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पन्द्रह दिन धरि चलैत पुजा -पाठक मध्य भरि मधुश्रावनी सासुक देल अन्न ग्रहण कैल जाइत छैक

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लेख विचार
प्रेषित: माला झा
श्रोत: दहेज मुक्त मिथिला समूह
लेखनी के धार ,बृहस्पतिवार साप्ताहिक गतिविधि
#विषय – मधुश्रावणी पावनिक महत्व

मधुश्रावणी पावैन मिथिलाक एकटा बहुत महत्वपूर्ण आ पवित्र १४ दिनक लोक पर्व छी।जे नव विवाहिता स्त्री सभ पति के दीर्घायु आ अखण्ड सौभाग्य लेल व्रत करैत छथि। एहि पावैन
में भगवान शिव ,माता पार्वती, बिसहारा आ विभिन्न लोक कथा सुनल जाइत अछि।ई साओन मास कृष्ण पक्ष पंचमी तिथ स शुक्ल पक्ष तृतीया धरि चलैत छै।
पूजा सामग्री : फूल ,पान ,सुपारी,सिंदूर,गाय के दूध माटी के बिसहारा ! मुख्य कथा में बिसहारा,पृथ्वी जन्म,राजा श्रीकर, आ शिव पार्वती स जुड़ल कथा।
फूल लोड़ीक संग आरंभ होइत अछी मिथिलाक लोक पर्व मधुश्रावणी पावैन।साओन मास अबैत मिथलांचल संस्कृति मे आस पड़ोस में मधुश्रावणी गीत गुनजय लगैत अछी। मधुश्रावणी पावैन के ओरियान में सभ पवनैतिन जुटी जाइत छथि। पति के दीर्घायुक कमाना लेल चौदह दिवसीयक पूजा मिथलांचल संस्कृति मे होइत छै।मिथिला के नव विवाहिता बहुत धूम धाम स दुल्हन के रुप में सजधैज कए हर्ष उल्लास के संग पावैन मनाबैत छथि। मधुश्रावणी पावैन में सन्ध्याक
समय लोड़ल गेल फूल स भोर में पूजा करए स विशेष महत्व छै। सासुरक अन्न, वस्त्र पहिर कए पूजा आरम्भ कएल जाइत छै,संध्या के समय नवविवाहित अपन सखी सहेली संग एकटा समुह बना कए पूजा हेतु बांस के डाली में फूल सजबैत
आ सभ मिल गीतनाद दीर्घायु के कामना करैत छथि। चौदह दिन तक नवविवाहित अपन सासुरक अन्न अरवा भोजन करैत छथि। तपस्याक समान ई पावैन अछि अपन पति के दीर्घायु लेल ।एहि पावैन में दुल्हा जी एनाई अनिवार्य थिक।
सभ दिन अलग अलग तरहक कथा होइत छै ,जेना मैना पंचमी,विषहरी,बिहुला ,मनसा,मंगला गौड़ी पृथ्वी जन्म समुद्र मंथन आ सती कथा पबनैतिन के सुनाएल जाइत छै। व्रत के प्रारंभ दिन स नवविवाहित सासुरक पाठओल सामग्री स चौदह दिन सन्ध्या से पहिने भोजन ग्रहण करैत अछि ।शुरू आ अंतिम दिन अंकुरि बटनाई अनिवार्य थिक।प्रातःकाल के पूजा में गौड़ी गीत , बिसहारा गीत, चनाई गीत, पावैन गीत स पूजा सम्पन्न होइत छै। सन्ध्या के पूजा में साँझ,कोबर गीत,आ शिव पार्वती के गीत गाउल जाइत अछि।सभ दिन पुजा के उपरांत
नवविवाहित सखी सहेलिक संग सजधैज गामक मंदिर, फुलबारी में फूल सजबैत डाली में आ गीत गाबैत उल्लासित रहैत छथि, आ सूर्यास्त स पहिने भोजन ग्रहण करैत छथि।
पूजा स्थल पर मैना पात,केला पात पर सिंदूर ,पिठार, चानन, काजर स बिसहारा लिखल जाइत अछि,दूध, लवा चढ़ायल जाइत अछि। विभिन्न प्रकार के नैवेद्य स पूजा प्रारंभ होइत अछी। पावैन में विशेष रूप स महादेव गौड़ी , विषहरी के पूजा होइत छै।नवविवाहिता के सासूर स विधि विधान में कोनो त्रुटि
नै राखैत अछि। पूजाक अंतिम दिन नवविवाहिता के सासूर स विशेष मात्रा में पावैन के सामग्री आ अनेक प्रकारक मिष्ठान,नव वस्त्र आ जेवर अबैत छै।सावन मास के शुक्ल पक्ष तृतीया तिथि में विशेष पूजा – अर्चनाक संग समाप्त होइत अछी। ओहि दिन गौड़ी, विषहरी, चनाई सभ के पूजा बड़ी विधान स होइत छै।भोर सांझ घंटों गीत गेनाईं आ महत्वपूर्ण बात सभ स ई लगातार चौदह दिन पुजा स्थल पर नवविवाहित के देख– रेख अखण्ड दीप प्रज्वलित रहनाई आ कथा वाचिका सभ दिन नवविवाहिता के मधुश्रावणी वर्तक कथा कहनाई ।
पूजा के समय नवविवाहित नया वस्त्र आभूषण स सुसज्जित भए कथा श्रवण के संग पूजा अर्चना केनाई बहुत कठिन
तपस्या थिक। व्रत के अंतिम दिन नवविवाहिता के टेमी दागै के
परम्परा होइत छै आ सुन्दर दानक परंपरा सेहो होइत अछि।
मिथिलांचल संस्कृति के पीढ़ी दर पीढ़ी जोड़ी कए राखब माता पिता के कर्त्तव्य अछि तखने जीवंत रहत धरोहर ।

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