लेख विचार
प्रेषित: आभा झा अद्विका
श्रोत: दहेज मुक्त मिथिला समूह
लेखनी के धार ,बृहस्पतिवार साप्ताहिक गतिविधि
विषय :– मिथिलाक लुरि-व्यवहार
परंपरा, आत्मनिर्भरता आ संस्कृतिक पहिचान
मिथिला केवल अपन मधुर भाषा, लोकगीत आ पाबनि-तिहार लेल प्रसिद्ध नहि अछि, बल्कि एहि ठामक लुरि-व्यवहार सेहो एकटा समृद्ध सांस्कृतिक धरोहर अछि। ‘लुरि-व्यवहार’क अर्थ अछि—पीढ़ी-दर-पीढ़ी घर-परिवारमे सीखल गेल ओ पारंपरिक ज्ञान, कौशल आ व्यवहार, जे मिथिलाक जीवन-पद्धतिकेँ सहज, आत्मनिर्भर आ संस्कृतिसँ जोड़ने रखैत अछि। ई ज्ञान प्रायः पुस्तकमे नहि, बल्कि दादी-नानीक अनुभव आ माताक हाथक काज सँ अगिला पीढ़ी धरि पहुँचैत रहल अछि।
मिथिलाक गृहिणी सभ अपन घरेलू कौशल लेल सदिखन प्रसिद्ध रहल छथि। ॠतुक अनुसार कुम्हरौड़ी, अदौड़ी, बड़ी, चरौड़ी, आलूक चिप्स, आलू-पापड़ आदि बनाकऽ सुखा कऽ राखब पुरान समयक एकटा महत्वपूर्ण लुरि छल। एहि सभक उपयोग आवश्यकता पड़ला पर कएल जाइत छल। आम, नेबो, मिरचाई, करौंदा, कटहर आदि सँ अचार बनौनाइ सेहो मिथिलाक पाक-परंपराक महत्वपूर्ण अंग अछि। घरमे बनल अचारक स्वादमे केवल मसालाक सुगंध नहि, बल्कि परिवारक स्नेह आ पुरान परंपराक मिठास सेहो बसल रहैत अछि।
मिथिलाक लुरि-व्यवहार केवल भोजन धरि सीमित नहि अछि। मधुबनी चित्रकला एहि संस्कृतिक विलक्षण पहचान अछि। प्राकृतिक रंग, सहज रेखा आ लोकजीवनक विविध प्रसंगक माध्यमसँ चित्र बनौनाइ मिथिलाक स्त्री-शक्ति आ सृजनशीलताक अद्भुत उदाहरण अछि। विवाहक अवसर पर कोहबर चित्र बनौनाइ आ मांगलिक अवसर पर अरिपन देब सेहो एहि ठामक प्राचीन परंपरा अछि। चाउरक पीठार सँ बनल अरिपन घरक आँगनकेँ पवित्रता आ मंगलक भावसँ भरि दैत अछि।
मिथिलामे बाँस, माटि, पात आ अन्य प्राकृतिक सामग्रीसँ उपयोगी वस्तु बनौनाइ सेहो लुरि-व्यवहारक हिस्सा अछि। डाला, सुप, मौनी, टोकरी, माटिक दीप आ बरतन आदि बनौनाइ ग्रामीण जीवनक आत्मनिर्भर परंपराक परिचायक रहल अछि। कपड़ा सिलाइ, कढ़ाइ, ऊन-बुनाइ आ पारंपरिक अलंकरणक कलामे सेहो मिथिलाक स्त्री सभक विशेष योगदान रहल अछि।
पाबनि-तिहार सभ लुरि-व्यवहारकेँ जीवित रखबाक महत्वपूर्ण माध्यम अछि। मधुश्रावणी, वटसावित्री, छइठ, सामा-चकेवा, विवाह आदि अवसर पर बनाओल जाएवाला पकवान, अरिपन, गीत आ मांगलिक सामग्री सभमे मिथिलाक लोकज्ञानक सुन्दर रूप देखाइ पड़ैत अछि। ठेकुआ, पूआ, खाजा, पिरूकिया, दही-चूड़ा आदि व्यंजन केवल भोजन नहि, बल्कि सांस्कृतिक स्मृति सेहो अछि।
आधुनिकताक एहि समयमे बहुत रास पारंपरिक लुरि धीरे-धीरे कम होइत जा रहल अछि। बजारमे तैयार वस्तु सहज उपलब्ध होइत अछि, ताहि कारण घरमे बनौनाइ घटि रहल अछि। मुदा अपन लुरि-व्यवहारकेँ बचेनाइ केवल पुरान रीति बचेनाइ नहि, बल्कि अपन सांस्कृतिक अस्मिता आ आत्मनिर्भरताकेँ सुरक्षित रखनाइ अछि।
एहि लेल आवश्यक अछि जे घरक बूढ़-बुजुर्ग अपन अनुभव नब पीढ़ीकेँ सिखाबथि। विद्यालय, सांस्कृतिक संस्था आ साहित्यिक मंच सभ सेहो एहि लोकज्ञानकेँ प्रोत्साहित करथि। मिथिलाक लुरि-व्यवहारमे श्रम, सृजन, मितव्ययिता, आत्मनिर्भरता आ संस्कारक अद्भुत समन्वय अछि। ई हमर धरोहर अछि, हमर पहिचान अछि आ हमर अगिला पीढ़ीक लेल अमूल्य पूँजी सेहो अछि। मुदा एकर संरक्षण तखने संभव अछि, जखन हम एकरा केवल स्मृतिमे नहि, बल्कि अपन दैनिक जीवनमे सेहो जीवित राखब। अपन लुरिकेँ बचेनाइ अर्थात् अपन जड़िकेँ बचेनाइ—आ जड़ि मजबूत रहत, तँ मिथिलाक सांस्कृतिक वृक्ष सदिखन हरियर रहत।
