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मोबाइले जेकाँ संबंधक ताग कें चार्ज करैत रहब बड्ड आवश्यक अछि

17 भ्यूज

लेख विचार
प्रेषित: दिलीप झा ललित
श्रोत: दहेज मुक्त मिथिला समूह
लेखनी के धार ,बृहस्पतिवार साप्ताहिक गतिविधि
विषय :- बढैत नेटवर्क आऽ घटैत संबंध

ई कलियुगो बड़ विचित्र अछि। पहिने गाममे ककरो घर धुँआ उठैत देखैत लोक पूछैत छल “भाई, सभ कुशल-मंगल तऽ अछि?” आब घरमे धुँआ उठए कि आगि लगए, लोक पहिने मोबाइल निकालि रील बनबैत अछि “ब्रेकिंग न्यूज!” कहि पोस्ट करैत अछि।
विज्ञानक कृपासँ दुनियाँ मुठ्ठीमे समा गेल, मुदा परिवार आँखिक सामने रहितो मनसँ दूर भऽ गेल। मोबाइलक नेटवर्क पाँच डंडी देखबैत अछि, मुदा अपनापनक नेटवर्क बरसौँ सँ “नो सिग्नल” पर अटकल अछि।
ई सोचैत- सोचैत हम चौपाल पर पहुँचलहुँ। ओतहि पढुआऽ क्कका पान चबबैत, गमछा झाड़ैत आऽ समाजक एक्स-रे करैत बैसल छलाह।
हम प्रणाम कयलियनि।
पढुआऽ क्कका कहलनि “बैसू बौआ। तोहर चेहरा देखिते बुझा गेल जे रिचार्ज खत्म भऽ गेल।”
हम कहलियनि “पढुआऽ क्कका, मोबाइलमे नहि, जेबमे बैलेंस नहि अछि।”
पढुआऽ क्कका हँसि पड़लाह “दुनू एक्के बात छै। आब गरीब ओ नहि जे पइसा विहीन अछि, गरीब ओ अछि जकर मोबाइलमे डेटा नहि अछि।”
चौपाल ठहाकासँ गूँजि उठल।
एहि बीच एकटा युवक अबैत-अबैत मोबाइलमे एहन घुसल छल जे सीधा बाँसक खूट्टासँ टकरा गेल।
पढुआऽ क्कका कहलनि “देखलह? पहिने लोक भाग्यसँ टकराइत छल, आब खूट्टासँ।”
युवक उठिते पहिने अपन माथ नहि, मोबाइल देखलक।
पढुआऽ क्कका बजला “वाह रे आधुनिकता! माथ फुटए तऽ चलत, स्क्रीन नहि फुटए।”
सभ हँसैत-हँसैत दोबर।
एतबे मे पढुआऽ काकी आबि कहलखिन “सुनैत छी, चलू, भोजन तैयार अछि।”
पढुआऽ क्कका कहलनि “आबैत छी।”
पढुआऽ काकी पाँच मिनट ठाढ़ रहली, मुदा पढुआऽ क्कका फेसबुक पर “बस पाँच मिनट” लिखैत रहलाह।
पढुआऽ काकी झल्ला कऽ कहली “हमरा संग बात करबाक समय नहि, मुदा फेसबुकक अनजान छौरीक फोटो पर ‘वाह! अद्भुत!!’ लिखबाक फुरसत छै।”
पढुआऽ क्कका धीरेसँ कहलनि “घरमे सत्य बाजब खतरनाक होइत छै।”
सभ फेर हँसी सँ लोटपोट।
पढुआऽ क्कका फेर कथा शुरू केलनि
“हमर पड़ोसीक बेटा विदेशमे अछि। प्रतिदिन वीडियो कॉल करैत अछि। एक दिन पूछलक ‘पापा, दवाई खा लेलहुँ?’
बाप कहलक ‘बेटा, तोहर आवाज सुनि लेलहुँ, एतबे दवाई पर्याप्त अछि।’
बाँकी बेटा कहलक ‘ठीक छै, आब मीटिंग छै। बाई।’
बापक आँखि भीजल रहि गेल।”
पढुआऽ क्कका गमछासँ नाक पोछि फेर ठठा मारि कहलनि
“ई भेल डिजिटल स्नेह।”
एक दिन विवाहमे गेलहुँ।
बर-कनियाँ मंच पर बैसल छल।

फोटोग्राफर चिचियाइत छल
“सर, स्माइल प्लीज!”
कनियाँ हँसलि।
फेर कहलक
“आब वरक दिस देखू।”
फेर
“आब मोबाइल दिस देखू।”
पढुआऽ क्कका कहला
“लगैत अछि विवाह वर-कनियाँक नहि, कैमरा संग होइत अछि।”
एकटा बच्चा कनैत छल।
दादी कोरामे लऽ कथा सुनाबऽ लगली
“एक छल राजा…”
बच्चा मोबाइल मंगैत कहलक
“ई कहानी यूट्यूब पर अछि?”
दादी हमरा दिस तकैत कहली
“बौआ, आब हमरो अपडेट कराबऽ पड़त।”
पढुआऽ क्कका कहला
“पहिने दादी पोताकेँ संस्कार सिखबैत छलीह, आब पोता दादीकेँ पासवर्ड सिखबैत अछि।”
सभ कियो ठहाका लगबैत रहल।
एहि बीच गाममे बिजली चलि गेल।
सभक चेहरापर अन्हार छा गेल।
हम सोचलहुँ गरमीसँ परेशान छथि।
पढुआऽ क्कका कहलनि
“गरमीसँ नहि, मोबाइलमे बैटरी तीन प्रतिशत बचल छै।”
एकटा युवक हाथ जोड़ि आकाश दिस देखैत छल।
हम पूछलियैक
“भगवानसँ प्रार्थना?”
ओ कहलक
“हे विद्युत देव! जल्दी दर्शन दिअ।”
पढुआऽ क्कका कहलनि
“पहिने लोक इन्द्र देवताकेँ वर्षाक लेल मनबैत छल, आब बिजली बोर्डकेँ चार्जक लेल।”
सभ फेर लोटपोट।
पढुआऽ क्कका अन्तिम बाण छोड़लनि
“एक दिन सुनलहुँ जे ककरो मृत्यु भऽ गेलनि। सोचलहुँ, चलू शोक व्यक्त करी। ओतए पहुँचलहुँ तँ आधा लोक दिवंगतक चेहरासँ बेसी अपन सेल्फी पर ध्यान दैत छल। एकटा तऽ लिखलक ‘फीलिंग सैड विथ फैमिली।'”
पढुआऽ क्कका गमछा पटकैत कहलनि
“ई समाज दुखमे कम, पोस्टमे बेसी जीवैत अछि।”
क्षणभरि लेल चौपाल मौन भऽ गेल।
तखन पढुआऽ क्कका धीरेसँ बजला
“बेटा, मोबाइलक नेटवर्क जतेक बढ़ैत जाए, ततेक मनुष्यक हृदयक नेटवर्क कमजोर नहि होमय। नहि तँ एक दिन एहन समय आयत जे घरमे चार्जर चारिटा रहत, मुदा कन्धा देबाक लेल चारि गोटे नहि भेटत।”
तकनीक जीवनक सुविधा अछि, जीवनक विकल्प नहि। मोबाइल, इंटरनेट आऽ सोशल मीडिया ज्ञान, व्यवसाय आऽ सम्पर्कक उत्कृष्ट साधन अछि, मुदा जखन ई अपन परिवार, मित्र, पड़ोसी आऽ बुजुर्गसँ दूरीक कारण बनि जाइत अछि, तखन समाजक आत्मा कमजोर पड़ि जाइत अछि।
आइ आवश्यकता एहि बातक अछि जे मोबाइलक स्क्रीनसँ कनेक समय निकालि कऽ माता-पिता संग बैसी, दादा-दादीक खिस्सा पिहानी सुनी, पड़ोसीक कुशल पूछी आऽ मित्रक हाथ धरी। मनुष्यक असली नेटवर्क टावरसँ नहि, व्यवहारसँ बनैत अछि, डेटा पैकसँ नहि, प्रेम आऽ विश्वाससँ चलैत अछि।
मोबाइल चार्ज करब आवश्यक अछि, मुदा संबंध चार्ज करब ताहूसँ बेसी आवश्यक अछि।
जँ ई बात बुझि लेलहुँ, तँ बढ़ैत नेटवर्कक संग-संग संबंध सेहो सुदृढ़ रहत, आऽ समाजमे अपनापनक सिग्नल कखनो कमजोर नहि पड़त।

 

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