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लुरि आ प्रतिभा माने हुनरगर भेने आत्मनिर्भर हेबा मे सहूलियत होइछ

17 भ्यूज

लेख विचार
प्रेषित: सुष्मिता झा
श्रोत: दहेज मुक्त मिथिला समूह
लेखनी के धार ,बृहस्पतिवार साप्ताहिक गतिविधि
विषय :- मिथिलाक लूरि-व्यवहार : हाथक हुनरसँ आत्मनिर्भरता धरि

मिथिला केवल एकटा भौगोलिक क्षेत्र नहि, बल्कि अपन समृद्ध लोकसंस्कृति, परंपरा आ जीवन-पद्धतिसँ जुड़ल एकटा भावभूमि अछि। मिथिलाक माटिमे जतेक अपनापन अछि, ओतेकहि गहिराई एतयक लूरि-व्यवहारमे सेहो अछि। लूरि अर्थात् हाथक हुनर—जे अनुभव, धैर्य, सृजनशीलता आ आत्मनिर्भरता केर सुंदर संगम अछि।

मिथिलाक लूरि-व्यवहारक चर्चा हो आ मिथिलाक नारीक बात नहि हो, ई संभव नहि। मिथिलाक महिलासभ अपन हाथक हुनरसँ घर-आँगनकेँ सजबैत, परिवारक आवश्यकता पूरा करैत आ अपन छोट व्यवसाय सेहो चलबैत रहल छथि। हुनरक संग हुनका सभमे आत्मसम्मान आ आत्मनिर्भरता सेहो रहल अछि।

अचार, पापड़-बड़ी, अदौरी-चरौरी, तिलौरी, सिलाई-कढ़ाई, बुनाई, सुजनी, सिक्की शिल्प आ बाँस-पातक वस्तु निर्माण—ई सभ मिथिलाक लोकजीवनक अभिन्न हिस्सा अछि। दादी-नानीक हाथसँ एक पीढ़ीसँ दोसर पीढ़ी धरि पहुँचल ई हुनर केवल बनाबयक विधि नहि, बल्कि संस्कार, अनुभव आ माटिसँ जुड़ल जीवनक सुगंध सेहो अछि।

मधुबनी चित्रकला एहि लूरिक विश्वप्रसिद्ध उदाहरण अछि। जे कला पहिने घरक भित्ति, कोहबर आ अरिपनमे सिमटल छल, से आइ कागज, वस्त्र आ विभिन्न माध्यमसँ देश-विदेश धरि पहुँचि गेल अछि। माछ, मयूर, कमल, सूर्य, देवी-देवता आ विवाह-संस्कारक प्रतीकसभमे मिथिलाक जीवनक कथा जीवंत भऽ उठैत अछि।

लोकगीत सेहो एक प्रकारक लूरि अछि—शब्द आ भावक लूरि। सोहर, विवाह गीत, समदाउन, कजरी, झिझिया आ पर्व-त्योहारक गीत नव पीढ़ीकेँ अपन इतिहास, संस्कार आ संबंधक परिचय करबैत रहल अछि।

आइ समय बदलि रहल अछि। यदि हाथक हुनर केवल घरक चारि देवालि धरि सीमित रहि जाएत, तऽ ओकरा अगिला पीढ़ी धरि पहुँचेनाइ कठिन भऽ सकैत अछि। प्रशिक्षण, प्रदर्शनी, सोशल मीडिया आ ऑनलाइन बाजारक माध्यमसँ एहि पारंपरिक हुनरकेँ नव पहचान देल जा सकैत अछि। उचित बाजार आ सम्मान भेटलासँ ई हुनर महिलाक आर्थिक सशक्तीकरण आ आत्मनिर्भरता केर मजबूत आधार बनि सकैत अछि।

तेँ आवश्यकता अछि जे हम अपन लूरि-व्यवहारकेँ केवल पुरान परंपरा मानि नहि छोड़ि दी, बल्कि नव पीढ़ीसँ जोड़ि ओकरा नव रूप दी। बच्चासभकेँ लोककला आ पारंपरिक हुनरसँ परिचित कराबी आ युवासभकेँ एहि क्षेत्रमे नव प्रयोग लेल प्रोत्साहित करी।

किएक तँ लूरि केवल हाथक हुनर नहि, ई मिथिलाक माटिसँ जुड़ल स्मृति, पूर्वजक देल ज्ञान आ अपन संस्कृतिक जीवंत पहचान अछि। हुनरमंद हाथकेँ सम्मान आ उचित मूल्य भेटय, महिलाक श्रमक कदर होय आ नव पीढ़ी एहि अमूल्य धरोहरकेँ गर्वसँ आगाँ बढ़ाबय—एहिसँ मिथिलाक ई सुंदर परंपरा सदिखन जीवंत रहत।

जय मिथिला!
जय मैथिली!

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