थित आ ओकर आत्मीयता बचेबाक पूरा श्रेय मिथिलाक नारी शक्ति केँ जाइत छैन्ह । गाम-घर सँ लऽ क’ परदेस धरि, कोनो पावनि महिला लोकनिक सक्रिय सहभागिता आ कठिन परिश्रमक बिना संभव नहिं अछि। कोनो पावनि जेना चौरचन, छठि, जिउतिया, या दुर्गापूजा केँ शुरू होमय सँ पहिने घरक कोना-कोना साफ करब महिला लोकनिक पहिल जिम्मेदारी होइत छैन्ह । पहिलुक जमाना मे जतय माटि सँ घर-आँगन नीपब आ बर्तन में माटिक लेबा लगा क’ चूल्हा-चौका पवित्र कएल जाइत छल, ओहि परंपरा केँ आजुक आधुनिक युग में हूबहू तँ नहि, मुदा ओहि पवित्रताक भाव केँ महिला लोकनि एखनो कायम रखने छथि। ओ सब भोरहि उठि क’ घर-आँगन केँ पावनि लेल तैयार करैत छथि।मिथिलाक कोनो भी पावनि बिना ‘अरिपन’ क’ संपन्न भ’ ही नहि सकैत अछि। चौरचन मे चान देखबाक स्थान हो या दीयाबाती मे लक्ष्मी पूजाक स्थल, पिठार आ सिन्दूर सँ अपन आंगुरक जादू बिखेरब महिला लोकनिक अद्भुत कला थीक। ओ सब पीढ़ी-दर-पीढ़ी एहि लोक-कला केँ हस्तांतरित करैत आबि रहल छथि, जे पावनि केँ एकटा विशिष्ट सांस्कृतिक रूप दैत अछि। पावनि-तिहारक असली स्वाद महिला लोकनिक हाथ सँ आबैत अछि। चौरचन मे ठेकुआ, खजूरी, पूरी आ खीर बनएबाक बात हो या छठि पावनि में अत्यंत पवित्रताक संग गहुमक आंटा पीसि क’ महाप्रसाद तैयार करब, महिला लोकनि भूखे-पियासे रहि क’ एहि कठिन काज केँ हँसइत-खेलइत करैत छथि। डाली सजायब, केलाक घौर, चौरचनक दही-मखान आ विभिन्न फल-फूल केँ नीक जकाँ सजा क’ पूजा योग्य बनयबाक व्यावहारिक लुइर मात्र महिला लोकनि लग अछि।मिथिलाक अधिकांश पावनि महिला प्रधान अछि, जतय ओ सब कठोर व्रत राखैत छथि। संतानक दीर्घायु लेल ‘जिउतिया’ जँका अत्यंत कठिन निर्जला व्रत करब, पति आ परिवारक सुख-समृद्धि लेल ‘मधुश्रावणी’ या ‘वटसावित्री’ करब, आ लोक-कल्याण लेल ‘छठि’ मैयाक आराधना करब—एहिसँ सिद्ध होइत अछि जे महिला लोकनि अपन सुख केँ त्यागि क’ पूरा परिवारक आत्मिक रक्षा कवच बनैत छथि।
बिना पारम्परिक गीतक मिथिलाक कोनो पावनि नीरस लगैत अछि। पूजाक समय महिला लोकनिक समूह द्वारा गओल गेल भगवतीक गीत, चौरचनक लोकगीत, आ छठि मैयाक कोपि-कोपि बोलबइ हे सुरुजमल… जँका गीत पूरा वातावरण केँ भक्तिमय आ भावुक बना दैत अछि। ई गीत मात्र मनोरंजन नहि, बल्कि हमर संस्कृति केँ जीवंत राखबाक सबसँ पैघ व्यावहारिक माध्यम अछि।गामक बुजुर्ग महिला लोकनि घरक छोट-छोट बच्चा आ नवविवाहिता सभ केँ पावनिक नियम, ओकर पाछू के मुख्य उद्देश्य आ विधि-विधान सिखाबैत छथि। ई महिला लोकनिकेँ व्यावहारिक कुशलता छैक जे शहरक चकाचौंध में रहि क’ सेहो आजुक युवा पीढ़ी अपन गाम आ परंपरा सँ जुड़ल छथि ।
महिला लोकनिक एहि कठिन परिश्रम, त्याग आ असीम श्रद्धाक बिना मिथिलाक कोनो भी पावनि वा ओकर संस्कारक कल्पना असम्भव अछि। ओ सब सही मायने में मिथिलाक सांस्कृतिक धरोहरक असली संरक्षिका छथि।
