लेख विचार
प्रेषित: सुष्मिता झा
श्रोत: दहेज मुक्त मिथिला समूह
लेखनी के धार ,बृहस्पतिवार साप्ताहिक गतिविधि
विषय :- मधुश्रावणी पावैन केँ महत्व
मधुश्रावणी : मिथिलाक संस्कार, सुहाग आ स्नेहक पावन पर्व
जतय परंपरा पीढ़ीसँ पीढ़ी प्रेमक संग जीवित रहैत अछि, जतय लोकगीतमे संस्कृतिक स्वर गूँजैत अछि, आ जतय नवविवाहिताक जीवन संस्कारक आलोकसँ आलोकित होइत अछि, ओतहि मिथिलाक पावन लोकपर्व मधुश्रावणी अपन अनुपम स्वरूपमे देखाइत अछि।”
मिथिलाक समृद्ध सांस्कृतिक परंपरामे मधुश्रावणी एक अत्यन्त पावन आ महत्वपूर्ण लोकपर्व अछि। ई केवल नवविवाहिताक व्रत नहि, बल्कि प्रेम, विश्वास, संस्कार, लोकआस्था आ पारिवारिक एकताक अनुपम उत्सव अछि। सावन मासक हरियरी, रिमझिम वर्षा, माटिक सोन्हगर सुगंध आ लोकगीतक मधुर स्वर एहि पर्वकेँ विशेष आकर्षण प्रदान करैत अछि।
विवाहक बाद पहिल सावनमे नवविवाहिता अपन नैहर आबि श्रद्धा आ उत्साहसँ मधुश्रावणी मनबैत छथि। परंपरानुसार सासुरसँ पूजाक सामग्री, वस्त्र आ अन्य मंगल वस्तु नैहर पठाओल जाइत अछि। नैहरमे घरक ज्येष्ठ महिला सभ हुनका पूजा-विधि, लोकाचार आ गृहस्थ जीवनक संस्कार सिखबैत छथि। एहि अवसर पर नैहर आ सासुरक प्रेम, सम्मान, सहयोग आ आत्मीय सम्बन्ध आरो सुदृढ़ बनैत अछि।
एहि पर्वमे भगवान शिव आ माता गौरीक पूजा विशेष श्रद्धासँ कयल जाइत अछि। नवविवाहिता अपन पति केर दीर्घायु, सुखी दाम्पत्य जीवन, परिवारक सुख-समृद्धि आ अखंड सौभाग्यक कामना करैत छथि। मधुश्रावणीक कथा सभ प्रेम, धैर्य, विश्वास, कर्तव्य, सहनशीलता आ पारिवारिक मेल-जोलक सुन्दर शिक्षा दैत अछि।
मधुश्रावणी केवल सुहाग आ संस्कारक पर्व नहि, बल्कि प्रकृति, पर्यावरण आ लोकआस्थाक अनुपम संगम सेहो अछि। एहि पावन अवसर पर माता विषहरी आ नाग देवताक पूजा विशेष श्रद्धासँ कयल जाइत अछि। मिथिलाक लोकविश्वास अनुसार माता विषहरी अपन भक्तसभकेँ सर्पदंश, रोग-व्याधि आ अनेक विपत्तिसँ रक्षा करैत छथि, जखनकि नाग-पूजा प्रकृतिक प्रत्येक जीवप्रति आदर आ सह-अस्तित्वक भावकेँ प्रकट करैत अछि।मिथिलाक पूर्वजसभ एहि परंपराक माध्यमसँ प्रकृतिक संरक्षण, जीव-जंतुप्रति करुणा आ पर्यावरणक संतुलनक संदेश पीढ़ीसँ पीढ़ी पहुँचबैत एलाह। आइ, जखन पर्यावरण अनेक चुनौतीसँ गुजरि रहल अछि, तखन मधुश्रावणीक ई शिक्षा आरो महत्वपूर्ण भऽ जाइत अछि—प्रकृतिक सम्मान, प्रत्येक जीवक संरक्षण आ पर्यावरणक रक्षा करब, वास्तवमे जीवनक रक्षा करब अछि।
आधुनिक समयमे बहुतो परंपरा बदलि रहल अछि, मुदा मिथिलाक लोक आइयो श्रद्धा आ गर्वक संग मधुश्रावणीकेँ जीवित रखने छथि। गाम हो वा शहर, देश हो वा विदेश, ई पर्व अपन लोकगीत, संस्कार आ पारिवारिक आत्मीयताक माध्यमसँ नवपीढ़ीकेँ अपन जड़िसँ जोड़ने अछि।
वास्तवमे, मधुश्रावणी केवल एक पर्व नहि, बल्कि मिथिलाक सांस्कृतिक अस्मिता, सुहागक पवित्रता, लोकआस्थाक दृढ़ विश्वास आ प्रकृतिप्रति सम्मानक जीवंत प्रतीक अछि। एहि अमूल्य धरोहरकेँ सहेजि कऽ अगिला पीढ़ी धरि पहुँचाएब हम सभक सामूहिक दायित्व अछि।
