ऋग्वेद – संहिता
॥ अथ प्रथमं मण्डलम् ॥
[ सूक्त – १ ]
ऋषि मधुच्छन्दा वैश्वामित्र । देवता – अग्नि । छन्द – गायत्री ।
१. ॐ अग्निमीळे पुरोहितं यज्ञस्य देवमृत्विजम् । होतारं रत्नथातमम् ॥ १ ॥
हम अग्निदेव की स्तुति करते हैं । (कैसे अग्निदेव ?) जो यज्ञ (श्रेष्ठतम पारमार्थिक कर्म) के पुरोहित (आगे बढ़ाने वाले), देवता (अनुदान देने वाले), ऋत्विज् (समयानुकूल यज्ञ का सम्पादन करने वाले), होता (देवों का आवाहन करने वाले) और याजकों को रत्नो से (यज्ञ के लाभों से) विभूषित करने वाले हैं ॥१ ॥
I Laud Agni, the chosen Priest, God, minister of sacrifice,
The hotar, lavishest of wealth.
२. अग्निः पूर्वेभिर्ऋषिभिरीड्यो नूतनैरुत । स देवाँ एह वक्षति ॥ २ ॥
जो अग्निदेव पूर्वकालीन ऋषियों (भृगु, अंगिरादि) द्वारा प्रशंसित हैं । जो आधुनिक काल में भी ऋषि कल्प वेदश विद्वानों द्वारा स्तुत्य हैं, वे अग्निदेव इस यज्ञ में देवों का आवाहन करें ॥ २ ॥
Worthy is Agni to be praised by living as by ancient seers.
He shall bring. hitherward the Gods.
३. अग्निना रयिमश्नवत् पोषमेव दिवेदिवे । यशसं वीरवत्तमम् ॥ ३ ॥
(स्तोता द्वारा स्तुति किये जाने पर) ये बढ़ाने वाले अग्निदेव मनुष्यों (यजमानों) को प्रतिदिन विवर्धमान (बढ़ने वाला) धन्, यश एवं पुत्र-पौत्रादि वीर पुरुष प्रदान करने वाले हैं ॥ ३ ॥
Through Agni man obtaineth wealth, yea, plenty waxing day by day,
Most rich in heroes, glorious.
४. अग्ने यं यज्ञमध्वरं विश्वतः परिभूरसि । स इद्देवेषु गच्छति ॥ ४ ॥
हे अग्निदेव । आप सबका रक्षण करने में समर्थ हैं । आप जिस अध्यर (हिंसारहित यज्ञ) को सभी ओर से आवृत किये रहते हैं, वही यज्ञ देवताओं तक पहुँचता है ॥ ४ ॥
Agni, the perfect sacrifice which thou encompassest about
Verily goeth to the Gods.
५. अग्निर्होता कविक्रतुः सत्यश्चित्रश्रवस्तमः । देवो देवेभिरा गमत् ॥ ५ ॥
हे अग्निदेव । आप हवि प्रदाता, ज्ञान और कर्म की संयुक्त शक्ति के प्रेरक, सत्यरूप एवं विलक्षण रूप युक्त हैं । आप देवों के साथ इस यज्ञ में पधारें ॥ ५ ॥
May Agni, sapient−minded Priest, truthful, most gloriously great,
The God, come hither with the Gods.
६. यदङ्ग दाशुषे त्वमग्ने भद्रं करिष्यसि । तवेत्तत् सत्यमङ्गिरः ॥ ६ ॥
हे अग्निदेव ! आप यज्ञ करने वाले यजमान का धन, आवास, संतान एवं पशुओं की समृद्धि करके जो भी कल्याण करते हैं, वह भविष्य में किये जाने वाले यज्ञों के माध्यम से आपको ही प्राप्त होता है ।
Whatever blessing, Agni, thou wilt grant unto thy worshipper,
That, Angiras, is indeed thy truth.
७. उप त्वाग्ने दिवेदिवे दोषावस्तर्थिया वयम् । नमो भरन्त एमसि ॥ ७ ॥
हे जाज्वल्यमान अग्निदेव ! हम आपके सच्चे उपासक हैं । श्रेष्ठ बुद्धि द्वारा आपकी स्तुति करते हैं और दिन-रात, आपका सतत गुणगान करते हैं । हे देव ! हमें आपका सान्निध्य प्राप्त हो ।॥ ७ ॥
To thee, dispeller of the night, O Agni, day by day with prayer
Bringing thee reverence, we come
८. राजन्तमध्वराणां गोपामृतस्य दीदिविम् । वर्धमानं स्वे दमे ॥ ८ ॥
हम गृहस्थ लोग दीप्तिमान्, यज्ञों के रक्षक, सत्यवचनरूप व्रत को आलोकित करने वाले, यज्ञस्थल में वृद्धि को प्राप्त करने वाले अग्निदेव के निकट स्तुतिपूर्वक आते हैं ॥८ ॥
Ruler of sacrifices, guard of Law eternal, radiant One,
Increasing in thine own abode.
९. स नः पितेव सूनवेऽग्ने सूपायनो भव । सचस्वा नः स्वस्तये ॥ ९ ॥
हे गार्हपत्य अग्ने ! जिस प्रकार पुत्र को पिता (बिना बाधा के) सहज ही प्राप्त होता है, उसी प्रकार आप भी (हम यजमानों के लिये) बाधारहित होकर सुखपूर्वक प्राप्त हों । आप हमारे कल्याण के लिये हमारे निकट रहें ॥ ९ ॥
Be to us easy of approach, even as a father to his son:
Agni, be with us for our weal.
क्रमशः…..
हरिः हरः!!
नोटः मैथिली मे सम्पूर्ण वेद केर अनुवाद लेल स्रोत सामग्रीक संकलन मे उपरोक्त दुइ (एक हिन्दी आ दोसर अंग्रेजी) अनुवाद केर अध्ययन आरम्भ कय रहल छी । अपन काज करय सँ पहिने दोसरक काज केँ नीक सँ पढ़नाय-गुननाय बहुत आवश्यक अछि । संस्कृतक पूरा ज्ञान रहितय त सीधा मैथिली मे जा सकैत छलहुँ, तैयो गुरुवर्गक कार्य केँ बिना पढ़ने-बुझने अपन जुइत नहि जोतबाक चाही, ताहि अनुशासन केँ अनुकरण करैत बढ़ि रहल छी ।
हरिः हरः!!
[ सूक्त – २ ]
[ऋषि – मधुच्छन्दा वैश्वामित्र । देवता – १-३ वायु, ४-६ – इन्द्र-वायुः ७-९ मित्रावरुण। छन्द-गायत्री ।]
१०. वायवा याहि दर्शतेमे सोमा अरंकृताः । तेषां पाहि श्रुधी हवम् ॥ १ ॥
हे प्रियदर्शी वायुदेव ! हमारी प्रार्थना को सुनकर आप यज्ञस्थल पर आयें । आपके निमित सोमरस प्रस्तुत है, इसका पान करें ॥१ ॥
BEAUTIFUL Vayu, come, for thee these Soma drops have been prepared:
Drink of them, hearken to our call.
११. वाय उक्थेभिर्जरन्ते त्वामच्छा जरितारः । सुतसोमा अहर्विदः ॥ २ ॥
हे वायुदेव ! सोमरस तैयार करके रखने वाले, उसके गुणों को जानने वाले स्तोतागण स्तोत्रों में आपकी उत्तम प्रकार से स्तुति करते हैं ॥ २ ॥
Knowing the days, with Soma juice poured forth, the singers glorify
Thee, Vayu, with their hymns of praise.
१२. वायो तव प्रपृञ्चती धेना जिगाति दाशुषे । उरूची सोमपीतये ॥ ३ ॥
हे वायुदेव ! आपकी प्रभावोत्पादक वाणी, सोमयाग करने वाले सभी यजमानों की प्रशंसा करती हुई एवं सोमरस का विशेष गुण-गान करती हुई, सोमरस पान करने की अभिलाषा से दाता (यजमान) के पास पहुँचती है ॥ ३ ॥
Vayu, thy penetrating stream goes forth unto the worshipper,
Far−spreading for the Soma draught.
१३. इन्द्रवायू इमे सुता उप प्रयोभिरा गतम् । इन्दवो वामुशन्ति हि ॥ ४ ॥
हे इन्द्रदेव ! हे वायुदेव ! यह सोमरस आपके लिये अभिषुत किया (निचोड़ा) गया है । आप अन्नादि पदार्थों के साथ यहाँ पधारें, क्योंकि यह सोमरस आप दोनों की कामना करता है ॥ ४ ॥
These, Indra−Vayu, have been shed; come for our offered dainties’ sake:
The drops are yearning for you both.
१४. वायविन्द्रश्च चेतथः सुतानां वाजिनीवसू । तावा यातमुप द्रवत् ॥ ५ ॥
हे वायुदेव ! हे इन्द्रदेव ! आप दोनों अन्नादि पदार्थों और धन से परिपूर्ण हैं एवं अभिषुत सोमरस की विशेषता को जानते हैं । अतः आप दोनों शीघ्र ही इस यज्ञ में पदार्पण करें ॥ ५ ॥
Well do ye mark libations, ye Vayu and Indra, rich in spoil
So come ye swiftly hitherward.
१५. वायविन्द्रश्च सुन्वत आ यातमुप निष्कृतम् । मक्ष्वि१ त्था धिया नरा ॥ ६ ॥
हे वायुदेव ! हे इन्द्रदेव ! आप दोनों बड़े सामर्थ्यशाली हैं । आप यजमान द्वारा बुद्धिपूर्वक निष्पादित सोम के पास अति शीघ्र पधारें ॥ ६ ॥
Vayu and Indra, come to what the Soma. presser hath prepared:
Soon, Heroes, thus I make my prayer.
१६. मित्रं हुवे पूतदक्षं वरुणं च रिशादसम् । धियं घृताचीं साधन्ता ॥ ७ ॥
घृत के समान प्राणप्रद वृष्टि-सम्पन्न कराने वाले मित्र और वरुण देवों का हम आवाहन करते हैं । मित्र हमें बलशाली बनायें तथा वरुणदेव हमारे हिंसक शत्रुओं का नाश करें ॥ ७ ॥
Mitra, of holy strength, I call, and foe−destroying Varuna,
Who make the oil−fed rite complete.
१७. ऋतेन मित्रावरुणावृतावृद्धावृतस्पृशा । क्रतुं बृहन्तमाशाथे ॥ ८ ॥
सत्य को फलितार्थ करने वाले सत्ययज्ञ के पुष्टिकारक देव मित्रावरुणो ! आप दोनों हमारे पुण्यदायी कार्यों (प्रवर्त्तमान सोमयाग) को सत्य से परिपूर्ण करें ॥ ८ ॥
Mitra and Varuna, through Law, lovers and cherishers of Law,
Have ye obtained your might power
१८. कवी नो मित्रावरुणा तुविजाता उरुक्षया । दक्षं दधाते अपसम् ॥ ९ ॥
अनेक कर्मों को सम्पन्न कराने वाले विवेकशील तथा अनेक स्थलों में निवास करने वाले मित्रावरुण हमारी क्षमताओं और कार्यों को पुष्ट बनाते हैं ॥ ९ ॥
Our Sages, Mitra−Varuna, wide dominion, strong by birth,
Vouchsafe us strength that worketh well.
[ सूक्त – ३]
[ऋषि – मधुच्छन्दा वैश्वामित्र । देवता – १-३ अश्विनीकुमार, ४-६ इन्द्र, ७-९ विश्वेदेवा, १०-१२ सरस्वती । छन्द-गायत्री ॥]
१९. अश्विना यज्वरीरिषो द्रवत्पाणी शुभस्पती । पुरुभुजा चनस्यतम् ॥ १ ॥
हे विशालबाहो ! शुभ कर्मपालक, द्रुतगति से कार्य सम्पन्न करने वाले अश्विनीकुमारो ! हमारे द्वारा समर्पित हविष्यान्नों से आप भली प्रकार सन्तुष्ट हों ॥ १ ॥
YE Asvins, rich in treasure, Lords of splendour, having nimble hands,
Accept the sacrificial food.
२०. अश्विना पुरुदंससा नरा शवीरया धिया । धिष्ण्या वनतं गिरः ॥ २ ॥
असंख्य कर्मों को सम्पादित करने वाले, धैर्य धारण करने वाले, बुद्धिमान् हे अश्विनीकुमारो ! आप अपनी उत्तम बुद्धि से हमारी वाणियों (प्रार्थनाओं) को स्वीकार करें ॥ २ ॥
Ye Asvins, rich in wondrous deeds, ye heroes worthy of our praise,
Accept our songs with mighty thought.
२१. दस्त्रा युवाकवः सुता नासत्या वृक्तबर्हिषः । आ यातं रुद्रवर्तनी ॥ ३ ॥
रोगों को विनष्ट करने वाले, सदा सत्य बोलने वाले रुद्रदेव के समान (शत्रु संहारक) प्रवृत्ति वाले, दर्शनीय हे अश्विनीकुमारो ! आप यहाँ आयें और बिछी हुई कुशाओ पर विराजमान होकर प्रस्तुत संस्कारित सोमरस का पान करे ॥ ३ ॥
Nisatyas, wonder−workers, yours arc these libations with clipt grass:
Come ye whose paths are red with flame.
२२. इन्द्रा याहि चित्रभानो सुता इमे त्वायवः। अण्वीभिस्तना पूतासः ॥ ४ ॥
हे अद्भुत दीप्तिमान् इन्द्रदेव ! अँगुलियों द्वारा स्रवित, श्रेष्ठ पवित्रतायुक्त यह सोमरस आपके निमित्त है। आप आयें और सोमरस का पान करें ॥ ४ ॥
O Indra marvellously bright, come, these libations long for thee,
Thus by fine fingers purified.
२३. इन्द्रा याहि धियेषितो विप्रजूतः सुतावतः । उप ब्रह्माणि वाघतः ॥ ५ ॥
हे इन्द्रदेव ! श्रेष्ठ बुद्धि द्वारा जानने योग्य आप, सोमरस प्रस्तुत करते हुये ऋत्विजों के द्वारा बुलाये गये हैं । उनकी स्तुति के आधार पर आप यज्ञशाला में पधारें ॥ ५ ॥
Urged by the holy singer, sped by song, come, Indra, to the prayers,
Of the libation−pouring priest.
२४. इन्द्रा याहि तूतुजान उप ब्रह्माणि हरिवः । सुते दधिष्व नश्चनः ॥ ६ ॥
हे अश्वयुक्त इन्द्रदेव ! आप स्तवनों के श्रवणार्ध एवं इस यज्ञ में हमारे द्वारा प्रदत्त हवियों का सेवन करने के लिये यज्ञशाला में शीघ्र ही पधारें ॥ ६ ॥
Approach, O Indra, hasting thee, Lord of Bay Horses, to the prayers.
In our libation take delight.
२५. ओमासश्चर्षणीधृतो विश्वे देवास आ गत । दाश्वांसो दाशुषः सुतम् ॥ ७ ॥
हे विश्वेदेवो ! आप सबकी रक्षा करने वाले, सभी प्राणियों के आधारभूत और सभी को ऐश्वर्य प्रदान करने वाले हैं । अतः आप इस सोम युक्त हवि देने वाले यजमान के यज्ञ में पधारें ॥ ७ ॥
Ye Visvedevas, who protect, reward, and cherish men, approach
Your worshipper’s drink−offering.
२६. विश्वे देवासो अप्तुरः सुतमा गन्त तूर्णयः । उस्त्रा इव स्वसराणि ॥ ८ ॥
समय-समय पर वर्षा करने वाले हे विश्वेदेवो ! आप कर्म कुशल और द्रुतगति से कार्य करने वाले हैं; आप सूर्य-रश्मियों के सदृश गतिशील होकर हमें प्राप्त हो ॥ ८ ॥
Ye Visvedevas, swift at work, come hither quickly to the draught,
As milch−kine hasten to their stalls.
२७. विश्वे देवासो अस्त्रिध एहिमायासो अद्रुहः । मेधं जुषन्त वह्रयः ॥ ९ ॥
हे विश्वेदेवो ! आप किसी के द्वारा बध न किये जाने वाले, कर्म-कुशल, द्रोहरहित और सुखप्रद हैं । आप हमारे यज्ञ में उपस्थित होकर हवि का सेवन करें ॥ ९ ॥
The Visvedevas, changing shape like serpents, fearless, void of guile,
Bearers, accept the sacred draught.
२८. पावका नः सरस्वती वाजेभिर्वाजिनीवती । यज्ञं वष्टु धियावसुः ॥ १० ॥
पवित्र बनाने वाली, पोषण देने वाली, बुद्धिमत्तापूर्वक ऐश्वर्य प्रदान करने वाली देवी सरस्वती ज्ञान और कर्म से हमारे यज्ञ को सफल बनाये ॥ १० ॥
Wealthy in spoil, enriched with hymns, may bright Sarsavati desire,
With eager love, our sacrifice.
२९. चोदयित्री सूनृतानां चेतन्ती सुमतीनाम् । यज्ञं दधे सरस्वती ॥ ११ ॥
सत्यप्रिय (वचन) बोलने की प्रेरणा देने वाली, मेधावी जनों को यज्ञानुष्ठान की प्रेरणा (मति) प्रदान करने वाली देवी सरस्वती हमारे इस यज्ञ को स्वीकार करके हमें अभीष्ट वैभव प्रदान करें ॥ ११ ॥
Inciter of all pleasant songs, inspirer o all gracious thought,
Sarasvati accept our rite.
३०. महो अर्णः सरस्वती प्र चेतयति केतुना । थियो विश्वां वि राजति ॥ १२ ॥
जो देवी सरस्वती नदी-रूप में प्रभूत जल को प्रवाहित करती हैं । वे सुमति को जगाने वाली देवी सरस्वती सभी याजकों की प्रज्ञा को प्रखर बनाती हैं ॥ १२ ॥
Sarasvati, the mighty flood, − she with be light illuminates,
She brightens every pious thought.
[ सूक्त – ४]
[ऋषि – मधुच्छन्दा वैश्वामित्र । देवता – इन्द्र । छन्द-गायत्री । ]
३१. सुरूपकृत्नुमूतये सुदुघामिव गोदुहे । जुहूमसि द्यविद्यवि ॥ १ ॥
(गो दोहन करने वाले के द्वारा) प्रतिदिन मधुर दूध प्रदान करने वाली गाय को जिस प्रकार बुलाया जाता है, उसी प्रकार हम अपने संरक्षण के लिये सौन्दर्यपूर्ण यज्ञकर्म सम्पन्न करने वाले इन्द्रदेव का आवाहन करते हैं ॥ १ ॥
As a good cow to him who milks, we call the doer of fair deeds,
To our assistance day by day.
३२. उप नः सवना गहि सोमस्य सोमपाः पिब । गोदा इद्रेवतो मदः ॥ २ ॥
सोमरस का पान करने वाले हे इन्द्रदेव ! आप सोम ग्रहण करने हेतु हमारे सवन-यज्ञों में पधार कर, सोमरस पीने के बाद प्रसन्न होकर याजकों को यश, वैभव और गौएँ प्रदान करें ॥ २ ॥
Come thou to our libations, drink of Soma, Soma-drinker thou!
The rich One’s rapture giveth kine.
३३. अथा ते अन्तमानां विद्याम सुमतीनाम् । मा नो अति ख्य आ गहि ॥ ३ ॥
सोमपान कर लेने के अनन्तर हे इन्द्रदेव ! हम आपके अत्यन्त समीपवत्तों श्रेष्ठ प्रज्ञावान् पुरुषों की उपस्थिति में रहकर आपके विषय में अधिक ज्ञान प्राप्त करें । आप भी हमारे अतिरिक्त अन्य किसी के समक्ष अपना स्वरूप प्रकट न करें (अर्थात् अपने विषय में न बताएं) ॥ ३ ॥
So may we be acquainted with thine innermost benevolence:
Neglect us not, come hitherward.
३४. परेहि विग्रमस्तृतमिन्द्रं पृच्छा विपश्चितम् । यस्ते सखिभ्य आ वरम् ॥ ४ ॥
हे ज्ञानवानो ! आप उन विशिष्ट बुद्धि वाले, अपराजेय इन्द्रदेव के पास जाकर मित्रों-बन्धुओं के लिये घन-ऐश्वर्य के निमित्त प्रार्थना करें ॥ ४ ॥
Go to the wise unconquered One, ask thou of Indra, skilled in song,
Him who is better than thy friends.
३५. उत ब्रुवन्तु नो निदो निरन्यतश्चिदारत । दधाना इन्द्र इदुवः ॥ ५ ॥
इन्द्रदेव की उपासना करने वाले उपासक उन (इन्द्रदेव) के निन्दकों को यहाँ से अन्यत्र निकल जाने को कहें; ताकि वे यहाँ से दूर हो जायें ॥ ५ ॥
Whether the men who mock us say, Depart unto another place,
Ye who serve Indra and none else.
३६. उत नः सुभर्गों अरिर्वोचेयुर्दस्म कृष्टयः । स्यामेदिन्द्रस्य शर्मणि ॥ ६ ॥
हे इन्द्रदेव ! हम आपके अनुग्रह से समस्त वैभव प्राप्त करें, जिससे देखने वाले सभी शत्रु और मित्र हमें सौभाग्यशाली समझें ॥ ६ ॥
Or whether, God of wondrous deeds, all our true people call us blest,
Still may we dwell in Indra’s care.
३७. एमाशुमाशवे भर यज्ञश्रियं नृमादनम् । पतयन्मन्दयत् सखम् ॥ ७ ॥
(हे याजको !) यज्ञ को श्रीसम्पन्न बनाने वाले, प्रसन्नता प्रदान करने वाले, मित्रों को आनन्द देने वाले इस सोमरस को शीघ्रगामी इन्द्रदेव के लिये भरें (अर्पित करें) ॥ ७ ॥
Unto the swift One bring the swift, man-cheering, grace of sacrifice,
That to the Friend gives wings and joy.
३८. अस्य पीत्वा शतक्रतो घनो वृत्राणामभवः । प्रावो वाजेषु वाजिनम् ॥ ८ ॥
हे सैकड़ों यज्ञ सम्पन्न करने वाले इन्द्रदेव ! इस सोमरस को पीकर आप वृत्र-प्रमुख शत्रुओं के संहारक सिद्ध हुए हैं, अतः आप संग्राम-भूमि में वीर योद्धाओं को रक्षा करें ॥ ८ ॥
Thou, Satakratu, drankest this and was the Vrtras’ slayer, thou
Helpest the warrior in the fray.
३९. तं त्वा वाजेषु वाजिनं वाजयामः शतक्रतो । धनानामिन्द्र सातये ॥ ९ ॥
हे शतकर्मा इन्द्रदेव ! युद्धों में बल प्रदान करने वाले आपको हम धनों की प्राप्ति के लिये श्रेष्ठ हविष्यान्न अर्पित करते हैं ॥ ९ ॥
We strengthen, Satakratu, thee, year, thee the powerful in fight,
That, Indra, we may win us wealth.
४०. यो रायो३वनिर्महान्त्सुपारः सुन्वतः सखा । तस्मा इन्द्राय गायत ॥ १० ॥
हे याजको ! आप उन इन्द्रदेव के लिये स्तोत्रों का गान करें, जो धनों के महान् रक्षक, दुःखों को दूर करने वाले और याज्ञिकों से मित्रवत् भाव रखने वाले हैं ॥ १० ॥
To him the mighty stream of wealth, prompt friend of him who pours the juice,
Yea, to this Indra sing your song.
[ सूक्त-५ ]
[ऋषि – मधुच्छन्दा वैश्यामित्र । देवता – इन्द्र । छन्द – गायत्री ।]
४१. आ त्वेता नि षीदतेन्द्रमभि प्र गायत । सखायः स्तोमवाहसः ॥ १ ॥
हे याजक मित्रो ! इन्द्रदेव को प्रसन्न करने के लिये प्रार्थना करने हेतु शीघ्र आकर बैठो और हर प्रकार से उनकी स्तुति करो ॥ १ ॥
O come, ye hither, sit ye down to Indra sing ye forth, your song,
companions, bringing hymns of praise.
४२. पुरूतमं पुरूणामीशानं वार्याणाम् । इन्द्रं सोमे सचा सुते ॥ २ ॥
(हे याजक मित्रो ! सोम के अभिषुत होने पर) एकत्रित होकर संयुक्तरूप से सोमयज्ञ में शत्रुओं को पराजित करने वाले ऐश्वर्य के स्वामी इन्द्रदेव की अभ्यर्थना करो ॥ २ ॥
To him the richest of the rich, the Lord of treasures excellent,
Indra, with Some juice outpoured.
४३. स धा नो योग आ भुवत् स राये स पुरन्ध्याम् । गमद् वाजेभिरा स नः ॥ ३ ॥
वे इन्द्रदेव हमारे पुरुषार्थ को प्रखर बनाने में सहायक हों, धन-धान्य से हमें परिपूर्ण करें तथा ज्ञान प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त करते हुये पोषक अन्न सहित हमारे निकट आयें ॥ ३ ॥
May he stand by us in our need and in abundance for our wealth
May he come nigh us with his strength.
४४. यस्य संस्थे न वृण्वते हरी समत्सु शत्रवः । तस्मा इन्द्राय गायत ॥ ४ ॥
(हे याजको !) संग्राम में जिनके अश्वों से युक्त रथों के सम्मुख शत्रु टिक नहीं सकते, उन इन्द्रदेव के गुणों का आप गान करें ॥ ४ ॥
Whose pair of tawny horses yoked in battles foemen challenge not:
To him,, to Indra sing your song.
४५. सुतपाठने सुता इमे शुचयो यन्ति वीतये । सोमासो दध्याशिरः ॥ ५ ॥
यह निचोड़ा और शुद्ध किया हुआ दही मिश्रित सोमरस, सोमपान की इच्छा करने वाले इन्द्रदेव के निमित्त प्राप्त हो ॥ ५ ॥
Nigh to the Soma-drinker come, for his enjoyment, these pure drops,
The Somas mingled with the curd.
४६. त्वं सुतस्य पीतये सद्यो वृद्धो अजायथाः । इन्द्र ज्यैष्ठ्याय सुक्रतो ॥ ६ ॥
हे उत्तम कर्मवाले इन्द्रदेव ! आप सोमरस पीने के लिये देवताओं में सर्वश्रेष्ठ होने के लिये तत्काल वृद्ध रूप हो जाते हैं ॥ ६ ॥
Thou, grown at once to perfect strength, wast born to drink the Soma juice,
Strong Indra, for preeminence.
४७. आ त्वा विशन्त्वाशवः सोमास इन्द्र गिर्वणः । शं ते सन्तु प्रचेतसे ॥ ७ ॥
हे इन्द्रदेव ! तीनों सवनों में व्याप्त रहने वाला यह सोम, आपके सम्मुख उपस्थित रहे एवं आपके ज्ञान को सुखपूर्वक समृद्ध करे ॥ ७ ॥
O Indra, lover of the song, may these quick Somas enter three;
May they bring bliss to thee the Sage.
४८. त्वां स्तोमा अवीवृधन् त्वामुक्था शतक्रतो । त्वां वर्धन्तु नो गिरः ॥ ८ ॥
हे सैकड़ों यज्ञ करने वाले इन्द्रदेव ! स्तोत्र आपकी वृद्धि करें । यह उक्थ (स्तोत्र) वचन और हमारी वाणी आपकी महत्ता बढ़ाये ॥ ८ ॥
Our chants of praise have strengthened thee, O Satakratu, and our lauds,
So strengthen thee the songs we sing.
४९. अक्षितोतिः सनेदिमं वाजमिन्द्रः सहस्त्रिणम् । यस्मिन् विश्वानि पौंस्या ॥ ९ ॥
रक्षणीय की सर्वथा रक्षा करने वाले इन्द्रदेव बल-पराक्रम प्रदान करने वाले विविध रूपों में विद्यमान सोम रूप अन्न का सेवन करें ॥९ ॥
Indra, whose succour never fails, accept these viands thousandfold,
Wherein all manly powers abide.
५०. मा नो भर्ता अभि द्वहन् तनूनामिन्द्र गिर्वणः । ईशानो यवया वधम् ॥ १० ॥
हे स्तुत्य इन्द्रदेव! हमारे शरीर को कोई भी शत्रु क्षति न पहुँचाये । हमें कोई भी हिंसित न करे, आप हमारे संरक्षक रहें ॥ १० ॥
O Indra, thou who lovest song, let no man hurt our bodies, keep
Slaughter far from us, for thou canst.
[ सूक्त – ७ ]
[ ऋषि – मधुच्छन्दा वैश्वामित्र । देवता – इन्द्र । छन्द – गायत्री । ]
६१. इन्द्रमिद् गाथिनो बृहदिन्द्रमकेंभिरर्किणः । इन्द्र वाणीरनूषत ॥ १ ॥
सामगान के साधकों ने गाये जाने योग्य बृहत्साम की स्तुतियों (गाथा) से देवराज इन्द्र को प्रसन्न किया है । इसी तरह याज्ञिकों ने भी मन्त्रोच्चारण के द्वारा इन्द्रदेव की प्रार्थना की है ॥ १ ॥
[ “गाथा शब्द गान या पद्म के अर्थ में आया है” इसे मंत्र या ऋक् के स्तर का नहीं माना जाता । ]
Indra the singers with high praise, Indra recites with their lauds,
Indra the choirs have glorified.
६२. इन्द्र इद्धर्योः सचा सम्मिश्ल आ वचोयुजा । इन्द्रो वज्री हिरण्ययः ॥ २ ॥
संयुक्त करने की क्षमता वाले, वज्रधारी, स्वर्ण-मण्डित इन्द्रदेव, वचन मात्र के इशारे से जुड़ जाने वाले अश्वों के साथी हैं ॥ २ ॥
[‘वीर्यं वा अश्वः’ के अनुसार पराक्रम ही अश्व है । जो पराक्रमी समय पर संकेत मात्र से संगठित हो जायें इन्द्र देवता उनके साथी हैं, जो अहंकारवश बिखरे रहते हैं, वे इन्द्रदेव के प्रिय नहीं हैं । ]
Indra hath ever close to him his two bay steeds and word-yoked car,
Indra the golden, thunder-armed.
६३. इन्द्रो दीर्घाय चक्षस आ सूर्यं रोहयद् दिवि । वि गोभिरद्रिमैरयत् ॥ ३ ॥
(देवशक्तियों के संगठक) इन्द्रदेव ने विश्व को प्रकाशित करने के महान् उद्देश्य से सूर्यदेव को उच्चाकाश में स्थापित किया, जिनने अपनी किरणों से पर्वत आदि समस्त विश्व को दर्शनार्थ प्रेरित किया ॥ ३ ॥
Indra hat raised the Sun on high in heaven, that he may see afar.
He burst the mountain for the kine.
६४. इन्द्र वाजेषु नोऽव सहस्रप्रधनेषु च । उग्र उग्राभिरूतिभिः ॥ ४ ॥
हे वीर इन्द्रदेव ! आप सहस्रों प्रकार के धन लाभ वाले छोटे-बड़े संग्रामों में वीरतापूर्वक हमारी रक्षा करें ॥ ४ ॥
Help us, O Indra, in the frays, yea, frays, where thousand spoils are gained,
With awful aids, O awful One.
६५. इन्द्रं वयं महाधन इन्द्रमर्भे हवामहे । युजं वृत्रेषु वज्रिणम् ॥ ५ ॥
हम छोटे – बड़े सभी (जीवन) संग्रामों में वृत्रासुर के संहारक, वज्रपाणि इन्द्रदेव को सहायतार्थ बुलाते हैं ॥ ५ ॥
In mighty battle we invoke Indra, Indra in lesser fight,
The Friend who bends his bolt at fiends.
६६. स नो वृषन्नमुं चरुं सत्रादावन्नपा वृद्धि । अस्मध्यमप्रतिष्कुतः ॥ ६ ॥
सतत दानशील, सदैव अपराजित हे इन्द्रदेव ! आप हमारे लिये मेघ से जल की वृष्टि करें ॥ ६ ॥
Unclose, our manly Hero, thou for ever bounteous, yonder cloud,
For us, thou irresistible.
६७. तुञ्जेतुञ्जे य उत्तरे स्तोमा इन्द्रस्य वज्रिणः । न विन्धे अस्य सुष्टुतिम् ॥ ७ ॥
प्रत्येक दान के समय, वज्रधारी इन्द्रदेव के सदृश दान की (दानी की) उपमा कहीं अन्यत्र नहीं मिलती । इन्द्रदेव की इससे अधिक उत्तम स्तुति करने में हम समर्थ नहीं हैं ॥ ७ ॥
Still higher, at each strain of mine, thunder-armed Indra’s praises rise.
I find no land worthy of him.
६८. वृक्षा यूथेव वंसगः कृष्टीरियर्योजसा । ईशानो अप्रतिष्कुतः ॥ ८ ॥
सबके स्वामी, हमारे विरुद्ध कार्य न करने वाले, शक्तिमान् इन्द्रदेव अपनी सामर्थ्य के अनुसार, अनुदान बाँटने के लिये मनुष्यों के पास उसी प्रकार जाते हैं, जैसे वृषभ गायों के समूह में जाता है ॥ ८ ॥
Even as the bull drives on the herds, he drives the people with his might.
The Ruler irresistible.
६९. य एकवर्षणीनां वसूनामिरज्यति । इन्द्रः पञ्च क्षितीनाम् ॥ ९ ॥
इन्द्रदेव, पाँचों श्रेणियों के मनुष्यों (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र और निषाद) और सब ऐश्वर्यो – सम्पदाओं के अद्वितीय स्वामी हैं ॥ ९ ॥
Indra who rules with single sway men, riches, and the fivefold race,
Of those who dwell upon the earth.
७०. इन्द्रं वो विश्वतस्परि हवामहे जनेभ्यः । अस्माकमस्तु केवलः ॥ १० ॥
हे ऋत्विजो ! हे यजमानो ! सभी लोगों में उत्तम, इन्द्रदेव को, आप सब के कल्याण के लिये हम आमंत्रित करते हैं, वे हमारे ऊपर विशेष कृपा करें ॥ १० ॥
For your sake from each side we call Indra away from other men.
Ours, and none others’, may he be.
[सूक्त-८]
[ऋषि – मधुच्छन्दा वैश्वामित्र । देवता – इन्द्र । छन्द – गायत्री ।]
७१. एन्द्र सानसिं रयिं सजित्वानं सदासहम् । वर्षिष्ठमूतये भर ॥ १ ॥
हे इन्द्रदेव ! आप हमारे जीवन संरक्षण के लिये तथा शत्रुओं को पराभूत करने के निमित्त हमें ऐश्वर्य स पूर्ण करें ॥ १ ॥
Indra, bring wealth that gives delight, the victor’s every conquering wealth,
Most excellent, to be our aid.
७२. नि येन मुष्टिहत्यया नि वृत्रा रुणधामहै । त्वोतासो न्यर्वता ॥ २ ॥
उस ऐश्वर्य के प्रभाव और आपके द्वारा रक्षित अश्वों के सहयोग से हम मुक्के का प्रहार करके (शक्ति प्रयोग द्वारा) शत्रुओं को भगा दें ॥ २ ॥
By means of which we may repel our foes in battle hand to hand,
By thee assisted with the car.
७३. इन्द्र त्वोतास आ वयं वज्रं घना ददीमहि । जयेम सं युधि स्पृथः ॥ ३ ॥
हे इन्द्रदेव ! आपके द्वारा संरक्षित होकर तीक्ष्ण वज्रों को धारण कर हम युद्ध में स्पर्धा करने वाले शत्रुओं पर विजय प्राप्त करें ॥ ३ ॥
Aided by thee, the thunder-armed, Indra, may we lift up the bolt,
And conquer all our foes in fight.
७४. वयं शूरेभिरस्तृभिरिन्द्र त्वया युजा वयम् । रासह्याम पृतन्यतः ॥ ४ ॥
हे इन्द्रदेव! आपके द्वारा संरक्षित कुशल शस्त्र-चालक वीरों के साथ हम अपने शत्रुओं को पराजित करें ॥ ४ ॥
With thee, O Indra, for ally with missile-darting heroes, may
We conquer our embattled foes.
७५. महाँ इन्द्रः परश्च नु महित्वमस्तु वज्रिणे । द्यौर्न प्रथिना शवः ॥ ५ ॥
हमारे इन्द्रदेव श्रेष्ठ और महान् हैं । वज्रधारी इन्द्रदेव का यश द्युलोक के समान व्यापक होकर फैले तथा इनके बल की प्रशंसा चतुर्दिक् हो ॥ ५ ॥
Mighty is Indra, yea supreme, greatness be his, the Thunder.
Wide as the heaven extends his power.
७६. समोहे वा य आशत नरस्तोकस्य सनितौ । विप्रासो वा धियायवः ॥ ६ ॥
जो संग्राम में जुटते हैं, जो पुत्र के निर्माण में जुटते हैं और बुद्धिपूर्वक ज्ञान-प्राप्ति के लिए यत्न करते हैं, वे सब इन्द्रदेव की स्तुति से इष्टफल पाते हैं ॥ ६ ॥
Which aideth those to win them sons, who come as heroes to the fight,
Or singers loving holy thoughts.
७७. यः कुक्षिः सोमपातमः समुद्र इव पिन्वते। उर्दीरापो न काकुदः ॥ ७ ॥
अत्यधिक सोमपान करने वाले इन्द्रदेव का उदर समुद्र की तरह विशाल हो जाता है । वह (सोमरस) जीभ से प्रवाहित होने वाले रसों की तरह सतत द्रवित होता रहता है । (सदा आर्द्र बनाये रहता है ।) ॥ ७ ॥
His belly, drinking deepest draughts of Soma, like an ocean swells,
Like wide streams from the cope of heaven.
७८. एवा ह्यस्य सूनृता विरप्शी गोमती मही । पक्वा शाखा न दाशुषे ॥ ८ ॥
इन्द्रदेव की अति मधुर और सत्यवाणी उसी प्रकार सुख देती है, जिस प्रकार गो धन के दाता और पके फल वाली शाखाओं से युक्त वृक्ष यजमानों (हविदाता) को सुख देते हैं ॥ ८ ॥
So also is his excellence, great, vigorous, rich in cattle, like
A ripe branch to the worshipper.
७९. एवा हि ते विभूतय ऊतय इन्द्र मावते । सद्यश्चित् सन्ति दाशुषे ॥ ९ ॥
हे इन्द्रदेव ! हमारे लिये इष्टदात्री और संरक्षण प्रदान करने वाली जो आपकी विभूतियाँ हैं, वे सभी दान देने (श्रेष्ठ कार्य में नियोजन करने) वालों को भी तत्काल प्राप्त होती हैं ॥ ९ ॥
For venly thy mighty powers, Indra, are saving helps at once
Unto a worshipper like me.
८०. एवा ह्यास्य काम्या स्तोम उक्थं च शंस्या । इन्द्राय सोमपीतये ॥ १० ॥
दाता की स्तुतियाँ और उक्थ वचन अति मनोरम एवं प्रशंसनीय हैं । ये सब सोमपान करने वाले इन्द्रदेव के लिये हैं ॥ १० ॥
So are his lovely gifts, let lauds and praises be to Indra sung,
That he may drink the Soma juice.
[ सूक्त – ९ ]
[ ऋषि – मधुच्छन्दा वैश्वामित्र । देवता – इन्द्र । छन्द – गायत्री । ]
८१. इन्द्रेहि मत्स्यन्धसो विश्वेभिः सोमपर्वभिः । महाँ अभिष्टिरोजसा ॥ १ ॥
हे इन्द्रदेव ! सोमरूपी अन्नों से आप प्रफुल्लित होते हैं, अतः अपनी शक्ति से दुर्दान्त शत्रुओं पर विजय श्री वरण करने की क्षमता प्राप्त करने हेतु आप (यज्ञशाला में) पधारें ॥ १ ॥
COME, Indra, and delight thee with the juice at all the Soma feasts,
Protector, mighty in thy strength.
८२. एमेनं सुजता सुते मन्दिमिन्द्राय मन्दिने । चर्क्रि विश्वानि चक्रये ॥ २ ॥
(हे याजको !) प्रसन्नता देने वाले सोमरस को (निचोड़कर) तैयार करो तथा सम्पूर्ण कार्यों के कर्ता इन्द्र देव के लिये सामर्थ्य बढ़ाने वाले इस सोम को अर्पित करो ॥ २ ॥
To Indra pour ye forth the juice, the active gladdening juice to him
Ile gladdening, oinnific God.
८३. मत्स्वा सुशिप्र मन्दिभिः स्तोमेभिर्विश्वचर्षणे । सचैषु सवनेष्वा ॥ ३ ॥
हे उत्तम शस्त्रों से सुसज्जित (अथवा शोभन नासिका वाले), सर्वद्रष्टा इन्द्रदेव! हमारे इन यज्ञों में आकर प्रफुल्लता प्रदान करने वाले स्तोत्रों से आप आनन्दित हों ॥ ३ ॥
O Lord of all men, fair of cheek, rejoice thee in the gladdening lauds,
Present at these drink−offerings.
८४. असृग्रमिन्द्र ते गिरः प्रति त्वामुदहासत । अजोषा वृषभं पतिम् ॥ ४ ॥
हे इन्द्रदेव ! आपकी स्तुति के लिये हमने स्तोत्रों की रचना की है । हे बलशाली और पालनकर्ता इन्द्रदेव ! इन स्तुतियों द्वारा की गई प्रार्थना को आप स्वीकार करें ॥ ४ ॥
Songs have outpoured themselves to thee, Indra, the strong, the guardian Lord,
And raised themselves unsatisfied.
८५. सं चोदय चित्रमर्वाग्राध इन्द्र वरेण्यम् । असदित्ते विभु प्रभु ॥ ५ ॥
हे इन्द्रदेव ! आप ही विपुल ऐश्वर्यों के अधिपति हैं, अतः विविध प्रकार के श्रेष्ठ ऐश्वर्यों को हमारे पास प्रेरित करें; अर्थात् हमें श्रेष्ठ ऐश्वर्य प्रदान करें ॥ ५ ॥
Send to us bounty manifold, O Indra, worthy of’ our wish,
For power supreme is only thine.
८६. अस्मान्त्सु तत्र चोदयेन्द्र राये रभस्वतः । तुविद्युम्न यशस्वतः ॥ ६ ॥
हे प्रभूत ऐश्वर्य सम्पन्न इन्द्रदेव ! आप वैभव की प्राप्ति के लिये हमें श्रेष्ठ कर्मों में प्रेरित करें, जिससे हम परिश्रमी और यशस्वी हो सकें ॥ ६ ॥
O Indra, stimulate thereto us emulously fain for wealth,
And glorious, O most splendid One.
८७. सं गोमदिन्द्र वाजवदस्मे पृथु श्रवो बृहत् । विश्वायुर्धेह्यक्षितम् ॥ ७ ॥
हे इन्द्रदेव ! आप हमें गौओं, धन-धान्यों से युक्त अपार वैभव एवं अक्षय पूर्णायु प्रदान करें ॥ ७ ॥
Give, Indra, wide and lofty fame, wealthy in cattle and in strength,
Lasting our life−time, failing not.
८८. अस्मे धेहि श्रवो बृहद् द्युम्नं सहस्त्रसातमम् । इन्द्र ता रथिनीरिषः ॥ ८ ॥
हे इन्द्रदेव ! आप हमें प्रभूत यश एवं विपुल ऐश्वर्य प्रदान करें तथा बहुत से रथों में भरकर अन्नादि प्रदान करें ॥ ८ ॥
Grant us high fame, O Indra, grant riches bestowing thousands, those
Fair fruits of earth borne home in wains.
८९. वसोरिन्द्रं वसुपतिं गीर्भिर्गुणन्त ऋग्मियम् । होम गन्तारमूतये ॥ ९ ॥
धनों के अधिपति, ऐश्वर्यों के स्वामी, ऋचाओं से स्तुत्य इन्द्रदेव का हम स्तुतिपूर्वक आवाहन करते हैं । वे हमारे यज्ञ में पधार कर, हमारे ऐश्वर्य की रक्षा करें ॥ ९ ॥
Praising with songs the praise−worthy who cometh to our aid, we call
Indra, the Treasure−Lord of wealth.
९०. सुतेसुते न्योकसे बृहद् बृहत एदरिः । इन्द्राय शूषमर्चति ॥ १० ॥
सोम को सिद्ध (तैयार) करने के स्थान यज्ञस्थल पर यज्ञकर्ता, इन्द्रदेव के पराक्रम की प्रशंसा करते हैं ॥ १० ॥
To lofty Indra, dweller by each libation, the pious man
Sings forth aloud a strengthening hymn.
[ सूक्त – १० ]
[ ऋषि – मधुच्छन्दा वैश्वामित्र । देवता – इन्द्र । छन्द – अनुष्टुप् ]
९१. गायन्ति त्वा गायत्रिणोऽर्चन्त्यर्कमर्किणः । ब्रह्माणस्त्वा शतक्रत उद्वंशमिव येमिरे ॥ १ ॥
हे शतक्रतो (सौ यज्ञ या श्रेष्ठ कर्म करने वाले) इन्द्रदेव ! उद्गातागण (उच्च स्वर से गान करने वाले) आपका आवाहन करते हैं । स्तोतागण पूज्य इन्द्रदेव का मंत्रोच्चारण द्वारा आदर करते हैं । बाँस के ऊपर कला प्रदर्शन करने वाले नट के समान, बह्या नामक ऋत्विञ् श्रेष्ठ स्तुतियों द्वारा इन्द्रदेव को प्रोत्साहित करते हैं ॥ १ ॥
The chanters hymn thee, they who say the word of praise magnify thee.
The priests have raised thee up on high, O Satakratu, like a pole.
९२. यत्सानोः सानुमारुहद् भूर्यस्पष्ट कर्त्वम् । तदिन्द्रो अर्थं चेतति यूथेन वृष्णिरेजति ॥ २ ॥
जब यजमान सोमवल्ली, समिधादि के निमित्त एक पर्वत शिखर से दूसरे पर्वत शिखर पर जाते हैं और यजन कर्म करते हैं, तब उनके मनोरथ को जानने वाले इष्टप्रदायक इन्द्रदेव यज्ञ में आने को उद्यत होते हैं ॥ २ ॥
As up he climb from ridge to ridge and looked upon the toilsome task,
Indra observes this wish of his, and the Rain hastens with his troop.
९३. युक्ष्वा हि केशिना हरी वृषणा कक्ष्यप्रा । अथा न इन्द्र सोमपा गिरामुपश्रुतिं चर ॥ ३ ॥
हे सोमरस ग्रहीता इन्द्रदेव ! आप लम्बे केशयुक्त, शक्तिमान्, गन्तव्य तक ले जाने वाले दोनों घोड़ों को रथ में नियोजित करें । तत्पश्चात् सोमपान से तृप्त होकर हमारे द्वारा की गई प्रार्थनाएँ सुनें ॥ ३ ॥
Harness thy pair of strong bay steeds, long-maned, whose bodies fill the girths,
And, Indra, Soma-drinker, come to listen to our songs of praise.
९४. एहि स्तोमाँ अभि स्वराभि गृणीह्या रुव । ब्रह्म च नो वसो सचेन्द्र यज्ञं च वर्धय ॥४ ॥
हे सर्वनिवासक इन्द्रदेव ! हमारी स्तुतियों का श्रवण कर आप उद्गाताओं, होताओं एवं अध्वर्युवों को प्रशंसा से प्रोत्साहित करें ॥ ४ ॥
Come hither, answer thou the song, sing in approval, cry aloud.
Good Indra, make our prayer succeed, and prosper this our sacrifice.
९५. उक्थमिन्द्राय शंस्यं वर्धनं पुरुनिष्षिधे । शक्रो यथा सुतेषु णो रारणत् सख्येषु च ॥ ५ ॥
हे स्तोताओ ! आप शत्रुसंहारक, सामर्थ्ययान् इन्द्रदेव के लिये (उनके) यश को बढ़ाने वाले उत्तम स्तोत्रों का पाठ करें, जिससे उनकी कृपा हमारी सन्तानों एवं मित्रों पर सदैव बनी रहे ॥ ५ ॥
To Indra must a laud be said, to strengthen him who freely gives,
That Sakra may take pleasure in our friendship and drink-offerings.
९६. तमित् सखित्व ईमहे तं राये तं सुवीर्ये । स शक्र उत नः शकदिन्द्रो वसु दयमानः ॥ ६ ॥
हम उन इन्द्रदेव के पास मित्रता के लिये, धन प्राप्ति और उत्तमबल वृद्धि के लिये स्तुति करने जाते हैं । वे इन्द्रदेव बल एवं धन प्रदान करते हुए हमें संरक्षित करते हैं ॥ ६ ॥
Him, him we seek for friendship, him for riches and heroic might.
For Indra, he is Sakra, he shall aid us while he gives us wealth.
९७. सुविवृतं सुनिरजमिन्द्र त्वादातमिद्यशः । गवामप व्रजं वृधि कृणुष्व राधो अद्रिवः ॥ ७ ॥
हे इन्द्रदेव । आपके द्वारा प्रदत्त यश सब दिशाओं में सुविस्तृत हुआ है । हे वज्रधारक इन्द्रदेव ! गौओं को बाड़े से छोड़ने के समान हमारे लिये धन को प्रसारित करें ॥ ७ ॥
Easy to turn and drive away, Indra, is spoil bestowed by thee.
Unclose the stable of the kine, and give us wealth O Thunder-armed.
९८. नहि त्वा रोदसी उभे ऋधायमाणमिन्वतः । जेषः स्वर्वतीरपः सं गा अस्मभ्यं धूनुहि ॥ ८ ॥
हे इन्द्रदेव! युद्ध के समय आप के यश का विस्तार पृथ्वी और द्युलोक तक होता है । दिव्य जल – प्रवाहों पर आपका ही अधिकार है । उनसे अभिषिक्त कर हमें तृप्त करें ॥ ८ ॥
The heaven and earth contain thee not, together, in thy wrathful mood.
Win us the waters of the sky, and send us kine abundantly.
९९. आश्रुत्कर्ण श्रुधी हवं नू चिद्दधिष्व मे गिरः । इन्द्र स्तोममिमं मम कृष्वा युजश्विदन्तरम् ॥ ९ ॥
भक्तों की स्तुति सुनने वाले हे इन्द्रदेव ! हमारे आवाहन को सुनें । हमारी वाणियों को चित्त में धारण करें । हमारे स्तोत्रों को अपने मित्र के वचनों से भी अधिक प्रीतिपूर्वक धारण करें ॥ ९ ॥
Hear, thou whose ear is quick, my call; take to thee readily my songs,
O Indra, let this laud of mine come nearer even than thy friend.
१००. विद्या हि त्वा वृषन्तमं वाजेषु हवनश्रुतम् । वृषन्तमस्य हूमह ऊतिं सहस्रसातमाम् ॥ १० ॥
हे इन्द्रदेव ! हम जानते हैं कि आप बल-सम्पन्न हैं तथा युद्धों में हमारे आवाहन को आप सुनते हैं । हे बलशाली इन्द्रदेव ! आपके सहस्रों प्रकार के धन के साथ हम आपका संरक्षण भी चाहते हैं ॥ १० ॥
We know thee mightiest of all, in battles hearer of our cry.
Of thee most mighty we invoke the aid that giveth thousandfold.
१०१. आ तू न इन्द्र कौशिक मन्दसानः सुतं पिब । नव्यमायुः प्र सू तिर कृधी सहस्रसामृषिम् ॥ ११ ॥
हे कुशिक के पत्र *इन्द्रदेव ! आप इस निष्पादित सोम का पान करने के लिये हमारे पास शीघ्र आयें । हमें कर्म करने की सामर्थ्य के साथ नवीन आयु भी दें । इस ऋषि को सहस्र धनों से पूर्ण करें ॥ ११ ॥
[* कुशिक पुत्र विश्वामित्र के समान ही उत्पत्ति के कारण इन्द्रदेव को कुशिक पुत्र सम्बोधन दिया गया है । ]
O Indra, son of Kusika, drink our libation with delight.
Prolong our life anew, and cause the seer to win a thousand gifts.
१०२. परि त्वा गिर्वणो गिर इमा भवन्तु विश्वतः । वृद्धायुमनु वृद्धयो जुष्टा भवन्तु जुष्टयः ॥ १२ ॥
हे स्तुत्य इन्द्रदेव ! हमारे द्वारा की गई स्तुतियाँ सब ओर से आपकी आयु को बढ़ाती हुईं आपको यशस्वी बनायें । आपके द्वारा स्वीकृत ये (स्तुतियाँ) हमारे आनन्द को बढ़ाने वाली सिद्ध हों ॥ १२ ॥
Lover of song, may these our songs on every side encompass thee:
Strengthening thee of lengthened life, may they be dear delights to thee.
[ सूक्त – ११ ]
[ ऋषि – जेतामाधुच्छन्दस । देवता – इन्द्र । छन्द – अनुष्टुप् । ]
१०३. इन्द्रं विश्वा अवीवृधन्त्समुद्रव्यचसं गिरः । रथीतमं रथीनां वाजानां सत्पर्ति पतिम् ॥ १ ॥
समुद्र के तुल्य व्यापक, सब रथियों में महानतम्, अन्नों के स्वामी और सत्प्रवृत्तियों के पालक इन्द्रदेव को समस्त स्तुतियाँ अभिवृद्धि प्रदान करती हैं ॥ १ ॥
१०४. सख्ये त इन्द्र वाजिनो मा भेम शवसस्पते । त्वामभि प्र णोनुमो जेतारमपराजितम् ॥ २ ॥
हे बलरक्षक इन्द्रदेव ! आपकी मित्रता से हम बलशाली होकर किसी से न डरें। हे अपराजेय – विजयी इन्द्रदेव ! हम साधकगण आपको प्रणाम करते हैं ॥ २ ॥
१०५. पूर्वीरिन्द्रस्य रातयो न वि दस्यन्त्यूतयः । यदी वाजस्य गोमतः स्तोतृभ्यो मंहते मघम् ॥ ३ ॥
देवराज इन्द्र की दानशीलता सनातन है । ऐसी स्थिति में आज के यजमान भी यदि स्तोताओं को गवादि सहित अन्न दान करते हैं, तो इन्द्रदेव द्वारा की गई सुरक्षा अक्षुण्ण रहती है ॥ ३ ॥
१०६. पुरां भिन्दुर्युवा कविरमितौजा अजायत । इन्द्रो विश्वस्य कर्मणो धर्ता वज्री पुरुष्टुतः ॥ ४ ॥
शत्रु के नगरों को विनष्ट करने वाले वे इन्द्रदेव युवा, ज्ञाता, अतिशक्तिशाली, शुभ कार्यों के आश्रयदाता तथा सर्वाधिक कीर्ति-युक्त होकर विविधगुण सम्पन्न हुए हैं ॥ ४ ॥
१०७. “त्वं बलस्य गोमतोऽपावरद्रिवो बिलम् । त्वां देवा अबिभ्युषस्तुज्यमानास आविषुः ॥ ५ ॥
हे वज्रधारी इन्द्रदेव ! आपने गौओं (सूर्य-किरणों) को चुराने वाले असुरों के व्यूह को नष्ट किया, तब असुरों से पराजित हुए देवगण आपके साथ आकर संगठित हुए ॥ ५ ॥
१०८. तवाहं शूर रातिभिः प्रत्यायं सिन्धुमावदन् । उपातिष्ठन्त गिर्वणो विदुष्टे तस्य कारवः ॥ ६ ॥
संग्रामशूर हे इन्द्रदेव ! आपकी दानशीलता से आकृष्ट होकर हम होतागण पुनः आपके पास आये हैं । है स्तुत्य इन्द्रदेव ! सोमयाग में आपकी प्रशंसा करते हुए ये ऋत्विज् एवं यजमान आपकी दानशीलता को जानते हैं ॥ ६ ॥
१०९. मायाभिरिन्द्र मायिनं त्वं शुष्णमवातिरः । विदुष्टे तस्य मेधिरास्तेषां श्रवांस्युत्तिर ॥ ७ ॥
हे इन्द्रदेव ! अपनी माया द्वारा आपने ‘शुष्ण’ (एक राक्षस) को पराजित किया । जो बुद्धिमान् आपकी इस माया को जानते हैं, उन्हें यश और बल देकर वृद्धि प्रदान करें ॥ ७ ॥
११०. इन्द्रमीशानमोजसाभि स्तोमा अनूषत । सहस्रं यस्य रातय उत वा सन्ति भूयसीः ॥ ८ ॥
स्तोतागण, असंख्यों अनुदान देने वाले, ओजस् (बल-पराक्रम) के कारण जगत् के नियन्ता इन्द्रदेव की स्तुति करने लगे ॥ ८ ॥
[ सूक्त – १२ ]
[ ऋषि – मेधातिथि काण्व । देवता – अग्नि, (छठवीं ऋचा के प्रथम पाद के देवता – निर्मथ्य अग्नि और आहवनीय अग्नि) । छन्द – गायत्री । ]
१११. अग्निं दूतं वृणीमहे होतारं विश्ववेदसम् । अस्य यज्ञस्य सुक्रतुम् ॥ १ ॥
हे सर्वज्ञाता अग्निदेव ! आप यज्ञ के विधाता हैं, समस्त देवशक्तियों को तुष्ट करने की सामर्थ्य रखते हैं । आप यज्ञ की विधि-व्यवस्था के स्वामी हैं । ऐसे समर्थ आपको हम देव-दूत रूप में स्वीकार करते हैं ॥ १ ॥
११२. अग्निमग्नि हवीमभिः सदा हवन्त विश्पतिम् । हव्यवाहं पुरुप्रियम् ॥ २ ॥
प्रजापालक, देवों तक हवि पहुंचाने वाले, परमप्रिय, कुशल नेतृत्व प्रदान करने वाले हे अग्निदेव ! हम याजकगण हवनीय मंत्रों से आपको सदा बुलाते हैं ॥ २ ॥
११३. अग्ने देवाँ इहा वह जज्ञानो वृक्तबर्हिषे । असि होता न ईड्यः ॥ ३ ॥
हे स्तुत्य अग्निदेव ! आप अरणि मन्थन से उत्पन्न हुए हैं । आस्तीर्ण (बिछे हुए) कुशाओं पर बैठे हुए यजमान पर अनुग्रह करने हेतु आप (यज्ञ की) हवि ग्रहण करने वाले देवताओं को इस यज्ञ में बुलाएँ ॥ ३ ॥
११४. ताँ उशतो वि बोधय यदग्ने यासि दूत्यम्। देवैरा सत्सि बर्हिषि ॥ ४ ॥
हे अग्निदेव ! आप हवि की कामना करने वाले देवों को यहाँ बुलाएँ और इन कुशा के आसनों पर देवों के साथ प्रतिष्ठित हों ॥ ४ ॥
११५. घृताहवन दीदिवः प्रति ष्म रिषतो दह । अग्ने त्वं रक्षस्विनः ॥ ५ ॥
घृत आहुतियों से प्रदीप्त हे अग्निदेव ! आप राक्षसी प्रवृत्तियों वाले शत्रुओं को सम्यक् रूप से भस्म करें ॥ ५ ॥
११६. अग्निनाग्निः समिध्यते कविर्गृहपतिर्युवा । हव्यवाह जुहास्यः ॥ ६ ॥
यज्ञ स्थल के रक्षक, दूरदर्शी, चिरयुवा, आहुतियों को देवों तक पहुँचाने वाले, ज्वालायुक्त आहवनीय यज्ञाग्नि को अरणि मन्थन द्वारा उत्पन्न अग्नि से प्रज्वलित किया जाता है ॥ ६ ॥
११७. कविमग्निमुप स्तुहि सत्यधर्माणमध्वरे । देवममीवचातनम् ॥ ७ ॥
हे ऋत्विजो ! लोक हितकारी यज्ञ में रोगों को नष्ट करने वाले, ज्ञानवान् अग्निदेव की स्तुति आप सब विशेष रूप से करें ॥ ७ ॥
११८. यस्त्वामग्ने हविष्यतिर्दूतं देव सपर्यति । तस्य स्म प्राविता भव ॥ ८ ॥
देवगणों तक हविष्यान्न पहुँचाने वाले हे अग्निदेव ! जो याजक, आप (देवदूत) की उत्तम विधि से अर्चना करते हैं, आप उनको भली-भाँति रक्षा करें ॥ ८ ॥
११९. यो अग्निं देववीतये हविष्माँ आविवासति । तस्मै पावक मृळय ॥ ९ ॥
हे शोधक अग्निदेव ! देवों के लिए हवि प्रदान करने वाले जो यजमान आपकी प्रार्थना करते हैं, आप उन्हें सुखी बनायें ॥ ९ ॥
१२०. स नः पावक दीदिवोऽग्ने देवाँ इहा वह । उप यज्ञ हविश्च नः ॥ १० ॥
हे पवित्र, दीप्तिमान् अग्निदेव ! आप देवों को हमारे यज्ञ में हवि ग्रहण करने के निमित्त ले आएँ ॥ १० ॥
१२१. स नः स्तवान आ भर गायत्रेण नवीयसा । रयिं वीरवतीमिषम् ॥ ११ ॥
हे अग्निदेव ! नवीनतम गायत्री छन्द वाले सूक्त से स्तुति किये जाते हुए आप हमारे लिए पुत्रादि ऐश्वर्य और बलयुक्त अन्नों को भरपुर प्रदान करें ॥ ११ ॥
१२२. अग्ने शुक्रेण शोचिषा विश्वाभिर्देवहूतिभिः । इमं स्तोमं जुषस्व नः ॥ १२ ॥
हे अग्निदेव ! अपनी कान्तिमान् दीप्तियों से देवों को बुलाने के निमित्त हमारी स्तुतियों को स्वीकार करें ॥ १२ ॥
[ सूक्त – १३ ]
[ ऋषि – मेधातिथि काण्व । देवता-१- इध्म अथवा समिद्ध अग्नि, २ तनूनपात्, ३- नराशंस, ४ – इळा, ५ – बर्हि, ६- दिव्यद्वार, ७ – उषासानक्ता, ८ – दिव्यहोता प्रचेतस्, ९ – तीन देवियाँ सरस्वती, इळा, भारती, १० – त्वष्टा, ११ – वनस्पति, १२ – स्वाहाकृति । छन्द – गायत्री ]
१२३. सुसमिद्धो न आ वह देवाँ अग्ने हविष्मते । होतः पावक यक्षि च ॥ १ ॥
पवित्रकर्ता, यज्ञ सम्पादनकर्ता हे अग्निदेव ! आप अच्छी तरह प्रज्वलित होकर यजमान के कल्याण के लिए देवताओं का आवाहन करें और उनको लक्ष्य करके यज्ञ सम्पन्न करें अर्थात् देवों के पोषण के लिए हविष्यान्न ग्रहण करें ॥ १ ॥
१२४ मधुमन्तं तनूनपाद् यज्ञं देवेषु नः कवे । अद्या कृणुहि वीतये ॥ २ ॥
ऊर्ध्वगामी, मेधावी हे अग्निदेव ! हमारी रक्षा के लिए प्राणवर्द्धक मधुर हवियों को देवों के निमित्त प्राप्त करें और उन तक पहुँचाएँ ॥ २ ॥
१२५, नराशंसमिह प्रियमस्मिन् यज्ञ उप ह्वये । मधुजिह्वं हविष्कृतम् ॥ ३ ॥
हम इस यज्ञ में देवताओं के प्रिय और आह्लादक (मधुजिह्व) अग्निदेव का आवाहन करते हैं। वह हमारी हवियों को देवताओं तक पहुँचाने वाले हैं, अस्तु, वे स्तुत्य हैं ॥ ३ ॥
१२६. अग्ने सुखतमे रथे देवाँ ईळित आ वह । असि होता मनुर्हितः ॥ ४ ॥
मानवमात्र के हितैषी हे अग्निदेव! आप अपने श्रेष्ठ सुखदायी रथ से देवताओं को लेकर (यज्ञस्थल पर) पधारें । हम आपकी वन्दना करते हैं ॥ ४ ॥
१२७. स्तृणीत बर्हिरानुषम् घृतपृष्ठं मनीषिणः । यत्रामृतस्य चक्षणम् ॥ ५ ॥
हे मेधावी पुरुषो ! आप इस यज्ञ में कुशा के आसनों को परस्पर मिलाकर इस तरह बिछाएँ कि उस पर घृत-पात्र को भली प्रकार रखा जा सके, जिससे अमृततुल्य घृत का सम्यक् दर्शन हो सके ॥ ५ ॥
१२८. वि श्रयन्तामृतावृधो द्वारो देवीरसश्चतः । अद्या नूनं च यष्टवे ॥ ६ ॥
आज यज्ञ करने के लिए निश्चित रूप से ऋत (यज्ञीय वातावरण) की वृद्धि करने वाले अविनाशी दिव्य द्वार खुल जाएँ ॥ ६ ॥
१२९. नक्तोषासा सुपेशसास्मिन् यज्ञ उप ह्वये । इदं नो बर्हिरासदे ॥ ७ ॥
सुन्दर रूपवती रात्रि और उषा का हम इस यज्ञ में आवाहन करते हैं । हमारी ओर से आसन रूप में यह बर्हि (कुश) प्रस्तुत है ॥ ७ ॥
१३०. ता सुजिह्वा उप ह्वये होतारा दैव्या कवी । यज्ञं नो यक्षतामिमम् ॥ ८ ॥
उन उत्तम वचन वाले और मेधावी दोनों (अग्नियों) दिव्य होताओं को यज्ञ में यजन के निमित्त हम बुलाते हैं ॥ ८ ॥
१३१. इळा सरस्वती मही तिस्रो देवीर्मयोभुवः । बर्हिः सीदन्त्वस्त्रियः ॥ ९ ॥
इळा, सरस्वती और मही ये तीनों देवियाँ सुखकारी और क्षयरहित हैं । ये तीनों बिछे हुए दीप्तिमान् कुश के आसनों पर विराजमान हों ॥ ९ ॥
१३२. इह त्वष्टारमग्रियं विश्वरूपमुप ह्वये । अस्माकमस्तु केवलः ॥ १० ॥
प्रथम पूज्य, विविध रूप वाले त्वष्टादेव का इस यज्ञ में आवाहन करते हैं, वे देव केवल हमारे ही हों ॥ १० ॥
१३३. अव सृजा वनस्पते देव देवेभ्यो हविः । प्र दातुरस्तु चेतनम् ॥ ११ ॥
हे वनस्पतिदेव ! आप देवों के लिए नित्य हविष्यान्न प्रदान करने वाले दाता को प्राणरूप उत्साह प्रदान करें ॥ ११ ॥
१३४. स्वाहा यज्ञं कृणोतनेन्द्राय यज्वनो गृहे । तत्र देवाँ उप ह्वये ॥ १२ ॥
(हे अध्वर्यु !) आप याजकों के घर में इन्द्रदेव की तुष्टि के लिये आहुतियाँ समर्पित करें । हम होता वहाँ देवों को आमन्त्रित करते हैं ॥ १२ ॥
(विगत मे अंग्रेजी अनुवाद सँ हिन्दी अनुवाद कार्य बेस सन्तोषजनक, सुबोधगम्य आ सहज लगबाक कारण एतय सँ मात्र हिन्दी अनुवाद केर अध्ययन सामग्री संकलन कय रहल छी । लक्ष्य अछि जे सब बात मैथिली मे मनन कयला उपरान्त लिखब – अनुवाद करब ।)
[ सूक्त – १४ ]
[ऋषि – मेधातिथि काण्व । देवता – विश्वेदेवा । छन्द – गायत्री ।)
१३५. ऐभिरग्ने दुवो गिरो विश्वेभिः सोमपीतये । देवेभिर्याहि यक्षि च ॥ १ ॥
हे अग्निदेव ! आप समस्त देवों के साथ इस यज्ञ में सोम पीने के लिए आएँ एवं हमारी परिचर्या और स्तुतियों को ग्रहण करके यज्ञ कार्य सम्पन्न करें ॥ १ ॥
१३६. आ त्वा कण्वा अहूषत गृणन्ति विप्र ते धियः । देवेभिरग्न आ गहि ॥ २ ॥
हे मेधावी अग्निदेव ! कण्वऋषि आपको बुला रहे हैं, वे आपके कार्यों की प्रशंसा करते हैं । अतः आप देवों के साथ यहां पधारे ॥ २ ॥
१३७. इन्द्रवायू बृहस्पतिं मित्राग्निं पूषणं भगम् । आदित्यान् मारुतं गणम् ॥ ३ ॥
यज्ञशाला में हम इन्द्र, वायु, बृहस्पति, मित्र, अग्नि, पूषण, भग, आदित्यगण और मरुद्गण आदि देवों का आवाहन करते हैं ॥ ३ ॥
१३८. प्र वो भ्रियन्त इन्दवो मत्सरा मादयिष्णवः । द्रप्सा मध्वश्चमूषदः ॥ ४ ॥
कूट-पीसकर तैयार किया हुआ, आनन्द और हर्ष बढ़ाने वाला यह मधुर सोमरस अग्निदेव के लिए चमस्रादि पात्रों में भरा हुआ है ॥ ४ ॥
१३९. ईळते त्वामवस्यवः कण्वासो वृक्तबर्हिषः । हविष्मन्तो अरङ्कृतः ॥ ५ ॥
कण्व ऋषि के वंशज अपनी सुरक्षा की कामना से, कुश-आसन बिछाकर हविष्यान्न व अलंकारों से युक्त होकर अग्निदेव की स्तुति करते हैं ॥ ५ ॥
१४०. घृतपृष्ठा मनोयुजो ये त्वा वहन्ति वह्नयः । आ देवान्त्सोमपीतये ॥ ६ ॥
अतिदीप्तिमान् पृष्ठ भाग वाले, मन के संकल्प मात्र से ही रथ में नियोजित हो जाने वाले अश्वों (से खींचे गये रथ) द्वारा आप सोमपान के निमित देवों को ले आएँ ॥ ६ ॥
१४१. तान् यजत्राँ ऋतावृधोऽग्ने पत्नीवतस्कृधि । मध्वः सुजिह्व पायय ॥ ७ ॥
हे अग्निदेव ! आप यज्ञ की समृद्धि एवं शोभा बढ़ाने वाले पूजनीय इन्द्रादि देव को सपलीक इस यज्ञ में बुलाएँ तथा उन्हें मधुर सोमरस का पान कराएँ ॥ ७ ॥
१४२. ये यजत्रा य ईड्यास्ते ते पिबन्तु जिह्वया । मधोरग्ने वषट्कृति ॥ ८ ॥
हे अग्निदेव ! यजन किये जाने योग्य और स्तुति किये जाने योग्य जो देवगण हैं, वे यज्ञ में आपकी जिह्वा से आनन्दपूर्वक मधुर सोमरस का पान करें ॥ ८ ॥
१४३. आकीं सूर्यस्य रोचनाद् विश्वान् देवाँ उषर्बुधः । विप्रो होतेह वक्षति ॥ ९ ॥
हे मेधावी होतारूप अग्निदेव ! आप प्रातःकाल में जागने वाले विश्वेदेवों को सूर्य-रश्मियों से युक्त करके हमारे पास लाते हैं ॥ ९ ॥
१४४. विश्वेभिः सोम्यं मध्वग्न इन्द्रेण वायुना । पिबा मित्रस्य धामभिः ॥ १० ॥
हे अग्निदेव ! आप इन्द्र, वायु, मित्र आदि देवों के सम्पूर्ण तेजों के साथ मधुर सोमरस का पान करें ॥ १० ॥
१४५. त्वं होता मनुर्हितोऽग्ने यज्ञेषु सीदसि । सेमं नो अध्वरं यज ॥ ११ ॥
हे मनुष्यों के हितैषी अग्निदेव ! आप होता के रूप में यज्ञ में प्रतिष्ठित हों और हमारे इस हिसारहित यज्ञ को सम्पन्न करें ॥ ११ ॥
१४६. युक्ष्वा ह्यरुषी रथे हरितो देव रोहितः । ताभिर्देवाँ इहा वह ॥ १२ ॥
हे अग्निदेव ! आप रोहित नामक रथ को ले जाने में सक्षम, तेजगति वाली घोड़ियों को रथ में जोतें एवं उनके द्वारा देवताओं को इस यज्ञ में लाएँ ॥ १२ ॥
[ सूक्त – १५ ]
[ऋषि – मेधातिथि काण्व । देवता – (प्रतिदेवता ऋतु सहित) १.५ इन्द्र, २ मरुद्गण, ३ त्वष्टा, ४, १२ अग्नि, ६ मित्रावरुण, ७, १० द्रविणोदा, ११ अश्विनीकुमार । छन्द – गायत्री । ॥
१४७. इन्द्र सोमं पिब ऋतुना त्वा विशन्त्विन्दवः । मत्सरासस्तदोकसः ॥ १ ॥
हे इन्द्रदेव ! ऋतुओं के अनुकूल सोमरस का पान करें, ये सोमरस आपके शरीर में प्रविष्ट हों, क्योंकि आपकी तृप्ति का आश्रयभूत साधन यही सोम है ॥ १ ॥
१४८. मरुतः पिबत ऋतुना पोत्राद् यज्ञं पुनीतन । यूयं हि ष्ठा सुदानवः ॥ २ ॥
दानियों में श्रेष्ठ हे मरुतो ! आप पोता नामक ऋत्विज् के पात्र से ऋतु के अनुकूल सोमरस का पान करें एवं हमारे इस यज्ञ को पवित्रता प्रदान करें ॥ २ ॥
१४९. अभि यज्ञं गृणीहि नो ग्नावो नेष्टः पिब ऋतुना । त्वं हि रत्नधा असि ॥ ३ ॥
हे त्वष्टादेव ! आप पत्नी सहित हमारे यज्ञ की प्रशंसा करें, ऋतु के अनुकूल सोमरस का पान करें । आप निश्चय ही रत्नों को देने वाले हैं ॥ ३ ॥
१५०. अग्ने देवाँ इहा वह सादया योनिषु त्रिषु । परि भूष पिब ऋतुना ॥ ४ ॥
हे अग्निदेव ! आप देवों को यहाँ बुलाकर उन्हें यन के तीनों सवनों (प्रात, माध्यन्दिन एवं सायं) में आसीन करें । उन्हें विभूषित करके ऋतु के अनुकूल सोम का पान करें ॥ ४ ॥
१५१. ब्राह्मणादिन्द्र राधसः पिया सोममृतूँरनु । तवेद्धि सख्यमस्तृतम् ॥ ५ ॥
हे इन्द्रदेव ! आप ब्रह्मा को जानने वाले साधक के पात्र से सोमरस का पान करें, क्योंकि उनके साथ आपको अविच्छिन्न (अटूट) मित्रता है ॥ ५ ॥
१५२. युवं दक्षं धृतवत मित्रावरुण दूळभम् । ऋतुना यज़माशाथे ॥ ६ ॥
हे अटल व्रत वाले मित्रावरुण ! आप दोनों ऋतु के अनुसार बल प्रदान करने वाले हैं । आप कठिनाई से सिद्ध होने वाले इस यज्ञ को सम्पन्न करते हैं ॥ ६ ॥
१५३. द्रविणोदा द्रविणसो ग्रावहस्तासो अध्वरे । यज्ञेषु देवमीळते ॥ ७ ॥
धन की कामना वाले याजक सोमरस तैयार करने के निमित्त हाथ में पत्थर धारण करके पवित्र यज्ञ में धनप्रदायक अग्निदेव की स्तुति करते हैं ॥ ७ ॥
१५४. द्रविणोदा ददातु नो वसूनि यानि शृण्विरे । देवेषु ता वनामहे ॥ ८ ॥
हे धनप्रदायक अग्निदेव ! हमें वे सभी धन प्रदान करें, जिनके विषय में हमने श्रवण किया है । वे समस्त धन हम देवगणों को ही अर्पित करते हैं ॥ ८ ॥
[देव-शक्तियों से प्राप्त विभूतियों का उपयोग देवकार्यों के लिये ही करने का भाव व्यक्त किया गया है ।]
१५५. द्रविणोदाः पिपीषति जुहोत प्र च तिष्ठत । नेष्टादृतुभिरिष्यत ॥ ९ ॥
धनप्रदायक अग्निदेव नेष्टापात्र (नेष्ट्धिष्ण्या स्थान-यज्ञ कुण्ड) से ऋतु के अनुसार सोमरस पीने की इच्छा करते हैं । अतः हे याजकगण ! आप वहाँ जाकर यज्ञ करें और पुनः अपने निवास स्थान के लिये प्रस्थान करें ॥ ९ ॥
१५६. यत् त्वा तुरीयमृतुभिर्द्रविणोदो यजामहे । अघ स्मा नो ददिर्भव ॥ १० ॥
हे धनप्रदायक अग्निदेव ! ऋतुओं के अनुगत होकर हम आपके निमित्त सोम के चौथे भाग को अर्पित करते हैं, इसलिए आप हमारे लिये धन प्रदान करने वाले हों ॥ १० ॥
१५७. अश्विना पिबतं मधु दीद्यग्नी शुचिव्रता । ऋतुना यज्ञवाहसा ॥ ११ ॥
दीप्तिमान्, शुद्ध कर्म करने वाले, ऋतु के अनुसार यज्ञवाहक हे अश्विनीकुमारो ! आप इस मधुर सोमरस का पान करें ॥ ११ ॥
१५८. गार्हपत्येन सन्त्य ऋतुना यज्ञनीरसि । देवान् देवयते यज ॥ १२ ॥
हे इष्टप्रद अग्निदेव ! आप गार्हपत्य के नियमन में ऋतुओं के अनुगत यज्ञ का निर्वाह करने वाले हैं, अतः देवत्व प्राप्ति की कामना वाले याजकों के निमित्त देवों का यजन करें ॥ १२ ॥
[ सूक्त – १६ ]
[ऋषि – मेधातिथि काण्व । देवता – इन्द्र । छन्द-गायत्री । ]
१५९. आ त्वा वहन्तु हरयो वृषणं सोमपीतये । इन्द्र त्वा सूरचक्षसः ॥ १ ॥
हे बलवान् इन्द्रदेव ! आपके तेजस्वी घोड़े सोमरस पीने के लिए आपको यज्ञस्थल पर लाएँ तथा सूर्य के समान प्रकाशयुक्त ऋत्विज् मन्त्रों द्वारा आपकी स्तुति करें ॥ १ ॥
१६०. इमा धाना घृतस्नुवो हरी इहोप वक्षतः। इन्द्रं सुखतमे रथे ॥ २ ॥
अत्यन्त सुखकारी रथ में नियोजित इन्द्रदेव के दोनों हरि (घोड़े) उन्हें (इन्द्रदेव को) घृत से स्निग्ध हवि रूप धाना (भुने हुए जौ) ग्रहण करने के लिए यहाँ ले आएँ ॥ २ ॥
१६१. इन्द्रं प्रातर्हवामह इन्द्रं प्रयत्यध्वरे । इन्द्रं सोमस्य पीतये ॥ ३ ॥
हम प्रातःकाल यज्ञ प्रारम्भ करते समय मध्याह्नकालीन सोमयाग प्रारम्भ होने पर तथा सायंकाल यज्ञ की समाप्ति पर भी सोमरस पीने के निमित इन्द्रदेव का आवाहन करते हैं ॥ ३ ॥
१६२. उ प नः सुतमा गहि हरिभिरिन्द्र केशिभिः । सुते हि त्वा हवामहे ॥ ४ ॥
हे इन्द्रदेव । आप अपने केसर युक्त अश्वों से सोम के अभिषव, स्थान के पास आएँ । सोम के अभिषुत होने पर हम आपका आवाहन करते हैं ॥ ४ ॥
१६३. सेमं नः स्तोममा गद्युपेदं सवनं सुतम् । गौरो न तृषितः पिब ॥ ५ ॥
हे इन्द्रदेव ! हमारे स्तोत्रों का श्रवण कर आप यहाँ आएँ । प्यासे गौर मृग के सदृश व्याकुल मन से सोम के अभिषव स्थान के समीप आकर सोम का पान करें ॥ ५ ॥
१६४. इमे सोमास इन्दवः सुतासो अधि बर्हिषि । ताँ इन्द्र सहसे पिब ॥ ६ ॥
हे इन्द्रदेव ! यह दीप्तिमान् सोम निष्पादित होकर कुश-आसन पर सुशोभित है । शक्ति – वर्द्धन के निमित्त आप इसका पान करें ॥ ६ ॥
१६५. अयं ते स्तोमो अग्रियो हृदिस्पृगस्तु शंतमः । अथा सोमं सुतं पिब ॥ ७ ॥
हे इन्द्रदेव ! यह स्तोत्र श्रेष्ठ मर्मस्पर्शी और अत्यन्त सुखकारी है । अब आप इसे सुनकर अभिषुत सोमरस का पान करें ॥ ७ ॥
१६६. विश्वमित्सवनं सुतमिन्द्रो मदाय गच्छति । वृत्रहा सोमपीतये ॥ ८ ॥
सोम के सभी अभिषव स्थानों की ओर इन्द्रदेव अवश्य जाते हैं । दुष्टों का हनन करने वाले इन्द्रदेव सोमरस पीकर अपना हर्ष बढ़ाते हैं ॥ ८ ॥
१६७. सेमं नः काममा पृण गोभिरश्वैः शतक्रतो । स्तवाम त्वा स्वाध्यः ॥ ९ ॥
हे शतकर्मा इन्द्रदेव ! आप हमारी गौओं और अश्वों सम्बन्धी कामनायें पूर्ण करें । हम मनोयोगपूर्वक आपकी स्तुति करते हैं ।
[ सूक्त – १७ ]
[ ऋषि – मेधातिथि काण्व । देवता – इन्द्रावरुण । छन्द – गायत्री ४ पादनिवृत् गायत्री, ५ हसीयसी गायत्री ]
१६८. इन्द्रावरुणयोरहं सम्राजोरव आ वृणे । ता नो मृळात ईदृशे ॥ १ ॥
हम इन्द्र और वरुण दोनों प्रतापी देवों से अपनी सुरक्षा की कामना करते हैं । वे दोनों हम पर इस प्रकार अनुकम्पा करें, जिससे कि हम सुखी रहें ॥ १ ॥
१६९. गन्तारा हि स्थोऽवसे हवं विप्रस्य मावतः । धर्तारा चर्षणीनाम् ॥ २ ॥
हे इन्द्र और वरुणदेवो ! आप दोनों, मनुष्यों के सम्राट्, धारक एवं पोषक हैं । हम जैसे बाह्मणों के आवाहन पर सुरक्षा के लिए आप निश्चय ही आने को उद्यत रहते हैं ॥ २ ॥
१७०. अनुकामं तर्पयेथामिन्द्रावरुण राय आ । ता वां नेदिष्ठमीमहे ॥ ३ ॥
हे इन्द्र और वरुणदेवो ! हमारी कामनाओं के अनुरूप धन देकर हमें संतुष्ट करें । आप दोनों के समीप पहुंचकर हम प्रार्थना करते हैं ॥ ३ ॥
१७१. युवाकु हि शचीनां युवाकु सुमतीनाम् । भूयाम वाजदान्वाम् ॥ ४ ॥
हमारे कर्म संगठित हो, हमारी सद्बुद्धियों संगठित हो. हम अग्रगण्य होकर दान करने वाले बनें ॥ ४ ॥
१७२. इन्द्रः सहस्त्रदानां वरुणः शंस्यानाम् । क्रतुर्भवत्युक्थ्यः ॥ ५ ॥
इन्द्रदेव सहस्रो दाताओं में सर्वश्रेष्ठ हैं और वरुणदेव सहस्रों प्रशंसनीय देवों में सर्वश्रेष्ठ हैं ॥ ५ ॥
१७३. तयोरिदवसा वयं सनेम नि च धीमहि । स्यादुत प्ररेचनम् ॥ ६ ॥
आपके द्वारा सुरक्षित धन को प्राप्त कर हम उसका श्रेष्ठतम उपयोग करें । वह धन हमें विपुल मात्रा में प्राप्त हो ॥ ६ ॥
१७४. इन्द्रावरुण वामहं हुवे चित्राय राधसे । अस्मान्त्सु जिग्युषस्कृतम् ॥ ७ ॥
हे इन्द्रावरुण देवो । विविध प्रकार के धन की कामना से हम आपका आवाहन करते हैं । आप हमें उत्तम विजय प्राप्त कराएँ ॥ ७ ॥
१७५. इन्द्रावरुण नू नु वां सिषासन्तीषु धीष्वा । अस्मभ्यं शर्म यच्छतम् ॥ ८ ॥
हे इन्द्रावरुण देवो ! हमारी बुद्धियाँ सम्यक् रूप से आपकी सेवा करने की इच्छा करती हैं, अतः हमें शीघ्र ही निश्चयपूर्वक सुख प्रदान करें ॥ ८ ॥
१७६. प्र वामश्नोतु सुष्टुतिरिन्द्रावरुण यां हुवे । यामृधाथे सधस्तुतिम् ॥ ९ ॥
हे इन्द्रावरुण देवो! जिन उत्तम स्तुतियों के लिए (प्रति) हम, आप दोनों का आवाहन करते हैं एवं जिन स्तुतियों को साथ-साथ प्राप्त करके आप दोनों पुष्ट होते हैं. वे स्तुतियां आपको प्राप्त हो ॥ ९ ॥
[ सूक्त – १८ ]
[ऋषि- मेधातिथि काण्व । देवता – १-३ बह्मणस्पति, ४ इन्द्र, ब्रह्मणस्पति, सोम ५ ब्रह्मणस्पति, दक्षिणा, ६-८ सदसस्पति, ९ सदसस्पति या नराशंस । छन्द – गायत्री । ]
१७७. सोमानं स्वरणं कृणुहि ब्रह्मणस्पते । कक्षीवन्तं य औशिजः ॥ १ ॥
हे सम्पूर्ण ज्ञान के अधिपति ब्रह्मणस्पति देव ! सोम का सेवन करने वाले यजमान को आप उशिज् के पुत्र कक्षीवान् की तरह श्रेष्ठ प्रकाश से युक्त करें ॥ १ ॥
१७८. यो रेवान् यो अमीवहा वसुवित् पुष्टिवर्धनः । स नः सिषक्तु यस्तुरः ॥ २ ॥
ऐश्वर्यवान्, रोगों का नाश करने वाले, धन प्रदाता और पुष्टिवर्धक तथा जो शोध फलदायक हैं, वे ब्रह्मणस्पतिदेव, हम पर कृपा करें ॥ २ ॥
१७९. मा नः शंसो अररुषो धूर्तिः प्रणङ् मर्त्यस्य । रक्षा णो ब्रह्मणस्पते ॥ ३ ॥
हे ब्रह्मणस्पतिदेव ! यज्ञ न करने वाले तथा अनिष्ट चिन्तन करने वाले दुष्ट शत्रु का हिंसक दुष्ट प्रभाव हम पर न पड़े । आप हमारी रक्षा करें ॥ ३ ॥
१८०. स घा वीरो न रिष्यति यमिन्द्रो ब्रह्मणस्पतिः । सोमो हिनोति मर्त्यम् ॥ ४ ॥
जिस मनुष्य को इन्द्रदेव ब्रह्मणस्पतिदेव और सोमदेव प्रेरित करते हैं, वह वीर कभी नष्ट नहीं होता ॥ ४ ॥
(इन्द्र से संगठन की, ब्रह्मणस्पति से श्रेष्ठ मार्गदर्शन की एवं सोम से पोषण की प्राप्ति होती है । इनसे युक्त मनुष्य क्षीण नहीं होता । ये तीनों देव यज्ञ में एकत्रित होते हैं । यज्ञ से प्रेरित मनुष्य दुःखी नहीं होता वरन् देवत्व प्राप्त करता है ।)
१८१. त्वं तं ब्रह्मणस्पते सोम इन्द्रश्च मर्त्यम् । दक्षिणा पात्वंहसः ॥ ५ ॥
हे बह्मणस्पते । आप सोमदेव, इन्द्रदेव और दक्षिणादेवी के साथ मिलकर यज्ञादि अनुष्ठान करने वाले मनुष्य की पापों से रक्षा करें ॥ ५ ॥
१८२. सदसस्पतिमद्भुतं प्रियमिन्द्रस्य काम्यम् । सनिं मेधामयासिषम् ॥ ६ ॥
इन्द्रदेव के प्रिय मित्र, अभीष्ट पदार्थों को देने में समर्थ, लोकों का मर्म समझने में सक्षम सदसस्पतिदेव (सत्प्रवृत्तियों के स्वामी) से हम अद्भुत मेधा प्राप्त करना चाहते हैं ॥ ६ ॥
१८३. यस्मादृते न सिध्यति यज्ञो विपश्चितश्चन । स धीनां योगमिन्वति ॥ ७ ॥
जिनकी कृपा के बिना ज्ञानी का भी यज्ञ पूर्ण नहीं होता, वे सदसस्पतिदेव हमारी बुद्धि को उत्तम प्रेरणाओं से युक्त करते हैं ॥ ७ ॥
[सदाशयता जिनमें नहीं, ऐसे विद्वानों द्वारा यज्ञीय प्रयोजनों की पूर्ति नहीं होती ।]
१८४. आदृध्नोति हविष्कृतिं प्राञ्चं कृणोत्यध्वरम् । होत्रा देवेषु गच्छति ॥ ८ ॥
वे सदसस्पतिदेव हविष्यान्न तैयार करने वाले साधकों तथा यज्ञ को प्रवृद्ध करते हैं और वे ही हमारी स्तुतियों को देवों तक पहुँचाते हैं ॥ ८ ॥
१८५. नराशंसं सुधृष्टममपश्यं सप्रथस्तमम् । दिवो न सद्ममखसम् ॥ ९ ॥
द्युलोक के सदृश अतिदीप्तिमान्, तेजवान्, यशस्वी और मुनष्यों द्वारा प्रशंसित सदसस्पतिदेव को हमने देखा है ॥ ९ ॥
[ सूक्त – १९ ]
[ ऋषि – मेधातिथि काण्व । देवता – अग्नि और मरुद्गण । छन्द – गायत्री । ]
१८६. प्रति त्यं चारुमध्वरं गोपीथाय प्र हूयसे । मरुद्भिरग्न आ गहि ॥ १ ॥
हे अग्निदेव ! श्रेष्ठ यज्ञों की गरिमा के संरक्षण के लिए हम आपका आवाहन करते हैं, आपको मरुतों के साथ आमंत्रित करते हैं. अतः देवताओं के इस यज्ञ में आप पधारें ॥ १ ॥
१८७. नहि देवो न मर्त्यो महस्तव क्रतुं परः । मरुद्भिरग्न आ गहि ॥ २ ॥
हे अग्निदेव ! ऐसा न कोई देव है, न ही कोई मनुष्य, जो आपके द्वारा सम्पादित महान् कर्म को कर सके । ऐसे समर्थ आप मरुद्गणों के साथ इस यज्ञ में पधारें ॥ २ ॥
१८८. ये महो रजसो विदुर्विश्वे देवासो अद्रुहः। मरुद्भिरग्न आ गहि ॥ ३ ॥
जो मरुद्गण पृथ्वी पर श्रेष्ठ जल वृष्टि करने की (विधि जानते हैं या) क्षमता से सम्पन्न हैं । हे अग्निदेव ! आप उन द्रोहहित मरुद्गणों के साथ इस यज्ञ में पधारें ॥ ३ ॥
१८९. य उग्रा अर्कमान्चुरनाधृष्टास ओजसा । मरुद्भिरग्न आ गहि ॥ ४ ॥
हे अग्निदेव ! जो अति बलशाली, अजेय और अत्यन्त प्रचण्ड सूर्य के सदृश प्रकाशक हैं । आप उन मरुद्गणों के साथ यहाँ पधारें ॥ ४ ॥
१९०. ये शुभ्रा घोरवर्पसः सुक्षत्रासो रिशादसः । मरुद्भिरग्न आ गहि ॥ ५ ॥
जो शुभ्र तेजों से युक्त, तीक्ष्ण, वेधक रूप वाले, श्रेष्ठ बल – सम्पन्न और शत्रु का संहार करने वाले हैं । हे अग्निदेव! आप उन मरुतों के साथ यहाँ पधारें ॥ ५ ॥
१९१. ये नाकस्याधि रोचने दिवि देवास आसते । मरुद्भिरग्न आ गहि ॥ ६ ॥
हे अग्निदेव ! ये जो मरुद्गण सबके ऊपर अधिष्ठित, प्रकाशक, द्युलोक के निवासी हैं, आप उन मरुद्गणों के साथ पधारें ॥ ६ ॥
१९२. य ईङ्ख्यन्ति पर्वतान् तिरः समुद्रमर्णवम् । मरुद्भिरग्न आ गहि ॥ ७ ॥
हे अग्निदेव ! जो पर्वत सदृश विशाल मेघों को एक स्थान से सुदूरस्थ दूसरे स्थान पर ले जाते हैं तथा जो शान्त समुद्रों में भी ज्वार पैदा कर देते हैं (हलचल पैदा कर देते हैं), ऐसे उन मरुद्गणों के साथ आप यज्ञ में पधारें ॥ ७ ॥
१९३. आ ये तन्वन्ति रश्मिभिस्तिरः समुद्रमोजसा । मरुद्भिरग्न आ गहि ॥ ८ ॥
हे अग्निदेव । जो सूर्य की रश्मियों के साथ संव्याप्त होकर समुद्र को अपने ओज से प्रभावित करते हैं, उन मरुतों के साथ आप यहाँ पधारें ॥ ८ ॥
९४. अभि त्वा पूर्वपीतये सृजामि सोम्यं मधु । मरुद्भिरग्न आ गहि ॥ ९ ॥
हे अग्निदेव ! सर्वप्रथम आपके सेवनार्थ यह मधुर सोमरस हम अर्पित करते हैं, अतः आप मरुतों के साथ यहाँ पधारें ॥ ९ ॥
[ सूक्त – २० ]
[ ऋषि – मेधातिथि काण्व । देवता – ऋभुगण । छन्द – गायत्री । ]
१९५. अयं देवाय जन्मने स्तोमो विप्रेभिरासया । अकारि रत्नधातमः ॥ १ ॥
ऋभुदेवों के निमित्त ज्ञानियों ने अपने मुख से इन रमणीय स्तोत्रों को रचना की तथा उनका पाठ किया ॥ १ ॥
१९६. य इन्द्राय वचोयुजा ततक्षुर्मनसा हरी। शमीभिर्यज्ञमाशत ॥ २ ॥
जिन ऋभुदेवों ने अतिकुशलतापूर्वक इन्द्रदेव के लिए वचन मात्र से नियोजित होकर चलने वाले अश्वों की रचना की, वे शमी आदि (यज्ञ पात्र अथवा पाप शमन करने वाले देवों) के साथ यज्ञ में सुशोभित होते हैं ॥ २ ॥
[चमस एक प्रकार के पात्र का नाम है, जिसे भी देव भाव से सम्बोधित किया गया है । ]
१९७. तक्षन्नासत्याभ्यां परिज्मानं सुखं रथम् । तक्षन्धेनुं सबर्दुघाम् ॥ ३ ॥
उन ऋभुदेवों ने अश्विनीकुमारों के लिए अति सुखप्रद, सर्वत्र गमनशील रथ का निर्माण किया और गौओं को उत्तम दूध देने वाली बनाया ॥ ३ ॥
१९८. युवाना पितरा पुनः सत्यमत्र ऋजूयवः । ऋभवो विष्ट्यक्रत ॥ ४ ॥
अमोघ मन्त्र सामर्थ्य से युक्त, सर्वत्र व्याप्त रहने वाले ऋभुदेवों ने माता-पिता में स्नेहभाव संचरित कर उन्हें पुनः जवान बनाया ॥ ४ ॥
(यहाँ जरावस्था दूर करने की मन्त्र विद्या का संकेत है ।)
१९९. सं वो मदासो अग्मतेन्द्रेण च मरुत्वता । आदित्येभिश्च राजभिः ॥ ५ ॥
हे ऋभुदेवो ! यह हर्षप्रद सोमरस इन्द्रदेव, मरुतों और दीप्तिमान् आदित्यों के साथ आपको अर्पित किया जाता है ॥ ५ ॥
२००. उत त्यं चमसं नवं त्वष्टुर्देवस्य निष्कृतम् । अकर्त चतुरः पुनः ॥ ६ ॥
त्वष्टादेव के द्वारा एक ही चमस तैयार किया गया था, ऋभुदेवों ने उसे चार प्रकार का बनाकर प्रयुक्त किया ॥ ६ ॥
२०१. ते नो रत्नानि धत्तन त्रिरा साप्तानि सुन्वते । एकमेकं सुशस्तिभिः ॥ ७ ॥
वे उत्तम स्तुतियों से प्रशंसित होने वाले ऋभुदेव ! सोमयाग करने वाले प्रत्येक याजक को तीनों कोटि के सप्तरत्नों अर्थात् इक्कीस प्रकार के रत्नों (विशिष्ट यज्ञ कर्मों) को प्रदान करें । (यज्ञ के तीन विभाग हैं – हविर्यज्ञ, पाकयज्ञ एवं सोमयज्ञ । तीनों के सात-सात प्रकार हैं । इस प्रकार यज्ञ के इक्कीस प्रकार कहे गये हैं ।) ॥७ ॥
२०२. अधारयन्त वह्नयोऽभजन्त सुकृत्यया । भागं देवेषु यज्ञियम् ॥ ८ ॥
तेजस्वी ऋभुदेवों ने अपने उत्तम कर्मों से देवों के स्थान पर अधिष्ठित होकर यज्ञ के भाग को धारण कर उसका सेवन किया ॥ ८ ॥
[ सूक्त – २१ ]
[ ऋषि – मेधातिषि काण्व । देवता – इन्द्राग्नी । छन्द – गायत्री । ]
२०३. इहेन्द्राग्नी उप ह्वये तयोरित्स्तोममुश्मसि । ता सोमं सोमपातमा ॥ १ ॥
इस यज्ञ स्थल पर हम इन्द्र एवं अग्निदेवों का आवाहन करते हैं, सोमपान के उन अभिलाषियों की स्तुति करते हुए सोमरस पीने का निवेदन करते हैं ॥ १ ॥
२०४. ता यज्ञेषु प्र शंसतेन्द्राग्नी शुम्भता नरः । ता गायत्रेषु गायत ॥ २ ॥
हे ऋत्विजो ! आप यज्ञानुष्ठान करते हुए इन्द्र एवं अग्निदेवों की शस्त्रों (स्तोत्रों) से स्तुति करें, विविध अलंकारों से उन्हें विभूषित करें तथा गायत्री छन्दवाले सामगान (गायत्र साम) करते हुए उन्हें प्रसन्न करें ॥ २ ॥
२०५, ता मित्रस्य प्रशस्तय इन्द्राग्नी ता हवामहे । सोमपा सोमपीतये ॥ ३ ॥
सोमपान की इच्छा करने वाले मित्रता एवं प्रशंसा के योग्य उन इन्द्र एवं अग्निदेवों को हम सोमरस पीने के लिए बुलाते हैं ॥ ३ ॥
२०६. उग्रा सन्ता हवामह उपेदं सवनं सुतम् । इन्द्राग्नी एह गच्छताम् ॥ ४ ॥
अति उग्र देवगण इन्द्र एवं अग्निदेवों को सोम के अभिषव स्थान (यज्ञस्थल) पर आमन्त्रित करते हैं, वे यहाँ पधारें ॥ ४ ॥
२०७. ता महान्ता सदस्पती इन्द्राग्नी रक्ष उब्जतम् । अप्रजाः सन्त्वत्रिणः ॥ ५ ॥
देवों में महान् वे इन्द्र-अग्निदेव सत्पुरुषों के स्वामी (रक्षक) हैं । वे राक्षसों को वशीभूत कर सरल स्वभाव वाला बनाएँ और मनुष्य भक्षक राक्षसों को मित्र बांधवों से रहित करके निर्बल बनाएँ ॥ ५ ॥
२०८. तेन सत्येन जागृतमधि प्रचेतुने पदे । इन्द्राग्नी शर्म यच्छतम् ॥ ६ ॥
हे इन्द्राग्ने ! सत्य और चैतन्यरूप यज्ञस्थान पर आप संरक्षक के रूप में जागते रहें और हमें सुख प्रदान करें ।
[ सूक्त – २२ ]
[ ऋषि – मेधातिथि काण्व । देवता – १-४ अश्विनी कुमार, ५-८ सविता, ९-१० अग्नि, ११ देवियाँ, १२-इन्द्राणी, वरुणानी, अग्नायी, १३-१४ द्यावा पृथिवी, १५ पृथिवी, १६ विष्णु अथवा देवगण, १७-२१ विष्णु । छन्द – गायत्री । ]
२०९. प्रातर्युजा वि बोधयाश्विनावेह गच्छताम् । अस्य सोमस्य पीतये ॥ १ ॥
(हे अध्वर्युगण) प्रातःकाल चेतनता को प्राप्त होने वाले अश्विनीकुमारों को जगायें । वे हमारे इस यज्ञ में सोमपान करने के निमित्त पधारें ॥ १ ॥
२१०. या सुरथा रथीतमोभा देवा दिविस्पृशा । अश्विना ता हवामहे ॥ २ ॥
ये दोनों अश्विनीकुमार सुसज्जित रथों से युक्त महान् रथी हैं । ये आकाश में गमन करते हैं । इन दोनों का हम आवाहन करते हैं ॥ २ ॥
[ यहाँ मंत्रशक्ति से चालित, आकाश मार्ग से चलने वाले यान (रथों) का उल्लेख किया गया है । ]
२११. या वां कशा मधुमत्यश्विना सूनृतावती । तया यज्ञं मिमिक्षतम् ॥ ३ ॥
हे अश्विनीकुमारो ! आपकी जो मधुर सत्यवचन युक्त कशा (चाबुक-वाणी) है, उससे यज्ञ को सिंचित करने की कृपा करें ॥ ३ ॥
[ वाणी रूपी चाबुक से स्पट होता है कि अश्विनी देवों के यान मंत्र चालित हैं । मधुर एवं सत्यवचन रूप क्चनों से यज्ञ का श्री सिंचन किया जाता है । कशा – चावुक से यज्ञ के सिंचन का भाव अटपटा लगते हुए भी युक्ति संगत है । ]
२१२. नहि वामस्ति दूरके यत्रा रथेन गच्छथः । अश्विना सोमिनो गृहम् ॥ ४ ॥
हे अश्विनीकुमारो ! आप रथ पर आरूढ़ होकर जिस मार्ग से जाते हैं, वहाँ से सोमयाग करने वाले याजक का घर दूर नहीं है ॥ ४ ॥
[ पूर्वोक्त मंत्र में वर्णित यान के तीव्र वेग का वर्णन है । ]
२१३. हिरण्यपाणिमूतये सवितारमुप ह्वये । स चेत्ता देवता पदम् ॥ ५ ॥
यजमान को (प्रकाश ऊर्जा आदि) देने वाले हिरण्यगर्भ (हाथ में सुवर्ण धारण करने वाले या सुनहरी किरणों वाले) सवितादेव का हम अपनी रक्षा के लिये आवाहन करते हैं । वे ही यजमान के द्वारा प्राप्तव्य (गन्तव्य) स्थान को विज्ञापित (प्रकाशित) करने वाले हैं ॥ ५ ॥
२१४. अपां नपातमवसे सवितारमुप स्तुहि । तस्य व्रतान्युश्मसि ॥ ६ ॥
हे ऋत्विज् । आप हमारी रक्षा के लिये सवितादेवता की स्तुति करें । हम उनके लिए सोमयागादि कर्म सम्पन्न करना चाहते हैं । वे सवितादेव जलों को सुखाकर पुनः सहस्रों गुना बरसाने वाले हैं ॥ ६ ॥
(सौर शक्ति से ही जल के शोधन, वर्षण एवं शोषण की प्रक्रिया चलाने की बात विज्ञान सम्मत है ।)
२१५. विभक्तारं हवामहे वसोश्चित्रस्य राधसः । सवितारं नृचक्षसम् ॥ ७ ॥
समस्त प्राणियों के आश्रयभूत, विविध धनों के प्रदाता, मानवमात्र के प्रकाशक सूर्यदेव का हम आवाहन करते हैं ॥ ७ ॥
२१६. सखाय आ नि षीदत सविता स्तोम्यो नु नः । दाता राधांसि शुम्भति ॥ ८ ॥
हे मित्रो ! हम सब बैठकर सवितादेव की स्तुति करें । धन-ऐश्वर्य के दाता सूर्यदेव अत्यन्त शोभायमान हैं ॥ ८ ॥
२१७. अग्ने पत्नीरिहा वह देवानामुशतीरुप । त्वष्टारं सोमपीतये ॥ ९ ॥
हे अग्निदेव ! यहाँ आने की अभिलाषा रखने वाली देवों की पत्नियों को यहाँ ले आएं और त्वष्टादेव को भी सोमपान के निमित बुलाएँ ॥ ९ ॥
२१८. आ ग्ना अग्न इहावसे होत्रां यविष्ठ भारतीम् । वरूत्रीं धिषणां वह ॥ १० ॥
हे अग्निदेव ! देवपत्नियों को हमारी सुरक्षा के निमित्त यहाँ ले आएँ । आप हमारी रक्षा के लिए अग्निपत्नी होत्रा, आदित्यपत्नी भारती, वरणीय वाग्देवी धिषणा आदि देयियों को भी यहाँ ले आएँ ॥ १० ॥
२१९. अभि नो देवीरवसा महः शर्मणा नृपत्नीः । अच्छिन्नपत्राः सचन्ताम् ॥११ ॥
अनवरुद्ध मार्ग वाली देव-पत्नियाँ मनुष्यों को ऐश्वर्यं देने में समर्थ हैं । वे महान् सुखों एवं रक्षण सामर्थ्यों से युक्त होकर हमारी ओर अभिमुख हों ॥ ११ ॥
२२०. इहेन्द्राणीमुप ह्वये वरुणानीं स्वस्तये । अग्नायीं सोमपीतये ॥ १२ ॥
अपने कल्याण के लिए एवं सोमपान के लिए हम इन्द्राणी, वरुणपत्नी (वरुणानी) और अग्निपत्नी (अग्नायी) का आवाहन करते हैं ॥ १२ ॥
२२१. मही द्यौः पृथिवी च न इमं यज्ञं मिमिक्षताम्। पिपृतां नो भरीमभिः ॥ १३ ॥
अति विस्तारयुक्त पृथ्वी और द्युलोक हमारे इस यज्ञकर्म को अपने-अपने अंशों द्वारा परिपूर्ण करें । वे भरण-पोषण करने वाली सामग्रियों (सुख – साधनों) से हम सभी को तृप्त करें ॥ १३ ॥
२२२. तयोरिघृतवत्पयो विप्रा रिहन्ति धीतिभिः । गन्धर्वस्य ध्रुवे पदे ॥ १४ ॥
गंधर्वलोक के ध्रुव स्थान में आकाश और पृथ्वी के मध्य में अवस्थित घृत के समान (सार रूप) जलों (पोषक प्रवाहों) को ज्ञानी जन अपने विवेकयुक्त कर्मों (प्रयासों) द्वारा प्राप्त करते हैं ॥ १४ ॥
२२३. स्योना पृथिवि भवानृक्षरा निवेशनी । यच्छा नः शर्म सप्रथः ॥ १५ ॥
हे पृथिवी देवि ! आप सुख देने वाली, बाधा हरने वाली और उत्तमवास देने वाली हैं । आप हमें विपुल परिमाण में सुख प्रदान करें ॥ १५ ॥
२२४. अतो देवा अवन्तु नो यतो विष्णुर्विचक्रमे । पृथिव्याः सप्त धामभिः ॥ १६ ॥
जहाँ से (यज्ञ स्थल अथवा पृथ्वी से) विष्णुदेव ने (पोषण परक) पराक्रम दिखाया, वहाँ (उस यज्ञीय क्रम में) पृथ्वी के सप्तधामों से देवतागण हमारी रक्षा करें ॥ १६ ॥
२२५. इदं विष्णुर्वि चक्रमे त्रेधा नि दधे पदम् । समूळ्हमस्य पांसुरे ॥ १७ ॥
यह सब विष्णुदेव का पराक्रम है, तीन प्रकार के (त्रिविध-त्रियामी) उनके चरण हैं । इसका मर्म धूलि भरे प्रदेश में निहित है ॥ १७ ॥
(त्रिआयामी सृष्टि के पोषण का जो अद्भुत पराक्रम दिखाता है । उसका रहस्य अंतरिक्षधूलि – सूक्ष्मकणों, सबएटामिक पार्टिकल्स के प्रवाह में सन्निहित है । उसी प्रवाह से सभी प्रकार के पोषक पदार्थ बनते – बदलते रहते हैं।)
२२६. त्रीणि पदा वि चक्रमे विष्णुर्गोपा अदाभ्यः । अतो धर्माणि धारयन् ॥ १८ ॥
विश्वरक्षक, अविनाशी विष्णुदेव तीनों लोकों में यज्ञादि कर्मों को पोषित करते हुए तीन चरणों से जगत् में व्याप्त हैं अर्थात् तीन शक्ति धाराओं (सृजन, पोषण और परिवर्तन) द्वारा विश्व का संचालन करते हैं ॥ १८ ॥
२२७. विष्णोः कर्माणि पश्यत यतो व्रतानि पस्यशे । इन्द्रस्य युज्यः सखा ॥ १९ ॥
हे याजको ! सर्वव्यापक भगवान् विष्णु के सृष्टि संचालन सम्बन्धी कार्यों को (प्रजनन, पोषण और परिवर्तन की प्रक्रिया को) ध्यान से देखो । इसमें अनेकानेक व्रतों (नियमों अनुशासनों) का दर्शन किया जा सकता है । इन्द्र (आत्मा) के योग्य मित्र उस परम सत्ता के अनुकूल बनकर रहें (ईश्वरीय अनुशासनों का पालन करें) ॥ १९ ॥
२२८. तद्विष्णोः परमं पदं सदा पश्यन्ति सूरयः । दिवीव चक्षुराततम् ॥ २० ॥
जिस प्रकार सामान्य नेत्रों से आकाश में स्थित सूर्यदेव को सहजता से देखा जाता है, उसी प्रकार विद्वज्जन अपने ज्ञान-चक्षुओं से विष्णुदेव के (देवत्व के परमपद को) श्रेष्ठ स्थान को देखते (प्राप्त करते) हैं ॥ २० ॥
[ईश्वर दृष्टियम्य भले ही न हों, अनुभूतिजन्य अवश्य हैं ।]
२२९. तद्विप्रासो विपन्यवो जागृवांसः समिन्धते । विष्णोर्यत्परमं पदम् ॥ २१ ॥
जागरूक विद्वान् स्तोतागण विष्णुदेव के उस परमपद को प्रकाशित करते हैं । (अर्थात् जन सामान्य के लिए प्रकट करते हैं) ॥ २१ ॥
[ सूक्त – २३ ]
[ ऋषि – मेधातिथि काण्व । देवता – १ वायु, २-३ इन्द्रवायू, ४-६ मित्रावरुण, ७-९ इन्द्र-मरुत्वान्, १०-१२ विश्वेदेवा, १३-१५ पूषा, १६-२२ तथा २३ का पूर्वार्द्ध आपः देवता, २३ का उत्तरार्द्ध एवं २४ अग्नि । छन्द – १-१८ गायत्री, १९ पुर उष्णिक्, २१ प्रतिष्ठा, २० तथा २२-२४ अनुष्टुप् । ]
२३०. तीव्राः सोमास आ ग्रह्याशीर्वन्तः सुता इमे । वायो तान्प्रस्थितान्पिब ॥ १ ॥
हे वायुदेव ! अभिषुत सोमरस तीखा होने से दुग्ध मिश्रित करके तैयार किया गया है, आप आएँ और उत्तर वेदी के पास लाये गये इस सोमरस का पान करें ॥ १ ॥
२३१. उभा देवा दिविस्पृशेन्द्रवायू हवामहे । अस्य सोमस्य पीतये ॥ २ ॥
जिनका यश दिव्यलोक तक विस्तृत है, ऐसे इन्द्र और वायु देवों को हम सोमरस पीने के लिए आमंत्रित करते हैं ॥ २ ॥
२३२. इन्द्रवायू मनोजुवा विप्रा हवन्त ऊतये। सहस्राक्षा धियस्पती ॥ ३ ॥
मन के तुल्य वेग वाले, सहस्र चक्षु वाले, बुद्धि के अधीश्वर इन्द्र एवं वायु देवों का ज्ञानीजन अपनी सुरक्षा के लिए आवाहन करते हैं ॥ ३ ॥
२३३. मित्रं वयं हवामहे वरुणं सोमपीतये । जज्ञाना पूतदक्षसा ॥ ४ ॥
सोमरस पीने के लिए यज्ञस्थल पर प्रकट होने वाले परमपवित्र एवं बलशाली मित्र और वरुणदेवों का हम आवाहन करते हैं ॥ ४ ॥
२३४. ऋतेन यावृतावृद्धावृतस्य ज्योतिषस्पती । ता मित्रावरुणा हुवे ॥ ५ ॥
प्रत्यमार्ग पर चलने वालों का उत्साह बढ़ाने वाले, तेजस्वी मित्रावरुणों का हम आवाहन करते हैं ॥ ५ ॥
२३५. वरुणः प्राविता भुवन्मित्रो विश्वाभिरूतिभिः । करतां नः सुराधसः ॥ ६ ॥
वरुण एवं मित्र देवता अपने समस्त रक्षा साधनों से हम सबकी हर प्रकार से रक्षा करते हैं । वे हमें महान् वैभव सम्पन्न करें ॥ ६ ॥
२३६. मरुत्वन्तं हवामह इन्द्रमा सोमपीतये । सजूर्गणेन तृम्पतु ॥ ७ ॥
मरुद्गणों के सहित इन्द्रदेव को सोमरस पान के निमित्त बुलाते हैं । ये मरुद्गणों के साथ आकर तृप्त हों ॥ ७ ॥
२३७. इन्द्रज्येष्ठा मरुङ्गणा देवासः पूषरातयः । विश्वे मम श्रुता हवम् ॥ ८ ॥
दानी पूषादेव के समान इन्द्रदेव दान देने में श्रेष्ठ हैं । वे सब मरुद्गणों के साथ हमारे आवाहन को सुनें ॥ ८ ॥
२३८. हत वृत्रं सुदानव इन्द्रेण सहसा युजा । मा नो दुःशंस ईशत ॥ ९ ॥
हे उत्तम दानदाता मरुतो ! आप अपने उत्तम साथी और बलवान् इन्द्रदेव के साथ दुष्टों का हनन करें । दुष्टता हमारा अतिक्रमण न कर सके ॥ ९ ॥
२३९. विश्वान्देवान्हवामहे मरुतः सोमपीतये । उग्रा हि पृश्निमातरः ॥ १० ॥
सभी मरुद्गणों को हम सोमपान के निमित बुलाते हैं । वे सभी अनेक रंगों वाली पृथ्वी के पुत्र महान् वीर एवं पराक्रमी हैं ॥ १० ॥
२४०. जयतामिव तन्यतुर्मरुतामेति धृष्णुया । यच्छुभं याथना नरः ॥ ११ ॥
वेग से प्रवाहित होने वाले महतों का शब्द विजयनाद के सदृश गुंजित होता है, उससे सभी मनुष्यों का मंगल होता है ॥ ११ ॥
२४१. हस्काराद्विद्युतस्पर्यतो जाता अवन्तु नः । मरुतो मृळयन्तु नः ॥ १२ ॥
चमकने वाली विद्युत् से उत्पन्न हुए मरुद्गण हमारी रक्षा करें और प्रसन्नता प्रदान करें ॥ १२ ॥
(विज्ञान का मत है कि मेघों में बिजली चमकने से नाइट्रोजन आदि में उर्वरता बढ़ाने वाले यौगिक बनते हैं । वे निश्चित सरूम से जीवन रक्षक एवं हितकारी होते हैं ।)
२४२. आ पूषञ्चित्रबर्हिषमाघृणे धरुणं दिवः । आजा नष्टं यथा पशुम् ॥ १३ ॥
हे दीप्तिमान् पूषादेव आप अद्भुत तेजों से युक्त एवं धारण शक्ति से सम्पन्न हैं । अतः सोम को द्युलोक से वैसे ही लाएँ, जैसे खोये हुए पशु को ढूंढकर लाते हैं ॥ १३ ॥
२४३. पूषा राजानमाघृणिरपगूळ्हं गुहा हितम् । अविन्दच्चित्रबर्हिषम् ॥ १४ ॥
दीप्तिमान् पूषादेव ने अंतरिक्ष गुहा में छिपे हुए शुभ्र तेजों से युक्त सोमराजा को प्राप्त किया ॥ १४ ॥
२४४. उतो स मह्यमिन्दुभिः षड्युक्ताँ अनुसेषिधत् । गोभिर्यवं न चर्कृषत् ॥ १५ ॥
वे पूषादेव हमारे लिए, याग के हेतुभूत सोमों के साथ वसंतादि षट्क्रतुओं को क्रमशः वैसे ही प्राप्त कराते हैं, जैसे यवों (अनाजों) के लिए कृषक बार-बार खेत जोतता है ॥ १५ ॥
२४५. अम्बयो यन्त्यध्वभिर्जामयो अध्वरीयताम् । पृञ्वतीर्मधुना पयः ॥ १६ ॥
यज्ञ की इच्छा करने वालों के सहायक मधुर रसरूप जल – प्रवाह, माताओं के सदृश पुष्टिप्रद हैं । वे दुग्ध को पुष्ट करते हुए यज्ञमार्ग से गमन करते हैं ॥ १६ ॥
[यज्ञ द्वारा पुष्टि प्रदायक रस प्रवाहों के विस्तार का उल्लेख है।]
२४६. अमूर्या उप सूर्ये याभिर्वा सूर्यः सह । ता नो हिन्वन्त्वध्वरम् ॥ १७ ॥
जो वे जल सूर्य में (सूर्य किरणों में) समाहित है अथवा जिन जलों के साथ सूर्य का सान्निध्य है, ऐसे वे पवित्र जल हमारे यज्ञ को उपलब्ध हो ॥ १७ ॥
(उक्त दो मंत्रों में अंतरिक्ष की कृषि का वर्णन है । खेत में अन्न दिखता नहीं, किन्तु उससे उत्पन्न होता है । पूषा-पोषण देने वाले देवों (यज्ञ एवं सूर्य आदि) द्वारा सोम (सूक्ष्म पोषक तत्व) बोया एवं उपजाया जाता है ।)
२४७. अपो देवीरूप ह्वये यत्र गावः पिबन्ति नः । सिन्धुभ्यः कर्त्वं हविः ॥ १८ ॥
हमारी गायें जिस जल का सेवन करती हैं, उन जलों का हम स्तुतिगान करते हैं । (अन्तरिक्ष एवं भूमि पर) प्रवाहमान उन जलों के निमित्त हम हवि अर्पित करते हैं ॥ १८ ॥
१९ से २३ तक के मंत्रों में जस के गुणों और उस्से शारीरिक एवं मानसिक रोगों के शमन का उल्लेख है –
२४८. अप्स्वऽन्तरमृतमप्सु भेषजमपामुत प्रशस्तये । देवा भवत वाजिनः ॥ १९ ॥
जल में अमृतोपम गुण है, जल में ओषधीय गुण है । हे देवो ! ऐसे जल की प्रशंसा से आप उत्साह प्राप्त करें ॥ १९ ॥
२४९. अप्सु मे सोमो अन्नवीदन्तर्विश्वानि भेषजा । अग्नि च विश्वशम्भुवमापश्च विश्वभेषजीः ॥ २० ॥
मुझ (मंत्र द्रष्टा मुनि) से सोमदेव ने कहा है कि जल समूह में सभी ओषधियाँ समाहित हैं । जल में हो सर्व सुख प्रदायक अग्नितत्व समाहित है । सभी ओषधियाँ जलों से ही प्राप्त होती हैं ॥ २० ॥
२५०. आपः पृणीत भेषजं वरूथं तन्वे३मम । ज्योक् च सूर्यं दृशे ॥ २१ ॥
हे जल समूह ! जीवन रक्षक ओषधियों को हमारे शरीर में स्थित करें, जिससे हम नीरोग होकर चिरकाल तक सूर्यदेव का दर्शन करते रहें ॥ २१ ॥
२५१. इदमापः प्र वहत यत्कि च दुरितं मयि । यद्वाहमभिदुद्रोह यद्वा शेप उतानृतम् ॥ २२ ॥
हे जल देवो ! हम याजकों ने अज्ञानवश जो दुष्कृत्य किये हों, जान-बूझकर किसी से दोह किया हो, सत्पुरुषों पर आक्रोश किया हो या असत्य आचरण किया हो तथा इस प्रकार के हमारे जो भी दोष हों, उन सबको बहाकर दूर करें ॥ २२ ॥
२५२. आपो अद्यान्वचारिषं रसेन समगस्महि । पयस्वानग्न आ गहि तं मा सं सृज वर्चसा ॥२३॥
आज हमने जल में प्रविष्ट होकर अवभृथ स्नान किया है, इस प्रकार जल में प्रवेश करके हम रस से आप्लावित हुए हैं । हे पयस्वान् ! हे अग्निदेव ! आप हमें वर्चस्वी बनाएँ, हम आपका स्वागत करते हैं ॥ २३ ॥
२५३. सं माग्ने वर्चसा सूज सं प्रजया समायुषा । विद्युमें अस्य देवा इन्द्रो विद्यात्सह ऋषिभिः ॥ २४ ॥
हे अग्निदेव ! आप हमें तेजस्विता प्रदान करें । हमें प्रजा और दीर्घ आयु से युक्त करें । देवगण हमारे अनुष्ठान को जानें और इन्द्रदेव ऋषियों के साथ इसे जानें ॥ २४ ॥
[ सूक्त २४ ]
[ ऋषि – शुनःशेप आजीगर्ति (कृत्रिम देवरात वैश्वामित्र) । देवता – १ क (प्रजापति), २ अग्नि, ३-४ सविता, ५ सविता अथवा भग, ६-१५ वरुण । छन्द – १, २, ६-१५ त्रिष्टुप्, ३-५ गायत्री । ]
२५४. कस्य नूनं कतमस्यामृतानां मनामहे चारु देवस्य नाम । को नो मह्या अदितये पुनर्दात्पितरं च दृशेयं मातरं च ॥ १ ॥
हम अमर देवों में से किस देव के सुन्दर नाम का स्मरण करें ? कौन से देव हमें महती अदिति – पृथिवी को प्राप्त करायेंगे ? जिससे हम अपने पिता और माता को देख सकेंगे ॥ १ ॥
२५५. अग्नेर्वयं प्रथमस्यामृतानां मनामहे चारु देवस्य नाम । स नो मह्या अदितये पुनर्दात्पितरं च दृशेयं मातरं च ॥ २ ॥
हम अमर देवों में प्रथम अग्निदेव के सुन्दर नाम का मनन करें । वह हमें महती अदिति को प्राप्त करायेंगे, जिससे हम अपने माता-पिता को देख सकेंगे ॥ २ ॥
२५६. अभि त्वा देव सवितरीशानं वार्याणाम् । सदावन्भागमीमहे ॥ ३ ॥
हे सर्वदा रक्षणशील सवितादेव । आप वरण करने योग्य धनों के स्वामी हैं, अतः हम आपसे ऐश्वयों के उत्तम भाग को माँगते हैं ॥ ३ ॥
२५७. यश्चिद्धि त इत्था भगः शशमानः पुरा निदः । अद्वेषो हस्तयोर्दधे ॥ ४ ॥
हे सवितादेव ! आप तेजस्विता युक्त, निन्दा रहित, द्वेष रहित, वरण करने योग्य धनों को दोनों हाथों से धारण करने वाले हैं ॥ ४ ॥
२५८. भगभक्तस्य ते वयमुदशेम तवावसा । मूर्धानं राय आरभे ॥ ५ ॥
हे सवितादेव ! हम आपके ऐश्वर्य की छाया में रहकर संरक्षण को प्राप्त करें । उन्नति करते हुए सफलताओं के सर्वोच्च शिखर तक पहुँचकर भी अपने कर्तव्यों को पूरा करते रहें ॥ ५ ॥
[ उच्चपदों पर पहुँचकर भी मानवोचित सहज कर्तव्यों को न भूलने का संकल्प यहाँ व्यक्त हो रहा है । ]
२५९. नहि ते क्षत्रं न सहो न मन्युं वयश्चनामी पतयन्त आपुः । नेमा आपो अनिमिषं चरन्तीर्न ये वातस्य प्रमिनन्त्यभ्वम् ॥ ६ ॥
हे वरुणदेव ! ये उड़ने वाले पक्षी आपके पराक्रम, आपके बल और सुनीति युक्त क्रोध (मन्यु) को नहीं जान पाते । सतत गमनशील जलप्रवाह आपकी गति को नहीं जान सकते और प्रबल वायु के वेग भी आपको नहीं रोक सकते ॥ ६ ॥
२६०. अबुध्ने राजा वरुणो वनस्योर्ध्वं स्तूपं ददते पूतदक्षः । नीचीनाः स्थुरुपरि बुध्न एषामस्मे अन्तर्निहिताः केतवः स्युः ॥ ७ ॥
पवित्र पराक्रम युक्त राजा वरुण (सबको आच्छादित करने वाले) दिव्य तेज पुञ्ज (सूर्यदेव) को, आधारहित आकाश में धारण करते हैं । इस तेज पुञ्ज (सूर्यदेव) का मुख नीचे की ओर और मूल ऊपर की ओर है । इसके मध्य में दिव्य किरणें विस्तीर्ण होती चलती हैं ॥ ७ ॥
२६१. उरुं हि राजा वरुणश्चकार सूर्याय पन्थामन्वेतवा उ । अपदे पादा प्रतिधातवेऽकरुतापवक्ता हृदयाविधश्चित् ॥ ८ ॥
राजा वरुणदेव ने सूर्यगमन के लिए विस्तृत मार्ग निर्धारित किया है, जहाँ पैर भी स्थापित न हो, वे ऐसे अन्तरिक्ष स्थान पर भी चलने के लिए मार्ग विनिर्मित कर देते हैं और वे हृदय की पीड़ा का निवारण करने वाले हैं ॥ ८ ॥
२६२. शतं ते राजन्भिषजः सहस्रमुर्वी गभीरा सुमतिष्टे अस्तु । बाधस्य दूरे निर्ऋतिं पराचैः कृतं चिदेनः प्र मुमुग्ध्यस्मत् ॥ ९ ॥
हे वरुणदेव ! आपके पास असंख्य उपाय हैं । आपकी उत्तम बुद्धि अत्यन्त व्यापक और गम्भीर है । आप हमारी पाप वृत्तियों को हमसे दूर करें । किये हुए पापों से हमें विमुक्त करें ॥ ९ ॥
२६३. अमी य ऋक्षा निहितास उच्चा नक्तं ददृश्रे कुह चिद्दिवेयुः । अदब्धानि वरुणस्य व्रतानि विचाकशच्चन्द्रमा नक्तमेति ॥ १० ॥
ये नक्षत्रगण आकाश में रात्रि के समय दिखते हैं, परन्तु ये दिन में कहाँ विलीन होते हैं ? विशेष प्रकाशित चन्द्रमा रात्रि में आता है । वरुणराजा के ये नियम कभी नष्ट नहीं होते ॥ १० ॥
२६४. तत्वा यामि ब्रह्मणा वन्दमानस्तदा शास्ते यजमानो हविर्भिः । अहेळमानो वरुणेह बोध्युरुशंस मा न आयुः प्र मोषीः ॥ ११ ॥
हे वरुणदेव ! मन्त्ररूप वाणी से आपकी स्तुति करते हुए आपसे याचना करते हैं । यजमान हविष्यान्न अर्पित करते हुए कहते हैं – हे बहु प्रशंसित देव ! हमारी उपेक्षा न करें, हमारी स्तुतियों को जानें । हमारी आयु को क्षीण न करें ॥ ११ ॥
२६५. तदिन्नक्तं तद्दिवा महामाहुस्तदयं केतो हृद आ वि चष्टे । शुनः शेपो यमह्वद्गृभीतः सो अस्मान् राजा वरुणो मुमोक्तु ॥ १२ ॥
रात-दिन में (अनवरत) ज्ञानियों के कहे अनुसार यही ज्ञान (चिन्तन) हमारे हृदय में होता रहा है कि बन्धन में पड़े शुनःशेप ने जिस वरुणदेव को बुलाकर मुक्ति को प्राप्त किया, वही वरुणदेव हमें भी बन्धनों से मुक्त करें ॥ १२ ॥
२६६. शुनः शेपो ह्यह्वद्गृभीतस्त्रिष्वादित्यं द्रुपदेषु बद्धः । अवैनं राजा वरुणः ससृज्याद्विद्वाँ अदब्धो वि मुमोक्तु पाशान् ॥ १३ ॥
तीन स्तम्भों में बंधे हुए शुनःशेप ने अदिति पुत्र वरुणेदव का आवाहन करके उनसे निवेदन किया कि वे ज्ञानी और अटल वरुणदेव हमारे पाशों को काटकर हमें मुक्त करें ॥ १३ ॥
२६७. अव ते हेळो वरुण नमोभिरव यज्ञेभिरीमहे हविर्भिः । क्षयन्नस्मध्यमसुर प्रचेता राजन्नेनांसि शिश्रथः कृतानि ॥ १४ ॥
हे वरुणदेव ! आपके क्रोध को शान्त करने के लिए हम स्तुति रूप वचनों को सुनाते हैं । हविर्द्रव्यों के द्वारा यज्ञ में सन्तुष्ट होकर हे प्रखर बुद्धि वाले राजन् ! आप हमारे यहाँ वास करते हुए हमें पापों के बन्धन से मुक्त करें ॥ १४ ॥
२६८. उदुत्तमं वरुण पाशमस्मदवाथमं वि मध्यमं श्रथाय । अथा वयमादित्य व्रते तवानागसो अदितये स्याम ॥ १५ ॥
हे वरुणदेव । आप तीनों तापों रूपी बन्धनों से हमें मुक्त करें । आधिदैविक, आधिभौतिक और आध्यात्मिक पाश हमसे दूर हों तथा मध्य के एवं नीचे के बन्धन अलग करें । हे सूर्य पुत्र ! पापों से रहित होकर हम आपके कर्मफल सिद्धान्त में अनुशासित हों, दयनीय स्थिति में हम न रहें ॥ १५ ॥
[ सूक्त २५ ]
[ ऋषि – शुनःशेप आजीगर्ति (कृत्रिम देवरात वैश्वामित्र) । देवता – वरुण । छन्द – गायत्री । ]
२६९. यच्चिद्धि ते विशो यथा प्र देव वरुण व्रतम् । मिनीमसि द्यविद्यवि ॥ १ ॥
हे वरुणदेव ! जैसे अन्य मनुष्य आपके व्रत-अनुष्ठान में प्रमाद करते हैं, वैसे ही हमसे भी आपके नियमों आदि में कभी-कभी प्रमाद हो जाता है । (कृपया इसे क्षमा करें ।) ॥ १ ॥
२७०. मा नो वधाय हत्नवे जिहीळानस्य रीरधः । मा हुणानस्य मन्यवे ॥ २ ॥
हे वरुणदेव ! आप अपने निरादर करने वाले का वध करने के लिए धारण किये गये शस्त्र के सम्मुख हमें प्रस्तुत न करें । अपनी क्रुद्ध अवस्था में भी हम पर कृपा करके क्रोध न करें ॥ २ ॥
२७१. वि मृळीकाय ते मनो रथीरश्वं न सन्दितम् । गीर्भिर्वरुण सीमहि ॥ ३ ॥
हे वरुणदेव । जिस प्रकार रथी वीर अपने थके घोड़ों की परिचर्या करते हैं, उसी प्रकार आपके मन को हर्षित करने के लिए हम स्तुतियों का गान करते हैं ॥ ३ ॥
२७२. परा हि मे विमन्यवः पतन्ति वस्यइष्टये । वयो न वसतीरूप ॥ ४ ॥
(हे वरुणदेव !) जिस प्रकार पक्षी अपने घोसलों की ओर दौड़ते हुए गमन करते हैं, उसी प्रकार हमारी चंचल बुद्धियाँ धन प्राप्ति के लिए दूर-दूर दौड़ती हैं ॥ ४ ॥
२७३. कदा क्षत्रश्रियं नरमा वरुणं करीमहे । मुळीकायोरुचक्षसम् ॥ ५ ॥
बल-ऐश्वर्य के अधिपति सर्वद्रष्टा वरुणदेव को कल्याण के निमित्त हम यहाँ (यज्ञस्थल में) कब बुलायेंगे ? (अर्थात् यह अवसर कब मिलेगा ?) ॥ ५ ॥
२७४. तदित्समानमाशाते वेनन्ता न प्र युच्छतः। धृतव्रताय दाशुषे ॥ ६ ॥
व्रत धारण करने वाले (हविष्यान्न) दाता यजमान के मंगल के निमित्त ये मित्र और वरुण देव हविष्यान्न की इच्छा करते हैं, वे कभी उसका त्याग नहीं करते । वे हमें बन्धन से मुक्त करें ॥ ६ ॥
२७५. वेदा यो वीनां पदमन्तरिक्षेण पतताम् । वेद नावः समुद्रियः ॥ ७ ॥
हे वरुणदेव । अन्तरिक्ष में उड़ने वाले पक्षियों के मार्ग को और समुद्र में संचार करने वाली नौकाओं के मार्ग को भी आप जानते हैं ॥ ७ ॥
२७६. वेद मासो धृतव्रतो द्वादश प्रजावतः । वेदा य उपजायते ॥ ८ ॥
नियमधारक वरुणदेव प्रजा के उपयोगी बारह महीनों को जानते हैं और तेरहवें माह (अधिक मास) को भी जानते हैं ॥ ८ ॥
२७७. वेद वातस्य वर्तनिमुरोर्ऋष्वस्य बृहतः । वेदा ये अध्यासते ॥ ९ ॥
वे वरुणदेव अत्यन्त विस्तृत, दर्शनीय और अधिक गुणवान् वायु के मार्ग को जानते हैं । वे ऊपर द्युलोक में रहने वाले देवों को भी जानते हैं ॥ ९ ॥
२७८. नि बसाद घृतवतो वरुणः पस्त्या३स्वा । साम्राज्याय सुक्रतुः ॥ १० ॥
प्रकृति के नियमों का विधिवत् पालन कराने वाले, श्रेष्ठ कर्मों में सदैव निरत रहने वाले वरुणदेव प्रजाओं में साम्राज्य स्थापित करने के लिए बैठते हैं ॥ १० ॥
२७९. अतो विश्वान्यद्भुता चिकित्वाँ अभि पश्यति । कृतानि या च कर्त्या ॥ ११ ॥
सब अद्भुत कर्मों की क्रिया-विधि जानने वाले वरुणदेव, जो कर्म सम्पादित हो चुके हैं और जो किये जाने हैं, उन सबको भली-भाँति देखते हैं ॥ ११ ॥
२८०. स नो विश्वाहा सुक्रतुरादित्यः सुपथा करत् । प्र ण आयूंषि तारिषत् ॥ १२ ॥
वे उत्तम कर्मशील अदिति पुत्र वरुणदेव हमें सदा श्रेष्ठ मार्ग की ओर प्रेरित करें और हमारी आयु को बढ़ाएँ ॥ १२ ॥
२८१. बिभ्रद्द्रापिं हिरण्ययं वरुणो वस्त निर्णिजम् । परि स्पशो नि षेदिरे ॥ १३ ॥
सुवर्णमय कवच धारण करके वरुणदेव अपने हृष्ट-पुष्ट शरीर को सुसज्जित करते हैं । शुभ्र प्रकाश किरणें उनके चारों ओर विस्तीर्ण होती हैं ॥ १३ ॥
२८२. न यं दिप्सन्ति दिप्सवो न द्रुह्वाणो जनानाम् । न देवमभिमातयः ॥ १४ ॥
हिंसा करने की इच्छा वाले शत्रु-जन (भयाक्रान्ता होकर) जिनकी हिंसा नहीं कर पाते, लोगों के प्रति द्वेष रखने वाले, जिनसे द्वेष नहीं कर पाते – ऐसे (वरुण) देव को पापीजन स्पर्श तक नहीं कर पाते ॥ १४ ॥
२८३. उत यो मानुषेध्वा यशश्चके असाम्या । अस्माकमुदरेष्वा ॥ १५ ॥
जिन वरुणदेव ने मनुष्यों के लिए विपुल अन्न – भंडार उत्पन्न किया है; उन्होंने ही हमारे उदर में पाचन सामर्थ्य भी स्थापित की है ॥ १५ ॥
२८४. परा मे यन्ति धीतयो गावो न गव्यूतीरनु । इच्छन्तीरुरुचक्षसम् ॥ १६ ॥
उस सर्वद्रष्टा वरुणदेव की कामना करनेवाली हमारी बुद्धियाँ, वैसे ही उन तक पहुँचती हैं, जैसे गौएँ गोष्ठ (बाड़े) की ओर जाती हैं ॥ १६ ॥
२८५. सं नु वोचावहै पुनर्यतो मे मध्वाभृतम् । होतेव क्षदसे प्रियम् ॥ १७ ॥
होता (अग्निदेव) के समान हमारे द्वारा लाकर समर्पित की गई हवियों का आप अग्निदेव के समान भक्षण करें, फिर हम दोनों वार्ता करेंगे ॥ १७ ॥
२८६. दर्शं नु विश्वदर्शतं दर्शं रथमथि क्षमि । एता जुषत मे गिरः ॥ १८ ॥
दर्शन योग्य वरुणदेव को उनके रथ के साथ हमने भूमि पर देखा है । उन्होंने हमारी स्तुतियाँ स्वीकारी है ॥ १८ ॥
२८७. इमं में वरुण श्रुधी हवमद्या च मृळय । त्वामवस्युरा चके ॥ १९ ॥
हे वरुणदेव ! आप हमारी प्रार्थना पर ध्यान दें, हमें सुखी बनायें । अपनी रक्षा के लिए हम आपकी स्तुति करते हैं ॥ १९ ॥
२८८. त्वं विश्वस्य मेधिर दिवश्च ग्मश्च राजसि । स यामनि प्रति श्रुधि ॥ २० ॥
हे मेधावी वरुणदेव ! आप द्युलोक, भूलोक और सारे विश्वपर आधिपत्य रखते हैं, आप हमारे आवाहन को स्वीकार कर ‘हम रक्षा करेंगे’ ऐसा प्रत्युत्तर प्रदान करें ॥ २० ॥
२८९. उदुत्तमं मुमुग्धि नो वि पाशं मध्यमं चृत । अवाधमानि जीवसे ॥ २१ ॥
हे वरुणदेव ! हमारे उत्तम (ऊपर के) पाश को खोल दें, हमारे मध्यम पाश को काट दें और हमारे नीचे के पाश को हटाकर हमें उत्तम जीवन प्रदान करें ॥ २१ ॥
[ सूक्त – २६ ]
[ ऋषि – शुनःशेप आजीगर्ति (कृत्रिम देवरात वैश्वामित्र) । देवता – अग्नि । छन्द – गायत्री । ]
२९०. वसिष्वा हि मियेध्य वस्त्राण्यूर्जा पते । सेमं नो अध्वरं यज ॥ १ ॥
हे यज्ञ योग्य, (हवियोग्य) अन्नों के पालक अग्निदेव ! आप अपने तेजरूप वस्त्रों को पहनकर हमारे यज्ञ को सम्पादित करें ॥ १ ॥
२९१. नि नो होता वरेण्यः सदा यविष्ठ मन्मभिः । अग्ने दिवित्मता वचः ॥ २ ॥
सदा तरुण रहने वाले हे अग्निदेव ! आप सर्वोत्तम होता (यज्ञ सम्पन्न कर्ता) के रूप में यज्ञकुण्ड में स्थापित होकर यजमान के स्तुति वचनों का श्रवण करें ॥ २ ॥
२९२. आ हि घ्या सूनव पितापिर्यजत्यापय । सखा सख्य वरेण्यः ॥ ३ ॥
हे वरण करने योग्य अग्निदेव जैसे पिता अपने पुत्र के, भाई अपने भाई के और मित्र अपने मित्र के सहायक होते हैं, वैसे ही आप हमारी सहायता करें ॥ ३ ॥
२९३. आ नो बहीं रिशादसो वरुणो मित्रो अर्यमा । सीदन्तु मनुषो यथा ॥ ४ ॥
जिस प्रकार प्रजापति के यज्ञ में “मनु” आकर शोभा बढ़ाते हैं, उसी प्रकार शत्रुनाशक वरुणदेव, मित्र – देव एवं अर्यमादेव हमारे यज्ञ में आकर विराजमान हों ॥ ४ ॥
२९४. पूर्व्य होतरस्य नो मन्दस्व सख्यस्य च । इमा उ षु श्रुधी गिरः ॥ ५ ॥
पुरातन होता हे अग्निदेव ! आप हमारे इस यज्ञ से और हमारे मित्रभाव से प्रसन्न हों और हमारी स्तुतियों को भली प्रकार सुनें ॥ ५ ॥
२९५. यच्चिद्धि शश्वता तना देवन्देवं यजामहे । त्वे इद्धूयते हविः ॥ ६ ॥
हे अग्निदेव ! इन्द्र, वरुण आदि अन्य देवताओं के लिए प्रतिदिन विस्तृत आहुतियाँ अर्पित करने पर भी सभी हविष्यान्न आपको ही प्राप्त होते हैं ॥ ६ ॥
२९६. प्रियो नो अस्तु विश्पतिर्होता मन्द्रो वरेण्यः । प्रियाः स्वग्नयो वयम् ॥ ७ ॥
यज्ञ सम्पन्न करने वाले प्रजापालक आनन्दवर्धक, वरण करने योग्य हे अग्निदेव ! आप हमें प्रिय हों तथा श्रेष्ठ विधि से यज्ञाग्नि की रक्षा करते हुए हम सदैव आपके प्रिंय रहें ॥ ७ ॥
२९७. स्वग्नयो हि वार्यं देवासो दधिरे च नः । स्वग्नयो मनामहे ॥ ८ ॥
उत्तम अग्नि से युक्त होकर देदीप्यमान ऋत्विजों ने हमारे लिए ऐश्वर्य को धारण किया है, वैसे ही हम उत्तम अग्नि से युक्त होकर इनका (ऋत्विज् का) स्मरण करते हैं ॥ ८ ॥
२९८. अथा न उभयेषाममृत मर्त्यानाम् । मिथः सन्तु प्रशस्तयः ॥ ९ ॥
अमरत्व को धारण करने वाले हे अग्निदेव! आपके और हम मरणशील मनुष्यों के बीच स्नेहयुक्त, प्रशंसनीय वाणियों का आदान प्रदान होता रहे ॥ ९ ॥
२९९. विश्वेभिरग्ने अग्निभिरिमं यज्ञमिदं वचः । चनो धाः सहसो यहो ॥ १० ॥
बल के पुत्र (अरणि मन्थन रूप शक्ति से उत्पन्न) हे अग्निदेव ! आप (आहवनीयादि) अग्नियों के साथ यज्ञ में पधारें और स्तुतियों को सुनते हुए हमें अन्न (पोषण) प्रदान करें ॥ १० ॥
[ सूक्त – २७ ]
[ ऋषि – शुनः शेप आजीगर्ति (कृत्रिम देवरात वैश्वामित्र) । देवता – १-१२ अग्नि, १३ देवतागण । छन्द – १-१२ गायत्री, १३ त्रिष्टुप् । ]
३००. अश्वं न त्वा वारवन्तं वन्दध्या अग्निं नमोभिः । सम्राजन्तमध्वराणाम् ॥ १ ॥
तमोनाशक, यज्ञों के सम्राट् स्वरूप हे अग्निदेव ! हम स्तुतियों के द्वारा आपकी वन्दना करते हैं । जिस प्रकार अश्व अपनी पूँछ के बालों से मक्खी मच्छरों को दूर भगाता है, उसी प्रकार आप भी अपनी ज्वालाओं से हमारे विरोधियों को दूर भगायें ॥ १ ॥
३०१. स घा नः सूनुः शवसा पृथुप्रगामा सुशेवः । मीढ्वाँ अस्माकं बभूयात् ॥ २ ॥
हम इन अग्निदेव की उत्तम विधि से उपासना करते हैं । वे बल से उत्पन्न, शीघ्र गतिशील अग्निदेव हमें अभीष्ट सुखों को प्रदान करें ॥ २ ॥
३०२. स नो दूराच्चासाच्च नि मर्त्यादघायोः । पाहि सदमिद्विश्वायुः ॥ ३ ॥
हे अग्निदेव ! सब मनुष्यों के हितचिंतक आप दूर से और निकट से, अनिष्ट चिन्तकों से सदैव हमारी रक्षा करें ॥ ३ ॥
३०३. इममू षु त्वमस्माकं सनिं गायत्रं नव्यांसम् । अग्ने देवेषु प्र वोचः ॥ ४ ॥
हे अग्निदेव ! आप हमारे गायत्री परक प्राण-पोषक स्तोत्रों एवं नवीन अन्न (हव्य) को देवों तक (देव वृत्तियों के पोषण हेतु) पहुंचायें ॥ ४ ॥
३०४. आ नो भज परमेष्वा वाजेषु मध्यमेषु । शिक्षा वस्वो अन्तमस्य ॥ ५ ॥
हे अग्निदेव ! आप हमें श्रेष्ठ (आध्यात्मिक), मध्यम (आधिदैविक) एवं कनिष्ठ (आधिभौतिक) अर्थात् सभी प्रकार की धन-सम्पदा प्रदान करें ॥ ५ ॥
३०५. विभक्तासि चित्रभानो सिन्धोरूर्मा उपाक आ । सद्यो दाशुषे क्षरसि ॥ ६ ॥
सात ज्वालाओं से दीप्तिमान् हे अग्निदेव ! आप धनदायक हैं । नदी के पास आने वाली जल तरंगों के सदृश आप हविष्यान्न-दाता को तत्क्षण (श्रेष्ठ) कर्मफल प्रदान करते हैं ॥ ६ ॥
३०६. यमग्ने पृत्सु मर्त्यमवा वाजेषु यं जुनाः । स यन्ता शश्वतीरिषः ॥ ७ ॥
हे अग्नि देव ! आप जीवन-संग्राम में जिस पुरुष को प्रेरित करते हैं, उनकी रक्षा आप स्वयं करते हैं । साथ ही उनके लिए पोषक अन्नों की पूर्ति भी करते हैं ॥ ७ ॥
३०७. नकिरस्य सहन्त्य पर्येता कयस्य चित् । वाजो अस्ति श्रवाय्यः ॥ ८ ॥
हे शत्रु विजेता अग्निदेव ! आपके उपासक को कोई पराजित नहीं कर सकता, क्योंकि उसकी (आपके द्वारा प्रदत्त) तेजस्विता प्रसिद्ध है ॥ ८ ॥
३०८. स वाजं विश्वचर्षणिरर्वद्भिरस्तु तरुता । विप्रेभिरस्तु सनिता ॥ ९ ॥
सब मनुष्यों के कल्याणकारक वे अग्निदेव जीवन-संग्राम में अश्व रूपी इन्द्रियों द्वारा विजयी बनाने वाले हों । मेधावी पुरुषों द्वारा प्रशंसित वे अग्निदेव हमें अभीष्ट फल प्रदान करें ॥ ९ ॥
३०९. जराबोध तद्विविड्डि विशेविशे यज्ञियाय । स्तोमं रुद्राय दृशीकम् ॥ १० ॥
स्तुतियों से देवों को प्रबोधित करने वाले हे अग्निदेव ! ये यजमान्, पुनीत यज्ञ स्थल पर दुष्टता-विनाश हेतु आपका आवाहन करते हैं ॥ १० ॥
३१०. स नो महाँ अनिमानो धूमकेतुः पुरुश्चन्द्रः । धिये वाजाय हिन्वतु ॥ ११ ॥
अपरिमित धूम्र-ध्वजा से युक्त आनन्दप्रद, महान् वे अग्निदेव हमें ज्ञान और वैभव की ओर प्रेरित करें ॥ ११ ॥
३११. स रेवों इव विश्पतिर्दैव्यः केतुः शृणोतु नः । उक्थैरग्निर्वृहद्भानुः ॥ १२ ॥
विश्वपालक, अत्यन्त तेजस्वी और ध्वजा सदृश गुणों से युक्त दूरदर्शी वे अग्निदेव वैभवशाली राजा के समान हमारी स्तवन रूपी वाणियों को ग्रहण करें ॥ १२ ॥
३१२. नमो महद्ध्यो नमो अर्धकेभ्यो नमो युवभ्यो नम आशिनेभ्यः । यजाम देवान्यदि शन्कवाम मा ज्यायसः शंसमा वृक्षि देवाः ॥ १३ ॥
बड़ों, छोटों, युवकों और वृद्धों को हम नमस्कार करते हैं । सामर्थ्य के अनुसार हम देवों का यजन करें । हे देवो ! अपने से बड़ों के सम्मान में हमारे द्वारा कोई त्रुटि न हो ॥ १३ ॥
[ सूक्त – २८ ]
[ ऋषि – शुनः शेप आजीगर्ति (कृत्रिम देवरात वैश्वामित्र) । देवता – १-४ इन्द्र, ५-६ उलूखल, ७-८ उलूखल-मुसल, ९ प्रजापति, हरिश्चन्द्र; अधिषवणचर्म अथवा सोम । छन्द – १-६ अनुष्टुप्, ७-९ गायत्री । ]
३१३. यत्र ग्रावा पृथुबुध्न ऊर्ध्वो भवति सोतवे । उलूखलसुतानामवेद्विन्द्र जल्गुलः ॥ १ ॥
हे इन्द्रदेव ! जहाँ (सोमवल्ली) कूटने के लिए बड़ा मूसल उठाया जाता है (अर्थात् सोमरस तैयार किया जाता है), वहाँ (यज्ञशाला में) उलूखल से निष्पन्न सोमरस का पान करें ॥ १ ॥
३१४. यत्र द्वाविव जघनाधिषवण्या कृता । उलूखलसुतानामवेद्विन्द्र जल्गुलः ॥ २ ॥
हे इन्द्रदेव! जहाँ दो जंघाओं के समान विस्तृत, सोम कूटने के दो फलक रखे हैं, वहाँ (यज्ञशाला में) उलूखल से निष्पन्न सोम का पान करें ॥ २ ॥
३१५. यत्र नार्यपच्यवमुपच्यवं च शिक्षते । उलूखलसुतानामवेद्विन्द्र जल्गुलः ॥ ३ ॥
हे इन्द्रदेव! जहाँ गृहिणी सोमरस तैयार करने के लिए कूटने (मूसल चलाने) का अभ्यास करती है, वहाँ (यज्ञशाला में) उलूखल से निष्पन्न सोमरस का पान करें ॥ ३ ॥
३१६. यत्र मन्थां विबध्नते रश्मीन्यमितवा इव । उलूखलसुतानामवेद्विन्द्र जल्गुलः ॥ ४ ॥
हे इन्द्रदेव ! जहाँ सारथी द्वारा घोड़े को लगाम लगाने के समान (मथानी को) रस्सी से बाँधकर मन्थन करते है, वहाँ (यज्ञशाला में) उलूखल से निष्पन्न हुए सोमरस का पान करें ॥ ४ ॥
३१७. यच्चिद्धि त्वं गृहेगृह उलूखलक युज्यसे । इह द्युमत्तमं वद जयतामिव दुन्दुभिः ॥ ५ ॥
हे उलूखल ! यद्यपि घर-घर में तुमसे काम लिया जाता है, फिर भी हमारे घर में विजय-दुन्दुभि के समान उच्च शब्द करो ॥ ५ ॥
३१८. उत स्म ते वनस्पते वातो वि वात्यग्रमित् । अथो इन्द्राय पातये सुनु सोममुलूखल ॥ ६ ॥
हे उलूखल – मूसल रूप वनस्पते ! तुम्हारे सामने वायु विशेष गति से बहती है । हे उलूखल ! अब इन्द्रदेव के सेवनार्थ सोमरस का निष्पादन करो ॥ ६ ॥
३१९. आयजी वाजसातमा ता ह्यु१च्चा विजर्भृतः । हरी इवान्धांसि बप्सता ॥ ७ ॥
यज्ञ के साधन रूप पूजन-योग्य वे उलूखल और मूसल दोनों, अन्न (चने) खाते हुए इन्द्रदेव के दोनों अश्वों के समान उच्च स्वर से शब्द करते हैं ॥ ७ ॥
३२०. ता नो अद्य वनस्पती ऋष्वावृष्वेभिः सोतृभिः । इन्द्राय मधुमत्सुतम् ॥ ८ ॥
दर्शनीय उलूखल एवं मूसल रूप हे वनस्पते ! आप दोनों सोमयाग करने वालों के साथ इन्द्रदेव के लिए मधुर सोमरस का निष्पादन करें ॥ ८ ॥
३२१. उच्छिष्टं चम्वोर्भर सोमं पवित्र आ सृज । नि धेहि गोरधि त्वचि ॥ ९ ॥
उलूखल और मूसल द्वारा निष्पादित सोम को पात्र से निकालकर पवित्र कुशा के आसन पर रखें और अवशिष्ट को छानने के लिए पवित्र चर्म पर रखें ॥ ९ ॥
[ सूक्त – २९ ]
[ ऋषि – शुनः शेप आजीगर्ति (कृत्रिम देवरात वैश्वामित्र) । देवता – इन्द्र । छन्द – पंक्ति । ]
३२२. यच्चिद्धि सत्य सोमपा अनाशस्ता इव स्मसि । आ तू न इन्द्र शंसय गोष्वश्चेषु शुभ्रिषु सहस्रेषु तुवीमघ ॥ १ ॥
हे सत्य स्वरूप सोमपायी इन्द्रदेव ! यद्यपि हम प्रशंसा पाने के पात्र तो नहीं है, तथापि हे ऐश्वर्यशाली इन्द्रदेव ! हमें सहस्रों श्रेष्ठ गौएँ और घोड़े प्रदान करके सम्पन्न बनायें ॥ १ ॥
३२३. शिप्रिन्याजानां पते शचीवस्तव दंसना । आ तू न इन्द्र शंसय गोष्वश्चेषु शुभ्रिषु सहस्रेषु तुवीमघ ॥ २ ॥
हे इन्द्रदेव ! आप शक्तिशाली, शिरस्त्राण धारण करने वाले, बलों के अधीश्वर और ऐश्वर्यशाली हैं । आपका सदैव हम पर अनुग्रह बना रहे । हमें सहस्रों श्रेष्ठ गौएँ और अश्व प्रदान करके सम्पन्न बनायें ॥ २ ॥
३२४. नि ष्वापया मिथूदृशा सस्तामबुध्यमाने । आ तू न इन्द्र शंसय गोष्वश्चेषु शुभ्रिषु सहस्रेषु तुवीमघ ॥ ३ ॥
हे इन्द्रदेव! दोनों दुर्गतियाँ (विपत्ति और दरिद्रता) परस्पर एक दूसरे को देखती हुई सो जायें । ये कभी न जागें, वे अचेत पड़ी रहें । हे ऐश्वर्यशाली इन्द्रदेव ! हमें सहस्रों श्रेष्ठ गौएँ और अश्व प्रदान करके सम्पन्न बनायें ॥ ३ ॥
[ अश्व (पराक्रम) से विपत्ति तथा (पौष्टिक आहार उत्पादक) गौ से दरिद्रता प्रभावहीन होती है । ]
३२५. ससन्तु त्या अरातयो बोधन्तु शूर रातयः। आ तू न इन्द्र शंसय गोष्वश्चेषु शुभ्रिषु सहस्रेषु तुवीमघ ॥ ४ ॥
हे इन्द्रदेव ! हमारे शत्रु सोते रहें और हमारे वीर मित्र जागते रहें । हे ऐश्वर्यशाली इन्द्रदेव ! हमें सहस्रों श्रेष्ठ गौएँ और अश्व प्रदान करके सम्पन्न बनायें ॥ ४ ॥
३२६. समिन्द्र गर्दभं मृण नुवन्तं पापयामुया । आ तू न इन्द्र शंसय गोष्वश्चेषु शुभ्रिषु सहस्रेषु तुवीमघ ॥ ५ ॥
हे इन्द्रदेव ! कपटपूर्ण वाणी बोलने वाले शत्रु रूप गधे को मार डालें । हे ऐश्वर्यशासिन् इन्द्रदेव ! हमें सहस्रों पुष्ट गौएँ और अश्व देकर सम्पन्न बनायें ॥ ५ ॥
३२७. पताति कुण्ड्णाच्या दूरं वातो वनादधि । आ तू न इन्द्र शंसय गोष्वश्चेषु शुभ्रिषु सहस्रेषु तुवीमघ ॥ ६ ॥
हे इन्द्रदेव ! विध्वंसकारी बवंडर वनों से दूर जाकर गिरें । हे ऐश्वर्यशालिन् इन्द्रदेव ! हमें सहस्रों पुष्ट गौएँ और अश्व देकर सम्पन्न बनायें ॥ ६ ॥
३२८. सर्वं परिक्रोशं जहि जम्भया कृकदाश्वम् । आ तू न इन्द्र शंसय गोष्वश्चेषु शुभ्रिषु सहस्रेषु तुवीमघ ॥ ७ ॥
हे इन्द्रदेव ! हम पर आक्रोश करने वाले सब शत्रुओं को विनष्ट करें । हिंसकों का नाश करें । हे ऐश्वर्यशालिन् इन्द्रदेव ! हमें सहस्रों पुष्ट गौएँ और अश्व देकर सम्पन्न बनायें ॥ ७ ॥
[ सूक्त – ३० ]
[ ऋषि – शुनः शेप आजीगर्ति (कृत्रिम देवरात वैश्वामित्र) । देवता – १-१६ इन्द्र, १७-१९ अश्विनीकुमार, २०-२२ उषा । छन्द – १-१०, १२-१५ तथा १७-२२ गायत्री, ११ पादनिवृत् गायत्री, १६ त्रिष्टुप् । ]
३२९. आ व इन्द्रं क्रिविं यथा वाजयन्तः शतक्रतुम् । मंहिष्ठं सिञ्च इन्दुभिः ॥ १ ॥
जिस प्रकार अन्न की इच्छा वाले, खेत में पानी सींचते हैं, उसी तरह हम बल की कामना वाले साधक उन महान् इन्द्रदेव को सोमरस से सींचते हैं ॥ १ ॥
३३०. शतं वा यः शुचीनां सहस्त्रं वा समाशिराम् । एदु निम्नं न रीयते ॥ २ ॥
नीचे की ओर जाने वाले जल के समान सैकड़ों कलश सोमरस, सहस्रों कलश दूध में मिश्रित होकर इन्द्रदेव को प्राप्त होता है ॥ २ ॥
३३१. सं यन्मदाय शुष्मिण एना ह्यस्योदरे । समुद्रो न व्यचो दधे ॥ ३ ॥
समुद्र में एकत्र हुए जल के सदृश सोमरस इन्द्रदेव के पेट में एकत्र होकर उन्हें हर्ष प्रदान करता है ॥ ३ ॥
२. अयमु ते समतसि कपोत इव गर्भषिम् । वचस्तच्चिन्न ओहसे ॥ ४ ॥
हे इन्द्रदेव ! कपोत जिस स्नेह के साथ गर्भवती कपोती के पास रहता है, उसी प्रकार (स्नेहपूर्वक) यह सोमरस आपके लिये प्रस्तुत है । आप हमारे निवेदन को स्वीकार करें ॥ ४ ॥
३३३. स्तोत्रं राधानां पते गिर्वाहो वीर यस्य ते । विभूतिरस्तु सूनृता ॥ ५ ॥
जो (स्तोतागण), हे इन्द्र ! हे धनाधिपति ! हे स्तुतियों के आश्रयभूत ! हे वीर ! (इत्यादि) स्तुतियाँ करते हैं, उनके लिये आपकी विभूतियाँ प्रिय एवं सत्य सिद्ध हों ॥ ५ ॥
३३४. ऊर्ध्वस्तिष्ठा न ऊतये स्मिन्वाजे शतक्रतो । समन्येषु ब्रवावहै ॥ ६ ॥
सैकड़ों यज्ञादि श्रेष्ठ कार्यों को सम्पन्न करने वाले हे इन्द्रदेव ! संघर्षों (जीवन – संग्राम) में हमारे संरक्षण के लिये आप प्रयत्नशील रहें । हम आप से अन्य (श्रेष्ठ) कार्यों के विषय में भी परस्पर विचार-विनिमय करते रहें ॥ ६ ॥
३३५. योगेयोगे तवस्तरं वाजेवाजे हवामहे । सखाय इन्द्रमूतये ॥ ४७ ॥
सत्कर्मों के शुभारम्भ में एवं हर प्रकार के संग्राम में बलशाली इन्द्रदेव का हम अपने संरक्षण के लिये मित्रवत् आवाहन करते हैं ॥ ७ ॥
३३६. आ घा गमद्यदि श्रवत्सहस्रिणीभिरूतिभिः । वाजेभिरुप नो हवम् ॥ ८ ॥
हमारी प्रार्थना से प्रसन्न होकर वे इन्द्रदेव निश्चित ही सहस्रों रक्षा साधनों तथा अन्न, ऐश्वर्य आदि सहित हमारे पास आयेंगे ॥ ८ ॥
३३७. अनु प्रत्नस्यौकसो हुवे तुविप्रति नरम् । यं ते पूर्वं पिता हुवे ॥ ९ ॥
हम सहायता के लिये स्वर्गधाम के वासी, बहुतों के पास पहुँचकर उन्हें नेतृत्व प्रदान करने वाले इन्द्रदेव का आवाहन करते हैं । हमारे पिता ने भी ऐसा ही किया था ॥ ९ ॥
३३८. तं त्वा वयं विश्ववारा शास्महे पुरुहूत । सखे वसो जरितृभ्यः ॥ १० ॥
हे विश्ववरणीय इन्द्रदेव ! बहुतों द्वारा आवाहित किये जाने वाले आप स्तोताओं के आश्रय दाता और मित्र हैं । हम (ऋत्विग्गण) आप से उन (स्तोताओं) को अनुगृहीत करने की प्रार्थना करते हैं ॥ १० ॥
३३९. अस्माकं शित्रिणीनां सोमपाः सोमपान्वाम् । सखे वज्रिन्त्सखीनाम् ॥ ११ ॥
हे सोम पीने वाले वज्रधारी इन्द्रदेव ! सोम पीने के योग्य हमारे प्रियजनों और मित्रजनों में आप ही श्रेष्ठ सामर्थ्य वाले हैं ॥ ११ ॥
३४०. तथा तदस्तु सोमपाः सखे वज्रिन्तथा कृणु । यथा त उश्मसाष्टये ॥ १२ ॥
हे सोम पीने वाले वज्रधारी इन्द्रदेव ! हमारी इच्छा पूर्ण करें । हम इष्ट-प्राप्ति के निमित्त आपकी कामना करें और वह पूर्ण हो ॥ १२ ॥
३४१. रेवतीर्नः सधमाद इन्द्रे सन्तु तुविवाजाः । क्षुमन्तो याभिर्मदेम ॥ १३ ॥
जिन (इन्द्रदेव) की कृपा से हम धन-धान्य से परिपूर्ण होकर प्रफुल्लित होते हैं । उन इन्द्रदेव के प्रभाव से हमारी गौएँ (भी) प्रचुर मात्रा में दुग्ध-घृतादि देने की सामर्थ्य वाली हों ॥ १३ ॥
३४२. आ घ त्वावान्त्मनाप्तः स्तोतृभ्यो धृष्णवियानः । ऋणोरक्षं न चक्रयोः ॥ १४ ॥
हे धैर्यशाली इन्द्रदेव ! आप कल्याणकारी बुद्धि से स्तुति करने वाले स्तोताओं को अभीष्ट पदार्थ अवश्य प्रदान करें । आप स्तोताओं को धन देने के लिए रथ के चक्रों को मिलाने वाली धुरी के समान ही सहायक हैं ॥ १४ ॥
३४३. आ यद्दुवः शतक्रतवा कामं जरितृणाम् । ऋणोरक्षं न शचीभिः ॥ १५ ॥
हे इन्द्रदेव ! आप स्तोताओं द्वारा इच्छित धन उन्हें प्रदान करें । जिस प्रकार रथ की गति से उसके अक्ष (धुरे के आधार) को भी गति मिलती है, उसी प्रकार स्तुतिकर्ताओं को धन की प्राप्ति हो ॥ १५ ॥
३४४. शश्वदिन्द्रः पोप्रुथद्भिर्जिगाय नानदद्भिः शाश्वसद्भिर्धनानि । स नो हिरण्यरथं दंसनावान्त्स नः सनिता सनये स नोऽदात् ॥ १६ ॥
सदैव स्फूर्तिवान्, सदैव (शब्दवान्) हिनहिनाते हुए तीव्र गतिशील अश्वों के द्वारा जो इन्द्रदेव शत्रुओं के धन को जीतते हैं; उन पराक्रमशील इन्द्रदेव ने अपने स्नेह से हमें सोने का रथ (अकूत-वैभव) दिया है ॥ १६ ॥
३४५. आश्विनावश्वावत्येषा यातं शवीरया । गोमद्दस्रा हिरण्यवत् ॥ १७ ॥
हे शक्तिशाली अश्विनीकुमारो ! आप बलशाली अश्वों के साथ अन्नों, गौओं और स्वर्णादि धनों को लेकर यहाँ पधारें ॥ १७ ॥
३४६. समानयोजनो हि वां रथो दस्रावमर्त्यः । समुद्रे अश्विनेयते ॥ १८ ॥
हे अश्विनीकुमारो ! आप दोनों के लिए जुतने वाला एक ही रथ आकाश मार्ग से जाता है । उसे कोई नष्ट नहीं कर सकता ॥ १८ ॥
३४७. न्य१घ्न्यस्य मूर्धनि चक्रं रथस्य येमथुः । परि द्यामन्यदीयते ॥ १९ ॥
हे अश्विनीकुमारो ! आप के रथ (पोषण प्रक्रिया) का एक चक्र पृथ्वी के मूर्धा भाग में (पर्यावरण चक्र के रूप में) स्थित है और दूसरा चक्र द्युलोक में सर्वत्र गतिशील है ॥ १९ ॥
३४८. कस्त उषः कधप्रिये भुजे मर्तो अमर्त्ये । कं नक्षसे विभावरि ॥ २० ॥
हे स्तुति-प्रिय, अमर, तेजोमयी उषे ! कौन मनुष्य आपका अनुदान प्राप्त करता है ? किसे आप प्राप्त होती हैं ? (अर्थात् प्रायः सभी मनुष्य आलस्यादि दोषों के कारण आप का लाभ पूर्णतया नहीं प्राप्त कर पाते) ॥ २० ॥
३४९. वयं हि ते अमन्मह्याऽन्तादा पराकात् । अश्वे न चित्रे अरुषि ॥ २१ ॥
हे अश्व (किरणों) युक्त चित्र-विचित्र प्रकाश वाली उषे ! हम दूर अथवा पास से आपकी महिमा समझने में समर्थ नहीं हैं ॥ २१ ॥
३५०. त्वं त्येभिरा गहि वाजेभिर्दुहितर्दिवः । अस्मे रयिं नि धारय ॥ २२ ॥
हे द्युलोक की पुत्री उषे ! आप उन (दिव्य) बलों के साथ यहाँ आयें और हमें उत्तम ऐश्वर्य धारण करायें ॥ २२ ॥
[ सूक्त – ३१ ]
[ ऋषि – हिरण्यस्तूप आङ्गिरस । देवता – अग्नि । छन्द – जगती ८, १६, १८ त्रिष्टुप् । ]
३५१. त्वमग्ने प्रथमो अङ्गिरा ऋषिर्देवो देवानामभवः शिवः सखा । तव व्रते कवयो विद्यनापसोऽजायन्त मरुतो भ्राजदृष्टयः ॥ १ ॥
हे अग्निदेव ! आप सर्वप्रथम अंगिरा ऋषि के रूप में प्रकट हुए, तदनन्तर सर्वद्रष्टा, दिव्यतायुक्त, कल्याणकारी और देवों के सर्वश्रेष्ठ मित्र के रूप में प्रतिष्ठित हुए । आप के व्रतानुशासन से मरुद्गण क्रान्तदर्शी कर्मों के ज्ञाता और श्रेष्ठ तेज आयुधों से युक्त हुए हैं ॥ १ ॥
३५२. त्वमग्ने प्रथमो अङ्गिरस्तमः कविर्देवानां परि भूषसि व्रतम् । विभुर्विश्वस्मै भुवनाय मेधिरो द्विमाता शयुः कतिधा चिदायवे ॥ २ ॥
हे अग्निदेव ! आप अंगिराओं में आद्य और शिरोमणि हैं । आप देवताओं के नियमों को सुशोभित करते हैं । आप संसार में व्याप्त तथा दो माताओं वाले दो अरणियों से समुद्भूत होने से बुद्धिमान् हैं । आप मनुष्यों के हितार्थ सर्वत्र विद्यमान रहते हैं ॥ २ ॥
३५३. त्वमग्ने प्रथमो मातरिश्वन आविर्भव सुक्रतूया विवस्वते । अरेजेतां रोदसी होतृवूर्येऽसघ्नोर्भारमयजो महो वसो ॥ ३ ॥
हे अग्निदेव ! आप ज्योतिर्मय सूर्यदेव के पूर्व और वायु के भी पूर्व आविर्भूत हुए । आपके बल से आकाश और पृथ्वी काँप गये । होता रूप में वरण किये जाने पर आपने यज्ञ के कार्य का सम्पादन किया । देवों का यजनकार्य पूर्ण करने के लिए आप यज्ञ वेदी पर स्थापित हुए ॥ ३ ॥
३५४. त्वमग्ने मनवे द्यामवाशयः पुरूरवसे सुकृते सुकृत्तरः । श्वात्रेण यत्पित्रोर्मुच्यसे पर्या त्वा पूर्वमनयन्नापरं पुनः ॥ ४ ॥
हे अग्निदेव । आप अत्यन्त श्रेष्ठ कर्म वाले हैं । आपने मनु और सुकर्मा-पुरूरवा को स्वर्ग के आशय से अवगत कराया । जब आप मातृ-पितृ रूप दो काष्ठों के मंथन से उत्पन्न हुए, तो सूर्यदेव की तरह पूर्व से पश्चिम तक व्याप्त हो गये ॥ ४ ॥
३५५. त्वमग्ने वृषभः पुष्टिवर्धन उद्यतस्रुचे भवसि श्रवाय्यः । य आहुतिं परि वेदा वषट्कृतिमेकायुरग्रे विश आविवाससि ॥ ५ ॥
हे अग्निदेव ! आप बड़े बलिष्ठ और पुष्टिवर्धक हैं । हविदाता, सुवा हाथ में लिये स्तुति को उद्यत हैं, जो वषट्कार युक्त आहुति देता है, उस याजक को आप अग्रणी पुरुष के रूप में प्रतिष्ठित करते हैं ॥ ५ ॥
३५६. त्वमग्ने वृजिनवर्तनिं नरं सक्मन्पिपर्षि विदथे विचर्षणे । यः शूरसाता परितक्म्ये धने दभ्रेभिश्चित्समृता हंसि भूयसः ॥ ६ ॥
हे विशिष्ट द्रष्टा अग्निदेव ! आप पापकर्मियों का भी उद्धार करते हैं । बहुसंख्यक शत्रुओं का सब ओर से आक्रमण होने पर भी थोड़े से वीर पुरुषों को लेकर सब शत्रुओं को मार गिराते हैं ॥ ६ ॥
३५७. त्वं तमग्ने अमृतत्व उत्तमे मर्तं दद्यासि श्रवसे दिवेदिवे । यस्तातृषाण उभयाय जन्मने मयः कृणोषि प्रय आ च सूरये ॥ ७ ॥
हे अग्निदेव ! आप अपने अनुचर मनुष्यों को दिन-प्रतिदिन अमरपद का अधिकारी बनाते हैं, जिसे पाने की उत्कट अभिलाषा देवगण और मनुष्य दोनों ही करते रहते हैं । वीर पुरुषों को अन्न और धन द्वारा सुखी बनाते हैं ॥ ७ ॥
३५८. त्वं नो अग्ने सनये धनानां यशसं कारुं कृणुहि स्तवानः ।
ऋध्याम कर्मापसा नवेन देवैर्ध्यावापृथिवी प्रावतं नः ॥ ८ ॥
हे अग्निदेव ! प्रशंसित होने वाले आप हमें धन प्राप्त करने की सामर्थ्य दें । हमें यशस्वी पुत्र प्रदान करें । नये उत्साह के साथ हम यज्ञादि कर्म करें । द्यावा, पृथिवी और देवगण हमारी सब प्रकार से रक्षा करें ॥ ८ ॥
३५९. त्वं नो अग्ने पित्रोरुपस्थ आ देवो देवेष्वनवद्य जागृवि । तनूकुद्बोधि प्रमतिश्च कारवे त्वं कल्याण वसु विश्वमोपिषे ॥ ९ ॥
हे निर्दोष अग्निदेव ! सब देवों में चैतन्य रूप आप हमारे मातृ-पितृ रूप (उत्पन्न करने वाले) हैं । आप ने हमें बोध प्राप्त करने की सामर्थ्य दी, कर्म को प्रेरित करने वाली बुद्धि विकसित की । हे कल्याणरूप अग्निदेव ! हमें आप सम्पूर्ण ऐश्वर्य भी प्रदान करें ॥ ९ ॥
३६०. त्वमग्ने प्रमतिस्त्वं पितासि नस्त्वं वयस्कृत्तव जामयो वयम् ।
सं त्वा रायः शतिनः सं सहस्रिणः सुवीरं यन्ति व्रतपामदाभ्य ॥ १० ॥
हे अग्निदेव ! आप विशिष्ट बुद्धि-सम्पन्न, हमारे पिता रूप, आयु प्रदाता और बन्धु रूप हैं । आप उत्तमयोर, अटलगुण-सम्पन्न, नियम-पालक और असंख्यो धनों से सम्पन्न हैं ॥ १० ॥
३६१. त्वामग्ने प्रथममायुमायवे देवा अकृण्वन्नहुषस्य विश्पतिम् ।
इळामकृण्वन्मनुषस्य शासनीं पितुर्यत्पुत्रो ममकस्य जायते ॥ ११ ॥
हे अग्निदेव ! देवताओं ने सर्वप्रथम आपको मनुष्यों के हित के लिये राजा रूप में स्थापित किया । तत्पश्चात् जब हमारे (हिरण्यस्तूप ऋषि) पिता अंगिरा ऋषि ने आपको पुत्र रूप में आविर्भूत किया, तब देवताओं ने मनु की पुत्री इळा को शासन-अनुशासन (धर्मोपदेश) कर्त्री बनाया ॥ ११ ॥
३६२. त्वं नो अग्ने तव देव पायभिर्मघोनो रक्ष तन्वश्च वन्द्य । त्राता तोकस्य तनये गवामस्यनिमेषं रक्षमाणस्तव व्रते ॥ १२ ॥
हे अग्निदेव ! आप वन्दना के योग्य हैं । अपने रक्षण साधनों से धनयुक्त हमारी रक्षा करें । हमारी शारीरिक क्षमता को अपनी सामर्थ्य से पोषित करें । शीघ्रतापूर्वक संरक्षित करने वाले आप हमारे पुत्र-पौत्रादि और गवादि पशुओं के संरक्षक हों ॥ १२ ॥
३६३. त्वमग्ने यज्यवे पायुरन्तरोऽनिषङ्गाय चतुरक्ष इध्यसे । यो रातहव्योऽवृकाय धायसे कीरेश्चिन्मन्त्रं मनसा वनोषि तम् ॥ १३ ॥
हे अग्निदेव ! आप याजकों के पोषक हैं, जो सज्जन हविदाता आपको श्रेष्ठ, पोषक हविष्यान्न देते हैं, आप उनकी सभी प्रकार से रक्षा करते हैं । आप साधकों (उपासकों) को स्तुति हृदय से स्वीकार करते हैं ॥ १३ ॥
३६४. त्वमग्न उरुशंसाय वाघते स्पार्हं यद्रेक्णः परमं वनोषि तत् । आध्रस्य चित्प्रमतिरुच्यसे पिता प्र पाकं शास्सि प्रदिशो विदुष्टरः ॥ १४ ॥
हे अग्निदेव ! आप स्तुति करने वाले ऋत्विजों को धन प्रदान करते हैं । आप दुर्बलों को पिता रूप में पोषण देने वाले और अज्ञानी जनों को विशिष्ट ज्ञान प्रदान करने वाले मेधावी हैं ॥ १४ ॥
३६५. त्वमग्ने प्रयतदक्षिणं नरं वर्मेव स्यूतं परि पासि विश्वतः । स्वादुक्षद्मा यो वसतौ स्योनकृज्जीवयाजं यजते सोपमा दिवः ॥ १५ ॥
हे अग्निदेव ! आप पुरुषार्थी यजमानों की कवच के रूप में सुरक्षा करते हैं । जो अपने घर में मधुर हविष्यान्न देकर सुखप्रद यन्न करता है, वह घर स्वर्ग की उपमा के योग्य होता है ॥ १५ ॥ [ यज्ञीय आचरण से घर में स्वर्गतुल्य वातावरण बनता है । ]
३६६. इमामग्ने शरणि मीमृषो न इममध्वानं यमगाम दूरात् । आपिः पिता प्रमतिः सोम्यानां भृमिरस्यृषिकृन्मर्त्यानाम् ॥१६ ॥
हे अग्निदेव ! आप यज्ञ कर्म करते समय हुई हमारी भूलों को क्षमा करें जो लोग यज्ञ मार्ग से भटक गये हैं, उन्हें भी क्षमा करें । आप सोमयाग करने वाले याजकों के बन्धु और पिता हैं । सद्बुद्धि प्रदान करने वाले और ऋषि-कर्म के कुशल प्रणेता हैं ॥ १६ ॥
३६७. मनुष्वदग्ने अङ्गिरस्वदङ्गिरो ययातिवत्सदने पूर्ववच्छुचे । अच्छ याह्या वहा दैव्यं जनमा सादय बर्हिषि यक्षि च प्रियम् ॥ १७ ॥
हे पवित्र अंगिरा अग्निदेव ! (अंगों में संव्याप्त अग्नि) आप मनु, अंगिरा (ऋषि), ययाति जैसे पुरुषों के साथ देवों को ले जाकर यज्ञ स्थल पर सुशोभित हों । उन्हें कुश के आसन पर प्रतिष्ठित करते हुए सम्मानित करें ॥ १७ ॥
३६८. एतेनाग्ने ब्रह्मणा वावृधस्व शक्ती वा यत्ते चकृमा विदा वा । उत प्र णेष्यभि वस्यो अस्मान्त्सं नः सृज सुमत्या वाजवत्या ॥ १८ ॥
हे अग्निदेव ! इन मंत्र रूप स्तुतियों से आप वृद्धि को प्राप्त करें । अपनी शक्ति या ज्ञान से हमने जो यजन किया है, उससे हमें ऐश्वर्य प्रदान करें । बल बढ़ाने वाले अन्नों के साथ शुभ मति से हमें सम्पन्न करें ॥ १८ ॥
[ सूक्त – ३२ ]
[ ऋषि – हिरण्यस्तूप आङ्गिरस । देवता – इन्द्र । छन्द – त्रिष्टुप् । ]
३६९. इन्द्रस्य नु वीर्याणि प्र वोचं यानि चकार प्रथमानि वज्री । अहन्नहिमन्वपस्ततर्द प्र वक्षणा अभिनत्पर्वतानाम् ॥ १ ॥
मेघों को विदीर्ण कर पानी बरसाने वाले, पर्वतीय नदियों के तटों को निर्मित करने वाले, वज्रधारी, पराक्रमी इन्द्रदेव के कार्य वर्णनीय हैं । उन्होंने जो प्रमुख वीरतापूर्ण कार्य किये, वे ये ही हैं ॥ १ ॥
३७०. अहन्नहिं पर्वते शिश्रियाणं त्वष्टास्मै वज्रं स्वर्यं ततक्ष । वाश्रा इव धेनवः स्यन्दमाना अञ्जः समुद्रमव जग्मुरापः ॥ २ ॥
इन्द्रदेव के लिये त्वष्टादेव ने शब्द चालित वज्र का निर्माण किया, उसी से इन्द्रदेव ने मेघों को विदीर्ण कर जल बरसाया । रँभाती हुई गौओं के समान वे जलप्रवाह वेग से समुद्र की ओर चले गये ॥ २ ॥
३७१. वृषायमाणोऽवृणीत सोमं त्रिकद्रुकेष्वपिबत्सुतस्य । आ सायकं मघवादत्त वज्रमहन्नेनं प्रथा जामहीनाम् ॥ ३ ॥
अतिबलशाली इन्द्रदेव ने सोम को ग्रहण किया । यज्ञ में तीन विशिष्ट पात्रों में अभिषव किये हुए सोम का पान किया । ऐश्वर्यवान् इन्द्रदेव ने बाण और वज्र को धारण कर मेघों में प्रमुख मेघ को विदीर्ण किया ॥ ३ ॥
३७२. यदिन्द्राहन्प्रथमजामहीनामान्मायिनाममिनाः प्रोत मायाः । आत्सूर्यं जनयन्द्यामुषासं तादीत्ना शत्रुं न किला विवित्से ॥ ४ ॥
हे इन्द्रदेव ! आपने मेघों में प्रथम उत्पन्न मेघ को वेध दिया । मेघरूप में छाए धुन्ध (मायावियों) को दूर किया, फिर आकाश में उषा और सूर्य को प्रकट किया । अब कोई भी अवरोधक शत्रु शेष न रहा ॥ ४ ॥
३७३. अहन्वृत्रं वृत्रतरं व्यंसमिन्द्रो वज्रेण महता वधेन । स्कन्धांसीव कुलिशेना विवृक्णाऽहिः शयत उपपृक्पृथिव्याः ॥ ५ ॥
इन्द्रदेव ने घातक दिव्य वज्र से वृत्रासुर का वध किया । वृक्ष की शाखाओं को कुल्हाड़े से काटने के समान उसकी भुजाओं को काटा और तने की तरह उसे काटकर भूमि पर गिरा दिया ॥ ५ ॥
३७४. अयोद्धेव दुर्मद आ हि जुह्वे महावीरं तुविबाधमृजीषम् । नातारीदस्य समृतिं वधानां सं रुजानाः पिपिष इन्द्रशत्रुः ॥ ६ ॥
अपने को अप्रतिम योद्धा मानने वाले मिथ्या अभिमानी वृत्र ने महाबली, शत्रुवेधक, शत्रुनाशक इन्द्रदेव को ललकारा और इन्द्रदेव के आधातों को सहन न कर, गिरते हुए, नदियों के किनारों को तोड़ दिया ॥ ६ ॥
३७५. अपादहस्तो अपृतन्यदिन्द्रमास्य वज्रमधि सानौ जघान । वृष्णो वधिः प्रतिमानं बुभूषन्पुरुत्रा वृचो अशयद्व्यस्तः ॥ ७ ॥
हाथ और पाँव के कट जाने पर भी वृत्र ने इन्द्रदेव से युद्ध करने का प्रयास किया । इन्द्रदेव ने उसके पर्वत सदृश कन्धों पर वज्र का प्रहार किया । इतने पर भी वर्षा करने में समर्थ इन्द्रदेव के सम्मुख वह डटा रहा । अन्ततः इन्द्रदेव के आघातों से ध्वस्त होकर वह भूमि पर गिर पड़ा ॥ ७ ॥
३७६. नदं न भिन्नममुया शयानं मनो रुहाणा अति यन्त्यापः । याश्चिद् वृत्रो महिना पर्यतिष्ठत्तासामहिः पत्सुतः शीर्बभूव ॥ ८ ॥
जैसे नदी की बाढ़ तटां को लांघ जाती है, वैसे ही मन को प्रसन्न करने वाले जल (जल अवरोधक) वृत्र को लाँघ जाते हैं । जिन जलों को ‘वृत्र’ ने अपने बल से आबद्ध किया था, उन्हीं के नीचे ‘वृत्र’ मृत्यु-शैय्या पर पड़ा सो रहा है ॥ ८ ॥
३७७. नीचावया अभवद् वृत्रपुत्रेन्द्रो अस्या अव वधर्जभार । उत्तरा सूरधरः पुत्र आसीद्दानुः शये सहवत्सा न धेनुः ॥ ९ ॥
वृत्र की माता झुककर वृत्र का संरक्षण करने लगीं, इन्द्रदेव के प्रहार से बचाव के लिये वह वृत्र पर सो गयीं, फिर भी इन्द्रदेव ने नीचे से उस पर प्रहार किया । उस समय माता ऊपर और पुत्र नीचे था, जैसे गाय अपने बछड़े के साथ सोती है ॥ ९ ॥
३७८. अतिष्ठन्तीनामनिवेशनानां काष्ठानां मध्ये निहितं शरीरम् । वृत्रस्य निण्यं वि चरन्त्यापो दीर्घ तम आशयदिन्द्रशत्रुः ॥ १० ॥
एक स्थान पर न रुकने वाले अविश्रान्त (मेघरूप) जल-प्रवाहों के मध्य वृत्र का अनाम शरीर छिपा रहता है । वह दीर्घ निद्रा में पड़ा रहता है, उसके ऊपर जल प्रवाह बना रहता है ॥ १० ॥
[जल युक्त वादलों के नीचे निष्क्रिय बादलों को वृत्र का अनाम शरीर कहा गया प्रतीत होता है ।]
३७९. दासपत्नीरहिगोपा अतिष्ठन्निरुद्धा आपः पणिनेव गावः । अपां बिलमपिहितं यदासीद् वृत्रं जघन्वाँ अप तद्ववार ॥ ११ ॥
‘पणि’ नामक असुर ने जिस प्रकार गौओं अथवा किरणों को अवरुद्ध कर रखा था, उसी प्रकार जल-प्रवाहों को अगतिशील वृत्र ने रोक रखा था । वृत्र का वध करके वे प्रवाह खोल दिये गये ॥ ११ ॥
३८०. अश्व्यो वारो अभवस्तदिन्द्र सृके यत्त्वा प्रत्यहन्देव एकः । अजयो गा अजयः शूर सोममवासृजः सर्तवे सप्त सिन्धून् ॥ १२ ॥
हे इन्द्रदेव ! जब कुशल योद्धा वृत्र ने वज्र पर प्रहार किया, तब घोड़े की पूँछ हिलाने की तरह, बहुत आसानी से आपने अविचलित भाव से उसे दूर कर दिया। हे महाबली इन्द्रदेव ! सोम और गौओं को जीतकर आपने (वृत्र के अवरोध को नष्ट करके) गंगादि सातों सरिताओं को प्रवाहित किया ॥ १२ ॥
३८१. नास्मै विद्युन्न तन्यतुः सिषेध न यां मिहमकिरद्ध्रादुर्नि च । इन्द्रश्च यद्युयुधाते अहिश्चोतापरीभ्यो मघवा वि जिग्ये ॥ १३ ॥
युद्ध में वृत्रद्वारा प्रेरित भीषण विद्युत्, भयंकर मेघ गर्जन, जल और हिम वर्षा भी इन्द्रदेव को नहीं रोक सके । वृत्र के प्रचण्ड घातक प्रयोग भी निरर्थक हुए । उस युद्ध में असुर के हर प्रहार को इन्द्रदेव ने निरस्त करके उसे जीत लिया ॥ १३ ॥
३८२. अहेर्यातारं कमपश्य इन्द्र हृदि यत्ते जघ्नुषो भीरगच्छत् । नव च यन्नवर्ति च स्रवन्तीः श्येनो न भीतो अतरो रजांसि ॥ १४ ॥
हे इन्द्रदेव! वृत्र का वध करते समय यदि आपके हृदय में भय उत्पन्न होता, तो किस दूसरे वीर को असुर वध के लिये देखते ? (अर्थात् कोई दूसरा न मिलता) । (ऐसा करके) आपने निन्यानवे (लगभग सम्पूर्ण) जल-प्रवाहों को बाज पक्षी की तरह सहज ही पार कर लिया ॥ १४ ॥
३८३. इन्द्रो यातोऽवसितस्य राजा शमस्य च शृङ्गिणो वज्रबाहुः । सेदु राजा क्षयति चर्षणीनामरान्न नेमिः परि ता बभूव ॥ १५ ॥
हाथों में वज्रधारण करने वाले इन्द्रदेव मनुष्य, पशु आदि सभी स्थावर जंगम प्राणियों के राजा हैं । शान्त एवं क्रूर प्रकृति के सभी प्राणी उनके चारों ओर उसी प्रकार रहते हैं, जैसे चक्र की नेमि के चारों ओर उसके ‘अरे’ होते हैं ॥ १५ ॥
[ सूक्त – ३३ ]
[ ऋषि – हिरण्यस्तूप आङ्गिरस । देवता – इन्द्र । छन्द – त्रिष्टुप् । ]
३८४. एतायामोप गव्यन्त इन्द्रमस्माकं सु प्रमतिं वावृधाति । अनामृणः कुविदादस्य रायो गवां केतं परमावर्जते नः ॥ १ ॥
गौओं को प्राप्त करने की कामना से युक्त मनुष्य इन्द्रदेव के पास जायें । ये अपराजेय इन्द्रदेव हमारे लिए गोरूप धनों को बढ़ाने की उत्तम बुद्धि देंगे । वे गौओं की प्राप्ति का उत्तम उपाय करेंगे ॥ १ ॥
३८५. उपेदहं धनदामप्रतीतं जुष्टां न श्येनो वसति पतामि । इन्द्रं नमस्यन्नुपमेभिरर्कैर्यः स्तोतृभ्यो हव्यो अस्ति यामन् ॥ २ ॥
श्येन पक्षी के वेगपूर्वक घोंसले में जाने के समान हम उन धन दाता इन्द्रदेव के समीप पहुँचकर, स्तोत्रों से उनका पूजन करते हैं । युद्ध में सहायता के लिए स्तोताओं द्वारा बुलाये जाने पर अपराजेय इन्द्रदेव अविलम्ब पहुंचते हैं ॥ २ ॥
३८६. नि सर्वसेन इषुधीँ रसक्त समर्यो गः अजति यस्य वष्टि । चोष्कूयमाण इन्द्र भूरि वामं मा पणिर्भूरस्मदधि प्रवृद्ध ॥ ३ ॥
सब सेनाओं के सेनापति इन्द्रदेव तरकसों को धारण कर गौओं एवं धन को जीतते हैं । हे स्वामी इन्द्रदेव ! हमारी धन प्राप्ति की इच्छा पूरी करने में आप वैश्य की तरह विनिमय जैसा व्यवहार न करें ॥ ३ ॥
३८७. वधीर्हि दस्युं धनिनं घनेनँ एकश्चरन्नुपशाकेभिरिन्द्र । धनोरधि विषुणक्ते व्यायन्नयज्वानः सनकाः प्रेतिमीयुः ॥ ४ ॥
हे इन्द्रदेव ! आपने अकेले ही अपने प्रचण्ड वज्र से धनवान् दस्यु ‘वृत्र’ का वध किया । जब उसके अनुचरों ने आप के ऊपर आक्रमण किया, तब यज्ञ विरोधी उन दानवों को आपने (दृढ़तापूर्वक) नष्ट कर दिया ॥ ४ ॥
३८८. परा चिच्छीर्षा ववृजुस्त इन्द्रायज्वानो यज्वभिः स्पर्धमानाः । प्र यद्दिवो हरिवः स्थातरुप्र निरव्रताँ अधमो रोदस्योः ॥ ५ ॥
हे इन्द्रदेव ! याजकों से स्पर्धा करने वाले अयाज्ञिक मुँह छिपाकर भाग गये । हे अश्व-अधिष्ठित इन्द्रदेव ! आप युद्ध में अटल और प्रचण्ड सामर्थ्य वाले हैं । आपने आकाश, अन्तरिक्ष और पृथ्वी से धर्म-व्रतहीनों को हटा दिया है ॥ ५ ॥
३८९. अयुयुत्सन्ननवद्यस्य सेनामयातयन्त क्षितयो नवग्वाः । वृषायुधो न वध्रयो निरष्टाः प्रवद्भिरिन्द्राच्चितयन्त आयन् ॥ ६ ॥
उन शत्रुओं ने इन्द्रदेव की निर्दोष सेना पर पूरी शक्ति के साथ प्रहार किया, फिर भी हार गये । उनकी वही स्थिति हो गयी, जो शक्तिशाली वीर से युद्ध करने पर नपुंसक की होती है । अपनी निर्बलता स्वीकार करते हुए वे सब इन्द्रदेव से दूर चले गये ॥ ६ ॥
३९०. त्वमेतान्नुदतो जक्षतश्चायोधयो रजस इन्द्र पारे । अवादहो दिव आ दस्युमुच्चा प्र सुन्वतः स्तुवतः शंसमावः ॥ ७ ॥
हे इन्द्रदेव ! आपने रोने या हँसने वाले इन शत्रुओं को युद्ध करके मार दिया, दस्यु वृत्र को ऊँचा उठाकर आकाश से नीचे गिराकर जला दिया । आपने सोमयज्ञ करने वालों और प्रशंसक स्तोताओं की रक्षा की ॥ ७ ॥
३९१. चक्राणासः परीणहं पृथिव्या हिरण्येन मणिना शुम्भमानाः । न हिन्वानासस्तितिरुस्त इन्द्रं परि स्पशो अदधात्सूर्येण ॥ ८ ॥
उन शत्रुओं ने पृथ्वी के ऊपर अपना आधिपत्य स्थापित किया और स्वर्ण-रत्नादि से सम्पन्न हो गये, परन्तु वे इन्द्रदेव के साथ युद्ध में न ठहर सके । सूर्यदेव के द्वारा उन्हें दूर कर दिया गया ॥ ८ ॥
३९२. परि यदिन्द्र रोदसी उभे अबुभोजीर्महिना विश्वतः सीम् । अमन्यमानाँ अभि मन्यमानैर्निर्ब्रह्मभिरथमो दस्युमिन्द्र ॥ ९ ॥
हे इन्द्रदेव ! आपने अपनी सामर्थ्य से द्युलोक और भूलोक का चारों ओर से उपयोग किया । हे इन्द्रदेव ! आपने अपने अनुचरों द्वारा विरोधियों पर विजय प्राप्त की । आपने मन्त्र-शक्ति से (शानपूर्वक किये गये प्रयासों से) शत्रु पर विजय प्राप्त की ॥ ९ ॥
३९३. न ये दिवः पृथिव्या अन्तमापुर्न मायाभिर्धनदां पर्यभूवन् । युजं वज्रं वृषभश्चक्र इन्द्रो निज्योतिषा तमसो गा अदुक्षत् ॥ १० ॥
मेघ रूप वृत्र के द्वारा रोक लिये जाने के कारण जो जल द्युलोक से पृथ्वी पर नहीं बरस सके एवं जलों के अभाव से भूमि शस्यश्यामला न हो सकी, तब इन्द्रदेव ने अपने जाज्वल्यमान बज्र से अन्धकार रूपी मेघ को भेदकर गौ के समान जल का दोहन किया ॥ १० ॥
३९४. अनु स्वधामक्षरन्नापो अस्यावर्धत मध्य आ नाव्यानाम् । सध्रीचीनेन मनसा तमिन्द्र ओजिष्ठेन हन्मनाहन्नभि द्यून् ॥ ११ ॥
जल इन ब्रीहि यवादि रूप अन्न वृद्धि के लिए (मेघों से) बरसने लगे । उस समय नौकाओं के मार्ग पर (जलों में) वृत्र बढ़ता रहा । इन्द्रदेव ने अपने शक्ति-साधनों द्वारा एकाग्र मन से अल्प समयावधि में ही उस वृत्र को मार गिराया ॥ ११ ॥
३९५, न्याविध्यदिलीबिशस्य दुळहा वि शृङ्गिणमभिनच्छुष्णमिन्द्रः । यावत्तरो मघवन्यावदोजो वज्रेण शत्रुमवधीः पृतन्युम् ॥ १२ ॥
इन्द्रदेव ने गुफा में सोये हुए वृत्र के किलों को ध्वस्त करके उस सींगवाले शोषक वृत्र को क्षत-विक्षत कर दिया । हे ऐश्वर्यशाली इन्द्रदेव ! आपने सम्पूर्ण वेग और बल से शत्रु सेना का विनाश किया ॥ १२ ॥
३९६. अभि सिध्मो अजिगादस्य शत्रून्वितिग्मेन वृषभेणा पुरोऽभेत् । सं वज्रेणासृजद्वत्रमिन्द्रः प्र स्वां मतिमतिरच्छाशदानः ॥ १३ ॥
इन्द्रदेव का तीक्ष्ण और शक्तिशाली वज्र शत्रुओं को लक्ष्य बनाकर उनके किलों को ध्वस्त करता है । शत्रुओं को वज्र से मारकर इन्द्रदेव स्वयं अतीव उत्साहित हुए ॥ १३ ॥
३९७. आवः कुत्समिन्द्र यस्मिञ्चाकन्प्रावो युध्यन्तं वृषभं दशद्युम् । शफच्युतो रेणुर्नक्षत द्यामुच्छ्वैत्रेयो नृषाह्याय तस्थौ ॥ १४ ॥
हे इन्द्रदेव ! ‘कुत्स’ ऋषि के प्रति स्नेह होने से आपने उनकी रक्षा की और अपने शत्रुओं के साथ युद्ध करने वाले श्रेष्ठ गुणवान् ‘दशद्यु’ ऋषि की भी आपने रक्षा की । उस समय अश्वों के खुरों से धूल आकाश तक फैल गई, तब शत्रुभय से जल में छिपने वाले ‘श्वैत्रेय’ नामक पुरुष की रक्षाकर आपने उसे जल से बाहर निकाला ॥ १४ ॥
३९८. आवः शमं वृषभं तुग्र्यासु क्षेत्रजेषे मघवञ्छ्वित्र्यं गाम् । ज्योक् चिदत्र तस्थिवांसो अक्रञ्छत्रूयतामधरा वेदनाकः ॥ १५ ॥
हे धनवान् इन्द्रदेव ! क्षेत्र प्राप्ति की इच्छा से सशक्त जल प्रवाहों में घिरने वाले ‘श्वित्र्य’ (व्यक्तिविशेष) की आपने रक्षा की । वहाँ जलो में ठहरकर अधिक समय तक आप शत्रुओं से युद्ध करते रहे । उन शत्रुओं को जलों के नीचे गिराकर आपने मार्मिक पीड़ा पहुंचायी ॥ १५ ॥
[ सूक्त – ३४ ]
[ ऋषि – हिरण्यस्तूप आङ्गिरस । देवता – अश्विनीकुमार । छन्द – जगती, ९, १२ त्रिष्टुप् । ]
३९९. त्रिश्चिन्नो अद्या भवतं नवेदसा विभुर्वा याम उत रातिरश्विना । युवोर्हि यन्त्रं हिम्येव वाससोऽभ्यायंसेन्या भवतं मनीषिभिः ॥ १ ॥
हे ज्ञानी अश्विनीकुमारो ! आज आप दोनों यहाँ तीन बार (प्रात, मध्याह्न, सायं) आयें । आप के रथ और दान बड़े महान् हैं । सर्दी की रात एवं आतपयुक्त दिन के समान आप दोनों का परस्पर नित्य सम्बन्ध है । विद्वानों के माध्यम से आप हमें प्राप्त हों ॥ १ ॥
४००. त्रयः पवयो मधुवाहने रथे सोमस्य वेनामनु विश्व इद्विदुः । त्रयः स्कम्भासः स्कभितास आरभे त्रिर्नक्तं याथस्त्रिर्वश्विना दिवा ॥ २ ॥
मधुर सोम को वहन करने वाले रथ में वज्र के समान सुदृढ़ तीन पहिये लगे हैं । सभी लोग आपकी सोम के प्रति तीव्र उत्कंठा को जानते हैं । आपके रथ में अवलम्बन के लिये तीन खम्भे लगे हैं । हे अश्विनीकुमारो ! आप उस रथ से तीन बार रात्रि में और तीन बार दिन में गमन करते हैं ॥ २ ॥
४०१. समाने अहन्त्रिरवद्यगोहना त्रिरद्य यज्ञं मधुना मिमिक्षतम् । त्रिर्वाजवतीरिषो अश्विना युवं दोषा अस्मभ्यमुषसश्च पिन्वतम् ॥ ३ ॥
हे दोषों को ढंकने वाले अश्विनीकुमारो ! आज हमारे यज्ञ में दिन में तीन बार मधुर रसों से सिंचन करें । प्रातः, मध्याह्न एवं सायं तीन प्रकार के पुष्टिवर्धक अन्न हमें प्रदान करें ॥ ३ ॥
४०२. त्रिर्वर्तिर्यातं त्रिरनुव्रते जने त्रिः सुप्राव्ये त्रेधेव शिक्षतम् । त्रिर्नान्द्यं वहतमश्विना युवं त्रिः पृक्षो अस्मे अक्षरेव पिन्वतम् ॥ ४ ॥
हे अश्विनीकुमारो ! हमारे घर आप तीन बार आयें । अनुयायी जनों को तीन बार सुरक्षित करें, उन्हें तीन बार तीन विशिष्ट ज्ञान करायें । सुखप्रद पदार्थों को तीन बार इधर हमारी ओर पहुंचायें । बलप्रदायक अन्नों को प्रचुर परिमाण में देकर हमें सम्पन्न करें ॥ ४ ॥
४०३. त्रिर्नो रयिं वहतमश्विना युवं त्रिर्देवताता त्रिरुतावतं धियः । त्रिः सौभगत्वं त्रिरुत श्रवांसि नस्त्रिष्ठं वां सूरे दुहितारुहद्रथम् ॥ ५ ॥
हे अश्विनीकुमारो ! आप दोनों हमारे लिए तीन बार धन इधर लायें । हमारी बुद्धि को तीन बार देवों की स्तुति में प्रेरित करें । हमें तीन बार सौभाग्य और तीन बार यश प्रदान करें । आपके रथ में सूर्य-पुत्री (उषा) विराजमान हैं ॥ ५ ॥
४०४. त्रिर्नो अश्विना दिव्यानि भेषजा त्रिः पार्थिवानि त्रिरु दत्तमद्भयः । ओमानं शंयोर्ममकाय सूनवे त्रिधातु शर्म वहतं शुभस्पती ॥ ६ ॥
हे शुभ कर्मपालक अश्विनीकुमारो ! आपने तीन बार हमें (द्युस्थानीय) दिव्य ओषधियाँ, तीन बार पार्थिव ओषधियाँ तथा तीन बार जलौषधियाँ प्रदान की हैं । हमारे पुत्र को श्रेष्ठ सुख एवं सरक्षण दिया है और तीन धातुओं (वात-पित्त-कफ) से मिलने वाला सुख, आरोग्य एवं ऐश्वर्य भी प्रदान किया है ॥ ६ ॥
४०५. त्रिर्नो अश्विना यजता दिवेदिवे परि त्रिधातु पृथिवीमशायतम् । तिस्रो नासत्या रथ्या परावत आत्मेव वातः स्वसराणि गच्छतम् ॥ ७ ॥
हे अश्विनीकुमारो ! आप नित्य तीन बार यजन योग्य हैं । पृथ्वी पर स्थापित वेदी के तीन ओर आसनों पर बैठें । हे असत्यरहित रथारूढ़ देवो ! प्राणवायु और आत्मा के समान दूर स्थान से हमारे यज्ञों में तीन बार आयें ॥ ७ ॥
४०६. त्रिरश्विना सिन्धुभिः सप्तमाभिस्त्रय आहावास्त्रेधा हविष्कृतम् । तिस्रः पृथिवीरुपरि प्रवा दिवो नाकं रक्षेथे द्युभिरक्तुभिर्हितम् ॥ ८ ॥
हे अश्विनीकुमारो ! सात मातृभूत नदियों के जलों से तीन बार तीन पात्र भर दिये हैं । हवियों को भी तीन भागों में विभाजित किया है । आकाश में ऊपर गमन करते हुए आप तीनों लोकों की दिन और रात्रि में रक्षा करते हैं ॥ ८ ॥
४०७. क्व१त्री चक्रा त्रिवृतो रथस्य क्व१त्रयो वन्धुरो ये सनीळाः । कदा योगो वाजिनो रासभस्य येन यज्ञं नासत्योपयाथः ॥ ९ ॥
अश्विनीकुमारों के रहस्यमय रथ यान का वर्णन करते हुए कहा गया है –
हे सत्यनिष्ठ अश्विनीकुमारो ! आप जिस रथ द्वारा यज्ञ-स्थल में पहुंचते हैं, उस तीन छोर वाले रथ के तीन चक्र कहाँ हैं ? एक ही आधार पर स्थापित होने वाले तीन स्तम्भ कहाँ हैं ? और अति शब्द करने वाले बलशाली (अश्व या संचालक यंत्र) को रथाज साथ कब जोड़ा गया था ? ॥ ९ ॥
४०८. आ नासत्या गच्छतं हूयते हविर्मध्वः पिबतं मधुपेभिरासभिः । युवोर्हि पूर्व सवितोषसो रथमृताय चित्रं घृतवन्तमिष्यति ॥ १० ॥
हे सत्यशील अश्विनीकुमारो ! आप यहाँ आएँ । यहाँ हवि की आहुतियाँ दी जा रही हैं । मधु पीने वाले मुखों से मधुर रसों का पान करें । आप के विचित्र पुष्ट रथ को सूर्यदेव उषाकाल से पूर्व, यज्ञ के लिये प्रेरित करते हैं ॥ १० ॥
४०९. आ नासत्या त्रिभिरेकादशैरिह देवेभिर्यातं मधुपेयमश्विना । प्रायुस्तारिष्टं नी रपांसि मृक्षतं सेधतं द्वेषो भवतं सचाभुवा ॥ ११ ॥
हे अश्विनीकुमारो ! आप दोनों तैतीस देवताओं सहित हमारे इस यज्ञ में मधुपान के लिये पधारें । हमारी आयु बढ़ायें और हमारे पापों को भली-भाँति विनष्ट करें । हमारे प्रति देष की भावना को समाप्त करके सभी कार्यों में सहायक बनें ॥ ११ ॥
४१०. आ नो अश्विना त्रिवृता रथेनार्वाञ्चं रयिं वहतं सुवीरम् । शृण्वन्ता वामवसे जोहवीमि वृधे च नो भवतं वाजसातौ ॥ १२ ॥
हे अश्विनीकुमारो ! त्रिकोण रथ से हमारे लिये उत्तम धन-सामर्थ्यों को वहन करें । हमारी रक्षा के लिए आवाहनों को आप सुनें । युद्ध के अवसरों पर हमारी बल-वृद्धि का प्रयास करें ॥ १२ ॥
[ सूक्त – ३५ ]
[ ऋषि – हिरण्यस्तूप आङ्गिरस । देवता – प्रथम मन्त्र का प्रथम पाद – अग्नि, द्वितीय पाद – मित्रावरुण, तृतीय पाद – रात्रि, चतुर्थ पाद – सविता, २-११ सविता । छन्द – त्रिष्टुप्, १, ९ जगती । ]
४११. ह्वयाम्यग्निं प्रथमं स्वस्तये ह्वयामि मित्रावरुणाविहावसे । ह्वयामि रात्री जगतो निवेशनीं ह्वयामि देवं सवितारमूतये ॥ १ ॥
कल्याण की कामना से हम सर्वप्रथम अग्निदेव की प्रार्थना करते हैं । अपनी रक्षा के लिए हम मित्र और वरुण देवों को बुलाते हैं । जगत् को विश्राम देने वाली रात्रि और सूर्यदेव का हम अपनी रक्षा के लिए आवाहन करते हैं ॥ १ ॥
४१२. आ कृष्णेन रजसा वर्तमानो निवेशयन्नमृतं मर्त्यं च । हिरण्ययेन सविता रथेना देवो याति भुवनानि पश्यन् ॥ २ ॥
सवितादेव गहन तमिस्रा युक्त अन्तरिक्ष पथ में भ्रमण करते हुए, देवों और मनुष्यों को यज्ञादि श्रेष्ठ-कर्मों में नियोजित करते हैं । वे समस्त लोकों को देखते (प्रकाशित करते) हुए स्वर्णिम (किरणों से युक्त) रथ से आते हैं ॥ २ ॥
४१३. याति देवः प्रवता यात्युद्वता याति शुभ्राभ्यां यजतो हरिभ्याम् । आ देवो याति सविता परावतोऽप विश्वा दुरिता बाधमानः ॥ ३ ॥
स्तुत्य सवितादेव ऊपर चढ़ते हुए और फिर नीचे उतरते हुए निरन्तर गतिशील रहते हैं । वे सविता देव तमरूपी पापों को नष्ट करते हुए अतिदूर से इस यज्ञशाला में श्वेत अश्वों के रथ पर आसीन होकर आते हैं ।
४१४. अभीवृतं कशनैर्विश्वरूपं हिरण्यशम्यं यजतो बृहन्तम् । आस्थाद्रथं सविता चित्रभानुः कृष्णा रजांसि तविर्षी दधानः ॥ ४ ॥
सतत परिभ्रमणशील, विविध रूपों में सुशोभित, पूजनीय, अद्भुत रश्मि-युक्त सवितादेव गहन तमिस्रा को नष्ट करने के निमित्त प्रचण्ड सामर्थ्य को धारण करते हैं तथा स्वर्णिम रश्मियों से युक्त रथ पर प्रतिष्ठित होकर आते हैं ॥ ४ ॥
४१५. वि जनाञ्छ्यावाः शितिपादो अख्यन्रथं हिरण्यप्रउगं वहन्तः । शश्वद्विशः सवितुर्दैव्यस्योपस्थे विश्वा भुवनानि तस्थुः ॥ ५ ॥
सूर्यदेव के अश्व श्वेत पैर वाले हैं, वे स्वर्णरथ को वहन करते हैं और मानवों को प्रकाश देते हैं । सर्वदा सभी लोकों के प्राणी सवितादेव के अंक में स्थित हैं, अर्थात् उन्हीं पर आश्रित हैं ॥ ५ ॥
४१६. तिस्त्रो द्यावः सवितुर्द्वा उपस्थाँ एका यमस्य भुवने विराषाट् । आणिं न रथ्यममृताधि तस्थुरिह ब्रवीतु य उ तच्चिकेतत् ॥ ६ ॥
तीनों लोकों में द्यावा और पृथिवी ये दोनों लोक सूर्य के समीप हैं, अर्थात् सूर्य से प्रकाशित हैं । एक अंतरिक्ष लोक यमदेव का विशिष्ट द्वार रूप है । रथ के धुरे की कील के समान सूर्यदेव पर ही सब लोक (नक्षत्रादि) अवलम्बित हैं । जो यह रहस्य जानें, वे सबको बतायें ॥ ६ ॥
[ द्युलोक में सूर्यदेव स्थित हैं, पृथ्वी पर उनके द्वारा विकिरित ऊर्जा का प्रभाव है, इसलिए यह दो लोक उनके पास कहे गये हैं । बीच में अंतरिक्ष उनसे दूर क्यों है ? विज्ञान का नियम है कि विकिरित किरणें जब पदार्थ पर पड़ती हैं, तभी अपनी ऊर्जा उसे देती हैं बीच के वायुमण्डल को प्रभावित नहीं करतीं, इसलिए बीच का अन्तरिक्ष लोक सौर ऊर्जा से अप्रभावित रहता है, अन्यथा वायुमण्डल इतना गर्म हो जाता कि सहन करना संभव नहीं होता, इस अनुशासन के अन्तर्गत अन्तरिक्ष यम (अनुशासन के देवता) का द्वार कहा गया है । ]
४१७. वि सुपर्णो अन्तरिक्षाण्यख्यद्गभीरवेपा असुरः सुनीथः । क्वे३दानीं सूर्यः कश्चिकेत कतमां द्यां रश्मिरस्या ततान ॥ ७ ॥
गम्भीर, गतियुक्त, प्राणरूप, उत्तम प्रेरक, सुन्दर, दीप्तिमान् सूर्यदिव अन्तरिक्षादि को प्रकाशित करते हैं । ये सूर्यदेव कहाँ रहते हैं ? उनकी रश्मियों किस आकाश में होंगी ? यह रहस्य कौन जानता है ? ॥ ७ ॥
४१८. अष्टौ व्यख्यत्ककुभः पृथिव्यास्त्री धन्व योजना सप्त सिन्धून् । हिरण्याक्षः सविता देव आगाद्दधद्रत्ना दाशुषे वार्याणि ॥ ८ ॥
हिरण्य दृष्टि युक्त (सुनहली किरणों से युक्त) सवितादेव पृथ्वी की आठों दिशाओं (४ प्रमुख ४ उपदिशाएँ) उनसे युक्त तीनों लोकों, सप्त सागरों आदि को आलोकित करते हुए दाता (हविदाता) के लिए वरणीय विभूतियाँ लेकर यहाँ आएँ ॥८ ॥
४१९. हिरण्यपाणिः सविता विचर्षणिरुभे द्यावापृथिवी अन्तरीयते । अपामीवां बाधते वेति सूर्यमभि कृष्णेन रजसा द्यामृणोति ॥ ९ ॥
स्वर्णिम रश्मियों रूपी हाथों से युक्त विलक्षण द्रष्टा सवितादेव द्यावा और पृथ्वी के बीच संचरित होते हैं । वे रोगादि बाधाओं को नष्ट कर अन्धकारनाशक दीप्तियों से आकाश को प्रकाशित करते हैं ॥ ९ ॥
४२०. हिरण्यहस्तो असुरः सुनीथः सुमृळीकः स्ववाँ यात्वर्वाङ् । अपसेधत्रक्षसो यातुधानानस्थाद्देवः प्रतिदोषं गृणानः ॥ १० ॥
हिरण्य हस्त (स्वर्णिम तेजस्वी किरणों से युक्त) प्राणदाता, कल्याणकारक, उत्तम सुखदायक, दिव्यगुण सम्पन्न सूर्यदेव, सम्पूर्ण मनुष्यों के समस्त दोषों को, असुरों और दुष्कर्मियों को नष्ट करते (दूर भगाते) हुए उदित होते हैं । ऐसे सूर्यदेव हमारे लिये अनुकूल हों ॥ १० ॥
४२१. ये ते पन्थाः सवितः पूर्व्यासोऽरेणवः सुकृता अन्तरिक्षे । तेभिर्नो अद्य पथिभिः सुगेभी रक्षा च नो अधि च ब्रूहि देव ॥ ११ ॥
हे सवितादेव ! आकाश में आपके ये धूलरहित मार्ग पूर्व निश्चित हैं । उन सुगम मार्गों से आकर आज आप हमारी रक्षा करें तथा हम (यज्ञानुष्ठान करने वालों) को देवत्व से युक्त करें ॥ ११ ॥
[ सूक्त ३६ ]
[ ऋषि – कण्व घौर । देवता – अग्नि, १३-१४ यूप । छन्द – बार्हत प्रगाथ, विषमा बृहती, समासतो बृहती, १३ उपरिष्टाद् – बृहती । ]
४२२. प्र वो यह्वं पुरूणां विशां देवयतीनाम् । अग्निं सूक्तेभिर्वचोभिरीमहे यं सीमिदन्य ईळते ॥ १ ॥
हम ऋत्विज् अपने सूक्ष्म वाक्यों (मंत्र शक्ति) से व्यक्तियों में देवत्व का विकास करने वाली महानता का वर्णन करते हैं, जिस महानता का वर्णन (स्तवन) ऋषियों ने भली प्रकार किया था ॥ १ ॥
४२३. जनासो अग्निं दधिरे सहोवृधं हविष्मन्तो विधेम ते । स त्वं नो अद्य सुमना इहाविता भवा वाजेषु सन्त्य ॥ २ ॥
मनुष्यों ने बलवर्धक अग्निदेव का वरण किया । हम उन्हें हवियों से प्रवृद्ध करते हैं । अन्नों के दाता हे अग्निदेव ! आज आप प्रसत्र मन से हमारी रक्षा करें ॥ २ ॥
४२४. प्र त्वा दूतं वृणीमहे होतारं विश्ववेदसम् । महस्ते सतो वि चरन्त्यर्चयो दिवि स्पृशन्ति भानवः ॥ ३ ॥
देवों के दूत, होतारूप, सर्वज्ञ हे अग्निदेव ! आपका हम वरण करते हैं, आप महान् और सत्यरूप हैं । आपकी ज्वालाओं की दीप्ति फैलती हुई आकाश तक पहुँचती है ॥ ३ ॥
४२५. देवासस्त्वा वरुणो मित्रो अर्यमा सं दूतं प्रत्नमिन्धते । विश्वं सो अग्ने जयति त्वया धनं यस्ते ददाश मर्त्यः ॥ ४ ॥
हे अग्निदेव ! मित्र, वरुण और अर्यमा ये तीनों देव आप जैसे पुरातन देवदूत को प्रदीप्त करते हैं । जो याजक आपके निमित्त हवि समर्पित करते हैं, वे आपकी कृपा से समस्त धनों को उपलब्ध करते हैं ॥ ४ ॥
४२६. मन्द्रो होता गृहपतिरग्ने दूतो विशामसि । त्वे विश्वा संगतानि व्रता ध्रुवा यानि देवा अकृण्वत ॥ ५ ॥
हे अग्निदेव ! आप प्रमुदित करने वाले, प्रजाओं के पालक, होतारूप, गृहस्वामी और देवदूत हैं । देवों के द्वारा सम्पादित सभी शुभ कर्म आपसे सम्पादित होते हैं ॥ ५ ॥
४२७. त्वे इदग्ने सुभगे यविष्ठ्य विश्वमा हूयते हविः । स त्वं नो अद्य सुमना उतापरं यक्षि देवान्त्सुवीर्या ॥ ६ ॥
हे चिरयुवा अग्निदेव ! यह आपका उत्तम सौभाग्य है कि सब हवियों आपके अन्दर अर्पित की जाती है । आप प्रसत्र होकर हमारे निमित्त आज और आगे भी सामर्थ्यवान् देवों का यजन किया करें । (अर्थात् देवों को हमारे अनुकूल बनायें ।) ॥ ६ ॥
४२८. तं घेमित्था नमस्विन उप स्वराजमासते । होत्राभिरग्निं मनुषः समिन्धते तितिवाँसो अति स्त्रिधः ॥ ७ ॥
नमस्कार करने वाले उपासक स्वप्रकाशित इन अग्निदेव की उपासना करते हैं । शत्रुओं को जीतने वाले मनुष्य हवन-साधनों और स्तुतियों से अग्नि को प्रदीप्त करते हैं ॥ ७ ॥
४२९. घ्नन्तो वृत्रमतरत्रोदसी अप उरु क्षयाय चक्रिरे । भुवत्कण्वे वृषा द्युम्न्याहुतः क्रन्ददश्वो गविष्टिषु ॥ ८ ॥
देवों ने प्रहार कर वृत्र का वध किया । प्राणियों के निवासार्थ उन्होंने द्यावा-पृथिवी और अन्तरिक्ष का बहुत विस्तार किया । गौ, अश्व आदि की कामना से कण्व ने अग्नि को प्रकाशित कर आहुतियों द्वारा उन्हें बलिष्ठ बनाया ॥ ८ ॥
४३०. सं सीदस्व महाँ असि शोचस्व देववीतमः । वि धूममग्ने अरुषं मियेध्य सृज प्रशस्त दर्शतम् ॥ ९ ॥
यज्ञीय गुणों से युक्त प्रशंसनीय हे अग्निदेव ! आप देवताओं के प्रीतिपात्र और महान् गुणों के प्रेरक हैं । यहाँ उपयुक्त स्थान पर पधारें और प्रज्वलित हों । घृत की आहुतियों द्वारा दर्शन योग्य तेजस्वी होते हुए सघन धूम्र को विसर्जित करें ॥ ९ ॥
४३१. यं त्वा देवासो मनवे दधुरिह यजिष्ठं हव्यवाहन । यं कण्वो मेध्यातिथिर्धनस्पृतं यं वृषा यमुपस्तुतः ॥ १० ॥
हे हविवाहक अग्निदेव ! सभी देवों ने पूजने योग्य आपको मानव मात्र के कल्याण के लिए इस यज्ञ में धारण किया । मेध्यातिथि और कण्व ने तथा वृषा (इन्द्र) और उपस्तुत (अन्य यजमान) ने धन से संतुष्ट करने वाले आपका वरण किया ॥ १० ॥
४३२. यमग्निं मेध्यातिथिः कण्व ईध ऋतादधि । तस्य प्रेषो दीदियुस्तमिमा ऋचस्तमग्निं वर्धयामसि ॥ ११ ॥
जिन अग्निदेव को मेध्यातिथि और कण्व ने सत्यरूप कर्मों से प्रदीप्त किया, वे अग्निदेव देदीप्यमान हैं । उन्हीं को हमारी ऋचायें भी प्रवृद्ध करती है । हम भी उन अग्निदेव को संवर्धित करते हैं ॥ ११ ॥
४३३. रायस्पूर्धि स्वधावोऽस्ति हि तेऽग्ने देवेष्वाप्यम् त्वं वाजस्य श्रुत्यस्य राजसि स नो मृळ महाँ असि ॥१२॥
हे अत्रवान् अग्ने ! आप हमें अन्न – सम्पदा से अभिपूरित करें । आप देवों के मित्र और प्रशंसनीय बलों के स्वामी हैं । आप महान् हैं । आप हमें सुखी बनाएँ ॥ १२ ॥
४३४. ऊर्ध्व ऊ षु ण ऊतये तिष्ठा देवो न सविता । ऊध्वों वाजस्य सनिता यदञ्जिभिर्वाघद्धिर्विह्वयामहे ॥ १३ ॥
हे काष्ठ स्थित अग्निदेव ! सर्वोत्पादक सवितादेव जिस प्रकार अन्तरिक्ष से हम सबकी रक्षा करते हैं, उसी प्रकार आप भी ऊँचे उठकर, अन्न आदि पोषक पदार्थ देकर हमारे जीवन की रक्षा करें । मन्त्रोच्चारणपूर्वक हवि प्रदान करने वाले याजक आपके उत्कृष्ट स्वरूप का आवाहन करते हैं ॥ १३ ॥
४३५. ऊर्ध्वो नः पाह्यंहसो नि केतुना विश्वं समत्रिणं दह । कृधी न ऊर्ध्वाञ्चरधाय जीवसे विदा देवेषु नो दुवः ॥ १४ ॥
हे यूपस्थ अग्ने ! आप ऊँचे उठकर अपने श्रेष्ठ ज्ञान द्वारा पापों से हमारी रक्षा करें, मानवता के शत्रुओं का दहन करें, जीवन में प्रगति के लिए हमें ऊँचा उठाएँ तथा हमारी प्रार्थना देवों तक पहुँचाएँ ॥ १४ ॥
४३६. पाहि नो अग्ने रक्षसः पाहि धूर्तेरराव्णः । पाहि रीषत उत वा जिघांसतो बृहद्धानो यविष्ठ्य ॥ १५ ॥
हे महान् दीप्तिवाले, चिरयुवा अग्निदेव ! आप हमें राक्षसों से रक्षित करें, कृपण धूर्तों से रक्षित करें तथा हिंसकों और जघन्यों से रक्षित करें ॥ १५ ॥
४३७. घनेव विष्वग्वि जह्यराव्णस्तपुर्जम्भ यो अस्मधुक् । यो मर्त्यः शिशीते अत्यक्तुभिर्मा नः स रिपुरीशत ॥ १६ ॥
अपने ताप से रोगादि कष्टों को मिटाने वाले हे अग्ने ! आप कृपणों को गदा से विनष्ट करें । जो हमसे द्रोह करते हैं, जो रात्रि में जागकर हमारे नाश का यत्न करते हैं, वे शत्रु हम पर आधिपत्य न कर पाएँ ॥ १६ ॥
४३८. अग्निर्वव्ने सुवीर्यमग्निः कण्वाय सौभगम् । अग्निः प्रावन्मित्रोत मेध्यातिथिमग्निः साता उपस्तुतम् ॥ १७ ॥
उत्तम पराक्रमी ये अग्निदेव, जिन्होंने कण्व को सौभाग्य प्रदान किया, हमारे मित्रों की रक्षा की तथा ‘मेध्यातिधि’ और ‘उपस्तुत’ (यजमान) की भी रक्षा की है ॥ १७ ॥
४३९. अग्निना तुर्वशं यदुं परावत उग्रादेवं हवामहे । अग्निर्नयन्नववास्त्वं बृहद्रथं तुर्वीतिं दस्यवे सहः ॥ १८ ॥
अग्निदेव के साथ हम ‘तुर्वश’ ‘यदु’ और ‘उग्रदेव’ को बुलाते हैं । वे अग्निदेव ‘नववास्तु’, ‘बृहद्रथ’ और ‘तुर्वीति’ (आदि राजर्षियों) को भी ले चलें, जिससे हम दुष्टों के साथ संघर्ष कर सकें ॥ १८ ॥
४४०. नि त्वामग्ने मनुर्दधे ज्योतिर्जनाय शश्वते । दीदेथ कण्व ऋतजात उक्षितो यं नमस्यन्ति कृष्टयः ॥ १९ ॥
हे अग्निदेव ! विचारवान् व्यक्ति आपका वरण करते हैं । अनादिकाल से ही मानव जाति के लिए आपकी ज्योति प्रकाशित है । आपका प्रकाश आश्रमों के ज्ञानवान् ऋषियों में उत्पत्र होता है । यज्ञ में ही आपका प्रज्वलित स्वरूप प्रकट होता है । उस समय सभी मनुष्य आपको नमन-वन्दन करते हैं ॥ १९ ॥
४४१. त्वेषासो अग्नेरभवन्तो अर्चयो भीमासो न प्रतीतये । रक्षस्विनः सदमिद्यातुमावतो विश्वं समत्रिणं दह ॥ २० ॥
अग्निदेव की ज्वालाएँ प्रदीप्त होकर अत्यन्त बलवती और प्रचण्ड हुई हैं । कोई उनका सामना नहीं कर सकता । हे अग्ने ! आप समस्त राक्षसों, आतताइयों और मानवता के शत्रुओं को नष्ट करें ॥ २० ॥
[ सूक्त – ३७ ]
[ ऋषि – कण्व घौर । देवता – मरुद्गण । छन्द – गायत्री । ]
४४२. क्रीळं वः शर्धो मारुतमनर्वाणं रथेशुभम् । कण्वा अभि प्र गायत ॥ १ ॥
हे कण्व गोत्रीय ऋषियो ! क्रीड़ा युक्त, बल सम्पन्न, अहिंसक वृत्तियों वाले मरुद्गण रथ पर शोभायमान हैं । आप उनके निमित्त स्तुतिगान करें ॥ १ ॥
४४३. ये पृषतीभिर्ऋष्टिभिः साकं वाशीभिरञ्जिभिः । अजायन्त स्वभानवः ॥ २ ॥
ये मरुद्गण स्वदीप्ति से युक्त धब्बों वाले मृगों (वाहनों) सहित और आभूषणों से अलंकृत होकर गर्जना करते हुए प्रकट हुए हैं ॥ २ ॥
४४४. इहेव शृण्व एषां कशा हस्तेषु यद्वदान् । नि यामञ्चित्रमृञ्जते ॥ ३ ॥
मरुद्गणों के हाथों में स्थित चाबुकों से होने वाली ध्वनियों हमें सुनाई देती हैं, जैसे वे यहीं हो रही हों । वे ध्वनियाँ संघर्ष के समय असामान्य शक्ति प्रदर्शित करती हैं ॥ ३ ॥
४४५. प्र वः शर्धाय घृष्वये त्वेषद्युम्नाय शुष्पिणे । देवत्तं ब्रह्म गायत ॥ ४ ॥
(हे याजको ! आप) बल बढ़ाने वाले, शत्रु नाशक, दीप्तिमान् मरुद्गणों की सामर्थ्य और यश का मंत्रों से विशिष्ट गान करें ॥ ४ ॥
४४६. प्र शंसा गोष्यघ्न्यं क्रीळं यच्छर्धो मारुतम् । जम्भे रसस्य वावृधे ॥ ५ ॥
(हे याजको ! आप) किरणों द्वारा संचरित दिव्य रसों का पर्याप्त सेवन कर बलिष्ठ हुए उन मरुद्गगों के अविनाशी बल की प्रशंसा करें ॥ ५ ॥
४४७. को वो वर्षिष्ठ आ नरो दिवश्च ग्मश्च धूतयः । यत्सीमन्तं न धूनुथ ॥ ६ ॥
द्युलोक और भूलोक को कम्पित करने वाले हे मरुतो ! आप में वरिष्ठ कौन है ? जो सदा वृक्ष के अग्रभाग को हिलाने के समान शत्रुओं को प्रकम्पित कर दे ॥ ६ ॥
४४८. नि वो यामाय मानुषो दध्र उग्राय मन्यवे । जिहीत पर्वतो गिरिः ॥ ७ ॥
हे मरुद्गणो । आपके प्रचण्ड संघर्षक आवेश से भयभीत मनुष्य सुदृढ़ सहारा ढूँढ़ता है, क्योंकि आप बड़े पर्वतों और टीलों को भी कंपा देते हैं ॥ ७ ॥
४४ ९. येषामज्मेषु पृथिवी जुजुर्वाँ इव विश्पतिः । भिया यामेषु रेजते ॥ ८ ॥
उन मरुद्गणों के आक्रमणकारी बलों से यह पृथ्वी जरा-जीर्ण नृपति की भाँति भयभीत होकर प्रकम्पित हो उठती है ॥ ८ ॥
४५०. स्थिरं हि जानमेषां वयो मातुर्निरेतवे । यत्सीमनु द्विता शवः ॥ ९ ॥
इन वीर मरुतों की मातृभूमि आकाश स्थिर है । ये मातृभूमि से पक्षी के वेग के समान निर्बाधित होकर चलते हैं । उनका बल दुगुना होकर व्याप्त होता है ॥ ९ ॥
४५१. उदु त्ये सूनवो गिरः काष्ठा अज्मेष्वत्नत । वाश्रा अभिज्ञु यातवे ॥ १० ॥
शब्द नाद करने वाले मरुतों ने यज्ञार्थ जलों को निः सृत किया । प्रवाहित जल का पान करने के लिये रँभाती हुई गौएँ घुटने तक पानी में जाने के लिए बाध्य होती हैं ॥ १० ॥
४५२. त्यं चिद्धा दीर्घ पृथुं मिहो नपातममृध्रम् । प्रच्यावयन्ति यामभिः ॥ ११ ॥
विशाल और व्यापक न बिंध सकने वाले, जल वृष्टि न करने वाले मेघों को भी वीर मरुद्गण अपनी तेजगति से उड़ा ले जाते हैं ॥ ११ ॥
४५३. मरुतो यद्ध वो बलं जनाँ अचुच्यवीतन । गिरीँ रचुच्यवीतन ॥ १२ ॥
हे मरुतो ! आप अपने बल से लोगों को विचलित करते हैं, आप पर्वतों को भी विचलित करने में समर्थ हैं ॥ १२ ॥
४५४. यद्ध यान्ति मरुतः सं ह ब्रुवतेऽध्वन्ना । शृणोत्ति कश्चिदेषाम् ॥ १३ ॥
जिस समय मरुद्गण गमन करते हैं, तब वे मध्य मार्ग में ही परस्पर वार्ता करने लगते हैं । उनके शब्द को भला कौन नहीं सुन लेता है ? (सभी सुन लेते हैं ।) ॥ १३ ॥
४५५. प्र यात शीभमाशुभिः सन्ति कण्वेषु वो दुवः । तत्रो षु मादयाध्वै ॥ १४ ॥
हे मरुतो ! आप तीव्र वेग वाले वाहन से शीघ्र आएँ । कण्ववंशी आपके सत्कार के लिए उपस्थित है । वहाँ आप उत्साह के साथ तृप्ति को प्राप्त हों ॥ १४ ॥
४५६. अस्ति हि ष्मा मदाय वः स्मसि ष्पा वयमेषाम् । विश्वं चिदायुर्जीवसे ॥ १५ ॥
हे मरुतो ! आपकी प्रसत्रता के लिए यह हवि-द्रव्य तैयार है । हम सम्पूर्ण आयु सुखद जीवन प्राप्त करने के लिए आपका स्मरण करते हैं ॥ १५ ॥
[ सूक्त – ३८ ]
[ ऋषि – कण्व घौर । देवता मरुद्गण । छन्द गायत्री । ]
४५७. कद्ध नूनं कधप्रियः पिता पुत्रं न हस्तयोः । दधिध्वे वृक्तबर्हिषः ॥ १ ॥
हे स्तुति प्रिय मरुतो ! आप कुश के आसनों पर विराजमान हों । पुत्र को पिता द्वारा स्नेहपूर्वक गोद में उठाने के समान, आप हमें कब धारण करेंगे ? ॥ १ ॥
४५८. क्व नूनं कद्वो अर्थं गन्ता दिवो न पृथिव्याः । क्व वो गावो न रण्यन्ति ॥ २ ॥
हे मरुतो ! आप कहाँ हैं ? किस उद्देश्य से आप द्युलोक में गमन करते हैं ? पृथ्वी में क्यों नहीं घूमते ? आपकी गौएँ आपके लिए नही रँभाती क्या ? (अर्थात् आप पृथ्वी रूपी गौ के समीप ही रहें ।) ॥ २ ॥
४५९. क्व वः सुम्ना नव्यांसि मरुतः क्व सुविता । क्वो३ विश्वानि सौभगा ॥ ३ ॥
हे मरुद्गणो ! आपके नवीन संरक्षण साधन कहाँ हैं ? आपके सुख ऐश्वर्य के साधन कहाँ हैं ? आपके सौभाग्यप्रद साधन कहाँ हैं ? आप अपने समस्त वैभव के साथ इस यज्ञ में आएँ ॥ ३ ॥
४६०. यद्यूयं पृश्निमातरो मर्तासः स्यातन । स्तोता वो अमृतः स्यात् ॥ ४ ॥
हे मातृभूमि की सेवा करने वाले आकाशपुत्र मरुतो । यद्यपि आप मरणशील हैं, फिर भी आपकी स्तुति करने वाला अमरता को प्राप्त करता है ॥ ४ ॥
[ प्राणियों के अंगों में रूपान्तरित हो जाने के कारण वायु को मरणशील कहा है, किन्तु वायु सेवन करने वाला मृत्यु से बच जाता है । ]
४६१. मा वो मृगो न यवसे जरिता भूदजोष्यः । पथा यमस्य गादुप ॥ ५ ॥
जैसे मृग तृण को असेव्य नहीं समझता, उसी प्रकार आपकी स्तुति करने वाला आपके लिये अप्रिय न हो (अर्थात् उस पर कृपालु रहें), जिससे उसे यमलोक के मार्ग पर न जाना पड़े ॥ ५ ॥
४६२. मो षु णः परापरा निर्ऋतिर्दुर्हणा वधीत् । पदीष्ट तृष्णया सह ॥ ६ ॥
अति बलिष्ठ पापवृत्तियाँ हमारी दुर्दशा कर हमारा विनाश न करें, प्यास (अतृप्ति) से ये ही नष्ट हो जायें ॥ ६ ॥
४६३. सत्यं त्वेषा अमवन्तो धन्वञ्चिदा रुद्रियासः । मिहं कृण्वन्त्यवाताम् ॥ ७ ॥
यह सत्य ही है कि कान्तिमान्, बलिष्ठ रुद्रदेव के पुत्र ये मरुद्गण, मरुभूमि में भी अवात (वायु शून्य) स्थिति से वर्षा करते हैं ॥ ७ ॥
[ मौसम विशेषज्ञों के अनुसार जहाँ वायु का कम दबाव वाला (लो प्रेसर) क्षेत्र बन जाता है, वहाँ बादल इकट्ठे होकर बरस जाते हैं । ]
४६४. वाश्रेव विद्युन्मिमाति वत्सं न माता सिषक्ति । यदेषां वृष्टिरसर्जि ॥ ८ ॥
जब वह मरुद्गण वर्षा का सृजन करते हैं, तो विद्युत् रँभाने वाली गाय की तरह शब्द करती है (और जिस प्रकार) गाय बछड़ों को पोषण देती है, (उसी प्रकार) वह विद्युत् सिंचन करती है ॥ ८ ॥
[ वायु द्वारा बादलों में घर्षण होने पर रगड़ से विद्युत् पैदा होती है, उसी से गर्जन ध्वनि पैदा होती है । विद्युत् के चमकने से नाइट्रोजन आदि गैसें कृषि पोषक रसायनों में बदल जाती हैं । इस तरह विद्युत् पोषक सिंचन करती है । ]
४६५. दिवा चित्तमः कृण्वन्ति पर्जन्येनोदवाहेन। यत्पृथिवीं व्युन्दन्ति ॥ ९ ॥
मरुद्गण जल प्रवाहक मेघों द्वारा दिन में भी अँधेरा कर देते हैं, तब वे वर्षा द्वारा भूमि को आर्द्र करते हैं ॥ ९ ॥
४६६. अध स्वनान्मरुतां विश्वमा सद्य पार्थिवम् । अरेजन्त प्र मानुषाः ॥ १० ॥
मरुतों की गर्जना से पृथ्वी के निम्न भाग में अवस्थित सम्पूर्ण स्थान प्रकम्पित हो उठते हैं । उस कम्पन से समस्त मानव भी प्रभावित होते हैं ॥ १० ॥
४६७. मरुतो वीळुपाणिभिश्चित्रा रोधस्वतीरनु । यातेमखिद्रयामभिः ॥ ११ ॥
हे मरुतो ! (अश्वों को नियन्त्रित करने वाले) आप बलशाली बाहुओं से, अविच्छिन्न गति से शुभ नदियों की ओर गमन करें ॥ ११ ॥
४६८. स्थिरा वः सन्तु नेमयो रथा अश्वास एषाम् । सुसंस्कृता अभीशवः ॥१२ ॥
हे मरुतो ! आपके रथ बलिष्ठ घोड़ों, उत्तम धुरी और चंचल लगाम से भली प्रकार अलंकृत हों ॥ १२ ॥
४६९. अच्छा वदा तना गिरा जरायै ब्रह्मणस्पतिम् । अग्निं मित्रं न दर्शतम् ॥ १३ ॥
हे याजको ! आप दर्शनीय मित्र के समान ज्ञान के अधिपति अग्निदेव की, स्तुति युक्त वाणियों द्वारा प्रशंसा करें ॥ १३ ॥
४७०. मिमीहि श्लोकमास्ये पर्जन्य इव ततनः । गाय गायत्रमुक्थ्यम् ॥ १४ ॥
हे याजको ! आप अपने मुख से श्लोक रचना कर मेघ के समान इसे विस्तारित करें । गायत्री छन्द में रचे हुए काव्य का गायन करें ॥ १४ ॥
४७१. वन्दस्व मारुतं गणं त्वेषं पनस्युमर्किणम् । अस्मे वृद्धा असन्निह ॥ १५ ॥
हे ऋत्विजो ! आप कान्तिमान्, स्तुत्य, अर्चन योग्य मरुद्गणों का अभिवादन करें । यहाँ हमारे पास इनका वास रहे ॥ १५ ॥
[ सूक्त – ३९ ]
[ ऋषि – कण्व घौर । देवता – मरुद्गण । छन्द – बार्हत प्रगाथ (विषमा बृहती, समासतो बृहतो) । ]
४७२. प्र यदित्था परावतः शोचिर्न मानमस्यथ । कस्य क्रत्वा मरुतः कस्य वर्षसा कं याथ कं ह धूतयः ॥ १ ॥
हे कँपाने वाले मरुतो ! आप अपना बल दूरस्थ स्थान से विद्युत् के समान यहाँ पर फेंकते हैं, तो आप (किसके यज्ञ की ओर) किसके पास जाते हैं ? किस उद्देश्य से आप कहाँ जाना चाहते हैं ? उस समय आपका क्या लक्ष्य होता है ? ॥ १ ॥
४७३. स्थिरा वः सन्त्वायुधा पराणुदे वीळू उत प्रतिष्कभे । युष्माकमस्तु तविषी पनीयसी मा मर्त्यस्य मायिनः ॥ २ ॥
आपके हथियार शत्रु को हटाने में नियोजित हों । आप अपनी दृढ़ शक्ति से उनका प्रतिरोध करें । आपकी शक्ति प्रशंसनीय हो । आप छद्म वेषधारी मनुष्यों को आगे न बढ़ायें ॥ २ ॥
४७४. परा ह यत्स्थिरं हथ नरो वर्तयथा गुरु । वि याथन वनिनः पृथिव्या व्याशाः पर्वतानाम् ॥ ३ ॥
हे मरुतो ! आप स्थिर वृक्षों को गिराते, दृढ़ चट्टानों को प्रकम्पित करते, भूभि के वनों को जड़ विहीन करते हुए पर्वतों के पार निकल जाते हैं ॥ ३ ॥
४७५. नहि वः शत्रुर्विविदे अधि द्यवि न भूम्यां रिशादसः । युष्माकमस्तु तविषी तना युजा रुद्रासो नू चिदाधृषे ॥ ४ ॥
हे शत्रुनाशक मरुतो ! न द्युलोक में और न पृथ्वी पर ही, आपके शत्रुओं का अस्तित्व है । हे रुद्र पुत्रो ! शत्रुओं को क्षत-विक्षत करने के लिए आप सब मिलकर अपनी शक्ति विस्तृत करें ॥ ४ ॥
४७६. प्र वेपयन्ति पर्वतान्वि विञ्वन्ति वनस्पतीन् । प्रो आरत मरुतो दुर्मदा इव देवासः सर्वया विशा ॥ ५ ॥
हे मरुतो ! मदमत्त हुए लोगों के समान आप पर्वतों को प्रकम्पित करते हैं और पेड़ों को उखाड़ कर फेंकते हैं, अतः आप प्रजाओं के आगे-आगे उन्नति करते हुए चलें ॥ ५ ॥
४७७. उपो रथेषु पृषतीरयुग्ध्वं प्रष्टिर्वहति रोहितः । आ वो यामाय पृथिवी चिदश्रोदबीभयन्त मानुषाः ॥ ६ ॥
हे मरुतो ! आपके रथ को चित्र-विचित्र चिह्नों युक्त (पशु आदि) गति देते हैं, (उनमें) लाल रंग वाला अश्व धुरी को खीचता है । तुम्हारी गति से उत्पन्न शब्द भूमि सुनती है, मनुष्यगण उस ध्वनि से भयभीत हो जाते हैं ॥ ६ ॥
[ वायु मण्डल की गति आकाश में दिखाई देने वाले चित्र-विचित्र नक्षत्रों से प्रभावित होती है । उनमें से लोहित वर्ण का सूर्य मुख्य भूमिका निभाता है । ]
४७८. आ वो मक्षू तनाय कं रुद्रा अवो वृणीमहे । गन्ता नूनं नोऽवसा यथा पुरेत्था कण्वाय बिभ्युषे ॥ ७ ॥
हे रुद्रपुत्रो ! अपनी संतानों की रक्षा के लिए हम आपकी स्तुति करते हैं । जैसे पूर्व समय में आप भययुक्त कण्वों की ओर रक्षा के निमित्त शीघ्र गये थे, उसी प्रकार आप हमारी रक्षा के निमित्त शीघ्र पधारें ॥ ७ ॥
४७९. युष्मेषितो मरुतो मर्त्येषित आ यो नो अध्व ईषते । वि तं युयोत शवसा व्योजसा वि युष्माकाभिरूतिभिः ॥ ८ ॥
हे मरुतो ! आपके द्वारा प्रेरित या अन्य किसी मनुष्य द्वारा प्रेरित शत्रु हम पर प्रभुत्व जमाने आये, तो आप अपने बल से, अपने तेज से और रक्षण साधनों से उन्हें दूर हटा दें ॥ ८ ॥
४८०. असामि हि प्रयज्यवः कण्वं दद प्रचेतसः । असामिभिर्मरुत आ न ऊतिभिर्गन्ता वृष्टिं न विद्युतः ॥ ९ ॥
हे विशिष्ट पूज्य, ज्ञाता मरुतो ! कण्व को जैसे आपने सम्पूर्ण आश्रय दिया था, वैसे ही चमकने वाली बिजलियों के साथ वेग से आने वाली वृष्टि की तरह आप सम्पूर्ण रक्षा साधनों को लेकर हमारे पास आयें ॥ ९ ॥
४८१. असाम्योजो बिभृथा सुदानवोऽसामि धूतयः शवः । ऋषिद्विषे मरुतः परिमन्यव इषु न सुनत द्विषम् ॥ १० ॥
हे उत्तम दानशील मरुतो ! आप सम्पूर्ण पराक्रम और सम्पूर्ण बलों को धारण करते हैं । हे शत्रु को प्रकम्पित करने वाले मरुद्गणो । ऋषियों से द्वेष करने वाले शत्रुओं को नष्ट करने वाले बाण के समान आप शत्रुघातक (शक्ति) का सृजन करें ॥ १० ॥
[ सूक्त – ४० ]
[ ऋषि – कण्व घौर । देवता – ब्रह्मणस्पति । छन्द – बार्हत प्रगाथ (विषमा बृहती, समासतोवृहती)। ]
४८२. उत्तिष्ठ ब्रह्मणस्पते देवयन्तस्त्वेमहे । उप प्र यन्तु मरुतः सुदानव इन्द्र प्राशूर्भवा सचा ॥ १ ॥
हे ब्रह्मणस्पते ! आप उठें, देवों की कामना करने वाले हम आप की स्तुति करते हैं । कल्याणकारी मरुद्गण हमारे पास आयें । हे इन्द्रदेव ! आप ब्रह्मणस्पति के साथ मिलकर सोमपान करें ॥ १ ॥
४८३. त्वामिद्धि सहसस्पुत्र मर्त्य उपब्रूते धने हिते । सुवीर्यं मरुत आ स्वश्व्यं दधीत यो व आचके ॥ २ ॥
साहसिक कार्यों के लिये समर्पित हे ब्रह्मणस्पते ! युद्ध में मनुष्य आपका आवाहन करते हैं । हे मरुतो ! जो धनार्थी मनुष्य ब्रह्मणस्पति सहित आपकी स्तुति करता है, वह उत्तम अश्वों के साथ श्रेष्ठ पराक्रम एवं वैभव से सम्पन्न हो ॥ २ ॥
४८४. प्रैतु ब्रह्मणस्पतिः प्र देव्येतु सूनृता । अच्छा वीरं नर्यं पङ्क्तिराधसं देवा यज्ञं नयन्तु नः ॥ ३ ॥
ब्रह्मणस्पति हमारे अनुकूल होकर यज्ञ में आगमन करें । हमें सत्यरूप दिव्यवाणी प्राप्त हो । मनुष्यों के हितकारी देवगण हमारे यज्ञ में पंक्तिबद्ध होकर अधिष्ठित हों तथा शत्रुओं का विनाश करें ॥ ३ ॥
४८५. यो वाघते ददाति सूनरं वसु स धत्ते अक्षिति श्रवः । तस्मा इळां सुवीरामा यजामहे सुप्रतूर्तिमनेहसम् ॥ ४ ॥
जो यजमान ऋत्विजों को उत्तम धन देते हैं, वे अक्षय यश को पाते हैं । उनके निमित्त हम (ऋत्विग्गण) उत्तम पराक्रमी, शत्रु-नाशक, अपराजेय मातृभूमि की वन्दना करते हैं ॥ ४ ॥
४८६. प्र नूनं ब्रह्मणस्पतिर्मन्त्रं वदत्युक्थ्यम् । यस्मिन्निन्द्रो वरुणो मित्रो अर्यमा देवा ओकांसि चक्रिरे ॥ ५ ॥
ब्रह्मणस्पति निश्चय ही स्तुति योग्य (उन) मंत्रों को विधि से उच्चारित कराते हैं, जिन मंत्रों में इन्द्र, वरुण, मित्र और अर्यमा आदि देवगण निवास करते हैं ॥ ५ ॥
४८७. तमिद्वोचेमा विदथेषु शम्भुवं मन्त्रं देवा अनेहसम् । इमां च वाचं प्रतिहर्यथा नरो विश्वेद्वामा वो अश्नवत् ॥ ६ ॥
हे नेतृत्व करने वालो ! (देवताओ !) हम सुखप्रद, विघ्ननाशक मंत्र का यज्ञ में उच्चारण करते हैं । हे नेतृत्व करने वाले देवो ! यदि आप इस मन्त्र रूप वाणी की कामना करते हैं, (सम्मानपूर्वक अपनाते हैं) तो ये सभी सुन्दर स्तोत्र आपको निश्चय ही प्राप्त हो ॥ ६ ॥
४८८. को देवयन्तमश्नवज्जनं को वृक्तबर्हिषम् । प्रप्र दाश्वान्पस्त्याभिरस्थितान्तर्वावत्क्षयं दधे ॥ ७ ॥
देवत्व की कामना करने वालों के पास भला कौन आयेंगे ? (ब्रह्मणस्पति आयेंगे ।) कुश-आसन बिछाने वाले के पास कौन आयेंगे ? (बह्मणस्पति आयेंगे ।) आपके द्वारा हविदाता याजक अपनी संतानों, पशुओं आदि के निमित्त उत्तम घर का आश्रय पाते हैं ॥ ७ ॥
४८९. उप क्षत्रं पृञ्चीत हन्ति राजभिर्भये चित्सुक्षितिं दधे । नास्य वर्ता न तरुता महाधने नार्थे अस्ति वज्रिणः ॥ ८ ॥
ब्रह्मणस्पतिदेव, क्षात्रबल की अभिवृद्धि कर राजाओं की सहायता से शत्रुओं को मारते हैं । भय के सम्मुख वे उत्तम धैर्य को धारण करते हैं । ये वज्रधारी बड़े युद्धों या छोटे युद्धों में किसी से पराजित नहीं होते ॥ ८ ॥
[ सूक्त – ४१ ]
[ ऋषि – कण्व घौर । देवता – वरुण, मित्र एवं अर्यमा; ४-६ आदित्यगण । छन्द – गायत्री । ]
४९०. यं रक्षन्ति प्रचेतसो वरुणो मित्रो अर्यमा । नू चित्स दभ्यते जनः ॥ १ ॥
जिस याजक को, ज्ञान सम्पन्न वरुण, मित्र और अर्यमा आदि देवों का संरक्षण प्राप्त है, उसे कोई भी नहीं दबा सकता ॥ १ ॥
४९१. यं बाहुतेव पिप्रति पान्ति मर्त्यं रिषः । अरिष्टः सर्व एधते ॥ २ ॥
अपने बाहुओं से विविध धनों को देते हुए, वरुणादि देवगण जिस मनुष्य की रक्षा करते हैं, शत्रुओं से अहिंसित होता हुआ वह वृद्धि पाता है ॥ २ ॥
[ जब देवगण साधक को सत्पात्र मानकर उसे दैवी सम्पदा प्रदान करते हैं, तो अहितकर प्रवृत्तियों से वह अप्रभावित रहकर सतत प्रगतिशील रहता है । ]
४९२. वि दुर्गा वि द्विषः पुरो घ्नन्ति राजान एषाम् । नयन्ति दुरिता तिरः ॥ ३ ॥
राजा के सदृश वरुणादि देवगण, शत्रुओं के नगरों और किलों को विशेष रूप से नष्ट करते हैं । वे याजकों को दुःख के मूलभूत कारणों (पापों) से दूर ले जाते हैं ॥ ३ ॥
४९३. सुगः पन्था अनृक्षर आदित्यास ऋतं यते । नात्रावखादो अस्ति वः ॥ ४ ॥
हे आदित्यो ! आप के यज्ञ में आने के मार्ग अतिसुगम और कण्टकहीन हैं । इस यज्ञ में आपके लिए श्रेष्ठ हविष्यान्न समर्पित हैं ॥ ४ ॥
४९४. यं यज्ञं नयथा नर आदित्या ऋजुना पथा । प्र वः स धीतये नशत् ॥ ५ ॥
हे आदित्यो ! जिस यज्ञ को आप सरल मार्ग से सम्पादित करते हैं, वह यज्ञ आपके ध्यान में विशेष रूप से रहता है । वह भला कैसे विस्मृत हो सकता है ? ॥ ५ ॥
४९५, स रत्नं मर्त्यो वसु विश्वं तोकमुत त्मना । अच्छा गच्छत्यस्तृतः ॥ ६ ॥
हे आदित्यो ! आपका याजक किसी से पराजित नहीं होता । वह धनादि रत्न और सन्तानों को प्राप्त करता हुआ प्रगति करता है ॥ ६ ॥
४९६. कथा राधाम सखायः स्तोमं मित्रस्यार्यम्णः । महि प्सरो वरुणस्य ॥ ७ ॥
हे मित्रो ! मित्र, अर्यमा और वरुण देवों के महान् ऐश्वर्य साधनों का किस प्रकार वर्णन करें ? अर्थात् इनकी महिमा अपार है ॥ ७ ॥
४९७. मा वो घ्नन्तं मा शपन्तं प्रति वोचे देवयन्तम् । सुम्नैरिद्व आ विवासे ॥ ८ ॥
हे देवो ! देवत्व प्राप्ति की कामना वाले साधकों को कोई कटुवचनों से और क्रोधयुक्त बचनों से प्रताड़ित न करने पाये । हम स्तुति वचनों द्वारा आपको प्रसन्न करते हैं ॥ ८ ॥
४९८. चतुरश्चिद्ददमानाद्विभीयादा निधातोः । न दुरुक्ताय स्पृहयेत् ॥ ९ ॥
जैसे जुआ खेलने में चार पाँसे गिरने तक (हार-जीत का) भय रहता है, उसी प्रकार बुरे वचन कहने से भी डरना चाहिये । उससे स्नेह नहीं करना चाहिए ॥ ९ ॥
[ सूक्त – ४२ ]
[ऋषि – कण्वघौर । देवता – पूषा । छन्द – गायत्री । ]
४९९. सं पूषन्नध्वनस्तिर व्यंहो विमुचो नपात् । सक्ष्वा देव-प्र णस्पुरः ॥ १ ॥
हे पूषादेव ! हम पर सुखों को न्योछावर करें । पाप मार्गों से हमें पार लगाएँ । हे देव ! हमें आगे बढ़ाएँ ॥ १ ॥
५००. यो नः पूषन्नघो वृको दुःशेव आदिदेशति । अप स्म तं पथो जहि ॥ २ ॥
हे पूषादेव ! जो हिंसक, चोर, जुआ खेलने वाले हम पर शासन करना चाहते हैं, उन्हें हम से दूर करें ॥ २ ॥
५०१. अप त्यं परिपन्थिनं मुषीवाणं हुरश्चितम् । दूरमधि स्रुतेरज ॥ ३ ॥
हे पूषादेव ! मार्ग में घात लगाने वाले तथा लूटनेवाले कुटिल चोर को हमारे मार्ग से दूर करके विनष्ट करें ॥ ३ ॥
५०२. त्वं तस्य द्वयाविनोऽघशंसस्य कस्य चित् । पदाभि तिष्ठ तपुषिम् ॥ ४ ॥
आप हर किसी दुहरी चाल चलने वाले कुटिल हिंसकों के शरीर को पैरो से कुचलकर खड़े हों. अर्थात् उन्हें दबाकर रखें, उन्हें बढ़ने न दें ॥ ४ ॥
५०३. आ तत्ते दस्र मन्तुमः पूषन्नवो वृणीमहे । येन पितृनचोदयः ॥ ५ ॥
हे दुष्ट-नाशक, मनीषी पूषादेव ! हम अपनी रक्षा के निमित्त आपकी स्तुति करते हैं । आपके संरक्षण ने ही हमारे पितरों को प्रवृद्ध किया था ॥ ५ ॥
५०४. अधा नो विश्वसौभग हिरण्यवाशीमत्तम । धनानि सुषणा कृधि ॥ ६ ॥
हे सम्पूर्ण सौभाग्ययुक्त और स्वर्ण आभूषणों से युक्त पूषादेव ! हमारे लिए सभी उत्तम धन एवं सामर्थ्यों को प्रदान करें ॥ ६ ॥
५०५. अति नः सश्चतो नय सुगा नः सुपथा कृणु । पूषन्निह क्रतुं विदः ॥ ७ ॥
हे पूषादेव ! कुटिल दुष्टों से हमें दूर ले चलें । हमें सुगम-सुपथ का अवलम्बन प्रदान करें एवं अपने कर्तव्यो का बोध करायें ॥ ७ ॥
५०६. अभि सूयवसं नय न नवज्वारो अध्वने । पूषन्निह क्रतुं विदः ॥ ८ ॥
हे पूषादेव ! हमें उत्तम जौ (अन्न) वाले देश की ओर ले चलें । मार्ग में नवीन संकट न आने पायें । हमें अपने कर्तव्यों का ज्ञान करायें । (हम इन कर्तव्यों को जानें ।) ॥ ८ ॥
५०७. शग्धि पूर्धि प्र यंसि च शिशीहि प्रास्युदरम् । पूषन्निह क्रतुं विदः ॥ ९ ॥
हे पूषादेव ! हमे सामर्थ्य दें । हमें धनों से युक्त करें । हमें साधनों से सम्पन्न करें । हमें तेजस्वी बनाएँ । हमारी उदरपूर्ति करें । हम अपने इन कर्तव्यों को जानें ॥ ९ ॥
५०८. न पूषणं मेथामसि सूक्तैरभि गृणीमसि । वसूनि दस्ममीमहे ॥ १० ॥
हम पूषादेव को नहीं भूलते । सूक्तों से उनकी स्तुति करते हैं । प्रकाशमान सम्पदा हम उनसे माँगते हैं ॥ १० ॥
[ऐसी सम्पदा, जो प्रकाशित की जा सके और जो जीवन को प्रकाशित करे, कलंकित न करे । ऐसी सम्पदा की ही कामना की जानी चाहिए ।]
[ सूक्त – ४३ ]
[ ऋषि – कण्व घौर । देवता – रुद्र – ३ रुद्र, मित्रावरुण, ७-९ सोम । छन्द – गायत्री, ९ अनुष्टुप् । ]
५०९. कद्रुद्राय प्रचेतसे मीळ्हुष्टमाय तव्यसे । वोचेम शन्तमं हृदे ॥ १ ॥
विशिष्ट ज्ञान से सम्पन्न, सुखी एवं बलशाली रुद्रदेव के निमित किन सुखप्रद स्तोत्रों का पाठ करें ? ॥ १ ॥
५१०. यथा नो अदितिः करत्पश्वे नृभ्यो यथा गवे । यथा तोकाय रुद्रियम् ॥ २ ॥
अदिति हमारे लिये और हमारे पशुओं, सम्बन्धियों, गौओं और सन्तानों के लिये आरोग्य-वर्धक ओषधियों का उपाय (अन्वेषण-व्यवस्था) करें ॥ २ ॥
५११. यथा नो मित्रो वरुणो यथा रुद्रश्चिकेतति । यथा विश्वे सजोषसः ॥ ३ ॥
मित्र, वरुण और रुद्रदेव जिस प्रकार हमारे हितार्थ प्रयत्न करते हैं, उसी प्रकार अन्य समस्त देवगण भी हमारा कल्याण करें ॥ ३ ॥
५१२. गाथपतिं मेधपतिं रुद्रं जलाषभेषजम् । तच्छंयोः सुम्नमीमहे ॥ ४ ॥
हम सुखद जल एवं ओषधियों से युक्त, स्तुतियों के स्वामी तथा यज्ञ के स्वामी, रुद्रदेव से आरोग्य सुख की कामना करते हैं ॥ ४ ॥
[ स्तुत्य विचार, श्रेष्ठकर्म एवं रस से पुष्ट ओषधियों के संयोग से आरोग्य सुख प्राप्त हो सकता है । ]
५१३. यः शुक्र इव सूर्यो हिरण्यमिव रोचते । श्रेष्ठो देवानां वसुः ॥ ५ ॥
सूर्य सदृश सामर्थ्यवान् और स्वर्ण सदृश दीप्तिमान् रुद्रदेव सभी देवों में श्रेष्ठ और ऐश्वर्यवान् हैं ॥ ५ ॥
५१४. शं नः करत्यर्वते सुगं मेषाय मेष्ये । नृभ्यो नारिभ्यो गवे ॥ ६ ॥
हमारे अश्वों, मेढ़ों, भेड़ों, पुरुषों, नारियों और गौओं के लिये वे रुद्रदेव सब प्रकार से मंगलकारी हैं ॥ ६ ॥
५१५. अस्मे सोम श्रियमधि नि धेहि शतस्य नृणाम् । महि श्रवस्तुविनृम्णम् ॥ ७ ॥
हे सोमदेव ! हम मनुष्यों को सैकड़ों प्रकार का ऐश्वर्य, तेजयुक्त अन्न, बल और महान् यश प्रदान करें ॥ ७ ॥
५१६. मा नः सोम परिबाधो मारातयो जुहुरन्त । आ न इन्दो वाजे भज ॥ ८ ॥
सोमयाग में बाधा देने वाले शत्रु हमें प्रताड़ित न करें । कृपण और दुष्टों से हम पीड़ित न हों । हे सोमदेव ! आप हमारे बल में वृद्धि करें ॥ ८ ॥
५१७. यास्ते प्रजा अमृतस्य परस्मिन्धामन्नृतस्य । मूर्धा नाभा सोम वेन आभूषन्तीः सोम वेदः ॥ ९ ॥
हे सोमदेव ! यज्ञ के श्रेष्ठ स्थान में प्रतिष्ठित आप अमृत से युक्त हैं । यजन कार्य में सर्वोच्च स्थान पर विभूषित प्रजा को आप जानें ॥ ९ ॥
[ सूक्त – ४४ ]
[ ऋषि – प्रस्कण्व काण्व । देवता – अग्नि, १-२अग्नि, अश्विनीकुमार, उषा । छन्द – बार्हत प्रगाथ (विषमा बृहती, समासतो बृहतो) ।]
५१८. अग्ने विवस्वदुषसश्चित्रं राधो अमर्त्य ।
आ दाशुषे जातवेदो वहा त्वमद्या देवाँ उषर्बुधः ॥ १ ॥
हे अमर अग्निदेव ! उषा काल में विलक्षण शक्तियाँ प्रवाहित होती हैं, यह दैवी सम्पदा नित्यदान करने वाले व्यक्ति को दें । हे सर्वज्ञ ! उषाकाल में जाग्रत् हुए देवताओं को भी यहाँ लायें ॥ १ ॥
५१९. जुष्टो हि दूतो असि हव्यवाहनोऽग्ने रथीरध्वराणाम् । सजूरश्विभ्यामुषसा सुवीर्यमस्मे धेहि श्रवो बृहत् ॥ २ ॥
हे अग्निदेव ! आप सेवा के योग्य देवों तक हवि पहुँचाने वाले दूत और यज्ञ में देवों को लाने वाले रथ के समान हैं । आप अश्विनीकुमारों और देवी उषा के साथ हमें श्रेष्ठ, पराक्रमी एवं यशस्वी बनायें ॥ २ ॥
५२०. अद्या दूतं वृणीमहे वसुमग्निं पुरुप्रियम् । धूमकेतुं भाऋजीकं व्युष्टिषु यज्ञानामध्वरश्रियम् ॥ ३ ॥
उषाकाल में सम्पन्न होने वाले यज्ञ, जो धूम्र की पताका एवं ज्वालाओं से सुशोभित हैं, ऐसे सर्वप्रिय देवदूत, सबके आश्रय एवं महान् अग्निदेव को हम ग्रहण करते हैं और श्री सम्पन्न बनते हैं ॥ ३ ॥
५२१. श्रेष्ठं यविष्ठमतिथिं स्वाहुतं जुष्टं जनाय दाशुषे । देवाँ अच्छा यातवे जातवेदसमग्निमीळे व्युष्टिषु ॥ ४ ॥
हम सर्वश्रेष्ठ, अतियुवा, अतिथिरूप, वन्दनीय, हविदाता, यजमान द्वारा पूजनीय, आहवनीय, सर्वज्ञ अग्निदेव की प्रतिदिन स्तुति करते हैं । वे हमें देवत्व की ओर ले चलें ॥ ४ ॥
५२२. स्तविष्यामि त्वामहं विश्वस्यामृत भोजन ।
अग्ने त्रातारममृतं मियेध्य यजिष्ठं हव्यवाहन ॥ ५ ॥
अविनाशी, सबको जीवन (भोजन) देने वाले, हविवाहक, विश्व का त्राण करने वाले, सबके आराध्य, युवा हे अग्निदेव ! हम आपकी स्तुति करते हैं ॥ ५ ॥
५२३. सुशंसो बोधि गृणते यविष्ठ्य मधुजिह्वः स्वाहुतः । प्रस्कण्वस्य प्रतिरन्नायुर्जीवसे नमस्या दैव्यं जनम् ॥ ६ ॥
मधुर जिह्वावाले, याजकों की स्तुति के पात्र, हे तरुण अग्निदेव ! भली प्रकार आहुतियाँ प्राप्त करते हुए आप याजकों की आकांक्षा को जानें । प्रस्कण्व (ज्ञानियों) को दीर्घ जीवन प्रदान करते हुए आप देवगणों को सम्मानित करें ॥ ६ ॥
५२४. होतारं विश्ववेदसं सं हि त्वा विश इन्धते । स आ वह पुरुहूत प्रचेतसोऽग्ने देवाँ इह द्रवत् ॥ ७ ॥
होता रूप सर्वभूतों के ज्ञाता, हे अग्निदेव ! आपको मनुष्यगण सम्यक् रूप से प्रज्वलित करते हैं । बहुतों द्वारा आहुत किये जाने वाले हे अग्निदेय प्रकृष्ट ज्ञान सम्पन्न देवों को तीव्र गति से यज्ञ में लायें ॥ ७ ॥
५२५. सवितारमुषसमश्विना भगमग्नि व्युष्टिषु क्षपः । कण्वासस्त्वा सुतसोमास इन्धते हव्यवाहं स्वध्वर ॥ ८ ॥
श्रेष्ठ यज्ञों को सम्पन्न करने वाले हे अग्निदेव ! रात्रि के पश्चात् उषाकाल में आप सविता, उषा, दोनों अश्विनीकुमारों, भग और अन्य देवों के साथ यहाँ आयें । सोम को अभिषुत करने वाले तथा हवियों की पहुँचाने वाले ऋत्विग्गण आपको प्रज्वलित करते हैं ॥ ८ ॥
५२६. पतिर्ह्यध्वराणामग्ने दूतो विशामसि ।
उषर्बुध आ वह सोमपीतये देवाँ अद्य स्वर्दृशः ॥ ९ ॥
हे अग्निदेव ! आप साधकों द्वारा सम्पन्न होने वाले यज्ञों के अधिपति और देवों के दूत हैं । उषाकाल में जाप्रत् देव आत्माओं को आज सोमपान के निमित्त यहाँ यज्ञस्थल पर लायें ॥ ९ ॥
५२७. अग्ने पूर्वा अनूषसो विभावसो दीदेथं विश्वदर्शनः ।
असि ग्रामेष्वविता पुरोहितो ऽसि यज्ञेषु मानुषः ॥ १० ॥
हे विशिष्ट दीप्तिमान् अग्निदेव ! विश्वदर्शनीय आप उषाकाल के पूर्व ही प्रदीप्त होते हैं । आप ग्रामों की रक्षा करने वाले तथा यज्ञों, मानवों के अग्रणी नेता के समान पूजनीय हैं ॥ १० ॥
५२८. नि त्वा यज्ञस्य साधनमग्ने होतारमृत्विजम् । मनुष्वद्देव धीमहि प्रचेतसं जीरं दूतममर्त्यम् ॥ ११ ॥
हे अग्निदेव ! हम मनुष्यों की भाँति आप को यज्ञ के साधन रूप, होता रूप, ऋत्विज् रूप, प्रकृष्ट ज्ञानी रूप, चिर-पुरातन और अविनाशी रूप में स्थापित करते हैं ॥ ११ ॥
५२९. यद्देवानां मित्रमहः पुरोहितोऽन्तरो यासि दूत्यम् ।
सिन्धोरिव प्रस्वनितास ऊर्मयोऽग्नेर्भ्राजन्ते अर्चयः ॥ १२ ॥
हे मित्रों में महान् अग्निदेव ! आप जब यज्ञ के पुरोहित रूप में देवों के बीच दूत कर्म के निमित्त जाते हैं, तब आपकी ज्वालायें समुद्र की प्रचण्ड लहरों के समान शब्द करती हुई प्रदीप्त होती हैं ॥ १२ ॥
५३०. श्रुधि श्रुत्कर्ण वह्निभिर्देवैरग्ने सयावभिः ।
आ सीदन्तु बर्हिषि मित्रो अर्यमा प्रातर्यावाणो अध्वरम् ॥ १३ ॥
प्रार्थना पर ध्यान देने वाले हे अग्निदेव ! आप हमारी स्तुति स्वीकार करें । दिव्य अग्निदेव के साथ समान गति से चलने वाले, मित्र और अर्थमा आदि देवगण भी प्रातःकालीन यज्ञ में आसीन हों ॥ १३ ॥
५३१. शृण्वन्तु स्तोमं मरुतः सुदानवोऽग्निजिह्वा ऋतावृधः । पिबतु सोमं वरुणो धृतव्रतोऽश्विभ्यामुषसा सजूः ॥ १४ ॥
उत्तम दानशील, अग्निरूप जिह्वा से यज्ञ को प्रवृद्ध करने वाले मरुद्गण इन स्तोत्रों का श्रवण करें । नियमपालक वरुणदेव, अश्विनीकुमारों और देवी उषा के साथ सोम रस का पान करें ॥ १४ ॥
[ सूक्त – ४५ ]
[ ऋषि – प्रस्कण्व काण्व । देवता – अग्नि, १० उत्तरार्द्ध – देवगण । छन्द – अनुष्टप् । ]
५३२. त्वमग्ने वसूँरिह रुद्राँ आदित्याँ उत । यजा स्वध्वरं जनं मनुजातं घृतप्रुषम् ॥ १ ॥
वसु, रुद्र और आदित्य आदि देवताओं को प्रसन्नता के निमित्त यज्ञ करने वाले हे अग्निदेव ! आप घृताहुति से श्रेष्ठ यज्ञ सम्पन्न करने वाले मनु – संतानों (मनुष्यों) का (अनुदानादि द्वारा) सत्कार करें ॥ १ ॥
५३३. श्रुष्टीवानो हि दाशुषे देवा अग्ने विचेतसः । तान्रोहिदश्व गिर्वणस्त्रयस्त्रिंशतमा वह ॥ २ ॥
हे अग्निदेव ! विशिष्ट ज्ञान – सम्पन्न देवगण, हविदाता के लिए उत्तम सुख देते हैं । हे रोहित वर्ण अश्व वाले (अर्थात् रक्तवर्ण की ज्वालाओं से सुशोभित) स्तुत्य अग्निदेव ! उन तैंतीस कोटि देवों को यहाँ यज्ञस्थल पर लेकर आयें ॥ २ ॥
५३४. प्रियमेधवदत्रिवज्जातवेदो विरूपवत् । अङ्गिरस्वन्महिव्रत प्रस्कण्वस्य श्रुधी हवम् ॥ ३ ॥
हे श्रेष्ठकर्मा, ज्ञान सम्पन्न अग्निदेव ! जैसे आपने प्रियमेधा, अत्रि, विरूप और अंगिरा के आवाहनों को सुना था, वैसे ही अब प्रस्कण्व के आवाहन को भी सुनें ॥ ३ ॥
५३५. महिकेरव ऊत्तये प्रियमेधा अहूषत । राजन्तमध्वराणामग्निं शुक्रेण शोचिषा ॥ ४ ॥
दिव्य प्रकाश से युक्त अग्निदेव यज्ञ में तेजस्वी रूप में प्रदीप्त हुए । महान् कर्मवाले प्रियमेधा ऋषियों ने अपनी रक्षा के निमित्त अग्निदेव का आवाहन किया ॥ ४ ॥
५३६. घृताहवन सन्त्येमा उ षु श्रुधी गिरः । याभिः कण्वस्य सूनवो हवन्तेऽवसे त्वा ॥५ ॥
घृत – आहुति – भक्षक हे अग्निदेव ! कण्व के वंशज, अपनी रक्षा के लिये जो स्तुतियाँ करते हैं, उन्हीं स्तुतियों को आप सम्यक् प्रकार से सुनें ॥ ५ ॥
५३७. त्वां चित्रश्रवस्तम हवन्ते विक्षु जन्तवः । शोचिष्केशं पुरुप्रियाग्ने हव्याय बोल्लहवे ॥ ६ ॥
प्रेमपूर्वक हविष्य को ग्रहण करने वाले हे यशस्वी अग्निदेव ! आप आश्चर्यजनक वैभव से सम्पन्न हैं । सम्पूर्ण मनुष्य एवं ऋत्विग्गण यज्ञ सम्पादन के निमित्त आपका आवाहन करते हुए हवि समर्पित करते हैं ॥ ६ ॥
५३८. नि त्वा होतारमृत्विजं दधिरे वसुवित्तमम् । श्रुत्कर्णं सप्रथस्तमं विप्रा अग्ने दिविष्टिषु ॥ ७ ॥
हे अग्निदेव ! होता रूप, ऋत्विज्रूप, धन को धारण करने वाले, स्तुति सुनने वाले, महान् यशस्वी आपको विद्वज्जन स्वर्ग की कामना से, यज्ञों में स्थापित करते हैं ॥ ७ ॥
५३९. आ त्वा विप्रा अचुच्यवुः सुत्तसोमा अभि प्रयः । बृहद्धा बिभ्रतो हविरग्ने मर्ताय दाशुषे ॥ ८ ॥
हे अग्निदेव ! हविष्यान्न और सोम को तैयार करके रखने वाले विद्वान्, दानशील याजक के लिये महान् तेजस्वी आपको स्थापित करते हैं ॥ ८ ॥
५४०. प्रातर्याव्णः सहस्कृत सोमपेयाय सन्त्य । इहाद्य दैव्यं जनं बर्हिरा सादया वसो ॥ ९ ॥
हे बल उत्पादक अग्निदेव ! आप धनों के स्वामी और दानशील हैं । आज प्रात:काल सोमपान के निमित्त यहाँ यज्ञस्थल पर आने को उद्यत देवों को बुलाकर कुश के आसनों पर बिठायें ॥ ६ ॥
५४१. अर्वाञ्चं दैव्यं जनमग्ने यक्ष्व सहूतिभिः । अर्थ सोमः सुदानवस्तं पात तिरो अह्र्यम् ॥ १० ॥
हे अग्निदेव ! यज्ञ के समक्ष प्रत्यक्ष उपस्थित देवगणों का उत्तम वचनों से अभिवादन कर यजन करें । हे श्रेष्ठ देवो ! यह सोम आपके लिए प्रस्तुत है, इसका पान करें ॥ १० ॥
[ सूक्त ४६ ]
[ ऋषि – प्रस्कण्व काण्व । देवता – अश्विनीकुमार । छन्द – गायत्री । ]
५४२. एषो उषा अपूर्व्या म्युच्छति प्रिया दिवः । स्तुषे वायश्चिना बृहत् ॥ १ ॥
यह प्रिय अपूर्व (अलौकिक) देशी उषा आकाश के तम का नाश करती हैं । देवी उषा के कार्य में सहयोगी हे अश्विनीकुमारो । हम महान् स्तोत्रों द्वारा आपकी स्तुति करते हैं ।
५४३. या दस्रा सिन्धुमातरा मनोतरा रयीणाम् । धिया देवा वसुविदा ॥ २ ॥
हे अश्विनीकुमारो ! आप शत्रुओं के नाशक एवं नदियों के उत्पत्तिकर्ता हैं । आप विवेकपूर्वक कर्म करने वालों को अपार सम्पत्ति देने वाले हैं ॥ २ ॥
५४४. वच्यन्ते वां ककुहासो जूर्णायामधि विष्टषि । यद्वां रथो विभिष्पतात् ॥ ३ ॥
हे अश्विनीकुमारो ! जब आपका रथ पक्षियों की तरह आकाश में पहुंचता है, तथ प्रशंसनीय स्वर्गलोक में भी आप के लिये स्तोत्रों का पाठ किया जाता है ॥ ३ ॥
५४५. हविषा जारो अपां पिपर्ति पपुरिर्नरा । पिता कुटस्य चर्षणिः ॥ ४ ॥
हे देवपुरुषो ! जलों को सुखाने वाले, पिता रूप, पोषणकर्ता, कार्यद्रष्टा सूर्यदेव (हमारे द्वारा प्रदत्त) हवि से आपको संतुष्ट करते हैं, अर्थात् सूर्यदेव प्राणिमात्र के पोषण के लिये अन्नादि पदार्थ उत्पन्न करके प्रकृति के विराट् यज्ञ में आहुति दे रहे हैं ।
५४६. आदारो वां मतीनां नासत्या मतवचसा । पातं सोमस्य धृष्णुया ॥ ५ ॥ अ
असत्यहीन, मननपूर्वक वचन बोलने वाले हे अश्विनीकुमारो ! आप अपनी बुद्धि को प्रेरित करने वाले एवं संघर्ष शक्ति बनाने वाले इस सोमरस का पान करें ॥ ५ ॥
५४७. या नः पीपरदश्विना ज्योतिष्मती तमस्तिरः । तामस्मे रासाथामिषम् ॥ ६ ॥
हे अश्विनीकुमारो ! जो पोषक अन्न हमारे जीवन के अन्धकार को दूर कर प्रकाशित करने वाला हो, वह हमें प्रदान करें ॥ ६ ॥
[अन्न में दो गुण होते हैं । १ – शारीरिक पोषण २ – प्रवृत्तियों का पोषण । कहावत है- ‘जैसा खाये अन्न, वैसा बने मन । कुसंस्कार युक्त अन्न से, कुसंस्कारी मन बनने से जीवन अंधकारमय बनता है । इसलिये पोषण के साथ यज्ञीयभाव – सम्पन सुसंस्कार युक्त अन्न के लिये कामना की गयी है । ]
५४८. आ नो नावा मतीनां यातं पाराय गन्तवे । युञ्जाथामश्विना रथम् ॥ ७ ॥
हे अश्विनीकुमारो ! आप दोनों अपना रथ नियोजितकर हमारे पास आयें । अपनी श्रेष्ठ बुद्धि से हमें दुःखों के सागर से पार ले चलें ॥ ७ ॥
५४९. अरित्रं वां दिवस्पृथु तीर्थे सिन्धूनां रथः । धिया युयुज्र इन्दवः ॥ ८ ॥
हे अश्विनीकुमारो ! आपके आवागमन के साधन द्युलोक (की सीमा) से भी विस्तृत हैं । (तीनों लोकों में आपकी गति है ।) नदियों, तीर्थ प्रदेशों में भी आपके साधन हैं, (पृथ्वी पर भी) आपके लिये रथ तैयार है । (आप किसी भी साधन से पहुंचने में समर्थ हैं ।) आप के लिये यहाँ विचारयुक्त कर्म द्वारा सोमरस तैयार किया गया है ॥ ८ ॥
५५०. दिवस्कण्वास इन्दवो वसु सिन्धूनां पदे । स्वं वव्रिं कुह धित्सथः ॥ ९ ॥
कण्व वंशजों द्वारा तैयार सोम दिव्यता से परिपूर्ण है । नदियों के तट पर ऐश्वर्य रखा है । हे अश्विनीकुमारो ! अब आप अपना स्वरूप कहाँ प्रदर्शित करना चाहते हैं ? ॥ ९ ॥
५५१. अभृदु भा उ अंशवे हिरण्यं प्रति सूर्यः । व्यख्यज्जिह्वयासितः ॥ १० ॥
अमृतमयी किरणों वाले ये सूर्यदेव ! अपनी आभा से स्वर्णतुल्य प्रकट हो रहे हैं । इसी समय श्यामल अग्निदेव, ज्यालारूप जिह्वा से विशेष प्रकाशित हो चुके हैं । हे अश्विनीकुमारो ! यही आपके शुभागमन का समय है ॥ १० ॥
५५२. अभृदु पारमेतवे पन्था ऋतस्य साधुया । अदर्शि वि स्रुतिर्दिवः ॥ ११ ॥
द्युलोक से अंधकार को पार करती हुई विशिष्ट प्रथा प्रकट होने लगी है, जिससे यज्ञ के मार्ग अच्छी तरह से प्रकाशित हुए हैं । अत हे अश्विनीकुमारो ! आपको आना चाहिये ॥ ११ ॥
५५३. तत्तदिदश्विनोरवो जरिता प्रति भूषति । मदे सोमस्य पिप्रतोः ॥ १२ ॥
सोम के हर्ष से पूर्ण होने वाले अश्विनीकुमारों के उत्तम संरक्षण का स्तोतागण भली प्रकार वर्णन करते हैं ॥१२॥
५६४. वावसाना विवस्वति सोमस्य पीत्या गिरा । मनुष्वच्छंभू आ गतम् ॥ १३ ॥
है दीप्तिमान् (यजमानों के) मनों में निवास करने वाले, सुखदायक अश्विनीकुमारो ! मनु के समान श्रेष्ठ परिचर्या करने वाले यजमान के समीप निवास करने वाले (सुखप्रदान करने वाले है अश्विनीकुमारो !) आप दोनों सोमपान के निमित्त एवं स्तुतियों के निमित्त इस याग में पधारें ॥ १३ ॥
५५५. युवोरुषा अनु श्रियं परिज्मनोरुपाचरत् । ऋता वनथो अक्तुभिः ॥ १४ ॥
है अश्विनीकुमारो ! चारों ओर गमन करने वाले आप दोनों की शोभा के पीछे-पीछे देवी उषा अनुगमन कर रही हैं । आप रात्रि में भी यज्ञों का सेवन करते हैं ॥ १४ ॥
५५६. उषा पिबतमश्चिनोभा नः शर्भ यच्छतम् । अविद्रियाभिरूतिभिः ॥ १५ ॥
हे अश्विनीकुमारो ! आप दोनों सोमरस का पान करें । आलस्य न करते हुए हमारी रक्षा करें तथा हमें सुख प्रदान करें ॥ १५ ॥
[ सूक्त – ४७ ]
[ ऋषि – प्रस्कण्व काण्व । देवता – अश्विनीकुमार । छन्द – बार्हत प्रगाथ (विषमा बृहती, समासतो बृहती) । ]
५५७. अयं वां मधुमत्तमः सुतः सोम ऋतावृद्धा । तमश्विना पिबतं तिरोअह्न्यं धत्तं रत्नानि दाशुषे ॥ १ ॥
हे यज्ञ कर्म का विस्तार करने वाले अश्विनीकुमारो ! अपने इस यज्ञ में अत्यन्त मधुर तथा एक दिन पूर्व शोधित सोमरस का आप सेवन करें । यज्ञकर्ता यजमान को रत्न एवं ऐश्वर्य प्रदान करें ॥ १ ॥
५५८. त्रिवन्धुरेण त्रिवृता सुपेशसा रथेना यातमश्विना । कण्वासो वां ब्रह्म कृण्वन्त्यध्वरे तेषां सु शृणुतं हवम् ॥ २ ॥
हे अश्विनीकुमारो ! तीन वृत्त युक्त (त्रिकोण), तीन अवलम्बन वाले अति सुशोभित रथ से यहाँ आयें । यज्ञ में कण्व वंशज आप दोनों के लिये मंत्र-युक्त स्तुतियाँ करते हैं, उनके आवाहन को सुनें ॥ २ ॥
५५९. अश्विना मधुमत्तमं पातं सोममृतावृधा । अथाद्य दस्रा वसु बिभ्रता रथे दाश्वांसमुप गच्छतम् ॥ ३ ॥
हे शत्रुनाशक, यज्ञ-वर्द्धक अश्विनीकुमारो ! अत्यन्त मीठे सोमरस का पान करें । आज रथ में धनों को धारण कर हविदाता यजमान के समीप आयें ॥ ३ ॥
५६०. त्रिषधस्थे बर्हिषि विश्ववेदसा मध्वा यज्ञं मिमिक्षतम् । कण्वासो वां सुतसोमा अभिद्यवो युवां हवन्ते अश्विना ॥ ४ ॥
हे सर्वज्ञ अश्विनीकुमारो ! तीन स्थानों पर रखे हुए कुश-आसन पर अधिष्ठित होकर आप यज्ञ का सिंचन करें । स्वर्ग की कामना वाले कण्व वंशज सोम को अभिषुत कर आप दोनों को बुलाते हैं ॥ ४ ॥
५६१. याभिः कण्वमभिष्टिभिः प्रावतं युवमश्विना । ताभिः ष्व१स्माँ अवतं शुभस्पती पातं सोममृतावृधा ॥ ५ ॥
यज्ञ को बढ़ाने वाले शुभ कर्मों के पोषक हे अश्विनीकुमारो ! आप दोनों ने जिन इच्छित रक्षण-साधनों से कण्व की भली प्रकार रक्षा की, उन साधनों से हमारी भी भली प्रकार रक्षा करें और प्रस्तुत सोमरस का पान करें ॥ ५ ॥
५६२. सुदासे दस्रा वसु बिभ्रता रथे पृक्षो वहतमश्विना । रयिं समुद्रादुत वा दिवस्पर्यस्मे धत्तं पुरुस्पृहम् ॥ ६ ॥
शत्रुओं के लिए उग्ररूप धारण करने वाले हे अश्विनीकुमारो ! रथ में धनों को धारण कर आपने सुदास को अन्न पहुंचाया । उसी प्रकार अन्तरिक्ष या सागरों से लाकर बहुतों द्वारा वाञ्छित धन हमारे लिए प्रदान करें ॥ ६ ॥
५६३. यन्नासत्या परावति यद्वा स्थो अधि तुर्वशे । अतो रथेन सुवृता न आ गतं साकं सूर्यस्य रश्मिभिः ॥ ७ ॥
हे सत्य-समर्थक अश्विनीकुमारो ! आप दूर हों या पास हों, वहाँ से उत्तम गतिमान् रथ से सूर्य रश्मियों के साथ हमारे पास आयें ॥ ७ ॥
५६४. अर्वाञ्चा वां सप्तयोऽध्वरश्रियो वहन्तु सवनेदुप । इषं पृञ्चन्ता सुकृते सुदानव आ बर्हिः सीदतं नरा ॥ ८ ॥
हे देवपुरुषो अश्विनीकुमारो ! यज्ञ की शोभा बढ़ाने वाले आपके अश्व आप दोनों को सोमयाग के समीप ले आयें । उत्तम कर्म करने वाले और दान देने वाले याजकों के लिये अन्नों की पूर्ति करते हुए आप दोनों कुश के आसनों पर बैठे ॥ ८॥
५६५. तेन नासत्या गतं रथेन सूर्यत्वचा । येन शश्वदूहथुर्दाशुषे वसु मध्वः सोमस्य पीतये ॥ ९ ॥
हे सत्य – समर्थक अश्विनीकुमारो ! सूर्य सदृश तेजस्वी जिस रथ से दाता याजकों के लिए सदैव धन लाकर देते रहे हैं, उसी रथ से आप मीठे सोमरस पान के लिये पधारें ॥ ९ ॥
५६६. उक्थेभिरर्वागवसे पुरूवसू अर्कैश्च नि ह्वयामहे । शश्वत्कण्वानां सदसि प्रिये हि कं सोमं पपथुरश्विना ॥ १० ॥
हे विपुल धन वाले अश्विनीकुमारो ! अपनी रक्षा के निमित्त हम स्तोत्रों और पूजा-अर्चनाओं से बार-बार आपका आवाहन करते हैं । कण्व वंशजों की यज्ञ सभा में आप सर्वदा सोमपान करते रहे हैं ॥ १० ॥
[ सूक्त – ४८ ]
[ ऋषि – प्रस्कण्व काण्व । देवता – उषा । छन्द – बार्हत प्रगाथ (विषमा बृहती, समासतोबृहती) । ]
५६७. सह वामेन न उषो व्युच्छा दुहितर्दिवः । सह द्युम्नेन बृहता विभावरि राया देवि दास्वती ॥ १ ॥
हे आकाशपुत्री उषे ! उत्तम तेजस्वी, दान देने वाली, धनों और महान् ऐश्वर्यों से युक्त होकर आप हमारे सम्मुख प्रकट हों, अर्थात् हमें आपका अनुदान अनुग्रह प्राप्त होता रहे ॥ १ ॥
५६८. अश्वावतीर्गोमतीर्विश्वसुविदो भूरि च्यवन्त वस्तवे । उदीरय प्रति मा सूनृता उषश्चोद राधो मघोनाम् ॥ २ ॥
अश्व, गौ आदि (पशुओं अथवा संचरित होने वाली एवं पोषक किरणों) से सम्पन्न धन-धान्यों को प्रदान करने वाली उषाएँ प्राणिमात्र के कल्याण के लिए प्रकाशित हुई हैं । हे उषे ! कल्याणकारी वचनों के साथ आप हमारे लिए उपयुक्त धन – वैभव प्रदान करें ॥ २ ॥
५६९. उवासोषा उच्छाच्च नु देवी जीरा रथानाम् । ये अस्या आचरणेषु दधिरे समुद्रे न श्रवस्यवः ॥ ३ ॥
जो देवी उषा पहले भी निवास कर चुकी हैं, वह रथों को चलाती हुई अब भी प्रकट हों । जैसे रत्नों की कामना वाले मनुष्य समुद्र की ओर मन लगाये रहते हैं, वैसे ही हम देवी उषा के आगमन की प्रतीक्षा करते हैं ॥ ३ ॥
५७०. उषो ये ते प्र यामेषु युञ्जते मनो दानाय सूरयः । अत्राह तत्कण्व एषां कण्वतमो नाम गृणाति नृणाम् ॥ ४ ॥
हे उषे ! आपके आने के समय जो स्तोता अपना मन, धनादि दान करने में लगाते हैं, उसी समय अत्यन्त मेधावी कण्व उन मनुष्यों के प्रशंसात्मक स्तोत्र गाते हैं ॥ ४ ॥
५७१. आ घा योषेव सूनर्युषा याति प्रभुञ्जती । जरयन्ती वृजनं पद्वदीयत उत्पातयति पक्षिणः ॥ ५ ॥
उत्तम गृहिणी स्त्री के समान सभी का भलीप्रकार पालन करने वाली देवी उषा जब आती हैं, तो निर्बलों को शक्तिशाली बना देती हैं, पाँव वाले जीवों को कर्म करने के लिए प्रेरित करती है और पक्षियों को सक्रिय होने की प्रेरणा देती हैं ॥ ५ ॥
५७२. वि या सृजति समनं व्य१र्थिनः पदं न वेत्योदती । वयो नकिष्टे पप्तिवांस आसते व्युष्टौ वाजिनीवति ॥ ६ ॥
देवी उषा सबके मन को कर्म करने के लिए प्रेरित करती हैं तथा धन इच्छुकों को पुरुषार्थ के लिए भी प्रेरणा देती हैं । ये जीवन दात्री देवी उषा निरन्तर गतिशील रहती हैं । हे अन्नदात्री उषे ! आपके प्रकाशित होने पर पक्षी अपने घोसलों में बैठे नहीं रहते (अर्थात् वे भी सक्रिय होकर गतिशील हो जाते हैं) ॥ ६ ॥
५७३. एषायुक्त परावतः सूर्यस्योदयनादधि । शतं रथेभिः सुभगोषा इयं वि यात्यभि मानुषान् ॥ ७ ॥
ये देवी उषा सूर्य के उदयस्थान से दूरस्थ देशों को भी जोड़ देती हैं । ये सौभाग्यशालिनी देवी उषा मनुष्य लोक की ओर सैकड़ो रथों द्वारा गमन करती हैं ॥ ७ ॥
५७४. विश्वमस्या नानाम चक्षसे जगज्ज्योतिष्कृणोति सूनरी । अप द्वेषो मघोनी दुहिता दिव उषा उच्छदप स्त्रियः ॥ ८ ॥
सम्पूर्ण जगत् इन देवी उषा के दर्शन करके झुककर उन्हें नमन करता है । प्रकाशिका, उत्तम मार्गदर्शिका, ऐश्वर्य – सम्पन्न आकाश पुत्री देवी उषा, पीड़ा पहुँचाने वाले हमारे वैरियों को दूर हटाती हैं ॥ ८ ॥
५७५. उष आ भाहि भानुना चन्द्रेण दुहितर्दिवः । आवहन्ती भूर्यस्मभ्यं सौभगं व्युच्छन्ती दिविष्टिषु ॥ ९ ॥
हे आकाशपुत्री उषे ! आप आह्लादप्रद दीप्ति से सर्वत्र प्रकाशित हों । हमारे इच्छित स्वर्ग-सुख युक्त उत्तम सौभाग्य को ले आयें और दुर्भाग्य रूपी तमिस्रा को दूर करें ॥ ९ ॥
५७६. विश्वस्य हि प्राणनं जीवनं त्वे वि यदुच्छसि सूनरि । सा नो रथेन बृहता विभावरि श्रुधि चित्रामघे हवम् ॥ १० ॥
हे सुमार्ग प्रेरक उषे ! उदित होने पर आप ही विश्व के प्राणियों का जीवन आधार बनती हैं । विलक्षण धन वाली, कान्तिमती हे उषे ! आप अपने बृहत् रथ से आकर हमारा आवाहन सुनें ॥ १० ॥
५७७. उषो वाजं हि वंस्व यश्चित्रो मानुषे जने । तेना वह सुकृतो अध्वराँ उप ये त्वा गृणन्ति वह्रयः ॥ ११ ॥
हे उषादेवि ! मनुष्यों के लिये विविध अन्न-साधनों की वृद्धि करें । जो याजक आपकी स्तुतियाँ करते हैं, उनके इन उत्तम कर्मों से संतुष्ट होकर उन्हें यज्ञीय कर्मों की ओर प्रेरित करें ॥ ११ ॥
५७८. विश्वान्देवाँ आ वह सोमपीतयेऽन्तरिक्षादुषस्त्वम् । सास्मासु धा गोमदश्वावदुक्थ्य१ मुषो वाजं सुवीर्यम् ॥ १२ ॥
हे उषे ! सोमपान के लिए अंतरिक्ष से सब देवों को यहां ले आयें । आप हमें अश्वों, गौओं से युक्त धन और पुष्टिप्रद अन्न प्रदान करें ॥ १२ ॥
५७९. यस्या रुशन्तो अर्चयः प्रति भद्रा अदृक्षत । सा नो रयिं विश्ववारं सुपेशसमुषा ददातु सुग्म्यम् ॥ १३ ॥
जिन देवी उषा की दीप्तिमान् किरणें मंगलकारी प्रतिलक्षित होती हैं, वे देवी उषा हम सबके लिए वरणीय, श्रेष्ठ, सुखप्रद धनों को प्राप्त करायें ॥ १३ ॥
५८०. ये चिद्धि त्वामृषयः पूर्व ऊतये जुहूरेऽवसे महि । सा नः स्तोमाँ अभि गृणीहि राधसोषः शुक्रेण शोचिषा ॥ १४ ॥
हे श्रेष्ठ उषादेवि ! प्राचीन ऋषि आपको अन्न और संरक्षण प्राप्ति के लिये बुलाते थे । आप यश और तेजस्विता से युक्त होकर हमारे स्तोत्रों को स्वीकार करें ॥ १४ ॥
५८१. उषो यदद्य भानुना वि द्वारावृणवो दिवः । प्र नो यच्छतादवृकं पृथु च्छर्दिः प्र देवि गोमतीरिषः ॥ १५ ॥
हे देवी उषे ! आपने अपने प्रकाश से आकाश के दोनों द्वारों को खोल दिया है । अब आप हमें हिंसकों से रक्षित, विशाल आवास और दुग्धादि युक्त अन्नों को प्रदान करें ॥ १५ ॥
५८२. सं नो राया बृहता विश्वपेशसा मिमिक्ष्वा समिळाभिरा । सं द्युम्नेन विश्वतुरोषो महि सं वाजैर्वाजिनीवति ॥ १६ ॥
हे देवी उषे ! आप हमें सम्पूर्ण पुष्टिप्रद महान् धनों से युक्त करें, गौओं से युक्त करें । अन्न प्रदान करने वाली, श्रेष्ठ हे देवी उषे ! आप हमें शत्रुओं का संहार करने वाला बल देकर अन्नों से संयुक्त करें ॥ १६ ॥
[ सूक्त – ४९ ]
[ ऋषि – प्रस्कण्व काण्व । देवता – उषा । छन्द – अनुष्टुप् । ]
५८३. उषो भद्रेभिरा गहि दिवश्चिद्रोचनादधि । वहन्त्वरुणप्सव उप त्वा सोमिनो गृहम् ॥ १ ॥
हे देवी उषे ! द्युलोक के दीप्तिमान् स्थान से कल्याणकारी मार्गों द्वारा आप यहाँ आयें । अरुणिम वर्ण के अश्व आपको सोमयाग करने वाले के घर पहुँचाएँ ॥ १ ॥
५८४. सुपेशसं सुखं रथं यमध्यस्था उषस्त्वम् । तेना सुश्रवसं जनं प्रावाद्य दुहितर्दिवः ॥ २ ॥
हे आकाशपुत्री उषे ! आप जिस सुन्दर सुखप्रद रथ पर आरूढ़ हैं, उसी रथ से उत्तम हवि देने वाले याजक की सब प्रकार से रक्षा करें ॥ २ ॥
५८५. वयश्चित्ते पतत्रिणो द्विपच्चतुष्पदर्जुनि । उषः प्रारन्नृतूँरनु दिवो अन्तेभ्यस्परि ॥ ३ ॥
हे देदीप्यमान उषादेवि ! आपके (आकाशमण्डल पर) उदित होने के बाद मानव, पशु एवं पक्षी अन्तरिक्ष में दूर-दूर तक स्वेच्छानुसार विचरण करते हुए दिखाई देते हैं ॥ ३ ॥
५८६. व्युच्छन्ती हि रश्मिभिर्विश्वमाभासि रोचनम् । तां त्यामुषर्वसूयवो गीर्भिः कण्वा अहूषत ॥ ४ ॥
हे उषादेवी ! उदित होते हुए आप अपनी किरणों से सम्पूर्ण विश्व को प्रकाशित करती हैं । धन की कामना करने वाले कण्व वंशज आपका आवाहन करते हैं ॥ ४ ॥
[ सूक्त – ५० ]
[ ऋषि – प्रस्कण्व काण्व । देवता – सूर्य (११-१३ रोगघ्न उपनिषद्) । छन्द – गायत्री, १०-१३ अनुष्टुप् । ]
५८७. उदु त्यं जातवेदसं देवं वहन्ति केतवः । दृशे विश्वाय सूर्यम् ॥ १ ॥
ये ज्योतिर्मयी रश्मियाँ सम्पूर्ण प्राणियों के ज्ञाता सूर्यदेव को एवं समस्त विश्व को दृष्टि प्रदान करने के लिए विशेष रूप से प्रकाशित होती हैं ॥ १ ॥
५८८. अप त्ये तायवो यथा नक्षत्रा यन्त्यक्तुभिः । सूराय विश्वचक्षसे ॥ २ ॥
सबको प्रकाश देने वाले सूर्यदेव के उदित होते ही रात्रि के साथ तारा मण्डल वैसे ही छिप जाते हैं, जैसे चोर छिप जाते हैं ॥ २ ॥
५८९. अदृश्रमस्य केतवो वि रश्मयो जनाँ अनु । भ्राजन्तो अग्नयो यथा ॥ ३ ॥
प्रज्वलित हुई अग्नि की किरणों के समान सूर्यदेव की प्रकाश रश्मियाँ सम्पूर्ण जीव – जगत् को प्रकाशित करती हैं ॥ ३ ॥
५९०. तरणिर्विश्वदर्शतो ज्योतिष्कृदसि सूर्य । विश्वमा भासि रोचनम् ॥ ४ ॥
हे सूर्यदेव ! आप साधकों का उद्धार करने वाले हैं, समस्त संसार में एक मात्र दर्शनीय प्रकाशक हैं तथा आप ही विस्तृत अन्तरिक्ष को सभी ओर से प्रकाशित करते हैं ॥ ४ ॥
५९१. प्रत्यङ् देवानां विशः प्रत्यङ्ङुदेषि मानुषान् । प्रत्यङ् विश्वं स्वर्दृशे ॥ ५ ॥
हे सूर्यदेव । मरुद्गणों, देवगणों, मनुष्यों और स्वर्गलोक वासियों के सामने आप नियमित रूप से उदित होते हैं, ताकि तीनों लोकों के निवासी आपका दर्शन कर सकें ॥ ५ ॥
५९२. येना पावक चक्षसा भुरण्यन्तं जनाँ अनु । त्वं वरुण पश्यसि ॥ ६ ॥
जिस दृष्टि अर्थात् प्रकाश से आप प्राणियों को धारण-पोषण करने वाले इस लोक को प्रकाशित करते हैं, हम उस प्रकाश की स्तुति करते हैं ॥ ६ ॥
५९३. वि द्यामेषि रजस्पृथ्वहा मिमानो अक्तुभिः । पश्यञ्जन्मानि सूर्य ॥ ७ ॥
हे सूर्यदेव ! आप दिन एवं रात में समय को विभाजित करते हुए अन्तरिक्ष एवं द्युलोक में भ्रमण करते हैं, जिससे सभी प्राणियों को लाभ प्राप्त होता है ॥ ७ ॥
५९४. सप्त त्वा हरितो रथे वहन्ति देव सूर्य । शोचिष्केशं विचक्षण ॥ ८ ॥
हे सर्वद्रष्टा सूर्यदेव ! आप तेजस्वी ज्वालाओ से युक्त दिव्यता को धारण करते हुये सप्तवर्णी किरणोंरूपी अश्वों के रथ में सुशोभित होते हैं ॥ ८ ॥
५९५. अयुक्त सप्त शुन्ध्युवः सूरो रथस्य नप्त्यः । ताभिर्याति स्वयुक्तिभिः ॥ ९ ॥
पवित्रता प्रदान करने वाले ज्ञानसम्पन्न ऊर्ध्वगामी सूर्यदेव अपने सप्तवर्णी अश्वों से (किरणों से) सुशोभित रथ में शोभायमान होते हैं ॥ ९ ॥
[यहाँ सप्तवर्णी का तात्पर्य सात रंगों से है, जिसे विज्ञान ने बाद में ‘वैनीआहपीनाला’ के क्रम से दर्शाया है। ]
५९६. उद्वयं तमसस्परि ज्योतिष्पश्यन्त उत्तरम् । देवं देवत्रा सूर्यमगन्म ज्योतिरुत्तमम् ॥ १० ॥
तमिस्रा से दूर श्रेष्ठतम ज्योति को देखते हुए हम ज्योति स्वरूप और देवों में उत्कृष्टतम ज्योति (सूर्य) को प्राप्त हों ॥ १० ॥
५९७. उद्यन्नद्य मित्रमह आरोहन्नुत्तरां दिवम् । हृद्रोगं मम सूर्य हरिमाणं च नाशय ॥ ११ ॥
हे मित्रों के मित्र सूर्यदेव ! आप उदित होकर आकाश में उठते हुए हृदयरोग, शरीर की कान्ति का हरण करने वाले रोगों को नष्ट करें ॥ ११ ॥
[ सूर्य किरणों की रोगनाशक शक्ति का उत्लेख किया गया है । ]
५९८. शुकेषु मे हरिमाणं रोपणाकासु दध्मसि । अथो हारिद्रवेषु मे हरिमाणं नि दध्मसि ॥ १२ ॥
हम अपने हरिमाण (शरीर को क्षीण करने वाले रोग) को शुकों (तोतों), रोपणाका (वृक्षों) एवं हरिद्रवों (हरी वनस्पतियों) में स्थापित करते हैं ॥ १२ ॥
[ शुक, रोपणाका तथा हरिद्रव ओषधियों के वर्ग विशेष भी कहे गये हैं । ]
५९९. उद्गादयमादित्यो विश्वेन सहसा सह । द्विषन्तं महां रन्धयन्मो अहं द्विषते रधम् ॥ १३ ॥
ये सूर्यदेव अपने सम्पूर्ण तेजों से उदित होकर हमारे सभी रोगों को वशवर्ती करें । हम उन रोगों के वश में कभी न आयें ॥ १३ ॥
[ सूक्त – ५१ ]
[ ऋषि – सव्य आङ्गिरस । देवता – इन्द्र । छन्द – जगती, १४-१५ त्रिष्टुप् । ]
६००. अभि त्यं मेषं पुरुहूतमृग्मियमिन्द्रं गीर्भिर्मदता वस्वो अर्णवम् । यस्य द्यावो न विचरन्ति मानुषा भुजे मंहिष्ठमभि विप्रमर्चत ॥ १ ॥
हे याजको ! शत्रु को पराजित करने वाले, अनेकों द्वारा प्रशंसित, वैदिक ऋचाओं से स्तुति किये जाने योग्य, धन के सागर इन्द्रदेव की प्रार्थना करो । द्युलोक के विस्तार के समान जिनके कल्याणकारी कार्य चतुर्दिक् संव्याप्त हैं, ऐसे ज्ञानवान् इन्द्रदेव को सुखों की प्राप्ति के लिए अर्चना करो ॥ १ ॥
६०१. अभीमवन्वन्त्स्वभिष्टिमूतयोऽन्तरिक्षप्रां तविषीभिरावृतम् । इन्द्रं दक्षास ऋभवो मदच्युतं शतक्रतुं जवनी सूनुतारुहत् ॥ २ ॥
सहायता करने वाले, कर्मों में कुशल मरुत्देवों ने शत्रु के मद को चूर करने वाले, शतकर्मा, अभीष्ट पदार्थ देने वाले, अंतरिक्ष को तेज से पूर्ण करने वाले तथा अत्यन्त बलवान् इन्द्रदेव की स्तुति की । स्तोताओं की मधुर वाणी से इन्द्रदेव के उत्साह में अभिवृद्धि हुई ॥ २ ॥
६०२. त्वं गोत्रमङ्गिरोभ्योऽवृणोरपोतात्रये शतदुरेषु गातुवित् । ससेन चिद्विमदायावहो वस्वाजावद्रिं वावसानस्य नर्तयन् ॥ ३ ॥
हे इन्द्रदेव ! आपने अंगिरा ऋषि के लिए गौ समूह को छुड़ाया । अत्रि ऋषि के लिए शतद्वार वाली गुफा से मार्ग ढूँढ़ निकाला । विमद ऋषि के लिए अन्न से युक्त धन प्राप्त कराया और वज्र के द्वारा युद्धों में लोगों की रक्षा की, अत: आपकी महिमा का वर्णन कौन कर सकता है ? ॥ ३ ॥
६०३. त्वमपामपिधानाऽवृणोरपाधारयः पर्वते दानुमद्वसु । वृत्रं यदिन्द्र शवसावधीरहिमादित्सूर्य दिव्यारोहयो दृशे ॥ ४ ॥
हे इन्द्रदेव ! आपने जलों से भरे हुए मेघों को मुक्त कराया । पर्वत के दस्यु वृत्र से धन को (अपहृत करके) धारण किया। बल से वृत्र और अहिरूप मेघों को विदीर्ण किया, जिससे सूर्यदेव आकाश में स्पष्ट दृष्टिगत होकर प्रकाशित हो सकें ॥ ४ ॥
६०४. त्वं मायाभिरप मायिनोऽधमः स्वधाभिर्ये अधि शुप्तावजुह्वत । त्वं पिप्रोर्नृमणः प्रारुजः पुरः प्र ऋजिश्वानं दस्युहत्येष्वाविथ ॥ ५ ॥
हे इन्द्रदेव ! जो राक्षस यज्ञ की हवियों को अपने मुँह में डाल लेते थे, उन प्रपंजियों को आपने अपनी माया से मार गिराया । हे मनुष्यों द्वारा स्तुत्य इन्द्रदेव ! आपने अपना ही पेट भरने वाले पिप्रु नामक राक्षस के नगरों को ध्वस्त करके युद्ध में राक्षसों को विनष्ट करके ‘ऋजिश्वा’ ऋषि की रक्षा की ॥ ५ ॥
[यहाँ परमार्थ में लगने योग्य साधनों को भी स्वार्थ के लिए प्रयुक्त करने वालों का नाश करके लोक – मंगल का पत्र प्रशस्त करने का भाव है । ]
६०५. त्वं कुत्सं शुष्णहत्येष्वाविथारन्धयोऽतिथिग्वाय शम्बरम् । महान्तं चिदर्बुदं नि क्रमीः पदा सनादेव दस्युहत्याय जज्ञिषे ॥ ६ ॥
हे इन्द्रदेव ! आपने युद्ध में ‘शुष्ण’ का नाश कर ‘कुत्स’ की रक्षा की । ‘अतिथिग्व’ ऋषि के लिये शम्बरासुर को पराजित किया । महान् बलशाली अर्बुद को अपने पैरों से कुचल डाला । आप चिरकाल से ही असुरों का नाश करने के लिए उत्पन्न हुए हैं ॥ ६ ॥
६०६. त्वे विश्वा ताविषी सध्र्यग्घिता तव राधः सोमपीथांय हर्षते । तव वज्रश्चिकिते बाह्वोर्हितो वृश्चा शत्रोरव विश्वानि वृष्ण्या ॥ ७ ॥
हे इन्द्रदेव ! आपमें सम्पूर्ण बल समाविष्ट हैं । आपका मन सोमपान करने के लिए सदा हर्षित रहता है । हे इन्द्रदेव । आपमें सम्पूर्ण बल समाविष्ट हैं । आपका मन सोमपान करने के लिए सदा हर्षित रहता है । आपकी बाहों में धारण किया हुआ वज्र सर्वत्र प्रसिद्ध है, जिससे आप शत्रुओं के सम्पूर्ण बलों को काट डालते हैं ॥ ७ ॥
६०७. वि जानीह्यार्यान्ये च दस्यवो बर्हिष्मते रन्धया शासदव्रतान् । शाकी भव यजमानस्य चोदिता विश्वेत्ता ते सधमादेषु चाकन ॥ ८ ॥
हे इन्द्रदेव ! आप आर्यों को जानें और अनार्यों को भी जानें । व्रतहीनों को वशीभूत करके यज्ञ कर्म करने वालों के लिये उन्हें नष्ट करें । हे सामर्थ्यवान् इन्द्रदेव ! आप सभी यज्ञों में यजमान को प्रेरणा प्रदान करें, ऐसा हम चाहते हैं ॥ ८ ॥
६०८. अनुव्रताय रन्धयन्नपव्रतानाभूभिरिन्द्रः श्नधयन्ननाभुवः । वृद्धस्य चिद्वर्धतो द्यामिनक्षतः स्तवानो वम्रो वि जघान संदिहः ॥ ९ ॥
ये इन्द्रदेव व्रतवानों के निमित्त व्रतहीनों को प्रताड़ित करते तथा आस्तिकों के निमित्त नास्तिकों को विनष्ट करते हैं । वे द्युलोक को क्षति पहुँचाने वाले असुरों को मार डालते हैं । ऐसे प्राचीन पुरुष इन्द्रदेव के बढ़ते हुए यश की ‘वम्रऋषि’ ने स्तुति की ॥ ९ ॥
६०९. तक्षद्यत्त उशना सहसा सहो वि रोदसी मज्मना बाधते शवः । आ त्वा वातस्य नृमणो मनोयुज आ पूर्यमाणमवहन्नभि श्रवः ॥ १० ॥
हे इन्द्रदेव ! ‘उशना’ ऋषि ने अपनी स्तुतियों से आपके बल को तीक्ष्ण किया । आपके उस बल की प्रचण्डता से द्युलोक और पृथ्वी भय से युक्त हुए । मनुष्यों से स्तुत्य हे इन्द्रदेव ! इच्छा मात्र से योजित होने वाले अश्वों द्वारा हमारे निमित अन्नादि से पूर्ण होकर यशस्वी होने यहाँ आएँ ॥ १० ॥
६१०. मन्दिष्ट यदुशने काव्ये सचाँ इन्द्रो वङ्कू वङ्कुतराधि तिष्ठति । उग्रो ययिं निरपः स्रोतसासृजद्वि शुष्णस्य दृंहिता ऐरयत्पुरः ॥ ११ ॥
‘उशना’ की स्तुति से प्रसन्न होकर इन्द्रदेव अति वेग वाले अश्वों पर आरूढ़ हुए । तदनन्तर मेघ से जलप्रवाहों को बहाया और ‘शुष्ण’ (शोषण करने वाले) असुर के दृढ नगरों को ध्वस्त किया ॥ ११ ॥
६११. आ स्मा रथं वृषपाणेषु तिष्ठसि शार्यातस्य प्रभृता येषु मन्दसे । इन्द्र यथा सुतसोमेषु चाकनोऽनर्वाणं श्लोकमा रोहसे दिवि ॥ १२ ॥
हे इन्द्रदेव ! आप सोमरसों को पीने के निमित्त रथ पर अधिष्ठित होकर जाते हैं । जिन सोमरसों से आप प्रसन्न होते हैं, वे शार्य्यात द्वारा निष्पन्न हुए थे । आप जैसे ही सोमयज्ञों की कामना करते हैं, वैसे ही आपका उज्ज्वल यश वृद्धि को प्राप्त करता है ॥ १२ ॥
६१२. अददा अर्भां महते वचस्यवे कक्षीवते वृचयामिन्द्र सुन्वते । मेनाभवो वृषणश्वस्य सुक्रतो विश्वेत्ता ते सवनेषु प्रवाच्या ॥ १३ ॥
हे इन्द्रदेव ! आपने महान् स्तुति करने एवं सोम अभिषव करने वाले कक्षीवान् राजा के लिए अल्प विवेचन योग्य विद्याओं को अभिव्यक्त किया । हे उत्तम कर्मा इन्द्रदेव ! आपने वृषणश्व राजा के निमित्त प्रेरक वाणियाँ प्रकट कीं । आपके ये सभी कर्म सोम सवनों में बताने योग्य हैं ॥ १३ ॥
६१३. इन्द्रो अश्रायि सुध्यो निरेके पज्रेषु स्तोमो दुर्यो न यूपः । अश्वयुर्गव्यू रथयुर्वसूयुरिन्द्र इद्रायः क्षयति प्रयन्ता ॥ १४ ॥
निराश्रितों के लिए एकमात्र इन्द्रदेव ही आश्रय देने वाले हैं । द्वार में स्थिर स्तम्भ की भाँति इन्द्रदेव के आश्रय के लिए प्रजाओं में इन्द्रदेव की स्तुति अनवरत स्थिर रहती है । अश्वों, गायों, रथों और धनों के शासक इन्द्रदेव ही प्रजाओं को अभीष्ट ऐश्वर्य प्रदान करते रहते हैं ॥ १४ ॥
६१४. इदं नमो वृषभाय स्वराजे सत्यशुष्माय तवसेऽवाचि । अस्मिन्निन्द्र वृजने सर्ववीराः स्मत्सूरिभिस्तव शर्मन्त्स्याम ॥ १५ ॥
हम बलशाली, स्वप्रकाशित, सत्यरूप सामर्थ्यवाले, श्रेष्ठ इन्द्रदेव का स्तुतियों सहित अभिवादन करते हैं । हे इन्द्रदेव ! इस संग्राम में हम सभी शूरवीरों सहित आपके आश्रय में उपस्थित हैं ॥ १५ ॥
[ सूक्त – ५२ ]
[ ऋषि – सव्य आङ्गिरस । देवता – इन्द्र । छन्द – जगती, १३, १५ त्रिष्टुप् । ]
६१५. त्यं सु मेषं महया स्वर्विदं शतं यस्य सुभ्वः साकमीरते । अत्यं न वार्ज्र हवनस्यदं रथमेन्द्रं ववृत्यामवसे सुवृक्तिभिः ॥ १ ॥
हे अध्वर्यु ! उन शत्रुओं से स्पर्धा करने वाले, धनदान के निमित अभीष्ट स्थल पर जाने वाले इन्द्रदेव का विधिवत् पूजन करो । अश्व के समान शीघ्रता से यज्ञ स्थल पर पहुँचने वाले इन्द्रदेव के श्रेष्ठ यश की, अपनी रक्षा के लिए स्तुति करते हुए हम उन्हें रथ की ओर लौटा रहे हैं ॥ १ ॥
६१६. स पर्वतो न धरुणेष्वच्युतः सहस्रमूतिस्तविषीषु वावृधे । इन्द्रो यद्वृत्रमवधीन्नदीवृतमुब्जन्नर्णासि जर्हृषाणो अन्धसा ॥ २ ॥
सोमयुक्त हविष्यान्न पाकर हर्षित होते हुए इन्द्रदेव ने जल प्रवाहों के अवरोधक वृत्र को मारकर पानी में बहाया । जल प्रवाहों को संरक्षण प्रदान करने के निमित्त इन्द्रदेव अपने बलों को बढ़ाकर जलों में पर्वत की भाँति अविचल स्थिर हो गये ॥ २ ॥
६१७. स हि द्वरो द्वरिषु वव्र ऊधनि चन्द्रबुध्नो मदवृद्धो मनीषिभिः । इन्द्रं तमह्वे स्वपस्यया धिया मंहिष्ठरातिं स हि पप्रिरन्धसः ॥ ३ ॥
वे इन्द्रदेव शत्रुओं के लिए विकराल शत्रुरूप हैं । वे आकाश में व्याप्त आह्लादरूप हैं । विद्वानों द्वारा प्रदत्त सोम से वृद्धि को पाते हैं । महान् ऐश्वर्यदाता इन्द्रदेव को हविष्यान्न से तृप्त करने के निमित्त हम उत्तम स्तुतिरूपी वाणी द्वारा बुलाते हैं ॥ ३ ॥
६१८. आ यं पृणन्ति दिवि सद्मबर्हिषः समुद्रं न सुभ्वः स्वा अभीष्टयः । तं वृत्रहत्ये अनु तस्थुरूतयः शुष्मा इन्द्रमवाता अह्रुतप्सवः ॥ ४ ॥
जैसे नदियाँ समुद्र को पूर्ण करती हैं, वैसे ही कुश के आसन पर प्रतिष्ठित हुए द्युलोक निवासक इन्द्रदेव को तृप्त करते हैं । अपनी इच्छा से सुखपूर्वक, बलवान, संरक्षक, शत्रुरहित, शुभ्र कान्ति वाले मरुद्गण वृत्र हनन करने में उन इन्द्रदेव की सहायता करते हैं ॥ ४ ॥
६१९. अभि स्ववृष्टिं मदे अस्य युध्यतो रघ्वीरिव प्रवणे सस्रुरूतयः । इन्द्रो यद्वज्री धृषमाणो अन्धसा भिनद्वलस्य परिधीँरिव त्रितः ॥ ५ ॥
सोमपान से हर्षित हुए इन्द्रदेव उत्तम वृष्टि न करने वाले असुर से युद्ध हेतु उद्यत हुए । संरक्षक मरुद्गण भी नदियों के प्रवाह की तरह उनकी ओर अभिमुख हुए । सोम से वृद्धि पाने वाले वज्रधारी इन्द्रदेव ने उस असुर को बलपूर्वक मारकर तीनों सीमाओं को मुक्त किया ॥ ५ ॥
६२०. परीं घृणा चरति तित्विषे शवोऽपो वृत्वी रजसो बुध्नमाशयत् । वृत्रस्य यत्प्रवणे दुर्गृभिश्वनो निजघन्थ हन्वोरिन्द्र तन्यतुम् ॥ ६ ॥
जब वृत्र – असुर जलों को बाधित कर अंतरिक्ष के गर्भ में सो गया था, तब जलों को मुक्त करने के लिए हे इन्द्रदेव ! आपने कठिनता से वश में आने वाले वृत्र की ठोड़ी पर वज्र से प्रहार किया। इससे आपकी कीर्ति सर्वत्र फैली और बल प्रकाशित हुआ ॥ ६ ॥
६२१. हृदं न हि त्वा न्यृषन्त्यूर्मयो ब्रह्माणीन्द्र तव यानि वर्धना । त्वष्टा चित्ते युज्यं वावृधे शवस्ततक्ष वज्रमभिभूत्योजसम् ॥ ७ ॥
हे इन्द्रदेव ! जैसे जलप्रवाह जलाशय को प्राप्त होते हैं, वैसे आपकी वृद्धि करने वाले हमारे मन्त्र रूप स्तोत्र आपको प्राप्त होते हैं । त्वष्टादेव ने अपने बल को नियोजित कर आपके बल को बढ़ाया और शत्रु को पराभूत करने में समर्थ आपके वज्र को तीक्ष्ण किया ॥ ७ ॥
६२२. जघन्वाँ उ हरिभिः संभृतक्रतविन्द्र वृत्रं मनुषे गातुयंन्नपः । अयच्छथा बाह्वोर्वज्रमायसमधारयो दिव्या सूर्यं दृशे ॥ ८ ॥
हे श्रेष्ठ कर्म सम्पादक इन्द्रदेव ! आपने घोड़ों पर चढ़कर, फौलादी वज्र को बाहुओं में धारण कर मनुष्यों के हितों के लिए वृत्र को मारा, जल मार्गों को खोला और दर्शन के लिए सूर्यदेव को द्युलोक में प्रतिष्ठित किया ॥ ८ ॥
६२३. बृहत्स्वश्चन्द्रममवद्यदुक्थ्य१ मकृण्वत भियसा रोहणं दिवः । यन्मानुषप्रधना इन्द्रमूतयः स्वर्नृषाचो मरुतोऽमदन्ननु ॥ ९ ॥
वृत्र के भय से मनुष्यों ने आनन्ददायक, बलप्रद, आह्लादक और स्वर्गिक उक्तियों की रचना की । तब मनुष्यों के हितार्थ युद्ध करने वाले, उनके निमित्त श्रेष्ठ कर्म करने वाले, आकाश – रक्षक इन्द्रदेव की मरुद्गणों ने आकर सहायता की ॥ ९ ॥
६२४. द्यौश्चिदस्यामवाँ अहेः स्वनादयोयवीद्भियसा वज्र इन्द्र ते । वृत्रस्य यद्वद्वधानस्य रोदसी मदे सुतस्य शवसाभिनच्छिरः ॥ १० ॥
हे इन्द्रदेव ! सोमपान जनित हर्ष से आपने द्युल्लोक और पृथ्वी को प्रताड़ित करने वाले वृत्र के सिर को अपने वज्र के बलपूर्वक आघात द्वारा काट दिया । व्यापक आकाश भी उस वृत्र के विकराल शब्द से प्रकम्पित हुआ ॥ १० ॥
६२५. यदिन्न्विन्द्र पृथिवी दशभुजिरहानि विश्वा ततनन्त कृष्टयः । अत्राह ते मघवन्विश्रुतं सहो द्यामनु शवसा बर्हणा भुवत् ॥ ११ ॥
हे इन्द्रदेव ! जब पृथ्वी दस गुने साधनों से युक्त हो जाय और मनुष्य भी दिनों-दिन वृद्धि को प्राप्त होते रहें, तब हे ऐश्वर्यशाली इन्द्रदेव ! आपका बल और पराक्रम भी पृथ्वी से द्युलोक तक सर्वत्र फैलकर प्रसिद्ध हो ॥ ११ ॥
६२६. त्वमस्य पारे रजसो व्योमनः स्वभूत्योजा अवसे धृषन्मनः । चकृषे भूमिं प्रतिमानमोजसोऽपः स्वः परिभूरेष्या दिवम् ॥ १२ ॥
हे संघर्षक मनवाले इन्द्रदेव ! इस अंतरिक्ष के ऊपर रहते हुए आपने अपने ज्योतिर्मय स्वरूप के संरक्षण के लिए इस पृथ्वी को बनाया । स्वयं अन्तरिक्ष और द्युलोक को व्याप्त करके बल की प्रतिमूर्ति के रूप में प्रतिष्ठित हैं ॥ १२ ॥
६२७. त्वं भुवः प्रतिमानं पृथिव्या ऋष्ववीरस्य बृहतः पतिर्भूः । विश्वमाप्रा अन्तरिक्षं महित्वा सत्यमद्धा नकिरन्यस्त्वावान् ॥ १३ ॥
हे इन्द्रदेव ! आप विस्तृत भूमि के प्रतिरूप हैं । आप महान् बलों से युक्त व्यापक आकाश लोक के श्री स्वामी हैं और अपनी महता से सम्पूर्ण अन्तरिक्ष को पूर्ण करते हैं । निःसन्देह आपके समान अन्य कोई नहीं है ॥ १३ ॥
६२८. न यस्य द्यावापृथिवी अनु व्यचो न सिन्धवो रजसो अन्तमानशुः । नोत स्ववृष्टिं मदे अस्य युध्यत एको अन्यच्चकृषे विश्वमानुषक् ॥ १४ ॥
जिनके विस्तार को द्यावा और पृथिवी नहीं पा सकते । अन्तरिक्ष का जल भी जिनके अन्त को नहीं पा सकते । उत्तम वृष्टि में बाधक वृत्र के साथ युद्ध करते हुए जिनके उत्साह की तुलना नहीं की जा सकती, ऐसे हे इन्द्रदेव ! आप अकेले ही सब में व्याप्त होकर अन्यान्य विश्वों को भी प्रकट करते हैं ॥ १४ ॥
६२९. आर्चन्नत्र मरुतः सस्मिन्नाजौ विश्वे देवासो अमदन्ननु त्वा । वृत्रस्य यद्भृष्टिमता वधेन नि त्वमिन्द्र प्रत्यानं जघन्थ ॥ १५ ॥
हे इन्द्रदेव ! वृत्र के साथ सभी युद्धों में मरुतों ने आपकी अर्चना की तथा सभी देवों ने आपको उत्साहित किया, तब आपने वृत्र के मुख पर, दुष्ट बुद्धि वालों को मारने वाले वज्र का प्रहार किया ॥ १५ ॥
[ सूक्त – ५३ ]
[ ऋषि – सव्य आङ्गिरस । देवता – इन्द्र। छन्द जगती, १०-११ त्रिष्टुप् । ]
६३०. न्यू३ षु वाचं प्र महे भरामहे गिर इन्द्राय सदने विवस्वतः । नू चिद्धि रत्नं ससतामिवाविदन्न दुष्टुतिर्द्रविणोदेषु शस्यते ॥ १ ॥
हम विवस्वान् के यज्ञ में महान् इन्द्रदेव की उत्तम वचनों से स्तुति करते हैं । जिस प्रकार सोने वालों का धन चोर सहजता से ले जाते हैं, उसी प्रकार इन्द्रदेव ने (असुरों के) रत्नों को प्राप्त किया । धन दान करने वालों की निन्दा करना सराहनीय नहीं है ॥ १ ॥
६३१. दुरो अश्वस्य दुर इन्द्र गोरसि दुरो यवस्य वसुन इनस्पतिः । शिक्षानरः प्रदिवो अकामकर्शनः सखा सखिभ्यस्तमिदं गृणीमसि ॥ २ ॥
हे इन्द्रदेव ! आप अश्वों, गौवों, धन-धान्यों के देने वाले हैं । आप, सबका पालन-पोषण करते हुए उन्हें उत्तम कर्म की प्रेरणा प्रदान करने वाले तेजस्वी वीर हैं । आप संकल्पों को नष्ट न करने वाले तथा मित्रों के भी मित्र हैं । इस प्रकार हम आपकी स्तुति करते हैं ॥ २ ॥
६३२. शचीव इन्द्र पुरुकृद्द्युमत्तम तवेदिदमभितश्चेकिते वसु । अतः संगृभ्याभिभूत आ भर मा त्वायतो जरितुः काममूनयीः ॥ ३ ॥
शक्तिशाली, बहु-कर्मा, दीप्तिमान् हे इन्द्रदेव ! सम्पूर्ण धन आपका ही है – यह सर्वज्ञात है । वृत्र का पराभव करके उसका धन लेकर, हमें उससे अभिपूरित करें । आप अपने प्रशंसकों की कामना को अवश्य पूर्ण करें ॥ ३ ॥
६३३. एभिर्द्युभिः सुमना एभिरिन्दुभिर्निरुन्धानो अमतिं गोभिरश्विना । इन्द्रेण दस्युं दरयन्त इन्दुभिर्युतद्वेषसः समिषा रभेमहि ॥ ४ ॥
इन तेजस्वी हवियों और तेजस्वी सोमरसों द्वारा तृप्त होकर हे इन्द्रदेव ! हमें गौओं और घोड़ों (पोषण और प्रगति) से युक्त धनों को देकर हमारी दरिद्रता का निवारण करें । सोमरसों से तृप्त होने वाले, उत्तम मन वाले, इन्द्रदेव के द्वारा हम शत्रुओं को नष्ट करते हुए द्वेषरहित होकर अन्नों से सम्यक् रूप से हर्षित हों ॥ ४ ॥
६३४. समिन्द्र राया समिषा रभेमहि सं वाजेभिः पुरुश्चन्द्रैरभिद्युभिः । सं देव्या प्रमत्या वीरशुष्मया गोअग्रयाश्वावत्या रभेमहि ॥ ५ ॥
हे इन्द्रदेव ! हम धन-धान्यों से सम्पन्न हों, बहुतों को हर्ष प्रदान करने वाली सम्पूर्ण तेजस्विता तथा बलों से सम्पन्न हों । हम वीर पुत्रों, श्रेष्ठ गौवों एवं अश्वों को प्राप्त करने की उत्तम बुद्धि से युक्त हों ॥ ५ ॥
६३५. ते त्वा मदा अमदन्तानि वृष्ण्या ते सोमासो वृत्रहत्येषु सत्पते । यत्कारवे दश वृत्राण्यप्रति बर्हिष्पते नि सहस्राणि बर्हयः ॥ ६ ॥
हे सज्जनों के पालक इन्द्रदेव । वृत्र को मारने वाले संग्राम में आपने बलवर्द्धक सोमरस का पान करके आनन्द एवं उत्साह को प्राप्त किया और तब आपने संकल्प लेकर याजकों के निमित्त दस हजार असुरों का संहार किया ॥ ६ ॥
६३६. युधा युधमुप घेदेषि धृष्णुया पुरा पुरं समिदं हंस्योजसा । नम्या यदिन्द्र सख्या परावति निबर्हयो नमुचिं नाम मायिनम् ॥ ७ ॥
हे संघर्षशील शक्ति-सम्पन्न इन्द्रदेव ! आप शत्रु योद्धाओं से सर्वदा युक्त होकर रहे हैं, इनके अनेकों नगरों को आपने अपने बल से ध्वस्त किया है । उन नमनशील, योग्य मित्र, मरुतों के सहयोग से आपने प्रपंची असुर ‘नमुचि’ को मार दिया है ॥ ७ ॥
६३७. त्वं करञ्जमुत पर्णयं वधीस्तेजिष्ठ यातिथिग्वस्य वर्तनी । त्वं शता वङ्गृदस्याभिनत्पुरोऽनानुदः परिषूता ऋजिश्वना ॥ ८ ॥
हे इन्द्रदेव ! आपने ‘अतिधिग्व’ को प्रताड़ित करने वाले ‘करंज’ और ‘पर्णय’ नामक असुरों का तेजस्वी अस्त्रों से वध किया । सहायकों के बिना ही ‘वंगृद’ के सैकड़ों नगरों को गिराकर घिरे हुए ‘ऋजिश्वा’ को मुक्त किया ॥ ८ ॥
६३८. त्वमेताञ्जनराज्ञो द्विर्दशाबन्धुना सुश्रवसोपजग्मुषः । षष्टिं सहस्रा नवतिं नव श्रुतो नि चक्रेण रथ्या दुष्पदावृणक् ॥ ९ ॥
हे प्रसिद्ध इन्द्रदेव ! आपने बन्धु-रहित ‘सुश्रवस’ राजा के सम्मुख लड़ने के लिये खड़े हुए बीस राजाओं को तथा उनके साठ हजार निन्यानवे सैनिकों को अपने दुष्प्राप्य चक्र (व्यूह अथवा गतिशील प्रक्रिया) द्वारा नष्ट कर दिया ॥ ९ ॥
६३९. त्वमाविथ सुश्रवसं तवोतिभिस्तव त्रामभिरिन्द्र तूर्वयाणम् । त्वमस्मै कुत्समतिथिग्वमायुं महे राज्ञे यूने अरन्धनायः ॥ १० ॥
हे इन्द्रदेव! आपने अपने रक्षण साधनों से ‘सुश्रवस’ की और पोषण साधनों से ‘तूर्वयाण’ की रक्षा की । आपने इस महान् तरुण राजा के लिये ‘कुत्स अतिथिग्व’ और ‘आयु’ नामक राजाओं को वश में किया ॥ १० ॥
६४०. य उदृचीन्द्र देवगोपाः सखायस्ते शिवतमा असाम । त्वां स्तोषाम त्वया सुवीरा द्राघीय आयुः प्रतरं दधानाः ॥ ११ ॥
यज्ञ में स्तुत्य हे इन्द्रदेव ! देवों द्वारा रक्षित, हम आपके मित्र हैं । हम सर्वदा सुखी हों । आपकी कृपा से हम उत्तम बलों से युक्त, दीर्घ आयु को भली प्रकार धारण करते हैं तथा आपकी स्तुति करते हैं ॥ ११ ॥
[ सूक्त – ५४ ]
[ ऋषि – सव्य आङ्गिरस । देवता – इन्द्र । छन्द – जगती, ६,८,९,११ त्रिष्टुप् । ]
६४१. मा नो अस्मिन्मघवन्पृस्वंहसि नहि ते अन्तः शवसः परीणशे । अक्रन्दयो नद्यो३ रोरुवद्वना कथा न क्षोणीर्भियसा समारत ॥ १ ॥
जल एवं नदियों को गतिशील बनाने वाले हे ऐश्वर्यशाली इन्द्रदेव ! आप महान् शक्ति सम्पन्न हैं । हमें युद्ध जन्य दुःखों से बचायें एवं हम सबको भय मुक्त करें ॥ १ ॥
६४२. अर्चा शक्राय शाकिने शचीवते शृण्वन्तमिन्द्रं महयन्नभि ष्टुहि । यो धृष्णुना शवसा रोदसी उभे वृषा वृषत्वा वृषभो न्यृञ्जते ॥ २ ॥
हे मनुष्यो ! सर्वशक्तिमान्, साधनों से सम्पन्न, तेजस्वी इन्द्रदेव का आप पूजन करें । स्तुतियों को सुनने वाले इन्द्रदेव की महत्ता का गान करें । प्रचण्ड शक्ति से वर्षा करने वाले इन्द्रदेव अपनी सामर्थ्य से युक्त होकर सबके अभीष्ट की वर्षा करते हैं । अपने बल से ‘पृथ्वी’ और ‘द्युलोक’ को समायोजित करते हैं ॥ २ ॥
६४३. अर्चा दिवे बृहते शूष्यं१ वचः स्वक्षत्रं यस्य धृषतो धृषन्मनः । बृहच्छ्रवा असुरो बर्हणा कृतः पुरो हरिभ्यां वृषभो रथो हि षः ॥ ३ ॥
इन्द्रदेव शत्रुओं के विनाश के लिये शारीरिक एवं मानसिक शक्ति से सम्पन्न हैं । ऐसे तेजस्वी और महान् आत्मबल सम्पन्न इन्द्रदेव का आदरयुक्त वचनों द्वारा पूजन करें । वे इन्द्रदेव महान् यशस्वी प्राणशक्ति को बढ़ाने वाले शत्रु-नाशक, अश्वयोजित रथ पर अधिष्ठित हैं ॥ ३ ॥
६४४. त्वं दिवो बृहतः सानु कोपयोऽव त्मना धृषता शम्बरं भिनत् । यन्मायिनो व्रन्दिनो मन्दिना धृषच्छितां गभस्तिमशनिं पृतन्यसि ॥ ४ ॥
हे इन्द्रदेव ! आपने प्रपंची असुर के सैन्य दल को उत्साहपूर्वक तीक्ष्ण वज्र के प्रहार से नष्ट कर दिया है । आप विशाल द्युलोक के उच्च स्थान को प्रकम्पित करते हैं और अपने बल से असुर ‘शम्बर’ को मार गिराते हैं ॥ ४ ॥
६४५. नि यद्वृणक्षि श्वसनस्य मूर्धनि शुष्णस्य चिद्व्रन्दिनो रोरुवद्वना । प्राचीनेन मनसा बर्हणावता यदद्या चित्कृणवः कस्त्वा परि ॥ ५ ॥
हे इन्द्रदेव ! आपने गर्जना करते हुए, जलों को वृष्टि के लिये प्रेरित करने के निमित्त ‘शुष्ण’ का वध किया । प्राचीन काल से आज तक आप सामर्थ्यवान् मन से यही काम करते आये हैं । आपके ऊपर कौन है, जो आप को रोक सके ? ॥ ५ ॥
६४६. त्वमाविथ नर्यं तुर्वशं यदुं त्वं तुर्वीतिं वय्यं शतक्रतो । त्वं रथमेतशं कृत्व्ये धने त्वं पुरो नवतिं दम्भयो नव ॥ ६ ॥
सैकड़ों यज्ञादि श्रेष्ठ कर्म सम्पन्न करने वाले हे इन्द्रदेव ! आपने युद्ध जन्य कठिन परिस्थितियों में नर्य, तुर्वश, युद्ध तथा वय्य कुलोत्पन्न तुर्वीति की रक्षा की । आपने शत्रुओं के निन्यानवे (अर्थात् अनेकों) नगरों को ध्वस्त करके रथ और एवश नामक ऋषि को संरक्षित किया है ॥ ६ ॥
६४७. स घा राजा सत्पतिः शूशुवज्जनो रातहव्यः प्रति यः शासमिन्वति । उक्था वा यो अभिगृणाति राथसा दानुरस्मा उपरा पिन्वते दिवः ॥ ७ ॥
जो राजा सत्कर्मों का पोषक और समृद्धिशाली है, उसके शासन में रहने वाले मनुष्य उत्तम हवि को देने वाले होते हैं । वे हविष्यान्न के साथ उत्तम वचनों द्वारा स्तुतियों करते हैं । उसी राज्य के लिये दानशील इन्द्रदेव द्युलोक से मेघों द्वारा वृष्टि करते हैं ॥ ७ ॥
६४८. असमं क्षत्रमसमा मनीषा प्र सोमपा अपसा सन्तु नेमे । ये त इन्द्र ददुषो वर्धयन्ति महि क्षत्रं स्थविरं वृष्ण्यं च ॥ ८ ॥
सोम पान करने वाले हे इन्द्रदेव ! आपके बल की, बुद्धि की और हर्षदायक कर्मों की तुलना नहीं की जा सकती । हवि समर्पित करने वाले मनुष्यों को दिये गये आपके अनुदान, महान् पराक्रम की महत्ता और सामर्थ्य को बढ़ाने वाले हैं ॥ ८ ॥
६४९. तुभ्येदेते बहुला अद्रिदुग्धाश्चमूषदश्चमसा इन्द्रपानाः । व्यश्नुहि तर्पया काममेषामथा मनो वसुदेयाय कृष्व ॥ ९ ॥
हे इन्द्रदेव! पाषाणों से कूटकर और छानकर बहुत से पात्रों में पेय सोम रखा हुआ है । यह सोम आपके निमित है । आप इसे पानकर अपनी इच्छा को तृप्त करें, तत्पश्चात् उत्साहपूर्वक हमें अपार धन-वैभव प्रदान करें ॥ ९ ॥
६५०. अपामतिष्ठद्धरुणह्वरं तमोऽन्तर्वृत्रस्य जठरेषु पर्वतः । अभीमिन्द्रो नद्यो वव्रिणा हिता विश्वा अनुष्ठाः प्रवणेषु जिघ्नते ॥ १० ॥
जल – प्रवाहों को रोकने वाले पर्वत रूप वृत्र ने अपने उदर में जलों को स्थिर कर लिया, जिससे तमिस्रा व्याप्त हुई, तब इन्द्रदेव ने वृत्र द्वारा रोके हुए जल-प्रवाहों को मुक्त करके नीचे की ओर बहाया ॥ १० ॥
६५१. स शेवृधमधि धा द्युम्नमस्मे महि क्षत्रं जनाषाळिन्द्र तत्र्यम् । रक्षा च नो मघोनः पाहि सूरीन्राये च नः स्वपत्या इषे धाः ॥ ११ ॥
हे इन्द्रदेव ! आप सुख, यश, सभी लोगों को वशीभूत करने वाला राज्य और प्रशंसित सामर्थ्य हममें स्थापित करें । हमारे धनों की रक्षा करते हुए हमें उत्तम संतान एवं अधिकाधिक धन-धान्य प्रदान कर ऐश्वर्यवान् बनायें ॥ ११ ॥
[ सूक्त ५५ ]
[ ऋषि – सव्य आङ्गिरस । देवता – इन्द्र । छन्द – जगती । ]
६५२. दिवश्चिदस्य वरिमा वि पप्रथ इन्द्रं न मह्रा पृथिवी चन प्रति । भीमस्तुविष्माञ्चर्षणिभ्य आतपः शिशीते वर्ज तेजसे न वंसगः ॥ १ ॥
इन्द्रदेव की श्रेष्ठता पृथ्वी से घुलोक तक विस्तृत है । अपने दल में उन्हें पराजित करने वाला कोई नहीं है । शत्रुओं के प्रति अत्यन्त विकराल, बलवान् शत्रुओं को संतप्त करने वाले इन्द्रदेव अपने वज्र का प्रहार करने के लिये उसे उसी प्रकार तीक्ष्ण करते हैं, जैसे बैल लड़ने के लिये अपने सींगों को तेज करता है ॥ १ ॥
३५३. सो अर्णवो न नद्यः समुद्रियः प्रति गृभ्णाति विश्रिता वरीमभिः । इन्द्रः सोमस्य पीतये वृषायते सनात्स युष्म ओजसा पनस्यते ॥ २ ॥
ये इन्द्रदेव अपनी उत्कृष्टता से अन्तरिक्ष में व्याप्त जल-प्रवाहों को, समुद्र द्वारा नदियों को धारण करने के समान धारण करते हैं । वे इन्द्रदेव सोम पीने की तीव्र अभिलाषा रखते हैं । चिरकाल से वे युद्धों में अपनी सामर्थ्य के बल पर प्रशंसा को प्राप्त होते रहे हैं ॥ २ ॥
६५४. त्वं तमिन्द्र पर्वतं न भोजसे महो नृम्णस्य धर्मणामिरज्यसि । प्र वीर्येण देवताति चेकिते विश्वस्मा उग्रः कर्मणे पुरोहितः ॥ ३ ॥
हे इन्द्रदेव! आप महान् बलों के धारणकर्ता हैं । अपने बल से पर्वत के समान दृढ़, शत्रुओं (मेघों) को विदीर्ण कर, प्रजाओं के भोग के लिये जल देकर उन पर शासन करते हैं । आप सभी कर्मों में अग्रणी और बलों के कारण देवों में श्रेष्ठ माने जाते हैं ॥ ३ ॥
६५५. स इद्वने नमस्युभिर्वचस्यते चारु जनेषु प्रब्रुवाण इन्द्रियम् । वृषा छन्दुर्भवति हर्यतो वृषा क्षेमेण धेनां मघवा यदिन्वति ॥ ४ ॥
मनुष्यों में अपनी सामर्थ्य को प्रकट करते हुए सुन्दर रूप वाले वे धनवान् और बलवान् इन्द्रदेव, विनयशीलों की स्तुतियों को सुनकर प्रसन्न होते हैं तथा धनादि की कामना करने वालों को अभीष्ट पदार्थ प्रदान करते हैं ॥ ४ ॥
६५६. स इन्महानि समिधानि मज्मना कृणोति युध्म ओजसा जनेभ्यः । अधा चन श्रद्दधति त्विषीमत इन्द्राय वज्रं निघनिघ्नते वधम् ॥ ५ ॥
वे वीर इन्द्रदेव मनुष्यों के हित के लिए अपने महान् बल से बड़े-बड़े युद्धों को जीतते हैं । अपने घातक वज्र से शत्रुओं का विनाश करते हैं, जिससे मनुष्य तेजस्वी इन्द्रदेव के आगे श्रद्धा से झुकते हैं ॥ ५ ॥
६५७. स हि श्रवस्युः सदनानि कृत्रिमा क्ष्मया वृधान ओजसा विनाशयन् । ज्योतींषि कृण्वन्नवृकाणि यज्यवेऽव सुक्रतुः सर्तवा अपः सृजत् ॥ ६ ॥
वे यश की इच्छा वाले, उत्तमकर्मा इन्द्रदेव अपने तेजस्वी बलों से शत्रुओं के घरों को नष्ट करते हुए वृद्धि को प्राप्त हुए, सूर्यादि नक्षत्रों के प्रकाश को रोकने वाले आवरणों को दूर किया और याजक के लिए जलों के प्रवाह को खोल दिया ॥ ६ ॥
६५८. दानाय मनः सोमपावन्नस्तु तेऽर्वाञ्चा हरी वन्दनश्रुदा कृधि । यमिष्ठासः सारथयो य इन्द्र ते न त्वा केता आ दभ्नुवन्ति भूर्णयः ॥ ७ ॥
सोमपान करने वाले हे इन्द्रदेव ! आपका मन दान के लिये प्रवृत्त हो । आप हमारी स्तुतियाँ सुनते हैं । अपने अश्वों को हमारे यज्ञ की ओर अभिमुख करें । हे इन्द्रदेव ! आपके ये सारथी नियंत्रण में पूर्ण कुशल हैं, जिससे ये प्रबल अवरोधों से भी विचलित नहीं होते ॥ ७ ॥
६५९. अप्रक्षितं वसु बिभर्षि हस्तयोरषाळ्हं सहस्तन्वि श्रुतो दधे । आवृतासोऽवतासो न कर्तृभिस्तनूषु ते क्रतव इन्द्र भूरयः ॥ ८ ॥
हे इन्द्रदेव ! आप अपने दोनों हाथों में अक्षय धन को धारण करते हैं । आपके शरीर में प्रचण्ड बल स्थापित है । स्तुति करने वालों ने आप के शरीरों को बढ़ाया है । मनुष्यों से घिरे कुएँ के समान आपके शरीर प्रसिद्ध कर्मों से घिरे हुए हैं ॥ ८ ॥
[ इस ऋचा में लिखा है कि श्रेष्ठ कर्मों से इन्द्रदेव के शरीर घिरे रहते हैं । संगठक सत्ता को वेद में इन्द्रदेव कहा गया है । जिन शरीरों में इन्द्रदेव का आधिपत्य है, उनकी शक्तियाँ संगठित रहती हैं । बिखरी हुई शक्ति वाले शरीरों से कर्मों की सिद्धि नहीं होती, संगठित शक्ति युक्त शरीरों से कर्म सिद्ध होते हैं, अतः वे शरीर कर्मों से घिरे रहते हैं । ]
[ सूक्त – ५६ ]
[ ऋषि – सव्य आङ्गिरस । देवता – इन्द्र । छन्द – जगती । ]
६६०. एष प्र पूर्वीरव तस्य चग्निषोऽत्यो न योषामुदयंस्त भुर्वणिः । दक्ष महे पाययते हिरण्ययं रथमावृत्या हरियोगमृभ्वसम् ॥ १ ॥
जगत् का पोषण करने वाले इन्द्रदेव यजमान के बहुसंख्यक सोमपात्रों को प्रसत्रतापूर्वक स्वीकारते हैं । वे यजमान, सुन्दर अश्वों से योजित, दीप्तिमान् स्वर्णिम रथ में घिरे बैठे महान् बलवान् इन्द्रदेव को सोम पिलाते हैं ॥ १ ॥
६६१. तं गूर्तयो नेमन्निषः परीणसः समुद्रं न संचरणे सनिष्यवः । पतिं दक्षस्य विदथस्य नू सहो गिरिं न वेना अधि रोह तेजसा ॥ २ ॥
जिस प्रकार धन के इच्छुक समुद्र की ओर प्रस्थान करते हैं, उसी प्रकार हविदाता यजमान इन्द्रदेव की ओर हवि ले जाते हुए विचरण करते हैं । हे स्तोता! जैसे नदियाँ पहाड़ को घेरती हुई चलती हैं, वैसे ही आपकी स्तुतियाँ महान् बलों के स्वामी, यज्ञ के स्वामी, संघर्षक इन्द्रदेव को अपनी तेजस्विता से आवृत कर लें ॥ २ ॥
[ वैदिक युग में समुद्र से रत्न आदि प्राप्त करने की विद्या का ज्ञान था । ]
६६२. स तुर्वणिर्महाँ अरेणु पौंस्ये गिरेर्भृष्टिर्न भ्राजते तुजा शवः । येन शुष्णं मायिनमायसो मदे दुध्र आभूषु रामयन्नि दामनि ॥ ३ ॥
वे महान् इन्द्रदेव शत्रुओं का नाश करने वाले और फौलादी कवच को धारण करने वाले हैं । वे मायावी असुर “शुष्ण” को कारागार में रस्सियों से बाँधकर रखते हैं । उनका निन्दारहित बल संग्राम में पर्वत-शिखर तुल्य प्रतिभासित होता है ॥ ३ ॥
६६३. देवी यदि तविषी त्वावृधोतय इन्द्रं सिषक्त्युषसं न सूर्यः । यो धृष्णुना शवसा बाधते तम इयर्ति रेणुं बृहदर्हरिध्र्वणिः ॥ ४ ॥
हे स्तोता ! सूर्यदेव के द्वारा देवी उषा को प्राप्त करने के समान आपके स्तवन द्वारा प्रवृद्ध बल इन्द्रदेव को प्राप्त होता है; तब वे अपने संघर्षशील बल से दुष्कर्म रूपी तमिस्त्रा का निवारण करते हैं । शत्रुओं को रुलाने में समर्थ इन्द्रदेव संग्राम में (सेना के माध्यम से) बहुत धूलि उड़ाते हैं ॥ ४ ॥
६६४. वि यत्तिरो धरुणमच्युतं रजोऽतिष्ठिपो दिव आतासु बर्हणा । स्वर्मीळ्हे यन्मद इन्द्र हर्ष्याहन्वृत्रं निरपामौब्जो अर्णवम् ॥ ५ ॥
हे इन्द्रदेव! आपने बादलों द्वारा धारण किये हुए जलों को आकाश की दिशाओं में स्थापित किया । सोम से हर्षित होकर संघर्षक बल से वृत्र को युद्ध में मारा, तब वृत्र द्वारा ढके जलों को नीचे की ओर प्रवाहित किया ॥ ५ ॥
६६५. त्वं दिवो धरुणं धिष ओजसा पृथिव्या इन्द्र सदनेषु माहिनः । त्वं सुतस्य मदे अरिणा अपो वि वृत्रस्य समया पाष्यारुजः ॥ ६ ॥
हे इन्द्रदेव ! आपने अपने महान् बल से जलों को अन्तरिक्ष से पृथ्वी पर स्थापित किया । आपने सोम पीकर उत्साहपूर्वक संघर्षक बल से वृत्र को मारा और पृथ्वी के सब स्थानों को जलों से तृप्त किया ॥ ६ ॥
[ सूक्त – ५७ ]
[ ऋषि – सव्य आङ्गिरस । देवता – इन्द्र । छन्द – जगती । ]
६६६. प्र मंहिष्ठाय बृहते बृहद्रये सत्यशुष्माय तवसे मतिं भरे । अपामिव प्रवणे यस्य दुर्धरं राधो विश्वायु शवसे अपावृतम् ॥ १ ॥
अत्यन्त दानी, महान् ऐश्वर्यशाली, सत्य-स्वरूप, पराक्रमी इन्द्रदेव की हम बुद्धिपूर्वक स्तुति करते हैं । नीचे की ओर प्रवाहित जल प्रवाहों के समान इनके बलों को कोई भी धारण नहीं कर सकता । जिस बल से प्राप्य ऐश्वर्य को मनुष्यों के लिये जीवन भर प्रदान करने का उनका व्रत खुला हुआ है ॥ १ ॥
६६७. अध ते विश्वमनु हासदिष्टय आपो निम्नेव सवना हविष्मतः । यत्पर्वते न समशीत हर्यत इन्द्रस्य वज्रः श्नथिता हिरण्ययः ॥ २ ॥
हे इन्द्रदेव ! आपका स्वर्ण सदृश दीप्तिमान् मारक वज्र मेघों को विदीर्ण करने में तत्पर हुआ, तब हे इन्द्रदेव ! सारा जगत् आपके लिए यज्ञ-कर्मों में संलग्न हुआ । जल के नीचे की ओर प्रवाहित होने के समान याजकों के द्वारा समर्पित सोम आपकी ओर प्रवाहित हुआ ॥ २ ॥
६६८. अस्मै भीमाय नमसा समध्वर उषो न शुभ्र आ भरा पनीयसे । यस्य धाम श्रवसे नामेन्द्रियं ज्योतिरकारि हरितो नायसे ॥ ३ ॥
हे दीप्तिमति उषे ! शत्रुओं के प्रति विकराल और प्रशंसनीय उन इन्द्रदेव के लिये नमस्कार के साथ यज्ञ सम्पादन करें, जिनका धाम (स्थान) अन्नादि दान के लिये अत्यन्त प्रसिद्ध है, जिनकी सामर्थ्य और कीर्ति अश्व के सदृश सर्वत्र संचरित होती है ॥ ३ ॥
६६९. इमे त इन्द्र ते वयं पुरुष्टुत ये त्वारभ्य चरामसि प्रभूवसो । नहि त्वदन्यो गिर्वणो गिरः सघत्क्षोणीरिव प्रति नो हर्य तद्वचः ॥ ४ ॥
हे सम्पत्तिवान् एवं बहुप्रशंसित इन्द्रदेव ! आपके संरक्षण में कार्य करते हुए, निष्ठापूर्वक रहते हुए, आपके समान अन्य स्तुत्य देवता के न रहने के कारण, हम आपकी स्तुति करते हैं । सभी पदार्थों को स्वीकार करने वाली पृथ्वी के समान आप भी हमारे स्तोत्रों को स्वीकार करें ॥ ४ ॥
६७०. भूरि त इन्द्र वीर्यं१ तव स्मस्यस्य स्तोतुर्मघवन्काममा पृण । अनु ते द्यौर्बृहती वीर्यं मम इयं च ते पृथिवी नेम ओजसे ॥ ५ ॥
हे ऐश्वर्यशाली इन्द्रदेव ! स्तुति करने वाले इन साधकों की कामनायें पूर्ण करें । आप अत्यन्त बलवान् हैं । यह महान् द्युलोक भी आपके बल पर ही स्थित है और यह पृथ्वी भी आपके बल के आगे झुकती है ॥ ५ ॥
६७१. त्वं तमिन्द्र पर्वतं महामुरुं वज्रेण वज्रिन्पर्वशश्चकर्तिथ । अवासृजो निवृताः सर्तवा अपः सत्रा विश्वं दधिषे केवलं सहः ॥ ६ ॥
हे वज्रधारी इन्द्रदेव ! आपने महान् बलशाली मेघों को अपने वज्र से खण्ड-खण्ड किया और रुके जल-प्रवाहों को बहने के लिए मुक्त किया । केवल आप ही सब संघर्षक शक्तियों को धारण करते हैं, यही सत्य है ॥ ६ ॥
[ सूक्त – ५८ ]
[ ऋषि – नोधा गौतम । देवता – अग्नि। छन्द – जगती, ६-९ त्रिष्टुप् । ]
६७२. नू चित्सहोजा अमृतो नि तुन्दते होता यद्दूतो अभवद्विवस्वतः । वि साधिष्ठेभिः पथिभी रजो मम आ देवताता हविषा विवासति ॥ १ ॥
निश्चित रूप से बलों से उत्पन्न (अरणि मन्थन द्वारा उत्पन्न) यह अमर अग्निदेव कभी संतप्त नहीं होते । वे यजमान के दूत रूप में सहायक होते हैं । वे अपने उत्तम मार्गों से अन्तरिक्ष में प्रकाशित होते हुए गमन करते हैं । देवों को समर्पित हविष्यान्न उन तक पहुंचाकर सम्मानित करते हैं ॥ १ ॥
६७३. आ स्वमद्य युवमानो अजरस्तृष्वविष्यन्नतसेषु तिष्ठति । अत्यो न पृष्ठं प्रुषितस्य रोचते दिवो न सानु स्तनयन्नचिक्रदत् ॥ २ ॥
कभी जीर्णता को न प्राप्त होने वाले अग्निदेव, हवियों के साथ मिलकर इनका भक्षण करते हुए समिधाओं पर दीप्तिमान् होते हैं । घृत के सिंचन से ऊपर उठती हुई इनकी ज्वालायें सज्जित अश्व के सदृश सुशोभित होती हैं । ये आकाशस्थ मेध के गर्जन के समान शब्द करते हुए वृद्धि को प्राप्त होते हैं ॥ २ ॥
६७४. क्राणा रुद्रेभिर्वसुभिः पुरोहितो होता निषत्तो रयिषाळमर्त्यः । रथो न विश्वृञ्जसान आयुषु व्यानुषग्वार्या देव ऋण्वति ॥ ३ ॥
यज्ञादि कर्मों के सम्पादन में कुशल, रुद्रों और वसुओं द्वारा अग्रिम रूप में स्थापित, होता रूप अविनाशी, धन-प्रदाता, प्रतिष्ठित अग्निदेव, याजकों की स्तुतियों से, रथ के समान बढ़ती हुई प्रजाओं में क्रमशः वरण करने योग्य श्रेष्ठ धनों को स्थापित करते हैं ॥ ३ ॥
६७५. वि वातजूतो अतसेषु तिष्ठते वृथा जुहूभिः सृण्या तुविष्वणिः । तृषु यदग्ने वनिनो वृषायसे कृष्णं त एम रुशदूर्मे अजर ॥४ ॥
वायु के संयोग से समिधाओं पर प्रज्वलित अग्निदेव तेजस्वी ज्वालाओं के साथ शब्दायमान होते हुए सुशोभित हो रहे हैं। हे अजर, दीप्तिमान् अग्निदेव ! आप अपनी प्रखर शक्ति से वनों को (समिधाओं को) प्रभावित करते हुए काले धूम्र के रूप में उठकर अपनी उपस्थिति का बोध करा रहे हैं ॥ ४ ॥
६७६. तपुर्जम्भो वन आ वातचोदितो यूथे न साह्वाँ अव वाति वंसगः । अभिव्रजन्नक्षितं पाजसा रजः स्थातुश्चरथं भयते पतत्रिणः ॥ ५ ॥
वायु द्वारा प्रेरित, प्रज्वलित तेजस्वी ज्वालाओं रूपी दाढ़ वाले अग्निदेव वनों में गो समूह के बीच स्वच्छन्द बैल की तरह घूमते हैं । जब ये अनन्त अन्तरिक्ष में पक्षी के समान वेग से घूमते हैं, तो सारे स्थावर-जंगम भयभीत हो उठते हैं ॥ ५ ॥
६७७. दधुष्ट्वा भृगवो मानुषेष्वा रयिं न चारुं सुहवं जनेभ्यः । होतारमग्ने अतिथिं वरेण्यं मित्रं न शेवं दिव्याय जन्मने ॥ ६ ॥
हे अग्निदेव ! मनुष्यों द्वारा सुख प्राप्ति के निमित्त, आहवनीय, होतारूप, अतिथिरूप, पूज्य, वरण करने योग्य, मित्र तुल्य, सुखद, तेजस्वी, धन के सदृश सुन्दर रूप वाले आपको, भृगुओं ने मनुष्यों में देवत्व की प्राप्ति के लिए स्थापित किया ॥ ६ ॥
६७८. होतारं सप्त जुह्वो३यजिष्ठं यं वाघतो वृणते अध्वरेषु । अग्निं विश्वेषामरतिं वसूनां सपर्यामि प्रयसा यामि रत्नम् ॥ ७ ॥
आवाहन करने वाले सात ऋत्विज्ञ और होतागण यज्ञों में श्रेष्ठ होता रूप अग्निदेव का वरण करते हैं । उन सम्पूर्ण धनों को देने वाले अग्निदेव की हविष्यान्न द्वारा सेवा करते हुए, हम उनसे रत्नों की याचना करते हैं ॥ ७ ॥
६७९. अच्छिद्रा सूनो सहसो नो अद्य स्तोतृभ्यो मित्रमहः शर्म यच्छ । अग्ने गृणन्तमंहस उरुष्योर्जो नपात्पूर्भिरायसीभिः ॥ ८ ॥
बल के पुत्र, श्रेष्ठ मित्र रूप हे अग्निदेव ! हम स्तोताओं को आज श्रेष्ठ सुख प्रदान करें । बलों को न क्षीण करने वाले हे अग्निदेव ! आप अपने फौलादी दुर्गों से जैसे हम स्तोताओं की रक्षा करते हैं, वैसे आप हमें पापों से रक्षित करें ॥ ८ ॥
६८०. भवा वरूथं गृणते विभावो भवा मघवन्मघवद्ध्यः शर्म । उरुष्याग्ने अंहसो गृणन्तं प्रातर्मक्षू धियावसुर्जगम्यात् ॥ ९ ॥
हे देदीप्यमान् अग्निदेव ! स्तोता के लिये आप आश्रयरूप हों । हे ऐश्वर्यशालिन् अग्निदेव ! आप धन वाले याजक के लिये सुख प्रदायक हों । स्तोताओं को पापों से रक्षित करें । विचारपूर्वक वैभव देने वाले हे अग्निदेव ! आप प्रातः काल (यज्ञ में) शीघ्र पधारें ॥ ९ ॥
[ सूक्त – ५९ ]
[ऋषि – नोधा गौतम । देवता – अग्नि वैश्वानर । छन्द – त्रिष्टुप् ]
६८१. वया इदग्ने अग्नयस्ते अन्ये त्वे विश्वे अमृता मादयन्ते । वैश्वानर नाभिरसि क्षितीनां स्थूणेव जनाँ उपमिद्ययन्थ ॥ १ ॥
हे अग्निदेव ! समस्त अग्नियाँ आपकी ज्वालाएँ हैं । सब देव आपसे आनन्द पाते हैं । हे वैश्वानर ! आप सब प्राणियों का पोषण करने वाले नाभि (केन्द्र) हैं । आप स्तम्भ (यूप) की तरह सभी लोगों के आधार रूप हैं ॥ १ ॥
६८२. मूर्धा दिवो नाभिरग्निः पृथिव्या अथाभवदरती रोदस्योः । तं त्वा देवासोऽजनयन्त देवं वैश्वानर ज्योतिरिदार्याय ॥ २ ॥
ये अग्निदेव आकाश के शिर और पृथ्वी की नाभि हैं । (सूर्य रूप में आकाश के शीर्ष तथा यज्ञ रूप में पृथ्वी की नाभि हैं ।) ये आकाश-पृथ्वी के अधिपति हैं । इन देव को सभी देव प्रकट करते हैं । हे वैश्वानर अग्निदेव ! श्रेष्ठजनों के लिये भी आपने ज्योति रूप प्रकाश दिया है ॥ २ ॥
६८३. आ सूर्ये न रश्मयो ध्रुवासो वैश्वानरे दधिरेऽग्ना वसूनि । या पर्वतेष्वोषधीष्वप्सु या मानुषेष्वसि तस्य राजा ॥ ३ ॥
सूर्यदेव से सर्वदा प्रकाश किरणों के निःसृत होने के समान वैश्वानर अग्निदेव से सभी धन प्राप्त होते हैं । हे अग्निदेव ! आप सभी पर्वतों, ओषधियों, जलों और मानवों में स्थित धनों के राजा हैं ॥३ ॥
६८४. बृहती इव सूनवे रोदसी गिरो होता मनुष्यो३न दक्षः । स्वर्वते सत्यशुष्माय पूर्वीर्वैश्वानराय नृतमाय यह्वीः ॥ ४ ॥
द्यावा-पृथिवी इस पुत्र-रूप (गर्भ में रहने वाले) वैश्वानर अग्निदेव के लिये बृहत् स्वरूप को प्राप्त हुई हैं । मनुष्यों में श्रेष्ठ, ये होता प्रकाशित और सत्य बल से युक्त वैश्वानर अग्निदेव के लिये पुरातन स्तुतियों का गायन करते हैं ॥ ४ ॥
६८५. दिवश्चित्ते बृहतो जातवेदो वैश्वानर प्र रिरिचे महित्वम् । राजा कृष्टीनामसि मानुषीणां युधा देवेभ्यो वरिवश्चकर्थ ॥ ५ ॥
हे प्राणियों के ज्ञाता, मनुष्यों में व्याप्त अग्निदेव ! आपकी महत्ता व्यापक एवं द्युलोक से भी अधिक बड़ी है । आप मानव मात्र के अधिपति हैं । संघर्षशील हमारा जीवन दैवी सम्पदाओं से अभिपूरित हो ॥ ५ ॥
६८६. प्र नू महित्वं वृषभस्य वोचं यं पूरवो वृत्रहणं सचन्ते । वैश्वानरो दस्युमग्निर्जघन्वाँ अधूनोत्काष्ठा अव शम्बरं भेत् ॥ ६ ॥
अब उन बलवान् अग्निदेव की महत्ता का वर्णन करते हैं । ये वैश्वानर अग्निदेव जलों के चोर वृत्र का वध करते हैं । सब मनुष्य उस वृत्र नाशक अग्निदेव का आश्रय लेते हैं । दिशाओं को कम्पित करने वाले वे ‘शंबर’ असुर का भेदन करते हैं ॥ ६ ॥
६८७. वैश्वानरो महिम्ना विश्वकृष्टिर्भरद्वाजेषु यजतो विभावा । शातवनेये शतिनीभिरग्निः पुरुणीथे जरते सूनृतावान् ॥ ७ ॥
ये वैश्वानर (विश्व पुरुष) अग्निदेव अपनी महिमा से सब मनुष्यों के स्वामी हैं । अन्नदाताओं में अतिपूजनीय और वैभवशाली हैं । ‘शतवन’ के पुत्र ‘पुरुनीथ’ के यज्ञ में सत्यवान् अग्निदेव की सैकड़ों स्तोत्रों से स्तुति की जाती है ॥ ७ ॥
[ सूक्त – ६० ]
[ ऋषि – नोधा गौतम । देवता – अग्नि । छन्द- त्रिष्टुप् । ]
६८८. वह्विं यशसं विदथस्य केतुं सुप्राव्यं दूतं सद्योअर्थम् । द्विजन्मानं रयिमिव प्रशस्तं रातिं भरद्भृगवे मातरिश्वा ॥ १ ॥
हविवाहक, यशस्वी, यज्ञ पताका सदृश लहराने वाले, उत्तम रक्षक, शीघ्र धन प्रदायक, देवताओं तक हवि पहुँचाने वाले, द्विज (अरणि मंथन और मंत्ररूप विद्या इन दो के द्वारा उद्भूत), धन के समान प्रशंसित अग्निदेव को वायुदेव ने भृगु का मित्र बनाया ॥ १ ॥
६८९. अस्य शासुरुभयासः सचन्ते हविष्मन्त उशिजो ये च मर्ताः । दिवश्चित्पूर्वो न्यसादि होतापृच्छ्यो विश्पतिर्विक्षु वेधाः ॥ २ ॥
देवों को हवि समर्पित करते हुए समुन्नत जीवन जीने वाले तथा सामान्य जीवन जीने वाले मनुष्य दोनों अग्निदेव के शासन में ही रहते हैं । पूजनीय, जलवर्षक, प्रजापालक, होतारूप अग्निदेव सूर्योदय से पहले ही (याजकों द्वारा यज्ञवेदी पर यज्ञाग्नि के रूप में) प्रकट होते हैं ॥ २ ॥
६९०. तं नव्यसी हृद आ जायमानमस्मत्सुकीर्तिर्मधुजिह्वमश्याः । यमृत्विजो वृजने मानुषासः प्रयस्वन्त आयवो जीजनन्त ॥ ३ ॥
जीवन-संग्राम में विजयी होते हुए, उन्नति की आकांक्षा करने वाले मनुष्य जिन अग्निदेव को उत्पन्न करते हैं, उन, प्रत्येक हृदय में विराजमान, मधुर वाणी वाले, उत्तम्, यशस्वी अग्निदेव को हमारी नवीन स्तुतियाँ प्राप्त हों ॥ ३ ॥
६९१. उशिक्पावको वसुर्मानुषेषु वरेण्यो होताधायि विक्षु । दमूना गृहपतिर्दम आँ अग्निर्भुवद्रयिपती रयीणाम् ॥ ४ ॥
धन-वैभव प्राप्त करने की कामना से पवित्रता प्रदान करने वाले ये अग्निदेव, याजकों द्वारा होतारूप में वरण किये जाते हैं । दोषों का दमन करने वाले, गृह पालक, श्रेष्ठ ऐश्वर्य के स्वामी, ये अग्निदेव यज्ञों में वेदी पर स्थापित किये जाते हैं ॥ ४ ॥
६९२. तं त्वा वयं पतिमग्ने रयीणां प्र शंसामो मतिभिर्गोत्तमासः । आशुं न वाजम्भरं मर्जयन्तः प्रातर्मक्षु धियावसुर्जगम्यात् ॥ ५ ॥
हे अग्निदेव ! हम गौतम वंशज आपकी अपनी बुद्धि से प्रशंसा करते हैं । अन्न देने वाले, पवित्र करने वाले, अश्व की तरह बल, सम्पन्न आप, हमें धन प्राप्त करने का कौशल प्रदान करें और प्रातःकाल (यज्ञ में) शीघ्र ही पधारें ॥ ५ ॥
[ सूक्त – ६१ ]
[ ऋषि – नोधा गौतम । देवता – इन्द्र । छन्द – त्रिष्टुप् । ]
६९३. अस्मा इदु प्र तवसे तुराय प्रयो न हर्मि स्तोमं माहिनाय ।
ऋचीषमायाध्रिगव ओहमिन्द्राय ब्रह्माणि राततमा ॥ १ ॥
शीघ्र कार्य करने वाले, मंत्रों द्वारा वर्णनीय, महान् कीर्ति वाले, अबाध गति वाले इन्द्रदेव के लिये हम प्रशंसात्मक मंत्रों का गान करते हुए हविष्यान्न अर्पित करते हैं ॥ १ ॥
६९४. अस्मा इदु प्रय इव प्र यंसि भराम्यङ्गुषं बाधे सुवृक्ति ।
इन्द्राय हृदा मनसा मनीषा प्रत्नाय पत्ये थियो मर्जयन्त ॥ २ ॥
हम उन इन्द्रदेव के निमित्त हविष्य के समान स्तोत्र अर्पित करते हैं । शत्रुनाशक इन्द्रदेव के लिए हम उत्तम स्तुति गान करते हैं । ऋषिगण उन पुरातन इन्द्रदेव के लिए हृदय, मन और बुद्धि के द्वारा पवित्र स्तुति करते हैं ॥ २ ॥
६९५. अस्मा इदु त्यमुपमं स्वर्षां भराम्याङ्गुषमास्येन ।
मंहिष्ठमच्छोक्तिभिर्मतीनां सुवृक्तिभिः सूरिं वावृधध्यै ॥ ३ ॥
हम महान् विद्वान् इन्द्रदेव को आकृष्ट करने वाली, उनकी महिमा के अनुरूप उत्तम स्तुतियों को निर्मल बुद्धि से नादपूर्वक उच्चारित करते हैं ॥ ३ ॥
६९६. अस्मा इदु स्तोमं सं हिनोमि रथं न तष्टेव तत्सिनाय ।
गिरश्च गिर्वाहसे सुवृक्तीन्द्राय विश्वमिन्वं मेधिराय ॥ ४ ॥
जैसे त्वष्टादेव रथ का निर्माण करके इन्द्रदेव को प्रदान करते हैं, वैसे ही हम समस्त कामनाओं को सिद्ध करने वाले, स्तुत्य मेधावी इन्द्रदेव के लिइ अपनी वाणियों से सर्व प्रसिद्ध श्रेष्ठ स्तोत्रों का गान करते हैं ।
६९७. अस्मा इदु सप्तिमिव श्रवस्येन्द्रायार्कं जुह्वा३समञ्जे ।
वीरं दानौकसं वन्दध्यै पुरां गूर्तश्रवसं दर्माणम ॥ ५ ॥
अश्व को रथ से नियोजित करने के समान हम धन की कामना से इन्द्रदेव के निमित्त युक्त करते हैं । हम उन वीर, दानशील, विपुल यशस्वी, शत्रु के नगरों को ध्वस्त करने वाले इन्द्रदेव की वन्दना करते हैं ॥ ५ ॥
६९८. अस्मा इदु त्वष्टा तक्षद्वज्रं स्वपस्तमं स्वर्यं१ रणाय ।
वृत्रस्य चिद्विदद्येन मर्म तुजन्नीशानस्तुजता कियेधाः ॥ ६ ॥
लक्ष्य को भली प्रकार बेधने वाले, शक्तिशाली वज्र को त्वष्टादेव ने युद्ध के निमित्त इन्द्र के लिए तैयार किया । उसी वज्र से शत्रुनाशक, अतिबलवान् इन्द्रदेव ने वृत्र के मर्म स्थान पर प्रहार करके उसे मारा ॥ ६ ॥
६९९. अस्येदु मातुः सवनेषु सद्यो महः पितुं परिवाज्वार्वन्ना
मुषायद्विष्णुः पचतं सहीयान्ध्यद्वराहं तिरो अद्रिमस्ता ॥ ७ ॥
वृष्टि के द्वारा माता की भाँति जगत् का श्रेष्ठ निर्माण करने वाले, महान् इन्द्रदेव ने यज्ञों में हवि का सेवन किया और सोम का शीघ्र पान किया । उन सर्व व्यापक इन्द्रदेव ने शत्रुओं के धन को जीता और वज्र का प्रहार करके मेघों का भेदन किया ॥ ७ ॥
७००. अस्मा इदु ग्नाश्चिद्देवपत्नीरिन्द्रायार्कमहिहत्य ऊवुः ।
परि द्यावापृथिवी जभ्र उर्वी नास्य ते महिमानं परि ष्टः ॥ ८ ॥
‘अहि’ (गति हीनों) का हनन करने पर देव-पलियों ने इन्द्रदेव की स्तुति की । इन्द्रदेव ने फिर पृथ्वीलोक और द्युलोक को वश में किया । दोनों लोकों में उनकी सामर्थ्य के सामने कोई ठहर नहीं सकता ॥ ८ ॥
७०१. अस्येदेव प्र रिरिचे महित्वं दिवस्पृथिव्याः पर्यन्तरिक्षात् ।
स्वराळिन्द्रो दम आ विश्वगूर्तः स्वरिरमत्रो ववक्षे रणाय ॥ ९ ॥
इन्द्रदेव की महत्ता आकाश, पृथ्वी और अन्तरिक्ष से भी विस्तृत है । स्वयं प्रकाशित, सर्वप्रिय, उत्तम योद्धा, असीमित बल वाले इन्द्रदेव युद्ध के लिए अपने वीरों को प्रेरित करते हैं ॥ ९ ॥
७०२. अस्येदेव शवसा शुषन्तं वि वृश्चद्वज्रेण वृत्रमिन्द्रः ।
गा न व्राणा अवनीरमुञ्चदभि श्रवो दावने सचेताः ॥ १० ॥
इन्द्रदेव ने अपने बल से शोषक वृत्र को वज्र से काट दिया और अपहृत गायों के समान रोके हुए जलों को मुक्त किया । हविदाताओं को अन्नों से पूर्ण किया ॥ १० ॥
७०३. अस्येदु त्वेषसा रन्त सिन्धवः परि यद्वज्रेण सीमयच्छत् ।
ईशानकृद्दाशुषे दशस्यन्तुर्वीतये गाधं तुर्वणिः कः ॥ ११ ॥
इन्द्रदेव के बल से ही नदियाँ प्रवाहित हुई; क्योंकि इन्होंने ही वज्र से (पर्वतों-भूखण्डों को काटकर, प्रवाह-पथ बनाकर) इन्हें मर्यादित कर दिया है । शत्रुओं को मारकर सभी पर शासन करने वाले इन्द्रदेव हविदाता को धन देते हुए ‘तुर्वणि’ अर्थात् शत्रुओ से मोर्चा लेने वाले की सहायता करते हैं ॥ ११ ॥
७०४. अस्मा इदु प्र भरा तूतुजानो वृत्राय वज्रमीशानः कियेधाः ।
गोर्न पर्व वि रदा तिरश्चेष्यन्नर्णांस्यपां चरध्यै ॥ १२ ॥
हे इन्द्रदेव ! अति वेगवान्, सबके स्वामी, महाबली आप इस वृत्र पर वज्र का प्रहार करें और इसके जोड़ों को तिरछे (वज्र के) प्रहार से भूमि के समान (समतल) काट दें । इस प्रकार जलों को मुक्त करके प्रवाहित करें ॥ १२ ॥
[ जल के प्रवाह में बाधक पर्वत आदि के जोड़ों को काटकर जल प्रवाह के लिए समतल मार्ग बनाने का भाव है। ]
७०५. अस्येदु प्र ब्रूहि पूर्व्याणि तुरस्य कर्माणि नव्य उक्थैः ।
युधे यदिष्णान आयुधान्यृघायमाणो निरिणाति शत्रून् ॥ १३ ॥
हे मनुष्य ! इन्द्रदेव के पुरातन कर्मों की आप प्रशंसा करें । युद्ध में वे शीघ्रता से शस्त्रों का प्रहार करके समाज को हानि पहुंचाने वाले शत्रुओं को विनष्ट करते हैं ॥ १३ ॥
७०६. अस्येदु भिया गिरयश्च दृळ्हा द्यावा च भूमा जनुषस्तुजेते ।
उपो वेनस्य जोगुवान ओणिं सद्यो भुवद्वीर्याय नोधाः ॥ १४ ॥
इन इन्द्रदेव के भय से दृढ़ पर्वत, आकाश, पृथ्वी और सभी प्राणी काँपते हैं । नोधा ऋषि इन्द्रदेव के श्रेष्ठ रक्षण सामर्थ्यों का वर्णन करते हुए उनके अनुग्रह से बलशाली हुए थे ॥ १४ ॥
७०७. अस्मा इदु त्यदनु दाय्येषामेको यद्वव्ने भूरेरीशानः ।
प्रैतशं सूर्ये पस्पृधानं सौवश्व्ये सुष्विमावदिन्द्रः ॥ १५ ॥
बहुत से धनों के एकमात्र स्वामी इन्द्रदेव जो इच्छा करते हैं, वही स्तोताओं के द्वारा अर्पित किया जाता है । इन्द्रदेव ने स्वश्य के पुत्र ‘सूर्य’ के साथ स्पर्धा करने वाले तथा सोमयाग करने वाले ‘एतश’ ऋषि को सुरक्षा प्रदान की ॥ १५ ॥
७०८. एवा ते हारियोजना सुवृक्तीन्द्र ब्रह्माणि गोतमासो अक्रन् ।
ऐषु विश्वपेशसं धियं धाः प्रातर्मक्षू धियावसुर्जगम्यात् ॥ १६ ॥
हरे रंग के अश्वों से योजित रथ वाले हे इन्द्रदेव ! गौतम वंशजों ने आपके निमित्त आकर्षक मंत्रयुक्त स्तोत्रों का गान किया है । इनका आप ध्यानपूर्वक श्रवण करें । विचारपूर्वक अपार धन वैभव प्रदान करने वाले इन्द्रदेव हमे प्रातः (यज्ञ में) शीघ्र प्राप्त हों ॥ १६ ॥
[ सूक्त – ६२ ]
[ ऋषि – नोधा गौतम । देवता – इन्द्र। छन्द – त्रिष्टुप् । ]
७०९. प्र मन्महे शवसानाय शूषमाङ्गूषं गिर्वणसे अङ्गिरस्वत् ।
सुवृक्तिभिः स्तुवत् ऋग्मियायार्चामार्कं नरे विश्रुतायं ॥ १ ॥
हम इन्द्रदेव के शक्ति संवर्धक स्तवन से परिचित हैं । शक्ति की आकांक्षा युक्त, श्रेष्ठ वाणियां से सम्पत्र, ज्ञानवान्, शक्ति – पराक्रम से विख्यात इन्द्रदेव को अंगिरा के सदृश स्तुति मंत्रों से अर्चना करते हैं ॥ १ ॥
७१०. प्र वो महे महि नमो भरध्वमाङ्गूष्यं शवसानाय साम ।
येना नः पूर्वे पितरः पदज्ञा अर्चन्तो अङ्गिरसो गा अविन्दन् ॥ २ ॥
हे ऋत्विजो ! आप महान् पराक्रमी इन्द्रदेव की प्रसत्रता के लिए स्तुति एवं सामगान करते हुए उनको नमन करें । हमारे पूर्वज ऋषियो – अंगिरा आदि ने इसी प्रकार अर्चना द्वारा तेजस्विता को प्राप्त किया था ॥ २ ॥
७११. इन्द्रस्याङ्गिरसां चेष्टौ विदत्सरमा तनयाय धासिम् ।
बृहस्पतिर्भिनदद्रिं विदद्नाः समुस्त्रियाभिर्वावशन्त नरः ॥ ३ ॥
इन्द्रदेव और अंगिराओ की इच्छा से ‘सरमा’ ने अपने पुत्र के निमित्त अन्नों को प्राप्त किया । महान् देवो के स्वामी इन्द्रदेव ने असुरों को मारा और जलधाराओं को मुक्त किया । जल प्रवाहों को पाकर सभी मनुष्य हर्षित हुए ॥ ३ ॥
७१२. स सुष्टुभा स स्तुभा सप्त विप्रैः स्वरेणाद्रिं स्वर्यो३नवग्वैः ।
सरण्युभिः फलिगमिन्द्र शक्र वलं रवेण दरयो दशग्वैः ॥ ४ ॥
हे शक्तिशाली इन्द्रदेव ! स्वर युक्त उत्तम स्तोत्रों से प्रशंसित, आपने तीव्र उत्कण्ठा से की गई सप्तऋषियों की नवीन स्तुतियो को सुना । आपने ही बलशाली मेघों को मारा, जिससे दशो दिशाओं में घोर गर्जना हुई ॥ ४ ॥
७१३. गृणानो अङ्गिरोभिर्दस्म वि वरुषसा सूर्येण गोभिरन्धः ।
वि भूम्या अप्रथय इन्द्र सानु दिवो रज उपरमस्तभायः ॥ ५ ॥
हे इन्द्रदेव! आपने अंगिरा ऋषियों द्वारा वर्णित स्तुतियों को प्राप्त किया । आपने दर्शनीय देवी उषा और सूर्यदेव की दीप्तिमान् रश्मियों द्वारा तमिस्रा को दूर किया । भूमि प्रदेश को विस्तृत किया । द्युलोक और अन्तरिक्ष को स्थिर किया ॥ ५ ॥
७१४. तदु प्रयक्षतममस्य कर्म दस्मस्य चारुतममस्ति दंसः ।
उपह्वरे यदुपरा अपिन्वन्मध्वर्णसो नद्य१श्चतस्त्रः ॥ ६ ॥
इन्द्रदेव के अति प्रशंसनीय, सुन्दरतम और दर्शनीय कर्मों में एक यह है कि उन्होंने भूमि के ऊपरी प्रदेश में प्रवाहित चार नदियों को मधुर जल से पूर्ण किया ॥ ६ ॥
[ यहाँ भूमि के ऊपरी भाग से हिमालय क्षेत्र का बोध होता है । उससे प्रवाहित चार मुख्य नदियाँ सिन्धु, यमुना, गंगा एवं ब्रह्मपुत्र के प्रवाहों में बाधकों (अवरोधों) को वज्र से काटकर इन्द्रदेव ने उन्हें मयुर जल से भर दिया ऐसा भाव परिलक्षित होता है । ]
७१५. द्वितावि वव्रे सनजा सनीळे अयास्यः स्तवमानेभिरर्कैः ।
भगो न मेने परमे व्योमत्रधारयद्रोदसी सुदंसाः ॥ ७ ॥
‘अयास्य’ ऋषि के प्रशंसनीय स्तोत्रों से पूजित इन्द्रदेव ने समान रूप से मिले हुए द्युलोक को दो रूपों, पृथ्वी और आकाश में विभक्त किया । शतकर्मा इन्द्रदेव ने उत्तमरूप से व्याप्त आकाश द्वारा सूर्यदेव को धारण करने के सदृश पृथ्वी और आकाश को धारण किया ॥ ७ ॥
७१६. सनाद्दिवं परि भूमा विरूपे पुनर्भुवा युवती स्वेभिरेवैः ।
कृष्णेभिरक्तोषा रुशद्भिर्वपुर्भिरा चरतो अन्यान्या ॥ ८ ॥
विविध रूप वाली दो युवतियों उषा और रात्रि अपनी गतियों से आकाश में भूमि के चारों ओर सनातन काल से चलती आती हैं । ये कृष्ण वर्ण रात्रि और दीप्तिमती उषा पृथक् पृथक् होकर चलती है, अर्थात् दोनों कभी एक साथ नहीं दिखाई देती हैं ॥ ८ ॥
७१७. सनेमि सख्यं स्वपस्यमानः सूनुर्दाधार शवसा सुदंसाः ।
आमासु चिद्दधिषे पक्वमन्तः पयः कृष्णासु रुशद्रोहिणीषु ॥ ९ ॥
उत्तम वृष्टिकारक बल के पुत्र, उत्तमकर्मा, स्तोताओं से सर्वदा मित्रता करने वाले हे इन्द्रदेव ! आप अपरिपक्व गौओं में भी पौष्टिक दूध को स्थापित करते हैं । कृष्ण वर्णा, रोहित वर्ण गौओं में भी श्वेत दूध को स्थापित करते हैं॥ ९ ॥
७१८. सनात्सनीळा अवनीरवाता व्रता रक्षन्ते अमृताः सहोभिः ।
पुरू सहस्त्रा जनयो न पत्नीर्दुवस्यन्ति स्वसारो अह्रयाणम् ॥ १० ॥
सदैव साथ रहने वाली अंगुलियां अपने बल से अनेकों (सहस्रो) स्थिर और अविनाशी कर्मों को करती है । जैसे लोग पत्नी की इच्छा पूर्ण करते हैं. वैसी ही स्वयं संचालित अँगुलियां अवाधगति वाले इन्द्रदेव की इच्छा पूर्ति करती है ॥ १० ॥
७१९. सनायुवो नमसा नव्यो अर्कैर्वसूयवो मतयो दस्म दद्रुः ।
पतिं न पत्नीरुशतीरुशन्तं स्पृशन्ति त्वा शवसावन्मनीषाः ॥ ११ ॥
हे दर्शनीय इन्द्रदेव ! यज्ञ और वैभव की इच्छा से ज्ञानी जन स्तोत्रों द्वारा आपका पूजन और नमन करते हैं । हे बलवान् इन्द्रदेव ! जैसे पतिव्रता स्त्रियाँ अपने पति को प्रसत्र रखती हैं, वैसे ही की गई स्तुतियाँ आपको प्रसत्रता प्रदान करती हैं ॥ ११ ॥
७२०. सनादेव तव रायो गभस्तौ न क्षीयन्ते नोप दस्यन्ति दस्म ।
द्युमाँ असि क्रतुमाँ इन्द्र धीरः शिक्षा शचीवस्तव नः शचीभिः ॥ १२ ॥
हे दर्शनीय इन्द्रदेव ! सनातन काल से आप अपने हाथो में कभी नष्ट न होने वाले अक्षय ऐश्वर्य को धारण करते हैं । हे इन्द्रदेव ! आप दीप्तिमान, कर्मवान, धैर्यवान् और सामर्थ्यवान् हैं । अपनी सामर्थों से हमे धन प्राप्त करने की प्रेरणा प्रदान करें ॥ १२ ॥
७२१. सनायते गोतम इन्द्र नव्यमतक्षद्ब्रह्म हरियोजनाय ।
सुनीथाय नः शवसान नोधाः प्रातर्मक्षू धियावसुर्जगम्यात् ॥ १३ ॥
हे इन्द्रदेव ! आप सनातन काल से ही स्थित हैं, उत्तम मार्गों से गमन करने वाले तथा अश्वों को नियोजित करने वाले हैं । आपकी स्तुति के लिये गौतम ऋषि के पुत्र नोधा ऋषि ने नवीन स्तोत्रों की रचना की है । बलवान्, धन की प्रेरणा देने वाले हे इन्द्रदेव ! आप प्रातः काल हमारे पास शीघ्र ही आयें ॥ १३ ॥
[ सूक्त – ६३ ]
[ ऋषि – नोधा गौतम । देवता – इन्द्र । छन्द – त्रिष्टुप् । ]
७२२. त्वं महाँ इन्द्र यो ह शुष्मैर्द्यावा जज्ञानः पृथिवी अमे धाः । यद्ध ते विश्वा गिरयश्चिदभ्वा भिया दळ्हासः किरणा नैजन् ॥ १ ॥
हे इन्द्रदेव ! आप महान् हैं । आपने उत्पन्न होते ही इस द्यावा-पृथिवी को अपने बल से धारण किया । आपके भय से सुदृढ़ पर्वतों के समूह भी किरणों के सदृश काँपते हैं ॥ १ ॥
७२३. आ यद्धरी इन्द्र विव्रता वेरा ते वज्रं जरिता बाह्वोर्धात् । येनाविहर्यतक्रतो अमित्रान्पुर इष्णासि पुरुहूत पूर्वीः ॥ २ ॥
निष्काम भाव से श्रेष्ठ कर्म करने वाले तथा बहुतों के द्वारा स्तुत्य हे इन्द्रदेव ! आप जब अपने रथ से विविध कर्म वाले अश्वों द्वारा आते हैं, तब स्तोता आपके हाथों में वज्र को स्थापित करते हैं । आप उसी वज्र से शत्रुओं के असंख्य नगरों को ध्वस्त करते हैं ॥ २ ॥
७२४. त्वं सत्य इन्द्र धृष्णुरेतान्त्वमृभुक्षा नर्यस्त्वं घाट् । त्वं शुष्णं वृजने पृक्ष आणौ यूने कुत्साय द्युमते सचाहन् ॥ ३ ॥
हे सत्यवान् इन्द्रदेव ! आप ऋभुओं और मनुष्यों के कुशल नायक हैं । शत्रुओं को वश में करने वाले, विजेतारूप हैं । आपने महान् संग्राम में तेजस्वी, युवा कुत्स के सहायक होकर ‘शुष्ण’ को मारा ॥ ३ ॥
७२५. त्वं ह त्यदिन्द्र चोदीः सखा वृत्रं यद्वज्रिन्वृक्षकर्मन्नुभ्नाः । यद्ध शूर वृषमणः पराचैर्वि दस्यूँर्योनावकृतो वृथाषाट् ॥ ४ ॥
हे इन्द्रदेव ! आपने कुत्स की सहायता कर, प्रसिद्ध विजयरूपी धन प्राप्त किया । जल वर्षण करने वाले, शत्रु विनाशक वज्रधारी हे इन्द्रदेव ! आपने संग्राम में जब कुत्स के विरोधी वृत्र तथा अन्य शत्रुओं को मार भगाया, तब कुत्स को सम्पूर्ण यश प्राप्त हुआ ॥ ४ ॥
७२६. त्वं ह त्यदिन्द्रारिषण्यन्दृळ्हस्य चिन्मर्तानामजुष्टौ । व्य१ स्मदा काष्ठा अर्वते वर्धनेव वज्रिञ्छ्नथिह्यमित्रान् ॥ ५ ॥
हे वज्रधारी इन्द्रदेव ! मनुष्यों पर क्रोध करने वाले सुदृढ़ शत्रु भी आप पर प्रहार नहीं कर पाते । हे इन्द्रदेव ! जैसे हथौड़े से लोहे को पीटते हैं, वैसे ही आप हमारे शत्रुओं पर आघात कर उन्हें मारें । हमारे अश्वों के मार्ग को मुक्त करें अर्थात् हमारी प्रर्गात का मार्ग बाधाओं से रहित हो ॥ ५ ॥
७२७. त्वां ह त्यदिन्द्रार्णसातौ स्वर्मीळ्हे नर आजा हवन्ते । तव स्वधाव इयमा समर्य ऊतिर्वाजेष्वतसाय्या भूत् ॥ ६ ॥
हे इन्द्रदेव ! धन प्राप्ति और सुख-प्राप्ति के निमित्त किये जाने वाले युद्ध में मनुष्य अपनी सहायता के लिए आपका आवाहन करते हैं । हे बलों के धारक इन्द्रदेव ! संग्राम में योद्धाओं को आपकी सामर्थ्य प्राप्त होती है ॥ ६ ॥
७२८. त्वं ह त्यदिन्द्र सप्त युध्यन्पुरो वज्रिन्युरुकुत्साय दर्दः । बर्हिर्न यत्सुदासे वृथा वर्गहो राजन्वरिवः पूरवे कः ॥ ७ ॥
हे वज्रधारी इन्द्रदेव ! आपने ‘पुरुकुत्स’ के लिए युद्ध करते हुये शत्रु के सात नगरों को तोड़ा और सुदास के लिए शत्रुओं को कुश के समान अनायास काट दिया । आपने ही पुरु के लिए धन प्रदान किया ॥ ७ ॥
७२९. त्वं त्यां न इन्द्र देव चित्रामिषमापो न पीपयः परिज्मन् । यया शूर प्रत्यस्मभ्यं यंसि त्मनमूर्ज न विश्वध क्षरध्यै ॥ ८ ॥
हे महान् बलशाली इन्द्रदेव ! जल को बढ़ाने के सदृश हमारी भूमि में चारों ओर अन्नों की वृद्धि करें । जलों को सर्वत्र बहाने के समान हमें अन्नों को प्रदान करें ॥ ८ ॥
७३०. अकारि त इन्द्र गोतमेभिर्ब्रह्माण्योक्ता नमसा हरिभ्याम् । सुपेशसं वाजमा भरा नः प्रातर्मक्षु धियावसुर्जगम्यात् ॥ ९ ॥
हे इन्द्रदेव ! गौतम वंशजों ने अश्वों से सम्पन्न आपके निमित्त स्तुति मंत्रों की रचना की । इन श्रेष्ठ स्तोत्रों को गाकर आपका सत्कार किया । हे इन्द्रदेव ! आप हमे श्रेष्ठ बल दें और धनों को प्राप्त करने की बुद्धि दें । प्रातः (यज्ञ की वेला में) हमें आप शीघ्र प्राप्त हों ॥ ९ ॥
[सूक्त – ६४]
[ ऋषि – नोधा गौतम । देवता – मरुद्गण । छन्द – जगती, १५ त्रिष्टुप् । ]
७३१. वृष्णे शर्धाय सुमखाय वेधसे नोधः सुवृक्तिं प्र भरा मरुद्भयः । अपो न धीरो मनसा सुहस्त्यो गिरः समजे विदथेष्वाभुवः ॥ १ ॥
हे नोधा (शोधकर्ता) ऋषे ! बल पाने के लिए, बल वृद्धि के लिए, उत्तम यज्ञ सम्पादन के निमित्त और मेधा प्राप्ति के निमित्त मरुद्गणों की श्रेष्ठ काव्यों से स्तुतियाँ करें । यज्ञों में हम होता हाथ जोड़कर हृदय से उनकी अभ्यर्थना करते हैं और जल सिंचन के सदृश उत्तम वाणियों से मंत्रों का गायन करते हैं ॥ १ ॥
७३२. ते जज्ञिरे दिव ऋष्वास उक्षणो रुद्रस्य मर्या असुरा अरेपसः । पावकासः शुचयः सूर्या इव सत्वानो न द्रप्सिनो घोरवर्पसः ॥ २ ॥
ये महान् सामर्थ्यवान् प्राणों की रक्षा करने वाले, जीवन में पवित्रता का संचार करने वाले, सूर्य सदृश तेजस्वी, सोम पीने वाले, विकराल शरीरधारी मरुद्गण, रुद्रदेव के मरणधर्मा गणों के ममान मानो दिव्य लोक से ही प्रकट हुए हैं ॥ २ ॥
७३३. युवानो रुद्रा अजरा अभोग्घनो ववक्षुरधिगावः पर्वता इव । दृळ्हा चिद्विश्वा भुवनानि पार्थिवा प्र च्यावयन्ति दिव्यानि मज्मना ॥ ३ ॥
युवा शत्रुओं के लिए रुद्ररूप, अजर, कृपणहन्ता, अवाधगति से चलने वाले मरुद्गण पर्वत के सदृश अभेद्य हैं । पृथ्वी और द्युलोक के सभी प्राणियों को अपने बल से ये विचलित कर देते हैं ॥ ३ ॥
७३४. चित्रैरञ्जिभिर्वपुषे व्यपञ्जते वक्षःसु रुक्मों अधि येतिरे शुभे । अंसेष्वेषां नि मिमृक्षुर्ऋष्टयः साकं जज्ञिरे स्वधया दिवो नरः ॥ ४ ॥
शरीर की शोभा बढ़ाने के उद्देश्य से विविध अलंकारों से सुसज्जित ये मरुद्गण विशेष रूप से आकर्षक हैं । वक्ष पर शोभा के निमित्त ये स्वर्णाभूषण धारण किये हैं । इन मरुतों के कन्धों पर रखे अस्त्रों की दीप्ति सर्वत्र प्रकाशित होती है । ये वीर पुरुष आकाश में अपने बल से उत्पन्न हुए हैं ॥ ४ ॥
७३५, ईशानकृतो धुनयो रिशादसो वातान्विद्युतस्तविषीभिरक्रत । दुहन्त्यूधर्दिव्यानि धूतयो भूमिं पिन्वन्ति पयसा परिज्रयः ॥ ५ ॥
ऐश्वर्य देने वाले स्वामी, शत्रु को कम्पित करने वाले, हिंसकों का नाश करने वाले ये मरुद्गण अपनी सामर्थ्य द्वारा वायु और विद्युत् को उत्पन्न करते हैं । सर्वत्र गमन कर शत्रुओं पर आघात करने वाले ये वीर आकाशीय मेघों को दुहकर भूमि को वर्षा के जलों से तृप्त करते हैं ॥ ५ ॥
[ मरुद्गण वायु और विद्युत् को उत्पन्न करते हैं, इससे स्पष्ट होता है कि मरुत् एक संकल्प युक्त सूक्ष्म प्रवाह है । विज्ञान के सूक्ष्मकणों (सब एटामिक पार्टिकल्स) के प्रवाह की अवधारणा वेद की इस उक्ति को कुछ स्पष्ट कर सकती है । ]
७३६. पिन्वन्त्यपो मरुतः सुदानवः पयो घृतवद्विद थेष्वा भुवः । अत्यं न मिहे वि नयन्ति वाजिनमुत्सं दुहन्ति स्तनयन्तमक्षितम् ॥ ६ ॥
उत्तम दानी, सामर्थ्यवान् मरुद्गण यज्ञों में घृत-दुग्ध आदि रसों और जलों का सिंचन करते हैं । अश्वों को घुमाने के समान वे बलशाली मेघों का सम्यक् रूप से दोहन करते हैं ॥ ६ ॥
७३७. महिषासो मायिनश्चित्रभानवो गिरयो न स्वतवसो रघुष्यदः । मृगा इव हस्तिनः खादथा वना यदारुणीषु तविषीरयुग्ध्वम् ॥ ७ ॥
हे मरुद्गण ! आप महिमावान्, विभित्र दीप्तियाँ छोड़ने वाले प्रपंची पर्वतों के समान अभेद्य बल से वेगपूर्वक गमन करने वाले हैं । आप हाथियों और मृगों के समान वनों को खा जाने वाले हैं, क्योंकि अपने बल से लाल वर्ण वाली घोड़ियों (अग्नि ज्वालाओं) को रथ में (यज्ञ में) नियोजित (प्रकट) करते हैं ॥ ७ ॥
७३८. सिंहा इव नानदति प्रचेतसः पिशाइव सुपिशो विश्ववेदसः । क्षपो जिन्वन्तः पृषतीभिर्ऋष्टिभिः समित्सबाधः शवसाहिमन्यवः ॥ ८ ॥
ये वीर मरुद्गण, सिंहों के समान गर्जनशील, प्रकृष्ट ज्ञानी, उत्तम बलवान् पुरुषों के समान सम्पूर्ण ऐश्वर्यो से सम्पन्न हैं । ये वीर शत्रु को क्षत-विक्षत करने वाले, पीड़ित जनों की रक्षा कर उन्हें सन्तुष्ट करने वाले धब्बेदार घोड़ियों और हथियारों से सुसज्जित होकर चलने वाले, अक्षय बल और उग्ररूप धारण करने वाले हैं ॥ ८ ॥
७३९. रोदसी आ वदता गणश्रियो नृषाचः शूराः शवसाहिमन्यवः । आ वन्धुरेष्वमतिर्न दर्शता विद्युन्न तस्थौ मरुतो रथेषु वः ॥ ९ ॥
सबकी रक्षा करने वाले, वीर, पराक्रमी, अक्षय उत्साह से सम्पन्न हे शोभायमान मरुद्गणो ! आप आकाश और पृथ्वी को अपनी गर्जना की गूँज से भर दें । रथ में विराजित होने से आपका तेजस्वी प्रकाश विद्युत्वत् सर्वत्र फैल गया है ॥ ९ ॥
७४०. विश्ववेदसो रयिभिः समोकसः संमिश्लासस्तविषीभिर्विरप्शिनः । अस्तार इषुं दधिरे गभस्त्योरनंतशुष्मा वृषखादयो नरः ॥ १० ॥
अनेक धनों से युक्त, सम्पूर्ण धनों के स्वामी, समान स्थान से उद्भूत, विविध बलों से युक्त, विशिष्ट सामर्थ्य वाले, अस्त्र-प्रहारक, अनन्त सामर्थ्यवान् तथा पुष्ट अन्नों के भक्षक वीर मरुद्गण अपने बाहुओं में विशिष्ट बल धारण करते हैं ॥ १० ॥
७४१. हिरण्ययेभिः पविभिः पयोवृद्ध उज्जिघ्नन्त आपथ्यो३ न पर्वतान् । मखा अयासः स्वसृतो ध्रुवच्युतो दुध्रकृतो मरुतो भ्राजदृष्टयः ॥ ११ ॥
जलों को बढ़ाने वाले पूजनीय, द्रुतगति वाले, स्पन्दनयुक्त, अडिग, पदार्थों को हिलाने वाले, अवाधगति वाले, तीक्ष्ण अस्त्र धारक वीर मरुद्गण, स्वर्णिम रथ के चक्रों से (वात्याचक्र से) मार्ग में आये हुए मेघों को उड़ा देते हैं ॥ ११ ॥
७४२. घृषु पावकं वनिनं विचर्षणिं रुद्रस्य सू नुं हवसा गृणीमसि । रजस्तुरं तवसं मारुतं गणमृजीषिणं वृषणं सश्चत श्रिये ॥ १२ ॥
सघर्ष शक्ति वाले, पवित्रकर्ता, वनों में संचरित होने वाले, विशेष चक्षुवाले, रुद्र के पुत्र रूप मरुद्गणों की हम स्तुति करते हैं । हम सब अति वेगवान् धूल उड़ाने वाले, बलवान्, वीर्यवान् तथा तीक्ष्ण बुद्धि वाले मरुद्गणों के आश्रय को प्राप्त करें ॥ १२ ॥
७४३. प्र नू स मर्तः शवसा जनाँ अति तस्थौ व ऊती मरुतो यमावत । अर्वद्भिर्वाजं भरते धना नृभिरापृच्छ्यं क्रतुमा क्षेति पुष्यति ॥ १३ ॥
हे मरुद्गणो ! आपकी रक्षण सामर्थ्य द्वारा रक्षित मनुष्य सब लोगों से अधिक बल पाकर स्थिर होता है । वह अश्वों द्वारा अन्न और मनुष्यों द्वारा धनों को प्राप्त कर उत्तम यज्ञ द्वारा प्रशसित होता है ॥ १३ ॥
७४४. चर्कृत्यं मरुतः पृत्सु दुष्टरं द्युमन्तं शुष्मं मघवत्सु धत्तन । धनस्पृतमुक्थ्यं विश्वचर्षणिं तोकं पष्येम तनयं शतं हिमाः ॥ १४ ॥
हे मरुद्गणो ! हम कार्यों में समर्थ, युद्धों में अजेय, दीप्तिमान्, बलों से युक्त तथा वैभवशाली हों । हम श्रेष्ठ धन – वैभव से सम्पन्न सर्व-हितकारी होकर सौ वर्षों तक जीवित रहें तथा पुत्र और पौत्रों के साथ सुख प्राप्त करें ॥ १४ ॥
७४५. नू ष्ठिरं मरुतो वीरवन्तमृतीषाहं रयिमस्मासु धत्त । सहस्रिणं शतिनं शूशुवांसं प्रातर्मक्षू धियावसुर्जगम्यात् ॥ १५ ॥
हे मरुद्गणो ! आप हमें शत्रुओं को जीतने वाली वीरोचित स्थाई सामर्थ्य प्रदान करें । हममें असंख्यों धनों को स्थापित करें । प्रातः काल (यज्ञ में) आप हमें शीघ प्राप्त हों ॥ १५ ॥
[ सूक्त – ६५ ]
[ ऋषि – पराशर शाक्त्य । देवता – अग्नि । छन्द – द्विपदा विराट् । ]
७४६-४७. पश्वा न तायुं गुहा चतन्तं नमो युजानं नमो वहन्तम् । सजोषा धीराः पदैरनु ग्मन्नुप त्वा सीदन्विश्वे यजत्राः ॥ १-२ ॥
हे अग्निदेव ! पशु चुराने वाले के पद चिह्नों के साथ जाने वाले मनुष्य के समान सभी बुद्धिमान् देवगण आपके अनुगामी हों । सभी याजकगण आपके चारों ओर बैठकर कुण्डरूप गुहा में स्तुतियों के साथ आपको प्रकट करते हैं । आप उनकी हवियों को देवों तक पहुँचाने वाले तथा देवों को उनसे नियोजित करने वाले के रूप मे सम्मानित किये जाते हैं ॥ १-२ ॥
७४८-४९. ऋतस्य देवा अनु व्रता गुर्भुवत्परिष्टिर्द्यौर्न भूम । वर्धन्तीमापः पन्वा सुशिश्विमृतस्य योना गर्भे सुजातम् ॥ ३-४ ॥
देवगणों ने अग्निदेव को भूमि में चारों ओर खोजा । अग्निदेव जल प्रवाहों के गर्भ से उत्पत्र हुए, उत्तम स्तोत्रों से उनकी सम्यक् प्रकार से वृद्धि हुई । देवों ने अग्निदेव के कर्मों का, उनकी प्रेरणाओं का अनुगमन किया और भूमि को स्वर्ग के समान सुखकारी बनाया ॥ ३-४ ॥
[ यह तथ्य सर्वमान्य है कि मनुष्य जब से अग्नि (ऊर्जा) को प्रकट कर उसका उपयोग सीखा, तभी से अनेक सुख-सुविधाओं का विकास क्रान्तिकारी ढंग से हुआ । ]
७५०-५१. पुष्टिर्न रण्वा क्षितिर्न पृथ्वी गिरिर्न भुज्म क्षोदो न शंभु । अत्यो नाज्मन्त्सर्गप्रतक्तः सिन्धुर्न क्षोदः क ईं वराते ॥ ५-६ ॥
ये अग्निदेव इष्ट फल प्राप्ति के समान रमणीय, भूमि के समान विस्तीर्ण, पर्वत के समान पोषक तत्त्व प्रदाता, जल के समान कल्याणकारी, अश्व के समान अग्रणी वाहक तथा समुद्र के समान विशाल हैं, इन्हें भला कौन रोक सकता है ? ॥ ५-६ ॥
७५२-५३. जामिः सिन्धूनां भ्रातेव स्वस्रामिभ्यान्न राजा वनान्यत्ति । यद्वातजूतो वना व्यस्थादग्निर्ह दाति रोमा पृथिव्याः ॥ ७-८ ॥
ये अग्निदेव बहिनों के लिए भाई के समान जलों के भ्राता रूप हैं । शत्रुओं का विनाश करने वाले राजा के समान ये वनों को नष्ट भी कर देते हैं । जब ये वायु से प्रेरित होकर वनों की ओर अभिमुख होते हैं, तो भूमि के बालों के सदृश वृक्ष वनस्पतियों का नाश कर देते हैं ॥ ७-८ ॥
७५४-५५. श्वसित्यप्सु हंसो न सीदन् क्रत्वा चेतिष्ठो विशामुषर्भुत् । सोमो न वेधा ऋतप्रजातः पशुर्न शिश्वा विभुर्दूरेभाः ॥ ९-१० ॥
ये अग्निदेव जल में बैठकर हंस के समान प्राण को धारण करते हैं । ये उषाकाल में उठकर अपने कर्मों से प्रजाओं को चैतन्य करते हैं । ये सोम की भाँति वृद्धि करने वाले, शिशु के समान चंचल तथा यज्ञ से उत्पत्र होकर दूर तक प्रकाश फैलाने वाले हैं ॥ ९-१० ॥
[ जल में प्राणों को धारण करने की क्षमता है । जल के माध्यम से दिये गये शाप वरदान में जल ही साधक के प्राण को आरोपित करता है । शरीर के प्रवाहों रक्त – रसों (हारमोन्स) आदि के माध्यम से ही मनुष्य का प्राण सक्रिय होता है । यह क्षमता जल-प्रवाहों में स्थित सूक्ष्म अग्नि के कारण ही है । ]
क्रमशः…..
हरिः हरः!!
