लेख विचार
प्रेषित: दिलीप झा ललित
श्रोत: दहेज मुक्त मिथिला समूह
लेखनी के धार ,बृहस्पतिवार साप्ताहिक गतिविधि
विषय :- अन्तःकरणमे कृष्णक जन्म : अन्धकारसँ आत्मप्रकाश धरि
(श्रीकृष्ण जन्माष्टमी)
भारतीय अध्यात्म-परम्परामे भगवान श्रीकृष्णक अवतरण केवल एक दिव्य पुरुषक जन्मकथा नहि, अपितु अधर्मक अन्धकार पर धर्मक प्रकाश, मोह पर विवेक, अहंकार पर प्रेम आ निराशा पर आशाक विजयक सनातन आख्यान अछि। भाद्रपद कृष्णपक्षक अष्टमीक अर्द्धरात्रिमे मथुराक कारागारमे देवकीक गर्भसँ श्रीकृष्णक प्राकट्य भेल ई घटना इतिहासक सीमा लाँघि अध्यात्मिक प्रतीकक रूप धारण करैत अछि।
यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्॥
श्रीमद्भगवद्गीताक ई उद्घोष स्पष्ट करैत अछि जे परमात्माक अवतरणक हेतु केवल दुष्टक विनाश नहि, बल्कि धर्मक पुनर्स्थापना आ साधुजनक संरक्षण सेहो अछि। अतः जन्माष्टमी वास्तवमे बाह्य उत्सवसँ बेसी अन्तःकरणमे कृष्ण-चेतनाक जन्मक पावन पर्व अछि।
श्रीकृष्णक जन्म अर्द्धरात्रिमे भेल। चारू दिस घोर अन्धकार, कारागारक कठोर बन्धन, अत्याचारी कंसक आतंक आ देवकी-वसुदेवक असह्य पीड़ा एहि समस्त प्रतिकूलताक मध्यमे परम प्रकाशक उदय होइत अछि। ई दृश्य अत्यन्त गम्भीर आध्यात्मिक संकेत दैत अछि।
कारागार केवल मथुराक नहि, मनुष्यक अन्तःकरणक सेहो प्रतीक अछि। कंस केवल एक ऐतिहासिक अत्याचारी नहि, बल्कि मनमे पलैत भय, अहंकार, लोभ आ क्रूरताक प्रतीक अछि। देवकीक गर्भ चेतनाक पवित्र आधार अछि आ वसुदेव सत्यक प्रतीक। जखन मनुष्यक भीतर अधर्मक अन्धकार घना भऽ जाइत अछि, तखन सत्यक गर्भमे दिव्य चेतनाक जन्म होइत अछि। एहि कारणे कृष्णक जन्म अन्धकारक अन्त नहि, अन्धकारक मध्यसँ प्रकाशक आरम्भ अछि।
भागवत-परम्परामे देवकी आ वसुदेवक तपस्या, श्रद्धा आ समर्पण कृष्णावतारक दिव्य पृष्ठभूमि निर्मित करैत अछि। परमात्माक प्राकट्य लेल केवल बाहरी साधन पर्याप्त नहि बल्कि अन्तःकरणक निर्मलता, तप, श्रद्धा आ पूर्ण समर्पण आवश्यक अछि।
वसुदेवक हाथमे नवजात कृष्ण आ सामने यमुनाक प्रचण्ड प्रवाह ई दृश्य भारतीय अध्यात्ममे समर्पणक अद्भुत प्रतीक अछि। जखन मनुष्य सत्यक भार अपन माथपर स्वीकार करैत अछि, तखन प्रकृति सेहो ओकर मार्ग प्रशस्त करैत अछि। यमुनाक प्रवाह बाधा छल, मुदा कृष्णक चरणस्पर्शसँ सेतु बनि गेल। अर्थात जतय विश्वास अछि, ततय मार्गक सम्भावना सेहो अछि।
श्रीकृष्णक व्यक्तित्व एकरूपी नहि, बहुआयामी अछि। ओ बालक छथि, गोपाल छथि, मुरलीधर छथि, सखा छथि, प्रेमक आराध्य छथि, रणभूमिक सारथी छथि आ विश्वरूपक उद्घाटक सेहो छथि।
वृन्दावनमे कृष्ण प्रेमक दर्शन दैत छथि, मथुरामे अन्यायक प्रतिरोधक आदर्श प्रस्तुत करैत छथि, द्वारकामे राजधर्म आ लोकव्यवस्थाक आदर्श देखबैत छथि, आ कुरुक्षेत्रमे कर्मयोग आ आत्मज्ञानक अमर संदेश प्रदान करैत छथि। एहि कारणे कृष्ण केँ केवल मन्दिरक मूर्तिमे सीमित करब हुनकर विराट व्यक्तित्व केँ संकुचित करब होयत।
गीता कहैत अछि…
“कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।”
अर्थात मनुष्यक अधिकार कर्मपर अछि, फलपर नहि। कृष्णक ई उपदेश आधुनिक जीवनमे सेहो समान रूपेण प्रासंगिक अछि। निष्काम कर्म, कर्तव्यनिष्ठा आ परिणामसँ अनासक्ति ई तीनू जीवन केँ कर्मक बन्धनसँ मुक्त करबाक आध्यात्मिक मार्ग प्रशस्त करैत अछि।
कृष्णक मुरली केवल एक वाद्य नहि, ई आत्माक भीतर सँ उठैत दिव्य पुकारक प्रतीक अछि। संसारक कोलाहलमे मनुष्य अपन वास्तविक स्वरूप बिसरि जाइत अछि। कृष्णक मुरली ओकरा पुनः आत्मतत्त्व दिस बजा रहल अछि।
गोपीक कृष्णप्रेम केँ केवल लौकिक श्रृंगारक दृष्टिसँ देखनाइ ओकर आध्यात्मिक गरिमा केँ न्यून करैत अछि। भक्तिक परम्परामे गोपीभाव जीवात्माक परमात्मामे पूर्ण आत्मसमर्पणक प्रतीक अछि। राधा-कृष्ण सम्बन्धमे प्रेम स्वामित्व नहि, समर्पण अछि; अधिकार नहि, आत्मविसर्जन अछि; दूरी नहि, अन्तरात्माक एकत्व अछि। एहि लेल कृष्णभक्ति प्रेम केँ वासनासँ ऊपर उठा कऽ साधनाक स्वरूप प्रदान करैत अछि।
गोवर्धनधारणक प्रसंग सेहो अत्यन्त गहन प्रतीकात्मकता सँ भरल अछि। इन्द्रक अहंकारक सम्मुख कृष्ण प्रकृति, ग्रामसमाज आ सामूहिक आस्थाक पक्षमे ठाढ़ होइत छथि। गोवर्धन पर्वत केवल एक पर्वत नहि, बल्कि प्रकृति-पूजा, पर्यावरणीय चेतना आ सामुदायिक एकताक प्रतीक रूपमे देखल जा सकैत अछि।
कृष्णक करांगुलीपर गोवर्धन उठल ई चमत्कारक दृश्य मात्र नहि, ई संदेश अछि जे दैवी शक्ति जखन लोकमंगलक पक्षमे सक्रिय होइत अछि, तखन असम्भव सेहो सम्भव भऽ जाइत अछि।
श्रीकृष्णक सर्वाधिक विराट स्वरूप कुरुक्षेत्रमे उद्घाटित होइत अछि। अर्जुन मोह, विषाद आ कर्तव्य-संशयमे डूबल छथि। हाथमे गांडीव छैन्ह, मुदा मनमे दुर्बलता। तखन कृष्ण सारथी बनैत छथि। ई तथ्य अत्यन्त अर्थपूर्ण अछि परमात्मा राजा बनि नहि, सारथी बनि मनुष्यक जीवनक रथ चलबैत छथि।
गीता द्वारा कृष्ण अर्जुन केँ आत्मा, कर्म, ज्ञान, योग, भक्ति आ मोक्षक रहस्य बुझबैत छथि। अन्ततः अर्जुन कहैत छथि “नष्टो मोहः स्मृतिर्लब्धा त्वत्प्रसादान्मयाच्युत।” अर्थात मोह नष्ट भेल, स्मृति पुनः प्राप्त भेल। यैह कृष्णक वास्तविक विजय अछि बाहरी युद्ध जितबासँ पहिने मनुष्यक भीतरक मोह पर विजय।
आजुक समयमे जन्माष्टमीक वास्तविक सार केवल व्रत, पूजा, झाँकी आ उत्सवधर्मितामे नहि, बल्कि कृष्णक आदर्श केँ जीवनमे उतारबामे अछि।
जखन मनमे द्वेषक स्थान पर प्रेम जन्म लैक, जखन अन्यायक स्थान पर न्याय ठाढ़ रहैक, जखन मोहक स्थान पर विवेक जागृत होइक, जखन स्वार्थक स्थान पर लोकमंगलक भावना विकसित होइक, आ जखन कर्म फलाकांक्षासँ मुक्त भऽ कर्तव्यक रूप धारण करय तखन बुझू जे मनुष्यक भीतर कृष्णक जन्म भेल। कृष्ण जन्माष्टमीक वास्तविक दीप बाहरक दीपसँ नहि, अन्तःकरणक अज्ञानान्धकार हटेबाक दीप अछि।
श्रीकृष्णक जन्म एक कालविशेषमे घटित दिव्य घटना होइतहुँ कालातीत आध्यात्मिक सत्यक उद्घोष अछि। कंसक कारागारसँ वृन्दावनक मधुरिमा, गोवर्धनसँ कुरुक्षेत्र धरि कृष्णक सम्पूर्ण जीवन मनुष्य केँ एकहि दिशा देखबैत अछि धर्म, प्रेम, कर्म, विवेक आ आत्मसमर्पणक दिशा।
कृष्ण कहैत छथि “सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।” ई मात्र शरणागति पलायन नहि, अपितु अहंकारक विसर्जन अछि। कृष्णमे शरण लेबक अर्थ जीवनक कर्तव्यसँ विमुख भेनाइ नहि, बल्कि कर्तव्य केँ ईश्वरार्पित भावसँ सम्पन्न केनाइ अछि।
अतः जन्माष्टमीक पावन रात्रिमे केवल मन्दिरक घण्टी नहि बाजय, मनक अन्तरतममे चेतनाक मुरली सेहो गूँजि उठय।
मात्र कृष्णक जन्मोत्सव नहि मनाबी, अपन भीतरक कृष्ण केँ सेहो जागृत करी।
जतय अधर्मक अन्धकार अछि, ततय धर्मक दीप जराबी, जतय द्वेष अछि, ततय प्रेमक मुरली बजाबी, जतय मोह अछि, ततय गीताक ज्ञान जगाबी तखनहि श्रीकृष्ण जन्माष्टमीक उत्सव अपन वास्तविक आध्यात्मिक पूर्णता प्राप्त करत।
कृष्णं वन्दे जगद्गुरुम्।
🙏🙏
✍️ दिलीप झा “ललित”
