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सम्पूर्ण वेदक अनुवाद – आरम्भ मे स्रोत अनुवादकक कृतिक प्रस्तुति

233 भ्यूज

ऋग्वेद – संहिता

॥ अथ प्रथमं मण्डलम् ॥

[ सूक्त – १ ]

ऋषि मधुच्छन्दा वैश्वामित्र । देवता – अग्नि । छन्द – गायत्री ।

१. ॐ अग्निमीळे पुरोहितं यज्ञस्य देवमृत्विजम् । होतारं रत्नथातमम् ॥ १ ॥

हम अग्निदेव की स्तुति करते हैं । (कैसे अग्निदेव ?) जो यज्ञ (श्रेष्ठतम पारमार्थिक कर्म) के पुरोहित (आगे बढ़ाने वाले), देवता (अनुदान देने वाले), ऋत्विज् (समयानुकूल यज्ञ का सम्पादन करने वाले), होता (देवों का आवाहन करने वाले) और याजकों को रत्नो से (यज्ञ के लाभों से) विभूषित करने वाले हैं ॥१ ॥

I Laud Agni, the chosen Priest, God, minister of sacrifice,
The hotar, lavishest of wealth.

२. अग्निः पूर्वेभिर्ऋषिभिरीड्यो नूतनैरुत । स देवाँ एह वक्षति ॥ २ ॥

जो अग्निदेव पूर्वकालीन ऋषियों (भृगु, अंगिरादि) द्वारा प्रशंसित हैं । जो आधुनिक काल में भी ऋषि कल्प वेदश विद्वानों द्वारा स्तुत्य हैं, वे अग्निदेव इस यज्ञ में देवों का आवाहन करें ॥ २ ॥

Worthy is Agni to be praised by living as by ancient seers.
He shall bring. hitherward the Gods.

३. अग्निना रयिमश्नवत् पोषमेव दिवेदिवे । यशसं वीरवत्तमम् ॥ ३ ॥

(स्तोता द्वारा स्तुति किये जाने पर) ये बढ़ाने वाले अग्निदेव मनुष्यों (यजमानों) को प्रतिदिन विवर्धमान (बढ़ने वाला) धन्, यश एवं पुत्र-पौत्रादि वीर पुरुष प्रदान करने वाले हैं ॥ ३ ॥

Through Agni man obtaineth wealth, yea, plenty waxing day by day,
Most rich in heroes, glorious.

४. अग्ने यं यज्ञमध्वरं विश्वतः परिभूरसि । स इद्देवेषु गच्छति ॥ ४ ॥

हे अग्निदेव । आप सबका रक्षण करने में समर्थ हैं । आप जिस अध्यर (हिंसारहित यज्ञ) को सभी ओर से आवृत किये रहते हैं, वही यज्ञ देवताओं तक पहुँचता है ॥ ४ ॥

Agni, the perfect sacrifice which thou encompassest about
Verily goeth to the Gods.

५. अग्निर्होता कविक्रतुः सत्यश्चित्रश्रवस्तमः । देवो देवेभिरा गमत् ॥ ५ ॥

हे अग्निदेव । आप हवि प्रदाता, ज्ञान और कर्म की संयुक्त शक्ति के प्रेरक, सत्यरूप एवं विलक्षण रूप युक्त हैं । आप देवों के साथ इस यज्ञ में पधारें ॥ ५ ॥

May Agni, sapient−minded Priest, truthful, most gloriously great,
The God, come hither with the Gods.

६. यदङ्ग दाशुषे त्वमग्ने भद्रं करिष्यसि । तवेत्तत् सत्यमङ्गिरः ॥ ६ ॥

हे अग्निदेव ! आप यज्ञ करने वाले यजमान का धन, आवास, संतान एवं पशुओं की समृद्धि करके जो भी कल्याण करते हैं, वह भविष्य में किये जाने वाले यज्ञों के माध्यम से आपको ही प्राप्त होता है ।

Whatever blessing, Agni, thou wilt grant unto thy worshipper,
That, Angiras, is indeed thy truth.

७. उप त्वाग्ने दिवेदिवे दोषावस्तर्थिया वयम् । नमो भरन्त एमसि ॥ ७ ॥

हे जाज्वल्यमान अग्निदेव ! हम आपके सच्चे उपासक हैं । श्रेष्ठ बुद्धि द्वारा आपकी स्तुति करते हैं और दिन-रात, आपका सतत गुणगान करते हैं । हे देव ! हमें आपका सान्निध्य प्राप्त हो ।॥ ७ ॥

To thee, dispeller of the night, O Agni, day by day with prayer
Bringing thee reverence, we come

८. राजन्तमध्वराणां गोपामृतस्य दीदिविम् । वर्धमानं स्वे दमे ॥ ८ ॥

हम गृहस्थ लोग दीप्तिमान्, यज्ञों के रक्षक, सत्यवचनरूप व्रत को आलोकित करने वाले, यज्ञस्थल में वृद्धि को प्राप्त करने वाले अग्निदेव के निकट स्तुतिपूर्वक आते हैं ॥८ ॥

Ruler of sacrifices, guard of Law eternal, radiant One,
Increasing in thine own abode.

९. स नः पितेव सूनवेऽग्ने सूपायनो भव । सचस्वा नः स्वस्तये ॥ ९ ॥

हे गार्हपत्य अग्ने ! जिस प्रकार पुत्र को पिता (बिना बाधा के) सहज ही प्राप्त होता है, उसी प्रकार आप भी (हम यजमानों के लिये) बाधारहित होकर सुखपूर्वक प्राप्त हों । आप हमारे कल्याण के लिये हमारे निकट रहें ॥ ९ ॥

Be to us easy of approach, even as a father to his son:
Agni, be with us for our weal.

क्रमशः…..

हरिः हरः!!

नोटः मैथिली मे सम्पूर्ण वेद केर अनुवाद लेल स्रोत सामग्रीक संकलन मे उपरोक्त दुइ (एक हिन्दी आ दोसर अंग्रेजी) अनुवाद केर अध्ययन आरम्भ कय रहल छी । अपन काज करय सँ पहिने दोसरक काज केँ नीक सँ पढ़नाय-गुननाय बहुत आवश्यक अछि । संस्कृतक पूरा ज्ञान रहितय त सीधा मैथिली मे जा सकैत छलहुँ, तैयो गुरुवर्गक कार्य केँ बिना पढ़ने-बुझने अपन जुइत नहि जोतबाक चाही, ताहि अनुशासन केँ अनुकरण करैत बढ़ि रहल छी ।

हरिः हरः!!

[ सूक्त – २ ]

[ऋषि – मधुच्छन्दा वैश्वामित्र । देवता – १-३ वायु, ४-६ – इन्द्र-वायुः ७-९ मित्रावरुण। छन्द-गायत्री ।]

१०. वायवा याहि दर्शतेमे सोमा अरंकृताः । तेषां पाहि श्रुधी हवम् ॥ १ ॥

हे प्रियदर्शी वायुदेव ! हमारी प्रार्थना को सुनकर आप यज्ञस्थल पर आयें । आपके निमित सोमरस प्रस्तुत है, इसका पान करें ॥१ ॥

BEAUTIFUL Vayu, come, for thee these Soma drops have been prepared:

Drink of them, hearken to our call.

११. वाय उक्थेभिर्जरन्ते त्वामच्छा जरितारः । सुतसोमा अहर्विदः ॥ २ ॥

हे वायुदेव ! सोमरस तैयार करके रखने वाले, उसके गुणों को जानने वाले स्तोतागण स्तोत्रों में आपकी उत्तम प्रकार से स्तुति करते हैं ॥ २ ॥

Knowing the days, with Soma juice poured forth, the singers glorify

Thee, Vayu, with their hymns of praise.

१२. वायो तव प्रपृञ्चती धेना जिगाति दाशुषे । उरूची सोमपीतये ॥ ३ ॥

हे वायुदेव ! आपकी प्रभावोत्पादक वाणी, सोमयाग करने वाले सभी यजमानों की प्रशंसा करती हुई एवं सोमरस का विशेष गुण-गान करती हुई, सोमरस पान करने की अभिलाषा से दाता (यजमान) के पास पहुँचती है ॥ ३ ॥

Vayu, thy penetrating stream goes forth unto the worshipper,

Far−spreading for the Soma draught.

१३. इन्द्रवायू इमे सुता उप प्रयोभिरा गतम् । इन्दवो वामुशन्ति हि ॥ ४ ॥

हे इन्द्रदेव ! हे वायुदेव ! यह सोमरस आपके लिये अभिषुत किया (निचोड़ा) गया है । आप अन्नादि पदार्थों के साथ यहाँ पधारें, क्योंकि यह सोमरस आप दोनों की कामना करता है ॥ ४ ॥

These, Indra−Vayu, have been shed; come for our offered dainties’ sake:

The drops are yearning for you both.

१४. वायविन्द्रश्च चेतथः सुतानां वाजिनीवसू । तावा यातमुप द्रवत् ॥ ५ ॥

हे वायुदेव ! हे इन्द्रदेव ! आप दोनों अन्नादि पदार्थों और धन से परिपूर्ण हैं एवं अभिषुत सोमरस की विशेषता को जानते हैं । अतः आप दोनों शीघ्र ही इस यज्ञ में पदार्पण करें ॥ ५ ॥

Well do ye mark libations, ye Vayu and Indra, rich in spoil

So come ye swiftly hitherward.

१५. वायविन्द्रश्च सुन्वत आ यातमुप निष्कृतम् । मक्ष्वि१ त्था धिया नरा ॥ ६ ॥

हे वायुदेव ! हे इन्द्रदेव ! आप दोनों बड़े सामर्थ्यशाली हैं । आप यजमान द्वारा बुद्धिपूर्वक निष्पादित सोम के पास अति शीघ्र पधारें ॥ ६ ॥

Vayu and Indra, come to what the Soma. presser hath prepared:

Soon, Heroes, thus I make my prayer.

१६. मित्रं हुवे पूतदक्षं वरुणं च रिशादसम् । धियं घृताचीं साधन्ता ॥ ७ ॥

घृत के समान प्राणप्रद वृष्टि-सम्पन्न कराने वाले मित्र और वरुण देवों का हम आवाहन करते हैं । मित्र हमें बलशाली बनायें तथा वरुणदेव हमारे हिंसक शत्रुओं का नाश करें ॥ ७ ॥

Mitra, of holy strength, I call, and foe−destroying Varuna,

Who make the oil−fed rite complete.

१७. ऋतेन मित्रावरुणावृतावृद्धावृतस्पृशा । क्रतुं बृहन्तमाशाथे ॥ ८ ॥

सत्य को फलितार्थ करने वाले सत्ययज्ञ के पुष्टिकारक देव मित्रावरुणो ! आप दोनों हमारे पुण्यदायी कार्यों (प्रवर्त्तमान सोमयाग) को सत्य से परिपूर्ण करें ॥ ८ ॥

Mitra and Varuna, through Law, lovers and cherishers of Law,

Have ye obtained your might power

१८. कवी नो मित्रावरुणा तुविजाता उरुक्षया । दक्षं दधाते अपसम् ॥ ९ ॥

अनेक कर्मों को सम्पन्न कराने वाले विवेकशील तथा अनेक स्थलों में निवास करने वाले मित्रावरुण हमारी क्षमताओं और कार्यों को पुष्ट बनाते हैं ॥ ९ ॥

Our Sages, Mitra−Varuna, wide dominion, strong by birth,

Vouchsafe us strength that worketh well.

[ सूक्त – ३]

[ऋषि – मधुच्छन्दा वैश्वामित्र । देवता – १-३ अश्विनीकुमार, ४-६ इन्द्र, ७-९ विश्वेदेवा, १०-१२ सरस्वती । छन्द-गायत्री ॥]

१९. अश्विना यज्वरीरिषो द्रवत्पाणी शुभस्पती । पुरुभुजा चनस्यतम् ॥ १ ॥

हे विशालबाहो ! शुभ कर्मपालक, द्रुतगति से कार्य सम्पन्न करने वाले अश्विनीकुमारो ! हमारे द्वारा समर्पित हविष्यान्नों से आप भली प्रकार सन्तुष्ट हों ॥ १ ॥

YE Asvins, rich in treasure, Lords of splendour, having nimble hands,
Accept the sacrificial food.

२०. अश्विना पुरुदंससा नरा शवीरया धिया । धिष्ण्या वनतं गिरः ॥ २ ॥

असंख्य कर्मों को सम्पादित करने वाले, धैर्य धारण करने वाले, बुद्धिमान् हे अश्विनीकुमारो ! आप अपनी उत्तम बुद्धि से हमारी वाणियों (प्रार्थनाओं) को स्वीकार करें ॥ २ ॥

Ye Asvins, rich in wondrous deeds, ye heroes worthy of our praise,
Accept our songs with mighty thought.

२१. दस्त्रा युवाकवः सुता नासत्या वृक्तबर्हिषः । आ यातं रुद्रवर्तनी ॥ ३ ॥

रोगों को विनष्ट करने वाले, सदा सत्य बोलने वाले रुद्रदेव के समान (शत्रु संहारक) प्रवृत्ति वाले, दर्शनीय हे अश्विनीकुमारो ! आप यहाँ आयें और बिछी हुई कुशाओ पर विराजमान होकर प्रस्तुत संस्कारित सोमरस का पान करे ॥ ३ ॥

Nisatyas, wonder−workers, yours arc these libations with clipt grass:
Come ye whose paths are red with flame.

२२. इन्द्रा याहि चित्रभानो सुता इमे त्वायवः। अण्वीभिस्तना पूतासः ॥ ४ ॥

हे अ‌द्भुत दीप्तिमान् इन्द्रदेव ! अँगुलियों द्वारा स्रवित, श्रेष्ठ पवित्रतायुक्त यह सोमरस आपके निमित्त है। आप आयें और सोमरस का पान करें ॥ ४ ॥

O Indra marvellously bright, come, these libations long for thee,
Thus by fine fingers purified.

२३. इन्द्रा याहि धियेषितो विप्रजूतः सुतावतः । उप ब्रह्माणि वाघतः ॥ ५ ॥

हे इन्द्रदेव ! श्रेष्ठ बुद्धि द्वारा जानने योग्य आप, सोमरस प्रस्तुत करते हुये ऋत्विजों के द्वारा बुलाये गये हैं । उनकी स्तुति के आधार पर आप यज्ञशाला में पधारें ॥ ५ ॥

Urged by the holy singer, sped by song, come, Indra, to the prayers,
Of the libation−pouring priest.

२४. इन्द्रा याहि तूतुजान उप ब्रह्माणि हरिवः । सुते दधिष्व नश्चनः ॥ ६ ॥

हे अश्वयुक्त इन्द्रदेव ! आप स्तवनों के श्रवणार्ध एवं इस यज्ञ में हमारे द्वारा प्रदत्त हवियों का सेवन करने के लिये यज्ञशाला में शीघ्र ही पधारें ॥ ६ ॥

Approach, O Indra, hasting thee, Lord of Bay Horses, to the prayers.
In our libation take delight.

२५. ओमासश्चर्षणीधृतो विश्वे देवास आ गत । दाश्वांसो दाशुषः सुतम् ॥ ७ ॥

हे विश्वेदेवो ! आप सबकी रक्षा करने वाले, सभी प्राणियों के आधारभूत और सभी को ऐश्वर्य प्रदान करने वाले हैं । अतः आप इस सोम युक्त हवि देने वाले यजमान के यज्ञ में पधारें ॥ ७ ॥

Ye Visvedevas, who protect, reward, and cherish men, approach
Your worshipper’s drink−offering.

२६. विश्वे देवासो अप्तुरः सुतमा गन्त तूर्णयः । उस्त्रा इव स्वसराणि ॥ ८ ॥

समय-समय पर वर्षा करने वाले हे विश्वेदेवो ! आप कर्म कुशल और द्रुतगति से कार्य करने वाले हैं; आप सूर्य-रश्मियों के सदृश गतिशील होकर हमें प्राप्त हो ॥ ८ ॥

Ye Visvedevas, swift at work, come hither quickly to the draught,
As milch−kine hasten to their stalls.

२७. विश्वे देवासो अस्त्रिध एहिमायासो अद्रुहः । मेधं जुषन्त वह्रयः ॥ ९ ॥

हे विश्वेदेवो ! आप किसी के द्वारा बध न किये जाने वाले, कर्म-कुशल, द्रोहरहित और सुखप्रद हैं । आप हमारे यज्ञ में उपस्थित होकर हवि का सेवन करें ॥ ९ ॥

The Visvedevas, changing shape like serpents, fearless, void of guile,
Bearers, accept the sacred draught.

२८. पावका नः सरस्वती वाजेभिर्वाजिनीवती । यज्ञं वष्टु धियावसुः ॥ १० ॥

पवित्र बनाने वाली, पोषण देने वाली, बुद्धिमत्तापूर्वक ऐश्वर्य प्रदान करने वाली देवी सरस्वती ज्ञान और कर्म से हमारे यज्ञ को सफल बनाये ॥ १० ॥

Wealthy in spoil, enriched with hymns, may bright Sarsavati desire,
With eager love, our sacrifice.

२९. चोदयित्री सूनृतानां चेतन्ती सुमतीनाम् । यज्ञं दधे सरस्वती ॥ ११ ॥

सत्यप्रिय (वचन) बोलने की प्रेरणा देने वाली, मेधावी जनों को यज्ञानुष्ठान की प्रेरणा (मति) प्रदान करने वाली देवी सरस्वती हमारे इस यज्ञ को स्वीकार करके हमें अभीष्ट वैभव प्रदान करें ॥ ११ ॥

Inciter of all pleasant songs, inspirer o all gracious thought,
Sarasvati accept our rite.

३०. महो अर्णः सरस्वती प्र चेतयति केतुना । थियो विश्वां वि राजति ॥ १२ ॥

जो देवी सरस्वती नदी-रूप में प्रभूत जल को प्रवाहित करती हैं । वे सुमति को जगाने वाली देवी सरस्वती सभी याजकों की प्रज्ञा को प्रखर बनाती हैं ॥ १२ ॥

Sarasvati, the mighty flood, − she with be light illuminates,
She brightens every pious thought.

[ सूक्त – ४]

[ऋषि – मधुच्छन्दा वैश्वामित्र । देवता – इन्द्र । छन्द-गायत्री । ]

३१. सुरूपकृत्नुमूतये सुदुघामिव गोदुहे । जुहूमसि द्यविद्यवि ॥ १ ॥

(गो दोहन करने वाले के द्वारा) प्रतिदिन मधुर दूध प्रदान करने वाली गाय को जिस प्रकार बुलाया जाता है, उसी प्रकार हम अपने संरक्षण के लिये सौन्दर्यपूर्ण यज्ञकर्म सम्पन्न करने वाले इन्द्रदेव का आवाहन करते हैं ॥ १ ॥

As a good cow to him who milks, we call the doer of fair deeds,
To our assistance day by day.

३२. उप नः सवना गहि सोमस्य सोमपाः पिब । गोदा इद्रेवतो मदः ॥ २ ॥

सोमरस का पान करने वाले हे इन्द्रदेव ! आप सोम ग्रहण करने हेतु हमारे सवन-यज्ञों में पधार कर, सोमरस पीने के बाद प्रसन्न होकर याजकों को यश, वैभव और गौएँ प्रदान करें ॥ २ ॥

Come thou to our libations, drink of Soma, Soma-drinker thou!
The rich One’s rapture giveth kine.

३३. अथा ते अन्तमानां विद्याम सुमतीनाम् । मा नो अति ख्य आ गहि ॥ ३ ॥

सोमपान कर लेने के अनन्तर हे इन्द्रदेव ! हम आपके अत्यन्त समीपवत्तों श्रेष्ठ प्रज्ञावान् पुरुषों की उपस्थिति में रहकर आपके विषय में अधिक ज्ञान प्राप्त करें । आप भी हमारे अतिरिक्त अन्य किसी के समक्ष अपना स्वरूप प्रकट न करें (अर्थात् अपने विषय में न बताएं) ॥ ३ ॥

So may we be acquainted with thine innermost benevolence:
Neglect us not, come hitherward.

३४. परेहि विग्रमस्तृतमिन्द्रं पृच्छा विपश्चितम् । यस्ते सखिभ्य आ वरम् ॥ ४ ॥

हे ज्ञानवानो ! आप उन विशिष्ट बुद्धि वाले, अपराजेय इन्द्रदेव के पास जाकर मित्रों-बन्धुओं के लिये घन-ऐश्वर्य के निमित्त प्रार्थना करें ॥ ४ ॥

Go to the wise unconquered One, ask thou of Indra, skilled in song,
Him who is better than thy friends.

३५. उत ब्रुवन्तु नो निदो निरन्यतश्चिदारत । दधाना इन्द्र इदुवः ॥ ५ ॥

इन्द्रदेव की उपासना करने वाले उपासक उन (इन्द्रदेव) के निन्द‌कों को यहाँ से अन्यत्र निकल जाने को कहें; ताकि वे यहाँ से दूर हो जायें ॥ ५ ॥

Whether the men who mock us say, Depart unto another place,
Ye who serve Indra and none else.

३६. उत नः सुभर्गों अरिर्वोचेयुर्दस्म कृष्टयः । स्यामेदिन्द्रस्य शर्मणि ॥ ६ ॥

हे इन्द्रदेव ! हम आपके अनुग्रह से समस्त वैभव प्राप्त करें, जिससे देखने वाले सभी शत्रु और मित्र हमें सौभाग्यशाली समझें ॥ ६ ॥

Or whether, God of wondrous deeds, all our true people call us blest,
Still may we dwell in Indra’s care.

३७. एमाशुमाशवे भर यज्ञश्रियं नृमादनम् । पतयन्मन्दयत् सखम् ॥ ७ ॥

(हे याजको !) यज्ञ को श्रीसम्पन्न बनाने वाले, प्रसन्नता प्रदान करने वाले, मित्रों को आनन्द देने वाले इस सोमरस को शीघ्रगामी इन्द्रदेव के लिये भरें (अर्पित करें) ॥ ७ ॥

Unto the swift One bring the swift, man-cheering, grace of sacrifice,
That to the Friend gives wings and joy.

३८. अस्य पीत्वा शतक्रतो घनो वृत्राणामभवः । प्रावो वाजेषु वाजिनम् ॥ ८ ॥

हे सैकड़ों यज्ञ सम्पन्न करने वाले इन्द्रदेव ! इस सोमरस को पीकर आप वृत्र-प्रमुख शत्रुओं के संहारक सिद्ध हुए हैं, अतः आप संग्राम-भूमि में वीर योद्धाओं को रक्षा करें ॥ ८ ॥

Thou, Satakratu, drankest this and was the Vrtras’ slayer, thou
Helpest the warrior in the fray.

३९. तं त्वा वाजेषु वाजिनं वाजयामः शतक्रतो । धनानामिन्द्र सातये ॥ ९ ॥

हे शतकर्मा इन्द्रदेव ! युद्धों में बल प्रदान करने वाले आपको हम धनों की प्राप्ति के लिये श्रेष्ठ हविष्यान्न अर्पित करते हैं ॥ ९ ॥

We strengthen, Satakratu, thee, year, thee the powerful in fight,
That, Indra, we may win us wealth.

४०. यो रायो३वनिर्महान्त्सुपारः सुन्वतः सखा । तस्मा इन्द्राय गायत ॥ १० ॥

हे याजको ! आप उन इन्द्रदेव के लिये स्तोत्रों का गान करें, जो धनों के महान् रक्षक, दुःखों को दूर करने वाले और याज्ञिकों से मित्रवत् भाव रखने वाले हैं ॥ १० ॥

To him the mighty stream of wealth, prompt friend of him who pours the juice,
Yea, to this Indra sing your song.

[ सूक्त-५ ]

[ऋषि – मधुच्छन्दा वैश्यामित्र । देवता – इन्द्र । छन्द – गायत्री ।]

४१. आ त्वेता नि षीदतेन्द्रमभि प्र गायत । सखायः स्तोमवाहसः ॥ १ ॥

हे याजक मित्रो ! इन्द्रदेव को प्रसन्न करने के लिये प्रार्थना करने हेतु शीघ्र आकर बैठो और हर प्रकार से उनकी स्तुति करो ॥ १ ॥

O come, ye hither, sit ye down to Indra sing ye forth, your song,
companions, bringing hymns of praise.

४२. पुरूतमं पुरूणामीशानं वार्याणाम् । इन्द्रं सोमे सचा सुते ॥ २ ॥

(हे याजक मित्रो ! सोम के अभिषुत होने पर) एकत्रित होकर संयुक्तरूप से सोमयज्ञ में शत्रुओं को पराजित करने वाले ऐश्वर्य के स्वामी इन्द्रदेव की अभ्यर्थना करो ॥ २ ॥

To him the richest of the rich, the Lord of treasures excellent,
Indra, with Some juice outpoured.

४३. स धा नो योग आ भुवत् स राये स पुरन्ध्याम् । गमद् वाजेभिरा स नः ॥ ३ ॥

वे इन्द्रदेव हमारे पुरुषार्थ को प्रखर बनाने में सहायक हों, धन-धान्य से हमें परिपूर्ण करें तथा ज्ञान प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त करते हुये पोषक अन्न सहित हमारे निकट आयें ॥ ३ ॥

May he stand by us in our need and in abundance for our wealth
May he come nigh us with his strength.

४४. यस्य संस्थे न वृण्वते हरी समत्सु शत्रवः । तस्मा इन्द्राय गायत ॥ ४ ॥

(हे याजको !) संग्राम में जिनके अश्वों से युक्त रथों के सम्मुख शत्रु टिक नहीं सकते, उन इन्द्रदेव के गुणों का आप गान करें ॥ ४ ॥

Whose pair of tawny horses yoked in battles foemen challenge not:
To him,, to Indra sing your song.

४५. सुतपाठने सुता इमे शुचयो यन्ति वीतये । सोमासो दध्याशिरः ॥ ५ ॥

यह निचोड़ा और शुद्ध किया हुआ दही मिश्रित सोमरस, सोमपान की इच्छा करने वाले इन्द्रदेव के निमित्त प्राप्त हो ॥ ५ ॥

Nigh to the Soma-drinker come, for his enjoyment, these pure drops,
The Somas mingled with the curd.

४६. त्वं सुतस्य पीतये सद्यो वृद्धो अजायथाः । इन्द्र ज्यैष्ठ्याय सुक्रतो ॥ ६ ॥

हे उत्तम कर्मवाले इन्द्रदेव ! आप सोमरस पीने के लिये देवताओं में सर्वश्रेष्ठ होने के लिये तत्काल वृद्ध रूप हो जाते हैं ॥ ६ ॥

Thou, grown at once to perfect strength, wast born to drink the Soma juice,
Strong Indra, for preeminence.

४७. आ त्वा विशन्त्वाशवः सोमास इन्द्र गिर्वणः । शं ते सन्तु प्रचेतसे ॥ ७ ॥

हे इन्द्रदेव ! तीनों सवनों में व्याप्त रहने वाला यह सोम, आपके सम्मुख उपस्थित रहे एवं आपके ज्ञान को सुखपूर्वक समृद्ध करे ॥ ७ ॥

O Indra, lover of the song, may these quick Somas enter three;
May they bring bliss to thee the Sage.

४८. त्वां स्तोमा अवीवृधन् त्वामुक्था शतक्रतो । त्वां वर्धन्तु नो गिरः ॥ ८ ॥

हे सैकड़ों यज्ञ करने वाले इन्द्रदेव ! स्तोत्र आपकी वृद्धि करें । यह उक्थ (स्तोत्र) वचन और हमारी वाणी आपकी महत्ता बढ़ाये ॥ ८ ॥

Our chants of praise have strengthened thee, O Satakratu, and our lauds,
So strengthen thee the songs we sing.

४९. अक्षितोतिः सनेदिमं वाजमिन्द्रः सहस्त्रिणम् । यस्मिन् विश्वानि पौंस्या ॥ ९ ॥

रक्षणीय की सर्वथा रक्षा करने वाले इन्द्रदेव बल-पराक्रम प्रदान करने वाले विविध रूपों में विद्यमान सोम रूप अन्न का सेवन करें ॥९ ॥

Indra, whose succour never fails, accept these viands thousandfold,
Wherein all manly powers abide.

५०. मा नो भर्ता अभि द्वहन् तनूनामिन्द्र गिर्वणः । ईशानो यवया वधम् ॥ १० ॥

हे स्तुत्य इन्द्रदेव! हमारे शरीर को कोई भी शत्रु क्षति न पहुँचाये । हमें कोई भी हिंसित न करे, आप हमारे संरक्षक रहें ॥ १० ॥

O Indra, thou who lovest song, let no man hurt our bodies, keep
Slaughter far from us, for thou canst.

[ सूक्त – ७ ]

[ ऋषि – मधुच्छन्दा वैश्वामित्र । देवता – इन्द्र । छन्द – गायत्री । ]

६१. इन्द्रमिद् गाथिनो बृहदिन्द्रमकेंभिरर्किणः । इन्द्र वाणीरनूषत ॥ १ ॥

सामगान के साधकों ने गाये जाने योग्य बृहत्साम की स्तुतियों (गाथा) से देवराज इन्द्र को प्रसन्न किया है । इसी तरह याज्ञिकों ने भी मन्त्रोच्चारण के द्वारा इन्द्रदेव की प्रार्थना की है ॥ १ ॥

[ “गाथा शब्द गान या पद्म के अर्थ में आया है” इसे मंत्र या ऋक् के स्तर का नहीं माना जाता । ]

Indra the singers with high praise, Indra recites with their lauds,
Indra the choirs have glorified.

६२. इन्द्र इद्धर्योः सचा सम्मिश्ल आ वचोयुजा । इन्द्रो वज्री हिरण्ययः ॥ २ ॥

संयुक्त करने की क्षमता वाले, वज्रधारी, स्वर्ण-मण्डित इन्द्रदेव, वचन मात्र के इशारे से जुड़ जाने वाले अश्वों के साथी हैं ॥ २ ॥

[‘वीर्यं वा अश्वः’ के अनुसार पराक्रम ही अश्व है । जो पराक्रमी समय पर संकेत मात्र से संगठित हो जायें इन्द्र देवता उनके साथी हैं, जो अहंकारवश बिखरे रहते हैं, वे इन्द्रदेव के प्रिय नहीं हैं । ]

Indra hath ever close to him his two bay steeds and word-yoked car,
Indra the golden, thunder-armed.

६३. इन्द्रो दीर्घाय चक्षस आ सूर्यं रोहयद् दिवि । वि गोभिरद्रिमैरयत् ॥ ३ ॥

(देवशक्तियों के संगठक) इन्द्रदेव ने विश्व को प्रकाशित करने के महान् उद्देश्य से सूर्यदेव को उच्चाकाश में स्थापित किया, जिनने अपनी किरणों से पर्वत आदि समस्त विश्व को दर्शनार्थ प्रेरित किया ॥ ३ ॥

Indra hat raised the Sun on high in heaven, that he may see afar.
He burst the mountain for the kine.

६४. इन्द्र वाजेषु नोऽव सहस्रप्रधनेषु च । उग्र उग्राभिरूतिभिः ॥ ४ ॥

हे वीर इन्द्रदेव ! आप सहस्रों प्रकार के धन लाभ वाले छोटे-बड़े संग्रामों में वीरतापूर्वक हमारी रक्षा करें ॥ ४ ॥

Help us, O Indra, in the frays, yea, frays, where thousand spoils are gained,
With awful aids, O awful One.

६५. इन्द्रं वयं महाधन इन्द्रमर्भे हवामहे । युजं वृत्रेषु वज्रिणम् ॥ ५ ॥

हम छोटे – बड़े सभी (जीवन) संग्रामों में वृत्रासुर के संहारक, वज्रपाणि इन्द्रदेव को सहायतार्थ बुलाते हैं ॥ ५ ॥

In mighty battle we invoke Indra, Indra in lesser fight,
The Friend who bends his bolt at fiends.

६६. स नो वृषन्नमुं चरुं सत्रादावन्नपा वृद्धि । अस्मध्यमप्रतिष्कुतः ॥ ६ ॥

सतत दानशील, सदैव अपराजित हे इन्द्रदेव ! आप हमारे लिये मेघ से जल की वृष्टि करें ॥ ६ ॥

Unclose, our manly Hero, thou for ever bounteous, yonder cloud,
For us, thou irresistible.

६७. तुञ्जेतुञ्जे य उत्तरे स्तोमा इन्द्रस्य वज्रिणः । न विन्धे अस्य सुष्टुतिम् ॥ ७ ॥

प्रत्येक दान के समय, वज्रधारी इन्द्रदेव के सदृ‌श दान की (दानी की) उपमा कहीं अन्यत्र नहीं मिलती । इन्द्रदेव की इससे अधिक उत्तम स्तुति करने में हम समर्थ नहीं हैं ॥ ७ ॥

Still higher, at each strain of mine, thunder-armed Indra’s praises rise.
I find no land worthy of him.

६८. वृक्षा यूथेव वंसगः कृष्टीरियर्योजसा । ईशानो अप्रतिष्कुतः ॥ ८ ॥

सबके स्वामी, हमारे विरुद्ध कार्य न करने वाले, शक्तिमान् इन्द्रदेव अपनी सामर्थ्य के अनुसार, अनुदान बाँटने के लिये मनुष्यों के पास उसी प्रकार जाते हैं, जैसे वृषभ गायों के समूह में जाता है ॥ ८ ॥

Even as the bull drives on the herds, he drives the people with his might.
The Ruler irresistible.

६९. य एकवर्षणीनां वसूनामिरज्यति । इन्द्रः पञ्च क्षितीनाम् ॥ ९ ॥

इन्द्रदेव, पाँचों श्रेणियों के मनुष्यों (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र और निषाद) और सब ऐश्वर्यो – सम्पदाओं के अद्वितीय स्वामी हैं ॥ ९ ॥

Indra who rules with single sway men, riches, and the fivefold race,
Of those who dwell upon the earth.

७०. इन्द्रं वो विश्वतस्परि हवामहे जनेभ्यः । अस्माकमस्तु केवलः ॥ १० ॥

हे ऋत्विजो ! हे यजमानो ! सभी लोगों में उत्तम, इन्द्रदेव को, आप सब के कल्याण के लिये हम आमंत्रित करते हैं, वे हमारे ऊपर विशेष कृपा करें ॥ १० ॥

For your sake from each side we call Indra away from other men.
Ours, and none others’, may he be.

[सूक्त-८]

[ऋषि – मधुच्छन्दा वैश्वामित्र । देवता – इन्द्र । छन्द – गायत्री ।]

७१. एन्द्र सानसिं रयिं सजित्वानं सदासहम् । वर्षिष्ठमूतये भर ॥ १ ॥

हे इन्द्रदेव ! आप हमारे जीवन संरक्षण के लिये तथा शत्रुओं को पराभूत करने के निमित्त हमें ऐश्वर्य स पूर्ण करें ॥ १ ॥

Indra, bring wealth that gives delight, the victor’s every conquering wealth,
Most excellent, to be our aid.

७२. नि येन मुष्टिहत्यया नि वृत्रा रुणधामहै । त्वोतासो न्यर्वता ॥ २ ॥

उस ऐश्वर्य के प्रभाव और आपके द्वारा रक्षित अश्वों के सहयोग से हम मुक्के का प्रहार करके (शक्ति प्रयोग द्वारा) शत्रुओं को भगा दें ॥ २ ॥

By means of which we may repel our foes in battle hand to hand,
By thee assisted with the car.

७३. इन्द्र त्वोतास आ वयं वज्रं घना ददीमहि । जयेम सं युधि स्पृथः ॥ ३ ॥

हे इन्द्रदेव ! आपके द्वारा संरक्षित होकर तीक्ष्ण वज्रों को धारण कर हम युद्ध में स्पर्धा करने वाले शत्रुओं पर विजय प्राप्त करें ॥ ३ ॥

Aided by thee, the thunder-armed, Indra, may we lift up the bolt,
And conquer all our foes in fight.

७४. वयं शूरेभिरस्तृभिरिन्द्र त्वया युजा वयम् । रासह्याम पृतन्यतः ॥ ४ ॥

हे इन्द्रदेव! आपके द्वारा संरक्षित कुशल शस्त्र-चालक वीरों के साथ हम अपने शत्रुओं को पराजित करें ॥ ४ ॥

With thee, O Indra, for ally with missile-darting heroes, may
We conquer our embattled foes.

७५. महाँ इन्द्रः परश्च नु महित्वमस्तु वज्रिणे । द्यौर्न प्रथिना शवः ॥ ५ ॥

हमारे इन्द्रदेव श्रेष्ठ और महान् हैं । वज्रधारी इन्द्रदेव का यश द्युलोक के समान व्यापक होकर फैले तथा इनके बल की प्रशंसा चतुर्दिक् हो ॥ ५ ॥

Mighty is Indra, yea supreme, greatness be his, the Thunder.
Wide as the heaven extends his power.

७६. समोहे वा य आशत नरस्तोकस्य सनितौ । विप्रासो वा धियायवः ॥ ६ ॥

जो संग्राम में जुटते हैं, जो पुत्र के निर्माण में जुटते हैं और बुद्धिपूर्वक ज्ञान-प्राप्ति के लिए यत्न करते हैं, वे सब इन्द्रदेव की स्तुति से इष्टफल पाते हैं ॥ ६ ॥

Which aideth those to win them sons, who come as heroes to the fight,
Or singers loving holy thoughts.

७७. यः कुक्षिः सोमपातमः समुद्र इव पिन्वते। उर्दीरापो न काकुदः ॥ ७ ॥

अत्यधिक सोमपान करने वाले इन्द्रदेव का उदर समुद्र की तरह विशाल हो जाता है । वह (सोमरस) जीभ से प्रवाहित होने वाले रसों की तरह सतत द्रवित होता रहता है । (सदा आर्द्र बनाये रहता है ।) ॥ ७ ॥

His belly, drinking deepest draughts of Soma, like an ocean swells,
Like wide streams from the cope of heaven.

७८. एवा ह्यस्य सूनृता विरप्शी गोमती मही । पक्वा शाखा न दाशुषे ॥ ८ ॥

इन्द्रदेव की अति मधुर और सत्यवाणी उसी प्रकार सुख देती है, जिस प्रकार गो धन के दाता और पके फल वाली शाखाओं से युक्त वृक्ष यजमानों (हविदाता) को सुख देते हैं ॥ ८ ॥

So also is his excellence, great, vigorous, rich in cattle, like
A ripe branch to the worshipper.

७९. एवा हि ते विभूतय ऊतय इन्द्र मावते । सद्यश्चित् सन्ति दाशुषे ॥ ९ ॥

हे इन्द्रदेव ! हमारे लिये इष्टदात्री और संरक्षण प्रदान करने वाली जो आपकी विभूतियाँ हैं, वे सभी दान देने (श्रेष्ठ कार्य में नियोजन करने) वालों को भी तत्काल प्राप्त होती हैं ॥ ९ ॥

For venly thy mighty powers, Indra, are saving helps at once
Unto a worshipper like me.

८०. एवा ह्यास्य काम्या स्तोम उक्थं च शंस्या । इन्द्राय सोमपीतये ॥ १० ॥

दाता की स्तुतियाँ और उक्थ वचन अति मनोरम एवं प्रशंसनीय हैं । ये सब सोमपान करने वाले इन्द्रदेव के लिये हैं ॥ १० ॥

So are his lovely gifts, let lauds and praises be to Indra sung,
That he may drink the Soma juice.

[ सूक्त – ९ ]

[ ऋषि – मधुच्छन्दा वैश्वामित्र । देवता – इन्द्र । छन्द – गायत्री । ]

८१. इन्द्रेहि मत्स्यन्धसो विश्वेभिः सोमपर्वभिः । महाँ अभिष्टिरोजसा ॥ १ ॥

हे इन्द्रदेव ! सोमरूपी अन्नों से आप प्रफुल्लित होते हैं, अतः अपनी शक्ति से दुर्दान्त शत्रुओं पर विजय श्री वरण करने की क्षमता प्राप्त करने हेतु आप (यज्ञशाला में) पधारें ॥ १ ॥

COME, Indra, and delight thee with the juice at all the Soma feasts,
Protector, mighty in thy strength.

८२. एमेनं सुजता सुते मन्दिमिन्द्राय मन्दिने । चर्क्रि विश्वानि चक्रये ॥ २ ॥

(हे याजको !) प्रसन्नता देने वाले सोमरस को (निचोड़कर) तैयार करो तथा सम्पूर्ण कार्यों के कर्ता इन्द्र देव के लिये सामर्थ्य बढ़ाने वाले इस सोम को अर्पित करो ॥ २ ॥

To Indra pour ye forth the juice, the active gladdening juice to him
Ile gladdening, oinnific God.

८३. मत्स्वा सुशिप्र मन्दिभिः स्तोमेभिर्विश्वचर्षणे । सचैषु सवनेष्वा ॥ ३ ॥

हे उत्तम शस्त्रों से सुसज्जित (अथवा शोभन नासिका वाले), सर्वद्रष्टा इन्द्रदेव! हमारे इन यज्ञों में आकर प्रफुल्लता प्रदान करने वाले स्तोत्रों से आप आनन्दित हों ॥ ३ ॥

O Lord of all men, fair of cheek, rejoice thee in the gladdening lauds,
Present at these drink−offerings.

८४. असृग्रमिन्द्र ते गिरः प्रति त्वामुदहासत । अजोषा वृषभं पतिम् ॥ ४ ॥

हे इन्द्रदेव ! आपकी स्तुति के लिये हमने स्तोत्रों की रचना की है । हे बलशाली और पालनकर्ता इन्द्रदेव ! इन स्तुतियों द्वारा की गई प्रार्थना को आप स्वीकार करें ॥ ४ ॥

Songs have outpoured themselves to thee, Indra, the strong, the guardian Lord,
And raised themselves unsatisfied.

८५. सं चोदय चित्रमर्वाग्राध इन्द्र वरेण्यम् । असदित्ते विभु प्रभु ॥ ५ ॥

हे इन्द्रदेव ! आप ही विपुल ऐश्वर्यों के अधिपति हैं, अतः विविध प्रकार के श्रेष्ठ ऐश्वर्यों को हमारे पास प्रेरित करें; अर्थात् हमें श्रेष्ठ ऐश्वर्य प्रदान करें ॥ ५ ॥

Send to us bounty manifold, O Indra, worthy of’ our wish,
For power supreme is only thine.

८६. अस्मान्त्सु तत्र चोदयेन्द्र राये रभस्वतः । तुविद्युम्न यशस्वतः ॥ ६ ॥

हे प्रभूत ऐश्वर्य सम्पन्न इन्द्रदेव ! आप वैभव की प्राप्ति के लिये हमें श्रेष्ठ कर्मों में प्रेरित करें, जिससे हम परिश्रमी और यशस्वी हो सकें ॥ ६ ॥

O Indra, stimulate thereto us emulously fain for wealth,
And glorious, O most splendid One.

८७. सं गोमदिन्द्र वाजवदस्मे पृथु श्रवो बृहत् । विश्वायुर्धेह्यक्षितम् ॥ ७ ॥

हे इन्द्रदेव ! आप हमें गौओं, धन-धान्यों से युक्त अपार वैभव एवं अक्षय पूर्णायु प्रदान करें ॥ ७ ॥

Give, Indra, wide and lofty fame, wealthy in cattle and in strength,
Lasting our life−time, failing not.

८८. अस्मे धेहि श्रवो बृहद् द्युम्नं सहस्त्रसातमम् । इन्द्र ता रथिनीरिषः ॥ ८ ॥

हे इन्द्रदेव ! आप हमें प्रभूत यश एवं विपुल ऐश्वर्य प्रदान करें तथा बहुत से रथों में भरकर अन्नादि प्रदान करें ॥ ८ ॥

Grant us high fame, O Indra, grant riches bestowing thousands, those
Fair fruits of earth borne home in wains.

८९. वसोरिन्द्रं वसुपतिं गीर्भिर्गुणन्त ऋग्मियम् । होम गन्तारमूतये ॥ ९ ॥

धनों के अधिपति, ऐश्वर्यों के स्वामी, ऋचाओं से स्तुत्य इन्द्रदेव का हम स्तुतिपूर्वक आवाहन करते हैं । वे हमारे यज्ञ में पधार कर, हमारे ऐश्वर्य की रक्षा करें ॥ ९ ॥

Praising with songs the praise−worthy who cometh to our aid, we call
Indra, the Treasure−Lord of wealth.

९०. सुतेसुते न्योकसे बृहद् बृहत एदरिः । इन्द्राय शूषमर्चति ॥ १० ॥

सोम को सिद्ध (तैयार) करने के स्थान यज्ञस्थल पर यज्ञकर्ता, इन्द्रदेव के पराक्रम की प्रशंसा करते हैं ॥ १० ॥

To lofty Indra, dweller by each libation, the pious man
Sings forth aloud a strengthening hymn.

[ सूक्त – १० ]

[ ऋषि – मधुच्छन्दा वैश्वामित्र । देवता – इन्द्र । छन्द – अनुष्टुप् ]

९१. गायन्ति त्वा गायत्रिणोऽर्चन्त्यर्कमर्किणः । ब्रह्माणस्त्वा शतक्रत उद्वंशमिव येमिरे ॥ १ ॥

हे शतक्रतो (सौ यज्ञ या श्रेष्ठ कर्म करने वाले) इन्द्रदेव ! उद्‌गातागण (उच्च स्वर से गान करने वाले) आपका आवाहन करते हैं । स्तोतागण पूज्य इन्द्रदेव का मंत्रोच्चारण द्वारा आदर करते हैं । बाँस के ऊपर कला प्रदर्शन करने वाले नट के समान, बह्या नामक ऋत्विञ् श्रेष्ठ स्तुतियों द्वारा इन्द्रदेव को प्रोत्साहित करते हैं ॥ १ ॥

The chanters hymn thee, they who say the word of praise magnify thee.
The priests have raised thee up on high, O Satakratu, like a pole.

९२. यत्सानोः सानुमारुहद् भूर्यस्पष्ट कर्त्वम् । तदिन्द्रो अर्थं चेतति यूथेन वृष्णिरेजति ॥ २ ॥

जब यजमान सोमवल्ली, समिधादि के निमित्त एक पर्वत शिखर से दूसरे पर्वत शिखर पर जाते हैं और यजन कर्म करते हैं, तब उनके मनोरथ को जानने वाले इष्टप्रदायक इन्द्रदेव यज्ञ में आने को उद्यत होते हैं ॥ २ ॥

As up he climb from ridge to ridge and looked upon the toilsome task,
Indra observes this wish of his, and the Rain hastens with his troop.

९३. युक्ष्वा हि केशिना हरी वृषणा कक्ष्यप्रा । अथा न इन्द्र सोमपा गिरामुपश्रुतिं चर ॥ ३ ॥

हे सोमरस ग्रहीता इन्द्रदेव ! आप लम्बे केशयुक्त, शक्तिमान्, गन्तव्य तक ले जाने वाले दोनों घोड़ों को रथ में नियोजित करें । तत्पश्चात् सोमपान से तृप्त होकर हमारे द्वारा की गई प्रार्थनाएँ सुनें ॥ ३ ॥

Harness thy pair of strong bay steeds, long-maned, whose bodies fill the girths,
And, Indra, Soma-drinker, come to listen to our songs of praise.

९४. एहि स्तोमाँ अभि स्वराभि गृणीह्या रुव । ब्रह्म च नो वसो सचेन्द्र यज्ञं च वर्धय ॥४ ॥

हे सर्वनिवासक इन्द्रदेव ! हमारी स्तुतियों का श्रवण कर आप उद्‌गाताओं, होताओं एवं अध्वर्युवों को प्रशंसा से प्रोत्साहित करें ॥ ४ ॥

Come hither, answer thou the song, sing in approval, cry aloud.
Good Indra, make our prayer succeed, and prosper this our sacrifice.

९५. उक्थमिन्द्राय शंस्यं वर्धनं पुरुनिष्षिधे । शक्रो यथा सुतेषु णो रारणत् सख्येषु च ॥ ५ ॥

हे स्तोताओ ! आप शत्रुसंहारक, सामर्थ्ययान् इन्द्रदेव के लिये (उनके) यश को बढ़ाने वाले उत्तम स्तोत्रों का पाठ करें, जिससे उनकी कृपा हमारी सन्तानों एवं मित्रों पर सदैव बनी रहे ॥ ५ ॥

To Indra must a laud be said, to strengthen him who freely gives,
That Sakra may take pleasure in our friendship and drink-offerings.

९६. तमित् सखित्व ईमहे तं राये तं सुवीर्ये । स शक्र उत नः शकदिन्द्रो वसु दयमानः ॥ ६ ॥

हम उन इन्द्रदेव के पास मित्रता के लिये, धन प्राप्ति और उत्तमबल वृद्धि के लिये स्तुति करने जाते हैं । वे इन्द्रदेव बल एवं धन प्रदान करते हुए हमें संरक्षित करते हैं ॥ ६ ॥

Him, him we seek for friendship, him for riches and heroic might.
For Indra, he is Sakra, he shall aid us while he gives us wealth.

९७. सुविवृतं सुनिरजमिन्द्र त्वादातमिद्यशः । गवामप व्रजं वृधि कृणुष्व राधो अद्रिवः ॥ ७ ॥

हे इन्द्रदेव । आपके द्वारा प्रदत्त यश सब दिशाओं में सुविस्तृत हुआ है । हे वज्रधारक इन्द्रदेव ! गौओं को बाड़े से छोड़ने के समान हमारे लिये धन को प्रसारित करें ॥ ७ ॥

Easy to turn and drive away, Indra, is spoil bestowed by thee.
Unclose the stable of the kine, and give us wealth O Thunder-armed.

९८. नहि त्वा रोदसी उभे ऋधायमाणमिन्वतः । जेषः स्वर्वतीरपः सं गा अस्मभ्यं धूनुहि ॥ ८ ॥

हे इन्द्रदेव! युद्ध के समय आप के यश का विस्तार पृथ्वी और द्युलोक तक होता है । दिव्य जल – प्रवाहों पर आपका ही अधिकार है । उनसे अभिषिक्त कर हमें तृप्त करें ॥ ८ ॥

The heaven and earth contain thee not, together, in thy wrathful mood.
Win us the waters of the sky, and send us kine abundantly.

९९. आश्रुत्कर्ण श्रुधी हवं नू चिद्दधिष्व मे गिरः । इन्द्र स्तोममिमं मम कृष्वा युजश्विदन्तरम् ॥ ९ ॥

भक्तों की स्तुति सुनने वाले हे इन्द्रदेव ! हमारे आवाहन को सुनें । हमारी वाणियों को चित्त में धारण करें । हमारे स्तोत्रों को अपने मित्र के वचनों से भी अधिक प्रीतिपूर्वक धारण करें ॥ ९ ॥

Hear, thou whose ear is quick, my call; take to thee readily my songs,
O Indra, let this laud of mine come nearer even than thy friend.

१००. विद्या हि त्वा वृषन्तमं वाजेषु हवनश्रुतम् । वृषन्तमस्य हूमह ऊतिं सहस्रसातमाम् ॥ १० ॥

हे इन्द्रदेव ! हम जानते हैं कि आप बल-सम्पन्न हैं तथा युद्धों में हमारे आवाहन को आप सुनते हैं । हे बलशाली इन्द्रदेव ! आपके सहस्रों प्रकार के धन के साथ हम आपका संरक्षण भी चाहते हैं ॥ १० ॥

We know thee mightiest of all, in battles hearer of our cry.
Of thee most mighty we invoke the aid that giveth thousandfold.

१०१. आ तू न इन्द्र कौशिक मन्दसानः सुतं पिब । नव्यमायुः प्र सू तिर कृधी सहस्रसामृषिम् ॥ ११ ॥

हे कुशिक के पत्र *इन्द्रदेव ! आप इस निष्पादित सोम का पान करने के लिये हमारे पास शीघ्र आयें । हमें कर्म करने की सामर्थ्य के साथ नवीन आयु भी दें । इस ऋषि को सहस्र धनों से पूर्ण करें ॥ ११ ॥

[* कुशिक पुत्र विश्वामित्र के समान ही उत्पत्ति के कारण इन्द्रदेव को कुशिक पुत्र सम्बोधन दिया गया है । ]

O Indra, son of Kusika, drink our libation with delight.
Prolong our life anew, and cause the seer to win a thousand gifts.

१०२. परि त्वा गिर्वणो गिर इमा भवन्तु विश्वतः । वृद्धायुमनु वृद्धयो जुष्टा भवन्तु जुष्टयः ॥ १२ ॥

हे स्तुत्य इन्द्रदेव ! हमारे द्वारा की गई स्तुतियाँ सब ओर से आपकी आयु को बढ़ाती हुईं आपको यशस्वी बनायें । आपके द्वारा स्वीकृत ये (स्तुतियाँ) हमारे आनन्द को बढ़ाने वाली सिद्ध हों ॥ १२ ॥

Lover of song, may these our songs on every side encompass thee:
Strengthening thee of lengthened life, may they be dear delights to thee.

[ सूक्त – ११ ]

[ ऋषि – जेतामाधुच्छन्दस । देवता – इन्द्र । छन्द – अनुष्टुप् । ]

१०३. इन्द्रं विश्वा अवीवृधन्त्समुद्रव्यचसं गिरः । रथीतमं रथीनां वाजानां सत्पर्ति पतिम् ॥ १ ॥

समुद्र के तुल्य व्यापक, सब रथियों में महानतम्, अन्नों के स्वामी और सत्प्रवृत्तियों के पालक इन्द्रदेव को समस्त स्तुतियाँ अभिवृद्धि प्रदान करती हैं ॥ १ ॥

१०४. सख्ये त इन्द्र वाजिनो मा भेम शवसस्पते । त्वामभि प्र णोनुमो जेतारमपराजितम् ॥ २ ॥

हे बलरक्षक इन्द्रदेव ! आपकी मित्रता से हम बलशाली होकर किसी से न डरें। हे अपराजेय – विजयी इन्द्रदेव ! हम साधकगण आपको प्रणाम करते हैं ॥ २ ॥

१०५. पूर्वीरिन्द्रस्य रातयो न वि दस्यन्त्यूतयः । यदी वाजस्य गोमतः स्तोतृभ्यो मंहते मघम् ॥ ३ ॥

देवराज इन्द्र की दानशीलता सनातन है । ऐसी स्थिति में आज के यजमान भी यदि स्तोताओं को गवादि सहित अन्न दान करते हैं, तो इन्द्रदेव द्वारा की गई सुरक्षा अक्षुण्ण रहती है ॥ ३ ॥

१०६. पुरां भिन्दुर्युवा कविरमितौजा अजायत । इन्द्रो विश्वस्य कर्मणो धर्ता वज्री पुरुष्टुतः ॥ ४ ॥

शत्रु के नगरों को विनष्ट करने वाले वे इन्द्रदेव युवा, ज्ञाता, अतिशक्तिशाली, शुभ कार्यों के आश्रयदाता तथा सर्वाधिक कीर्ति-युक्त होकर विविधगुण सम्पन्न हुए हैं ॥ ४ ॥

१०७. “त्वं बलस्य गोमतोऽपावरद्रिवो बिलम् । त्वां देवा अबिभ्युषस्तुज्यमानास आविषुः ॥ ५ ॥

हे वज्रधारी इन्द्रदेव ! आपने गौओं (सूर्य-किरणों) को चुराने वाले असुरों के व्यूह को नष्ट किया, तब असुरों से पराजित हुए देवगण आपके साथ आकर संगठित हुए ॥ ५ ॥

१०८. तवाहं शूर रातिभिः प्रत्यायं सिन्धुमावदन् । उपातिष्ठन्त गिर्वणो विदुष्टे तस्य कारवः ॥ ६ ॥

संग्रामशूर हे इन्द्रदेव ! आपकी दानशीलता से आकृष्ट होकर हम होतागण पुनः आपके पास आये हैं । है स्तुत्य इन्द्रदेव ! सोमयाग में आपकी प्रशंसा करते हुए ये ऋत्विज् एवं यजमान आपकी दानशीलता को जानते हैं ॥ ६ ॥

१०९. मायाभिरिन्द्र मायिनं त्वं शुष्णमवातिरः । विदुष्टे तस्य मेधिरास्तेषां श्रवांस्युत्तिर ॥ ७ ॥

हे इन्द्रदेव ! अपनी माया द्वारा आपने ‘शुष्ण’ (एक राक्षस) को पराजित किया । जो बुद्धिमान् आपकी इस माया को जानते हैं, उन्हें यश और बल देकर वृद्धि प्रदान करें ॥ ७ ॥

११०. इन्द्रमीशानमोजसाभि स्तोमा अनूषत । सहस्रं यस्य रातय उत वा सन्ति भूयसीः ॥ ८ ॥

स्तोतागण, असंख्यों अनुदान देने वाले, ओजस् (बल-पराक्रम) के कारण जगत् के नियन्ता इन्द्रदेव की स्तुति करने लगे ॥ ८ ॥

[ सूक्त – १२ ]

[ ऋषि – मेधातिथि काण्व । देवता – अग्नि, (छठवीं ऋचा के प्रथम पाद के देवता – निर्मथ्य अग्नि और आहवनीय अग्नि) । छन्द – गायत्री । ]

१११. अग्निं दूतं वृणीमहे होतारं विश्ववेदसम् । अस्य यज्ञस्य सुक्रतुम् ॥ १ ॥

हे सर्वज्ञाता अग्निदेव ! आप यज्ञ के विधाता हैं, समस्त देवशक्तियों को तुष्ट करने की सामर्थ्य रखते हैं । आप यज्ञ की विधि-व्यवस्था के स्वामी हैं । ऐसे समर्थ आपको हम देव-दूत रूप में स्वीकार करते हैं ॥ १ ॥

११२. अग्निमग्नि हवीमभिः सदा हवन्त विश्पतिम् । हव्यवाहं पुरुप्रियम् ॥ २ ॥

प्रजापालक, देवों तक हवि पहुंचाने वाले, परमप्रिय, कुशल नेतृत्व प्रदान करने वाले हे अग्निदेव ! हम याजकगण हवनीय मंत्रों से आपको सदा बुलाते हैं ॥ २ ॥

११३. अग्ने देवाँ इहा वह जज्ञानो वृक्तबर्हिषे । असि होता न ईड्यः ॥ ३ ॥

हे स्तुत्य अग्निदेव ! आप अरणि मन्थन से उत्पन्न हुए हैं । आस्तीर्ण (बिछे हुए) कुशाओं पर बैठे हुए यजमान पर अनुग्रह करने हेतु आप (यज्ञ की) हवि ग्रहण करने वाले देवताओं को इस यज्ञ में बुलाएँ ॥ ३ ॥

११४. ताँ उशतो वि बोधय यदग्ने यासि दूत्यम्। देवैरा सत्सि बर्हिषि ॥ ४ ॥

हे अग्निदेव ! आप हवि की कामना करने वाले देवों को यहाँ बुलाएँ और इन कुशा के आसनों पर देवों के साथ प्रतिष्ठित हों ॥ ४ ॥

११५. घृताहवन दीदिवः प्रति ष्म रिषतो दह । अग्ने त्वं रक्षस्विनः ॥ ५ ॥

घृत आहुतियों से प्रदीप्त हे अग्निदेव ! आप राक्षसी प्रवृत्तियों वाले शत्रुओं को सम्यक् रूप से भस्म करें ॥ ५ ॥

११६. अग्निनाग्निः समिध्यते कविर्गृहपतिर्युवा । हव्यवाह जुहास्यः ॥ ६ ॥

यज्ञ स्थल के रक्षक, दूरदर्शी, चिरयुवा, आहुतियों को देवों तक पहुँचाने वाले, ज्वालायुक्त आहवनीय यज्ञाग्नि को अरणि मन्थन द्वारा उत्पन्न अग्नि से प्रज्वलित किया जाता है ॥ ६ ॥

११७. कविमग्निमुप स्तुहि सत्यधर्माणमध्वरे । देवममीवचातनम् ॥ ७ ॥

हे ऋत्विजो ! लोक हितकारी यज्ञ में रोगों को नष्ट करने वाले, ज्ञानवान् अग्निदेव की स्तुति आप सब विशेष रूप से करें ॥ ७ ॥

११८. यस्त्वामग्ने हविष्यतिर्दूतं देव सपर्यति । तस्य स्म प्राविता भव ॥ ८ ॥

देवगणों तक हविष्यान्न पहुँचाने वाले हे अग्निदेव ! जो याजक, आप (देवदूत) की उत्तम विधि से अर्चना करते हैं, आप उनको भली-भाँति रक्षा करें ॥ ८ ॥

११९. यो अग्निं देववीतये हविष्माँ आविवासति । तस्मै पावक मृळय ॥ ९ ॥

हे शोधक अग्निदेव ! देवों के लिए हवि प्रदान करने वाले जो यजमान आपकी प्रार्थना करते हैं, आप उन्हें सुखी बनायें ॥ ९ ॥

१२०. स नः पावक दीदिवोऽग्ने देवाँ इहा वह । उप यज्ञ हविश्च नः ॥ १० ॥

हे पवित्र, दीप्तिमान् अग्निदेव ! आप देवों को हमारे यज्ञ में हवि ग्रहण करने के निमित्त ले आएँ ॥ १० ॥

१२१. स नः स्तवान आ भर गायत्रेण नवीयसा । रयिं वीरवतीमिषम् ॥ ११ ॥

हे अग्निदेव ! नवीनतम गायत्री छन्द वाले सूक्त से स्तुति किये जाते हुए आप हमारे लिए पुत्रादि ऐश्वर्य और बलयुक्त अन्नों को भरपुर प्रदान करें ॥ ११ ॥

१२२. अग्ने शुक्रेण शोचिषा विश्वाभिर्देवहूतिभिः । इमं स्तोमं जुषस्व नः ॥ १२ ॥

हे अग्निदेव ! अपनी कान्तिमान् दीप्तियों से देवों को बुलाने के निमित्त हमारी स्तुतियों को स्वीकार करें ॥ १२ ॥

[ सूक्त – १३ ]

[ ऋषि – मेधातिथि काण्व । देवता-१- इध्म अथवा समिद्ध अग्नि, २ तनूनपात्, ३- नराशंस, ४ – इळा, ५ – बर्हि, ६- दिव्यद्वार, ७ – उषासानक्ता, ८ – दिव्यहोता प्रचेतस्, ९ – तीन देवियाँ सरस्वती, इळा, भारती, १० – त्वष्टा, ११ – वनस्पति, १२ – स्वाहाकृति । छन्द – गायत्री ]

१२३. सुसमिद्धो न आ वह देवाँ अग्ने हविष्मते । होतः पावक यक्षि च ॥ १ ॥

पवित्रकर्ता, यज्ञ सम्पादनकर्ता हे अग्निदेव ! आप अच्छी तरह प्रज्वलित होकर यजमान के कल्याण के लिए देवताओं का आवाहन करें और उनको लक्ष्य करके यज्ञ सम्पन्न करें अर्थात् देवों के पोषण के लिए हविष्यान्न ग्रहण करें ॥ १ ॥

१२४ मधुमन्तं तनूनपाद् यज्ञं देवेषु नः कवे । अद्या कृणुहि वीतये ॥ २ ॥

ऊर्ध्वगामी, मेधावी हे अग्निदेव ! हमारी रक्षा के लिए प्राणवर्द्धक मधुर हवियों को देवों के निमित्त प्राप्त करें और उन तक पहुँचाएँ ॥ २ ॥

१२५, नराशंसमिह प्रियमस्मिन् यज्ञ उप ह्वये । मधुजिह्वं हविष्कृतम् ॥ ३ ॥

हम इस यज्ञ में देवताओं के प्रिय और आह्लादक (मधुजिह्व) अग्निदेव का आवाहन करते हैं। वह हमारी हवियों को देवताओं तक पहुँचाने वाले हैं, अस्तु, वे स्तुत्य हैं ॥ ३ ॥

१२६. अग्ने सुखतमे रथे देवाँ ईळित आ वह । असि होता मनुर्हितः ॥ ४ ॥

मानवमात्र के हितैषी हे अग्निदेव! आप अपने श्रेष्ठ सुखदायी रथ से देवताओं को लेकर (यज्ञस्थल पर) पधारें । हम आपकी वन्दना करते हैं ॥ ४ ॥

१२७. स्तृणीत बर्हिरानुषम् घृतपृष्ठं मनीषिणः । यत्रामृतस्य चक्षणम् ॥ ५ ॥

हे मेधावी पुरुषो ! आप इस यज्ञ में कुशा के आसनों को परस्पर मिलाकर इस तरह बिछाएँ कि उस पर घृत-पात्र को भली प्रकार रखा जा सके, जिससे अमृततुल्य घृत का सम्यक् दर्शन हो सके ॥ ५ ॥

१२८. वि श्रयन्तामृतावृधो द्वारो देवीरसश्चतः । अद्या नूनं च यष्टवे ॥ ६ ॥

आज यज्ञ करने के लिए निश्चित रूप से ऋत (यज्ञीय वातावरण) की वृद्धि करने वाले अविनाशी दिव्य द्वार खुल जाएँ ॥ ६ ॥

१२९. नक्तोषासा सुपेशसास्मिन् यज्ञ उप ह्वये । इदं नो बर्हिरासदे ॥ ७ ॥

सुन्दर रूपवती रात्रि और उषा का हम इस यज्ञ में आवाहन करते हैं । हमारी ओर से आसन रूप में यह बर्हि (कुश) प्रस्तुत है ॥ ७ ॥

१३०. ता सुजिह्वा उप ह्वये होतारा दैव्या कवी । यज्ञं नो यक्षतामिमम् ॥ ८ ॥

उन उत्तम वचन वाले और मेधावी दोनों (अग्नियों) दिव्य होताओं को यज्ञ में यजन के निमित्त हम बुलाते हैं ॥ ८ ॥

१३१. इळा सरस्वती मही तिस्रो देवीर्मयोभुवः । बर्हिः सीदन्त्वस्त्रियः ॥ ९ ॥

इळा, सरस्वती और मही ये तीनों देवियाँ सुखकारी और क्षयरहित हैं । ये तीनों बिछे हुए दीप्तिमान् कुश के आसनों पर विराजमान हों ॥ ९ ॥

१३२. इह त्वष्टारमग्रियं विश्वरूपमुप ह्वये । अस्माकमस्तु केवलः ॥ १० ॥

प्रथम पूज्य, विविध रूप वाले त्वष्टादेव का इस यज्ञ में आवाहन करते हैं, वे देव केवल हमारे ही हों ॥ १० ॥

१३३. अव सृजा वनस्पते देव देवेभ्यो हविः । प्र दातुरस्तु चेतनम् ॥ ११ ॥

हे वनस्पतिदेव ! आप देवों के लिए नित्य हविष्यान्न प्रदान करने वाले दाता को प्राणरूप उत्साह प्रदान करें ॥ ११ ॥

१३४. स्वाहा यज्ञं कृणोतनेन्द्राय यज्वनो गृहे । तत्र देवाँ उप ह्वये ॥ १२ ॥

(हे अध्वर्यु !) आप याजकों के घर में इन्द्रदेव की तुष्टि के लिये आहुतियाँ समर्पित करें । हम होता वहाँ देवों को आमन्त्रित करते हैं ॥ १२ ॥

(विगत मे अंग्रेजी अनुवाद सँ हिन्दी अनुवाद कार्य बेस सन्तोषजनक, सुबोधगम्य आ सहज लगबाक कारण एतय सँ मात्र हिन्दी अनुवाद केर अध्ययन सामग्री संकलन कय रहल छी । लक्ष्य अछि जे सब बात मैथिली मे मनन कयला उपरान्त लिखब – अनुवाद करब ।)

[ सूक्त – १४ ]

[ऋषि – मेधातिथि काण्व । देवता – विश्वेदेवा । छन्द – गायत्री ।)

१३५. ऐभिरग्ने दुवो गिरो विश्वेभिः सोमपीतये । देवेभिर्याहि यक्षि च ॥ १ ॥

हे अग्निदेव ! आप समस्त देवों के साथ इस यज्ञ में सोम पीने के लिए आएँ एवं हमारी परिचर्या और स्तुतियों को ग्रहण करके यज्ञ कार्य सम्पन्न करें ॥ १ ॥

१३६. आ त्वा कण्वा अहूषत गृणन्ति विप्र ते धियः । देवेभिरग्न आ गहि ॥ २ ॥

हे मेधावी अग्निदेव ! कण्वऋषि आपको बुला रहे हैं, वे आपके कार्यों की प्रशंसा करते हैं । अतः आप देवों के साथ यहां पधारे ॥ २ ॥

१३७. इन्द्रवायू बृहस्पतिं मित्राग्निं पूषणं भगम् । आदित्यान् मारुतं गणम् ॥ ३ ॥

यज्ञशाला में हम इन्द्र, वायु, बृहस्पति, मित्र, अग्नि, पूषण, भग, आदित्यगण और मरुद्‌गण आदि देवों का आवाहन करते हैं ॥ ३ ॥

१३८. प्र वो भ्रियन्त इन्दवो मत्सरा माद‌यिष्णवः । द्रप्सा मध्वश्चमूषदः ॥ ४ ॥

कूट-पीसकर तैयार किया हुआ, आनन्द और हर्ष बढ़ाने वाला यह मधुर सोमरस अग्निदेव के लिए चमस्रादि पात्रों में भरा हुआ है ॥ ४ ॥

१३९. ईळते त्वामवस्यवः कण्वासो वृक्तबर्हिषः । हविष्मन्तो अरङ्कृतः ॥ ५ ॥

कण्व ऋषि के वंशज अपनी सुरक्षा की कामना से, कुश-आसन बिछाकर हविष्यान्न व अलंकारों से युक्त होकर अग्निदेव की स्तुति करते हैं ॥ ५ ॥

१४०. घृतपृष्ठा मनोयुजो ये त्वा वहन्ति वह्नयः । आ देवान्त्सोमपीतये ॥ ६ ॥

अतिदीप्तिमान् पृष्ठ भाग वाले, मन के संकल्प मात्र से ही रथ में नियोजित हो जाने वाले अश्वों (से खींचे गये रथ) द्वारा आप सोमपान के निमित देवों को ले आएँ ॥ ६ ॥

१४१. तान् यजत्राँ ऋतावृधोऽग्ने पत्नीवतस्कृधि । मध्वः सुजिह्व पायय ॥ ७ ॥

हे अग्निदेव ! आप यज्ञ की समृद्धि एवं शोभा बढ़ाने वाले पूजनीय इन्द्रादि देव को सपलीक इस यज्ञ में बुलाएँ तथा उन्हें मधुर सोमरस का पान कराएँ ॥ ७ ॥

१४२. ये यजत्रा य ईड्यास्ते ते पिबन्तु जिह्वया । मधोरग्ने वषट्कृति ॥ ८ ॥

हे अग्निदेव ! यजन किये जाने योग्य और स्तुति किये जाने योग्य जो देवगण हैं, वे यज्ञ में आपकी जिह्वा से आनन्दपूर्वक मधुर सोमरस का पान करें ॥ ८ ॥

१४३. आकीं सूर्यस्य रोचनाद् विश्वान् देवाँ उषर्बुधः । विप्रो होतेह वक्षति ॥ ९ ॥

हे मेधावी होतारूप अग्निदेव ! आप प्रातःकाल में जागने वाले विश्वेदेवों को सूर्य-रश्मियों से युक्त करके हमारे पास लाते हैं ॥ ९ ॥

१४४. विश्वेभिः सोम्यं मध्वग्न इन्द्रेण वायुना । पिबा मित्रस्य धामभिः ॥ १० ॥

हे अग्निदेव ! आप इन्द्र, वायु, मित्र आदि देवों के सम्पूर्ण तेजों के साथ मधुर सोमरस का पान करें ॥ १० ॥

१४५. त्वं होता मनुर्हितोऽग्ने यज्ञेषु सीदसि । सेमं नो अध्वरं यज ॥ ११ ॥

हे मनुष्यों के हितैषी अग्निदेव ! आप होता के रूप में यज्ञ में प्रतिष्ठित हों और हमारे इस हिसारहित यज्ञ को सम्पन्न करें ॥ ११ ॥

१४६. युक्ष्वा ह्यरुषी रथे हरितो देव रोहितः । ताभिर्देवाँ इहा वह ॥ १२ ॥

हे अग्निदेव ! आप रोहित नामक रथ को ले जाने में सक्षम, तेजगति वाली घोड़ियों को रथ में जोतें एवं उनके द्वारा देवताओं को इस यज्ञ में लाएँ ॥ १२ ॥

[ सूक्त – १५ ]

[ऋषि – मेधातिथि काण्व । देवता – (प्रतिदेवता ऋतु सहित) १.५ इन्द्र, २ मरुद्गण, ३ त्वष्टा, ४, १२ अग्नि, ६ मित्रावरुण, ७, १० द्रविणोदा, ११ अश्विनीकुमार । छन्द – गायत्री । ॥

१४७. इन्द्र सोमं पिब ऋतुना त्वा विशन्त्विन्दवः । मत्सरासस्तदोकसः ॥ १ ॥

हे इन्द्रदेव ! ऋतुओं के अनुकूल सोमरस का पान करें, ये सोमरस आपके शरीर में प्रविष्ट हों, क्योंकि आपकी तृप्ति का आश्रयभूत साधन यही सोम है ॥ १ ॥

१४८. मरुतः पिबत ऋतुना पोत्राद् यज्ञं पुनीतन । यूयं हि ष्ठा सुदानवः ॥ २ ॥

दानियों में श्रेष्ठ हे मरुतो ! आप पोता नामक ऋत्विज् के पात्र से ऋतु के अनुकूल सोमरस का पान करें एवं हमारे इस यज्ञ को पवित्रता प्रदान करें ॥ २ ॥

१४९. अभि यज्ञं गृणीहि नो ग्नावो नेष्टः पिब ऋतुना । त्वं हि रत्नधा असि ॥ ३ ॥

हे त्वष्टादेव ! आप पत्नी सहित हमारे यज्ञ की प्रशंसा करें, ऋतु के अनुकूल सोमरस का पान करें । आप निश्चय ही रत्नों को देने वाले हैं ॥ ३ ॥

१५०. अग्ने देवाँ इहा वह सादया योनिषु त्रिषु । परि भूष पिब ऋतुना ॥ ४ ॥

हे अग्निदेव ! आप देवों को यहाँ बुलाकर उन्हें यन के तीनों सवनों (प्रात, माध्यन्दिन एवं सायं) में आसीन करें । उन्हें विभूषित करके ऋतु के अनुकूल सोम का पान करें ॥ ४ ॥

१५१. ब्राह्मणादिन्द्र राधसः पिया सोममृतूँरनु । तवेद्धि सख्यमस्तृतम् ॥ ५ ॥

हे इन्द्रदेव ! आप ब्रह्मा को जानने वाले साधक के पात्र से सोमरस का पान करें, क्योंकि उनके साथ आपको अविच्छिन्न (अटूट) मित्रता है ॥ ५ ॥

१५२. युवं दक्षं धृतवत मित्रावरुण दूळभम् । ऋतुना यज़माशाथे ॥ ६ ॥

हे अटल व्रत वाले मित्रावरुण ! आप दोनों ऋतु के अनुसार बल प्रदान करने वाले हैं । आप कठिनाई से सिद्ध होने वाले इस यज्ञ को सम्पन्न करते हैं ॥ ६ ॥

१५३. द्रविणोदा द्रविणसो ग्रावहस्तासो अध्वरे । यज्ञेषु देवमीळते ॥ ७ ॥

धन की कामना वाले याजक सोमरस तैयार करने के निमित्त हाथ में पत्थर धारण करके पवित्र यज्ञ में धनप्रदायक अग्निदेव की स्तुति करते हैं ॥ ७ ॥

१५४. द्रविणोदा ददातु नो वसूनि यानि शृण्विरे । देवेषु ता वनामहे ॥ ८ ॥

हे धनप्रदायक अग्निदेव ! हमें वे सभी धन प्रदान करें, जिनके विषय में हमने श्रवण किया है । वे समस्त धन हम देवगणों को ही अर्पित करते हैं ॥ ८ ॥

[देव-शक्तियों से प्राप्त विभूतियों का उपयोग देवकार्यों के लिये ही करने का भाव व्यक्त किया गया है ।]

१५५. द्रविणोदाः पिपीषति जुहोत प्र च तिष्ठत । नेष्टादृतुभिरिष्यत ॥ ९ ॥

धनप्रदायक अग्निदेव नेष्टापात्र (नेष्ट्धिष्ण्या स्थान-यज्ञ कुण्ड) से ऋतु के अनुसार सोमरस पीने की इच्छा करते हैं । अतः हे याजकगण ! आप वहाँ जाकर यज्ञ करें और पुनः अपने निवास स्थान के लिये प्रस्थान करें ॥ ९ ॥

१५६. यत् त्वा तुरीयमृतुभिर्द्रविणोदो यजामहे । अघ स्मा नो ददिर्भव ॥ १० ॥

हे धनप्रदायक अग्निदेव ! ऋतुओं के अनुगत होकर हम आपके निमित्त सोम के चौथे भाग को अर्पित करते हैं, इसलिए आप हमारे लिये धन प्रदान करने वाले हों ॥ १० ॥

१५७. अश्विना पिबतं मधु दीद्यग्नी शुचिव्रता । ऋतुना यज्ञवाहसा ॥ ११ ॥

दीप्तिमान्, शुद्ध कर्म करने वाले, ऋतु के अनुसार यज्ञवाहक हे अश्विनीकुमारो ! आप इस मधुर सोमरस का पान करें ॥ ११ ॥

१५८. गार्हपत्येन सन्त्य ऋतुना यज्ञनीरसि । देवान् देवयते यज ॥ १२ ॥

हे इष्टप्रद अग्निदेव ! आप गार्हपत्य के नियमन में ऋतुओं के अनुगत यज्ञ का निर्वाह करने वाले हैं, अतः देवत्व प्राप्ति की कामना वाले याजकों के निमित्त देवों का यजन करें ॥ १२ ॥

[ सूक्त – १६ ]

[ऋषि – मेधातिथि काण्व । देवता – इन्द्र । छन्द-गायत्री । ]

१५९. आ त्वा वहन्तु हरयो वृषणं सोमपीतये । इन्द्र त्वा सूरचक्षसः ॥ १ ॥

हे बलवान् इन्द्रदेव ! आपके तेजस्वी घोड़े सोमरस पीने के लिए आपको यज्ञस्थल पर लाएँ तथा सूर्य के समान प्रकाशयुक्त ऋत्विज् मन्त्रों द्वारा आपकी स्तुति करें ॥ १ ॥

१६०. इमा धाना घृतस्नुवो हरी इहोप वक्षतः। इन्द्रं सुखतमे रथे ॥ २ ॥

अत्यन्त सुखकारी रथ में नियोजित इन्द्रदेव के दोनों हरि (घोड़े) उन्हें (इन्द्रदेव को) घृत से स्निग्ध हवि रूप धाना (भुने हुए जौ) ग्रहण करने के लिए यहाँ ले आएँ ॥ २ ॥

१६१. इन्द्रं प्रातर्हवामह इन्द्रं प्रयत्यध्वरे । इन्द्रं सोमस्य पीतये ॥ ३ ॥

हम प्रातःकाल यज्ञ प्रारम्भ करते समय मध्याह्नकालीन सोमयाग प्रारम्भ होने पर तथा सायंकाल यज्ञ की समाप्ति पर भी सोमरस पीने के निमित इन्द्रदेव का आवाहन करते हैं ॥ ३ ॥

१६२. उ प नः सुतमा गहि हरिभिरिन्द्र केशिभिः । सुते हि त्वा हवामहे ॥ ४ ॥

हे इन्द्रदेव । आप अपने केसर युक्त अश्वों से सोम के अभिषव, स्थान के पास आएँ । सोम के अभिषुत होने पर हम आपका आवाहन करते हैं ॥ ४ ॥

१६३. सेमं नः स्तोममा गद्युपेदं सवनं सुतम् । गौरो न तृषितः पिब ॥ ५ ॥

हे इन्द्रदेव ! हमारे स्तोत्रों का श्रवण कर आप यहाँ आएँ । प्यासे गौर मृग के सदृश व्याकुल मन से सोम के अभिषव स्थान के समीप आकर सोम का पान करें ॥ ५ ॥

१६४. इमे सोमास इन्दवः सुतासो अधि बर्हिषि । ताँ इन्द्र सहसे पिब ॥ ६ ॥

हे इन्द्रदेव ! यह दीप्तिमान् सोम निष्पादित होकर कुश-आसन पर सुशोभित है । शक्ति – वर्द्धन के निमित्त आप इसका पान करें ॥ ६ ॥

१६५. अयं ते स्तोमो अग्रियो हृदिस्पृगस्तु शंतमः । अथा सोमं सुतं पिब ॥ ७ ॥

हे इन्द्रदेव ! यह स्तोत्र श्रेष्ठ मर्मस्पर्शी और अत्यन्त सुखकारी है । अब आप इसे सुनकर अभिषुत सोमरस का पान करें ॥ ७ ॥

१६६. विश्वमित्सवनं सुतमिन्द्रो मदाय गच्छति । वृत्रहा सोमपीतये ॥ ८ ॥

सोम के सभी अभिषव स्थानों की ओर इन्द्रदेव अवश्य जाते हैं । दुष्टों का हनन करने वाले इन्द्रदेव सोमरस पीकर अपना हर्ष बढ़ाते हैं ॥ ८ ॥

१६७. सेमं नः काममा पृण गोभिरश्वैः शतक्रतो । स्तवाम त्वा स्वाध्यः ॥ ९ ॥

हे शतकर्मा इन्द्रदेव ! आप हमारी गौओं और अश्वों सम्बन्धी कामनायें पूर्ण करें । हम मनोयोगपूर्वक आपकी स्तुति करते हैं ।

[ सूक्त – १७ ]

[ ऋषि – मेधातिथि काण्व । देवता – इन्द्रावरुण । छन्द – गायत्री ४ पादनिवृत् गायत्री, ५ हसीयसी गायत्री ]

१६८. इन्द्रावरुणयोरहं सम्राजोरव आ वृणे । ता नो मृळात ईदृशे ॥ १ ॥

हम इन्द्र और वरुण दोनों प्रतापी देवों से अपनी सुरक्षा की कामना करते हैं । वे दोनों हम पर इस प्रकार अनुकम्पा करें, जिससे कि हम सुखी रहें ॥ १ ॥

१६९. गन्तारा हि स्थोऽवसे हवं विप्रस्य मावतः । धर्तारा चर्षणीनाम् ॥ २ ॥

हे इन्द्र और वरुणदेवो ! आप दोनों, मनुष्यों के सम्राट्, धारक एवं पोषक हैं । हम जैसे बाह्मणों के आवाहन पर सुरक्षा के लिए आप निश्चय ही आने को उद्यत रहते हैं ॥ २ ॥

१७०. अनुकामं तर्पयेथामिन्द्रावरुण राय आ । ता वां नेदिष्ठमीमहे ॥ ३ ॥

हे इन्द्र और वरुणदेवो ! हमारी कामनाओं के अनुरूप धन देकर हमें संतुष्ट करें । आप दोनों के समीप पहुंचकर हम प्रार्थना करते हैं ॥ ३ ॥

१७१. युवाकु हि शचीनां युवाकु सुमतीनाम् । भूयाम वाजदान्वाम् ॥ ४ ॥

हमारे कर्म संगठित हो, हमारी सद्‌बुद्धियों संगठित हो. हम अग्रगण्य होकर दान करने वाले बनें ॥ ४ ॥

१७२. इन्द्रः सहस्त्रदानां वरुणः शंस्यानाम् । क्रतुर्भवत्युक्थ्यः ॥ ५ ॥

इन्द्रदेव सहस्रो दाताओं में सर्वश्रेष्ठ हैं और वरुणदेव सहस्रों प्रशंसनीय देवों में सर्वश्रेष्ठ हैं ॥ ५ ॥

१७३. तयोरिदवसा वयं सनेम नि च धीमहि । स्यादुत प्ररेचनम् ॥ ६ ॥

आपके द्वारा सुरक्षित धन को प्राप्त कर हम उसका श्रेष्ठतम उपयोग करें । वह धन हमें विपुल मात्रा में प्राप्त हो ॥ ६ ॥

१७४. इन्द्रावरुण वामहं हुवे चित्राय राधसे । अस्मान्त्सु जिग्युषस्कृतम् ॥ ७ ॥

हे इन्द्रावरुण देवो । विविध प्रकार के धन की कामना से हम आपका आवाहन करते हैं । आप हमें उत्तम विजय प्राप्त कराएँ ॥ ७ ॥

१७५. इन्द्रावरुण नू नु वां सिषासन्तीषु धीष्वा । अस्मभ्यं शर्म यच्छतम् ॥ ८ ॥

हे इन्द्रावरुण देवो ! हमारी बुद्धियाँ सम्यक् रूप से आपकी सेवा करने की इच्छा करती हैं, अतः हमें शीघ्र ही निश्चयपूर्वक सुख प्रदान करें ॥ ८ ॥

१७६. प्र वामश्नोतु सुष्टुतिरिन्द्रावरुण यां हुवे । यामृधाथे सधस्तुतिम् ॥ ९ ॥

हे इन्द्रावरुण देवो! जिन उत्तम स्तुतियों के लिए (प्रति) हम, आप दोनों का आवाहन करते हैं एवं जिन स्तुतियों को साथ-साथ प्राप्त करके आप दोनों पुष्ट होते हैं. वे स्तुतियां आपको प्राप्त हो ॥ ९ ॥

[ सूक्त – १८ ]

[ऋषि- मेधातिथि काण्व । देवता – १-३ बह्मणस्पति, ४ इन्द्र, ब्रह्मणस्पति, सोम ५ ब्रह्मणस्पति, दक्षिणा, ६-८ सदसस्पति, ९ सदसस्पति या नराशंस । छन्द – गायत्री । ]

१७७. सोमानं स्वरणं कृणुहि ब्रह्मणस्पते । कक्षीवन्तं य औशिजः ॥ १ ॥

हे सम्पूर्ण ज्ञान के अधिपति ब्रह्मणस्पति देव ! सोम का सेवन करने वाले यजमान को आप उशिज् के पुत्र कक्षीवान् की तरह श्रेष्ठ प्रकाश से युक्त करें ॥ १ ॥

१७८. यो रेवान् यो अमीवहा वसुवित् पुष्टिवर्धनः । स नः सिषक्तु यस्तुरः ॥ २ ॥

ऐश्वर्यवान्, रोगों का नाश करने वाले, धन प्रदाता और पुष्टिवर्धक तथा जो शोध फलदायक हैं, वे ब्रह्मणस्पतिदेव, हम पर कृपा करें ॥ २ ॥

१७९. मा नः शंसो अररुषो धूर्तिः प्रणङ् मर्त्यस्य । रक्षा णो ब्रह्मणस्पते ॥ ३ ॥

हे ब्रह्मणस्पतिदेव ! यज्ञ न करने वाले तथा अनिष्ट चिन्तन करने वाले दुष्ट शत्रु का हिंसक दुष्ट प्रभाव हम पर न पड़े । आप हमारी रक्षा करें ॥ ३ ॥

१८०. स घा वीरो न रिष्यति यमिन्द्रो ब्रह्मणस्पतिः । सोमो हिनोति मर्त्यम् ॥ ४ ॥

जिस मनुष्य को इन्द्रदेव ब्रह्मणस्पतिदेव और सोमदेव प्रेरित करते हैं, वह वीर कभी नष्ट नहीं होता ॥ ४ ॥

(इन्द्र से संगठन की, ब्रह्मणस्पति से श्रेष्ठ मार्गदर्शन की एवं सोम से पोषण की प्राप्ति होती है । इनसे युक्त मनुष्य क्षीण नहीं होता । ये तीनों देव यज्ञ में एकत्रित होते हैं । यज्ञ से प्रेरित मनुष्य दुःखी नहीं होता वरन् देवत्व प्राप्त करता है ।)

१८१. त्वं तं ब्रह्मणस्पते सोम इन्द्रश्च मर्त्यम् । दक्षिणा पात्वंहसः ॥ ५ ॥

हे बह्मणस्पते । आप सोमदेव, इन्द्रदेव और दक्षिणादेवी के साथ मिलकर यज्ञादि अनुष्ठान करने वाले मनुष्य की पापों से रक्षा करें ॥ ५ ॥

१८२. सदसस्पतिमद्भुतं प्रियमिन्द्रस्य काम्यम् । सनिं मेधामयासिषम् ॥ ६ ॥

इन्द्रदेव के प्रिय मित्र, अभीष्ट पदार्थों को देने में समर्थ, लोकों का मर्म समझने में सक्षम सदसस्पतिदेव (सत्प्रवृत्तियों के स्वामी) से हम अ‌द्भुत मेधा प्राप्त करना चाहते हैं ॥ ६ ॥

१८३. यस्मादृते न सिध्यति यज्ञो विपश्चितश्चन । स धीनां योगमिन्वति ॥ ७ ॥

जिनकी कृपा के बिना ज्ञानी का भी यज्ञ पूर्ण नहीं होता, वे सदसस्पतिदेव हमारी बुद्धि को उत्तम प्रेरणाओं से युक्त करते हैं ॥ ७ ॥

[सदाशयता जिनमें नहीं, ऐसे विद्वानों द्वारा यज्ञीय प्रयोजनों की पूर्ति नहीं होती ।]

१८४. आदृध्नोति हविष्कृतिं प्राञ्चं कृणोत्यध्वरम् । होत्रा देवेषु गच्छति ॥ ८ ॥

वे सदसस्पतिदेव हविष्यान्न तैयार करने वाले साधकों तथा यज्ञ को प्रवृद्ध करते हैं और वे ही हमारी स्तुतियों को देवों तक पहुँचाते हैं ॥ ८ ॥

१८५. नराशंसं सुधृष्टममपश्यं सप्रथस्तमम् । दिवो न सद्ममखसम् ॥ ९ ॥

द्युलोक के सदृश अतिदीप्तिमान्, तेजवान्, यशस्वी और मुनष्यों द्वारा प्रशंसित सदसस्पतिदेव को हमने देखा है ॥ ९ ॥

[ सूक्त – १९ ]

[ ऋषि – मेधातिथि काण्व । देवता – अग्नि और मरुद्गण । छन्द – गायत्री । ]

१८६. प्रति त्यं चारुमध्वरं गोपीथाय प्र हूयसे । मरुद्भिरग्न आ गहि ॥ १ ॥

हे अग्निदेव ! श्रेष्ठ यज्ञों की गरिमा के संरक्षण के लिए हम आपका आवाहन करते हैं, आपको मरुतों के साथ आमंत्रित करते हैं. अतः देवताओं के इस यज्ञ में आप पधारें ॥ १ ॥

१८७. नहि देवो न मर्त्यो महस्तव क्रतुं परः । मरुद्भिरग्न आ गहि ॥ २ ॥

हे अग्निदेव ! ऐसा न कोई देव है, न ही कोई मनुष्य, जो आपके द्वारा सम्पादित महान् कर्म को कर सके । ऐसे समर्थ आप मरुद्‌गणों के साथ इस यज्ञ में पधारें ॥ २ ॥

१८८. ये महो रजसो विदुर्विश्वे देवासो अद्रुहः। मरुद्भिरग्न आ गहि ॥ ३ ॥

जो मरुद्गण पृथ्वी पर श्रेष्ठ जल वृष्टि करने की (विधि जानते हैं या) क्षमता से सम्पन्न हैं । हे अग्निदेव ! आप उन द्रोहहित मरुद्‌गणों के साथ इस यज्ञ में पधारें ॥ ३ ॥

१८९. य उग्रा अर्कमान्चुरनाधृष्टास ओजसा । मरुद्भिरग्न आ गहि ॥ ४ ॥

हे अग्निदेव ! जो अति बलशाली, अजेय और अत्यन्त प्रचण्ड सूर्य के सदृश प्रकाशक हैं । आप उन मरुद्गणों के साथ यहाँ पधारें ॥ ४ ॥

१९०. ये शुभ्रा घोरवर्पसः सुक्षत्रासो रिशादसः । मरुद्भिरग्न आ गहि ॥ ५ ॥

जो शुभ्र तेजों से युक्त, तीक्ष्ण, वेधक रूप वाले, श्रेष्ठ बल – सम्पन्न और शत्रु का संहार करने वाले हैं । हे अग्निदेव! आप उन मरुतों के साथ यहाँ पधारें ॥ ५ ॥

१९१. ये नाकस्याधि रोचने दिवि देवास आसते । मरुद्भिरग्न आ गहि ॥ ६ ॥

हे अग्निदेव ! ये जो मरुद्गण सबके ऊपर अधिष्ठित, प्रकाशक, द्युलोक के निवासी हैं, आप उन मरुद्गणों के साथ पधारें ॥ ६ ॥

१९२. य ईङ्ख्यन्ति पर्वतान् तिरः समुद्रमर्णवम् । मरुद्भिरग्न आ गहि ॥ ७ ॥

हे अग्निदेव ! जो पर्वत सदृश विशाल मेघों को एक स्थान से सुदूरस्थ दूसरे स्थान पर ले जाते हैं तथा जो शान्त समुद्रों में भी ज्वार पैदा कर देते हैं (हलचल पैदा कर देते हैं), ऐसे उन मरुद्‌गणों के साथ आप यज्ञ में पधारें ॥ ७ ॥

१९३. आ ये तन्वन्ति रश्मिभिस्तिरः समुद्रमोजसा । मरुद्भिरग्न आ गहि ॥ ८ ॥

हे अग्निदेव । जो सूर्य की रश्मियों के साथ संव्याप्त होकर समुद्र को अपने ओज से प्रभावित करते हैं, उन मरुतों के साथ आप यहाँ पधारें ॥ ८ ॥

९४. अभि त्वा पूर्वपीतये सृजामि सोम्यं मधु । मरुद्भिरग्न आ गहि ॥ ९ ॥

हे अग्निदेव ! सर्वप्रथम आपके सेवनार्थ यह मधुर सोमरस हम अर्पित करते हैं, अतः आप मरुतों के साथ यहाँ पधारें ॥ ९ ॥

[ सूक्त – २० ]

[ ऋषि – मेधातिथि काण्व । देवता – ऋभुगण । छन्द – गायत्री । ]

१९५. अयं देवाय जन्मने स्तोमो विप्रेभिरासया । अकारि रत्नधातमः ॥ १ ॥

ऋभुदेवों के निमित्त ज्ञानियों ने अपने मुख से इन रमणीय स्तोत्रों को रचना की तथा उनका पाठ किया ॥ १ ॥

१९६. य इन्द्राय वचोयुजा ततक्षुर्मनसा हरी। शमीभिर्यज्ञमाशत ॥ २ ॥

जिन ऋभुदेवों ने अतिकुशलतापूर्वक इन्द्रदेव के लिए वचन मात्र से नियोजित होकर चलने वाले अश्वों की रचना की, वे शमी आदि (यज्ञ पात्र अथवा पाप शमन करने वाले देवों) के साथ यज्ञ में सुशोभित होते हैं ॥ २ ॥

[चमस एक प्रकार के पात्र का नाम है, जिसे भी देव भाव से सम्बोधित किया गया है । ]

१९७. तक्षन्नासत्याभ्यां परिज्मानं सुखं रथम् । तक्षन्धेनुं सबर्दुघाम् ॥ ३ ॥

उन ऋभुदेवों ने अश्विनीकुमारों के लिए अति सुखप्रद, सर्वत्र गमनशील रथ का निर्माण किया और गौओं को उत्तम दूध देने वाली बनाया ॥ ३ ॥

१९८. युवाना पितरा पुनः सत्यमत्र ऋजूयवः । ऋभवो विष्ट्यक्रत ॥ ४ ॥

अमोघ मन्त्र सामर्थ्य से युक्त, सर्वत्र व्याप्त रहने वाले ऋभुदेवों ने माता-पिता में स्नेहभाव संचरित कर उन्हें पुनः जवान बनाया ॥ ४ ॥

(यहाँ जरावस्था दूर करने की मन्त्र विद्या का संकेत है ।)

१९९. सं वो मदासो अग्मतेन्द्रेण च मरुत्वता । आदित्येभिश्च राजभिः ॥ ५ ॥

हे ऋभुदेवो ! यह हर्षप्रद सोमरस इन्द्रदेव, मरुतों और दीप्तिमान् आदित्यों के साथ आपको अर्पित किया जाता है ॥ ५ ॥

२००. उत त्यं चमसं नवं त्वष्टुर्देवस्य निष्कृतम् । अकर्त चतुरः पुनः ॥ ६ ॥

त्वष्टादेव के द्वारा एक ही चमस तैयार किया गया था, ऋभुदेवों ने उसे चार प्रकार का बनाकर प्रयुक्त किया ॥ ६ ॥

२०१. ते नो रत्नानि धत्तन त्रिरा साप्तानि सुन्वते । एकमेकं सुशस्तिभिः ॥ ७ ॥

वे उत्तम स्तुतियों से प्रशंसित होने वाले ऋभुदेव ! सोमयाग करने वाले प्रत्येक याजक को तीनों कोटि के सप्तरत्नों अर्थात् इक्कीस प्रकार के रत्नों (विशिष्ट यज्ञ कर्मों) को प्रदान करें । (यज्ञ के तीन विभाग हैं – हविर्यज्ञ, पाकयज्ञ एवं सोमयज्ञ । तीनों के सात-सात प्रकार हैं । इस प्रकार यज्ञ के इक्कीस प्रकार कहे गये हैं ।) ॥७ ॥

२०२. अधारयन्त वह्नयोऽभजन्त सुकृत्यया । भागं देवेषु यज्ञियम् ॥ ८ ॥

तेजस्वी ऋभुदेवों ने अपने उत्तम कर्मों से देवों के स्थान पर अधिष्ठित होकर यज्ञ के भाग को धारण कर उसका सेवन किया ॥ ८ ॥

[ सूक्त – २१ ]

[ ऋषि – मेधातिषि काण्व । देवता – इन्द्राग्नी । छन्द – गायत्री । ]

२०३. इहेन्द्राग्नी उप ह्वये तयोरित्स्तोममुश्मसि । ता सोमं सोमपातमा ॥ १ ॥

इस यज्ञ स्थल पर हम इन्द्र एवं अग्निदेवों का आवाहन करते हैं, सोमपान के उन अभिलाषियों की स्तुति करते हुए सोमरस पीने का निवेदन करते हैं ॥ १ ॥

२०४. ता यज्ञेषु प्र शंसतेन्द्राग्नी शुम्भता नरः । ता गायत्रेषु गायत ॥ २ ॥

हे ऋत्विजो ! आप यज्ञानुष्ठान करते हुए इन्द्र एवं अग्निदेवों की शस्त्रों (स्तोत्रों) से स्तुति करें, विविध अलंकारों से उन्हें विभूषित करें तथा गायत्री छन्दवाले सामगान (गायत्र साम) करते हुए उन्हें प्रसन्न करें ॥ २ ॥

२०५, ता मित्रस्य प्रशस्तय इन्द्राग्नी ता हवामहे । सोमपा सोमपीतये ॥ ३ ॥

सोमपान की इच्छा करने वाले मित्रता एवं प्रशंसा के योग्य उन इन्द्र एवं अग्निदेवों को हम सोमरस पीने के लिए बुलाते हैं ॥ ३ ॥

२०६. उग्रा सन्ता हवामह उपेदं सवनं सुतम् । इन्द्राग्नी एह गच्छताम् ॥ ४ ॥

अति उग्र देवगण इन्द्र एवं अग्निदेवों को सोम के अभिषव स्थान (यज्ञस्थल) पर आमन्त्रित करते हैं, वे यहाँ पधारें ॥ ४ ॥

२०७. ता महान्ता सदस्पती इन्द्राग्नी रक्ष उब्जतम् । अप्रजाः सन्त्वत्रिणः ॥ ५ ॥

देवों में महान् वे इन्द्र-अग्निदेव सत्पुरुषों के स्वामी (रक्षक) हैं । वे राक्षसों को वशीभूत कर सरल स्वभाव वाला बनाएँ और मनुष्य भक्षक राक्षसों को मित्र बांधवों से रहित करके निर्बल बनाएँ ॥ ५ ॥

२०८. तेन सत्येन जागृतमधि प्रचेतुने पदे । इन्द्राग्नी शर्म यच्छतम् ॥ ६ ॥

हे इन्द्राग्ने ! सत्य और चैतन्यरूप यज्ञस्थान पर आप संरक्षक के रूप में जागते रहें और हमें सुख प्रदान करें ।

[ सूक्त – २२ ]

[ ऋषि – मेधातिथि काण्व । देवता – १-४ अश्विनी कुमार, ५-८ सविता, ९-१० अग्नि, ११ देवियाँ, १२-इन्द्राणी, वरुणानी, अग्नायी, १३-१४ द्यावा पृथिवी, १५ पृथिवी, १६ विष्णु अथवा देवगण, १७-२१ विष्णु । छन्द – गायत्री । ]

२०९. प्रातर्युजा वि बोधयाश्विनावेह गच्छताम् । अस्य सोमस्य पीतये ॥ १ ॥

(हे अध्वर्युगण) प्रातःकाल चेतनता को प्राप्त होने वाले अश्विनीकुमारों को जगायें । वे हमारे इस यज्ञ में सोमपान करने के निमित्त पधारें ॥ १ ॥

२१०. या सुरथा रथीतमोभा देवा दिविस्पृशा । अश्विना ता हवामहे ॥ २ ॥

ये दोनों अश्विनीकुमार सुसज्जित रथों से युक्त महान् रथी हैं । ये आकाश में गमन करते हैं । इन दोनों का हम आवाहन करते हैं ॥ २ ॥

[ यहाँ मंत्रशक्ति से चालित, आकाश मार्ग से चलने वाले यान (रथों) का उल्लेख किया गया है । ]

२११. या वां कशा मधुमत्यश्विना सूनृतावती । तया यज्ञं मिमिक्षतम् ॥ ३ ॥

हे अश्विनीकुमारो ! आपकी जो मधुर सत्यवचन युक्त कशा (चाबुक-वाणी) है, उससे यज्ञ को सिंचित करने की कृपा करें ॥ ३ ॥

[ वाणी रूपी चाबुक से स्पट होता है कि अश्विनी देवों के यान मंत्र चालित हैं । मधुर एवं सत्यवचन रूप क्चनों से यज्ञ का श्री सिंचन किया जाता है । कशा – चावुक से यज्ञ के सिंचन का भाव अटपटा लगते हुए भी युक्ति संगत है । ]

२१२. नहि वामस्ति दूरके यत्रा रथेन गच्छथः । अश्विना सोमिनो गृहम् ॥ ४ ॥

हे अश्विनीकुमारो ! आप रथ पर आरूढ़ होकर जिस मार्ग से जाते हैं, वहाँ से सोमयाग करने वाले याजक का घर दूर नहीं है ॥ ४ ॥

[ पूर्वोक्त मंत्र में वर्णित यान के तीव्र वेग का वर्णन है । ]

२१३. हिरण्यपाणिमूतये सवितारमुप ह्वये । स चेत्ता देवता पदम् ॥ ५ ॥

यजमान को (प्रकाश ऊर्जा आदि) देने वाले हिरण्यगर्भ (हाथ में सुवर्ण धारण करने वाले या सुनहरी किरणों वाले) सवितादेव का हम अपनी रक्षा के लिये आवाहन करते हैं । वे ही यजमान के द्वारा प्राप्तव्य (गन्तव्य) स्थान को विज्ञापित (प्रकाशित) करने वाले हैं ॥ ५ ॥

२१४. अपां नपातमवसे सवितारमुप स्तुहि । तस्य व्रतान्युश्मसि ॥ ६ ॥

हे ऋत्विज् । आप हमारी रक्षा के लिये सवितादेवता की स्तुति करें । हम उनके लिए सोमयागादि कर्म सम्पन्न करना चाहते हैं । वे सवितादेव जलों को सुखाकर पुनः सहस्रों गुना बरसाने वाले हैं ॥ ६ ॥

(सौर शक्ति से ही जल के शोधन, वर्षण एवं शोषण की प्रक्रिया चलाने की बात विज्ञान सम्मत है ।)

२१५. विभक्तारं हवामहे वसोश्चित्रस्य राधसः । सवितारं नृचक्षसम् ॥ ७ ॥

समस्त प्राणियों के आश्रयभूत, विविध धनों के प्रदाता, मानवमात्र के प्रकाशक सूर्यदेव का हम आवाहन करते हैं ॥ ७ ॥

२१६. सखाय आ नि षीदत सविता स्तोम्यो नु नः । दाता राधांसि शुम्भति ॥ ८ ॥

हे मित्रो ! हम सब बैठकर सवितादेव की स्तुति करें । धन-ऐश्वर्य के दाता सूर्यदेव अत्यन्त शोभायमान हैं ॥ ८ ॥

२१७. अग्ने पत्नीरिहा वह देवानामुशतीरुप । त्वष्टारं सोमपीतये ॥ ९ ॥

हे अग्निदेव ! यहाँ आने की अभिलाषा रखने वाली देवों की पत्नियों को यहाँ ले आएं और त्वष्टादेव को भी सोमपान के निमित बुलाएँ ॥ ९ ॥

२१८. आ ग्ना अग्न इहावसे होत्रां यविष्ठ भारतीम् । वरूत्रीं धिषणां वह ॥ १० ॥

हे अग्निदेव ! देवपत्नियों को हमारी सुरक्षा के निमित्त यहाँ ले आएँ । आप हमारी रक्षा के लिए अग्निपत्नी होत्रा, आदित्यपत्नी भारती, वरणीय वाग्देवी धिषणा आदि देयियों को भी यहाँ ले आएँ ॥ १० ॥

२१९. अभि नो देवीरवसा महः शर्मणा नृपत्नीः । अच्छिन्नपत्राः सचन्ताम् ॥११ ॥

अनवरुद्ध मार्ग वाली देव-पत्नियाँ मनुष्यों को ऐश्वर्यं देने में समर्थ हैं । वे महान् सुखों एवं रक्षण सामर्थ्यों से युक्त होकर हमारी ओर अभिमुख हों ॥ ११ ॥

२२०. इहेन्द्राणीमुप ह्वये वरुणानीं स्वस्तये । अग्नायीं सोमपीतये ॥ १२ ॥

अपने कल्याण के लिए एवं सोमपान के लिए हम इन्द्राणी, वरुणपत्नी (वरुणानी) और अग्निपत्नी (अग्नायी) का आवाहन करते हैं ॥ १२ ॥

२२१. मही द्यौः पृथिवी च न इमं यज्ञं मिमिक्षताम्। पिपृतां नो भरीमभिः ॥ १३ ॥

अति विस्तारयुक्त पृथ्वी और द्युलोक हमारे इस यज्ञकर्म को अपने-अपने अंशों द्वारा परिपूर्ण करें । वे भरण-पोषण करने वाली सामग्रियों (सुख – साधनों) से हम सभी को तृप्त करें ॥ १३ ॥

२२२. तयोरिघृतवत्पयो विप्रा रिहन्ति धीतिभिः । गन्धर्वस्य ध्रुवे पदे ॥ १४ ॥

गंधर्वलोक के ध्रुव स्थान में आकाश और पृथ्वी के मध्य में अवस्थित घृत के समान (सार रूप) जलों (पोषक प्रवाहों) को ज्ञानी जन अपने विवेकयुक्त कर्मों (प्रयासों) द्वारा प्राप्त करते हैं ॥ १४ ॥

२२३. स्योना पृथिवि भवानृक्षरा निवेशनी । यच्छा नः शर्म सप्रथः ॥ १५ ॥

हे पृथिवी देवि ! आप सुख देने वाली, बाधा हरने वाली और उत्तमवास देने वाली हैं । आप हमें विपुल परिमाण में सुख प्रदान करें ॥ १५ ॥

२२४. अतो देवा अवन्तु नो यतो विष्णुर्विचक्रमे । पृथिव्याः सप्त धामभिः ॥ १६ ॥

जहाँ से (यज्ञ स्थल अथवा पृथ्वी से) विष्णुदेव ने (पोषण परक) पराक्रम दिखाया, वहाँ (उस यज्ञीय क्रम में) पृथ्वी के सप्तधामों से देवतागण हमारी रक्षा करें ॥ १६ ॥

२२५. इदं विष्णुर्वि चक्रमे त्रेधा नि दधे पदम् । समूळ्हमस्य पांसुरे ॥ १७ ॥

यह सब विष्णुदेव का पराक्रम है, तीन प्रकार के (त्रिविध-त्रियामी) उनके चरण हैं । इसका मर्म धूलि भरे प्रदेश में निहित है ॥ १७ ॥

(त्रिआयामी सृष्टि के पोषण का जो अद्‌भुत पराक्रम दिखाता है । उसका रहस्य अंतरिक्षधूलि – सूक्ष्मकणों, सबएटामिक पार्टिकल्स के प्रवाह में सन्निहित है । उसी प्रवाह से सभी प्रकार के पोषक पदार्थ बनते – बदलते रहते हैं।)

२२६. त्रीणि पदा वि चक्रमे विष्णुर्गोपा अदाभ्यः । अतो धर्माणि धारयन् ॥ १८ ॥

विश्वरक्षक, अविनाशी विष्णुदेव तीनों लोकों में यज्ञादि कर्मों को पोषित करते हुए तीन चरणों से जगत् में व्याप्त हैं अर्थात् तीन शक्ति धाराओं (सृजन, पोषण और परिवर्तन) द्वारा विश्व का संचालन करते हैं ॥ १८ ॥

२२७. विष्णोः कर्माणि पश्यत यतो व्रतानि पस्यशे । इन्द्रस्य युज्यः सखा ॥ १९ ॥

हे याजको ! सर्वव्यापक भगवान् विष्णु के सृष्टि संचालन सम्बन्धी कार्यों को (प्रजनन, पोषण और परिवर्तन की प्रक्रिया को) ध्यान से देखो । इसमें अनेकानेक व्रतों (नियमों अनुशासनों) का दर्शन किया जा सकता है । इन्द्र (आत्मा) के योग्य मित्र उस परम सत्ता के अनुकूल बनकर रहें (ईश्वरीय अनुशासनों का पालन करें) ॥ १९ ॥

२२८. तद्विष्णोः परमं पदं सदा पश्यन्ति सूरयः । दिवीव चक्षुराततम् ॥ २० ॥

जिस प्रकार सामान्य नेत्रों से आकाश में स्थित सूर्यदेव को सहजता से देखा जाता है, उसी प्रकार विद्वज्जन अपने ज्ञान-चक्षुओं से विष्णुदेव के (देवत्व के परमपद को) श्रेष्ठ स्थान को देखते (प्राप्त करते) हैं ॥ २० ॥

[ईश्वर दृष्टियम्य भले ही न हों, अनुभूतिजन्य अवश्य हैं ।]

२२९. तद्विप्रासो विपन्यवो जागृवांसः समिन्धते । विष्णोर्यत्परमं पदम् ॥ २१ ॥

जागरूक विद्वान् स्तोतागण विष्णुदेव के उस परमपद को प्रकाशित करते हैं । (अर्थात् जन सामान्य के लिए प्रकट करते हैं) ॥ २१ ॥

[ सूक्त – २३ ]

[ ऋषि – मेधातिथि काण्व । देवता – १ वायु, २-३ इन्द्रवायू, ४-६ मित्रावरुण, ७-९ इन्द्र-मरुत्वान्, १०-१२ विश्वेदेवा, १३-१५ पूषा, १६-२२ तथा २३ का पूर्वार्द्ध आपः देवता, २३ का उत्तरार्द्ध एवं २४ अग्नि । छन्द – १-१८ गायत्री, १९ पुर उष्णिक्, २१ प्रतिष्ठा, २० तथा २२-२४ अनुष्टुप् । ]

२३०. तीव्राः सोमास आ ग्रह्याशीर्वन्तः सुता इमे । वायो तान्प्रस्थितान्पिब ॥ १ ॥

हे वायुदेव ! अभिषुत सोमरस तीखा होने से दुग्ध मिश्रित करके तैयार किया गया है, आप आएँ और उत्तर वेदी के पास लाये गये इस सोमरस का पान करें ॥ १ ॥

२३१. उभा देवा दिविस्पृशेन्द्रवायू हवामहे । अस्य सोमस्य पीतये ॥ २ ॥

जिनका यश दिव्यलोक तक विस्तृत है, ऐसे इन्द्र और वायु देवों को हम सोमरस पीने के लिए आमंत्रित करते हैं ॥ २ ॥

२३२. इन्द्रवायू मनोजुवा विप्रा हवन्त ऊतये। सहस्राक्षा धियस्पती ॥ ३ ॥

मन के तुल्य वेग वाले, सहस्र चक्षु वाले, बुद्धि के अधीश्वर इन्द्र एवं वायु देवों का ज्ञानीजन अपनी सुरक्षा के लिए आवाहन करते हैं ॥ ३ ॥

२३३. मित्रं वयं हवामहे वरुणं सोमपीतये । जज्ञाना पूतदक्षसा ॥ ४ ॥

सोमरस पीने के लिए यज्ञस्थल पर प्रकट होने वाले परमपवित्र एवं बलशाली मित्र और वरुणदेवों का हम आवाहन करते हैं ॥ ४ ॥

२३४. ऋतेन यावृतावृद्धावृतस्य ज्योतिषस्पती । ता मित्रावरुणा हुवे ॥ ५ ॥

प्रत्यमार्ग पर चलने वालों का उत्साह बढ़ाने वाले, तेजस्वी मित्रावरुणों का हम आवाहन करते हैं ॥ ५ ॥

२३५. वरुणः प्राविता भुवन्मित्रो विश्वाभिरूतिभिः । करतां नः सुराधसः ॥ ६ ॥

वरुण एवं मित्र देवता अपने समस्त रक्षा साधनों से हम सबकी हर प्रकार से रक्षा करते हैं । वे हमें महान् वैभव सम्पन्न करें ॥ ६ ॥

२३६. मरुत्वन्तं हवामह इन्द्रमा सोमपीतये । सजूर्गणेन तृम्पतु ॥ ७ ॥

मरुद्‌गणों के सहित इन्द्रदेव को सोमरस पान के निमित्त बुलाते हैं । ये मरुद्गणों के साथ आकर तृप्त हों ॥ ७ ॥

२३७. इन्द्रज्येष्ठा मरुङ्गणा देवासः पूषरातयः । विश्वे मम श्रुता हवम् ॥ ८ ॥

दानी पूषादेव के समान इन्द्रदेव दान देने में श्रेष्ठ हैं । वे सब मरुद्‌गणों के साथ हमारे आवाहन को सुनें ॥ ८ ॥

२३८. हत वृत्रं सुदानव इन्द्रेण सहसा युजा । मा नो दुःशंस ईशत ॥ ९ ॥

हे उत्तम दानदाता मरुतो ! आप अपने उत्तम साथी और बलवान् इन्द्रदेव के साथ दुष्टों का हनन करें । दुष्टता हमारा अतिक्रमण न कर सके ॥ ९ ॥

२३९. विश्वान्देवान्हवामहे मरुतः सोमपीतये । उग्रा हि पृश्निमातरः ॥ १० ॥

सभी मरुद्‌गणों को हम सोमपान के निमित बुलाते हैं । वे सभी अनेक रंगों वाली पृथ्वी के पुत्र महान् वीर एवं पराक्रमी हैं ॥ १० ॥

२४०. जयतामिव तन्यतुर्मरुतामेति धृष्णुया । यच्छुभं याथना नरः ॥ ११ ॥

वेग से प्रवाहित होने वाले महतों का शब्द विजयनाद के सदृश गुंजित होता है, उससे सभी मनुष्यों का मंगल होता है ॥ ११ ॥

२४१. हस्काराद्विद्युतस्पर्यतो जाता अवन्तु नः । मरुतो मृळयन्तु नः ॥ १२ ॥

चमकने वाली विद्युत् से उत्पन्न हुए मरुद्‌गण हमारी रक्षा करें और प्रसन्नता प्रदान करें ॥ १२ ॥

(विज्ञान का मत है कि मेघों में बिजली चमकने से नाइ‌ट्रोजन आदि में उर्वरता बढ़ाने वाले यौगिक बनते हैं । वे निश्चित सरूम से जीवन रक्षक एवं हितकारी होते हैं ।)

२४२. आ पूषञ्चित्रबर्हिषमाघृणे धरुणं दिवः । आजा नष्टं यथा पशुम् ॥ १३ ॥

हे दीप्तिमान् पूषादेव आप अ‌द्भुत तेजों से युक्त एवं धारण शक्ति से सम्पन्न हैं । अतः सोम को द्युलोक से वैसे ही लाएँ, जैसे खोये हुए पशु को ढूंढकर लाते हैं ॥ १३ ॥

२४३. पूषा राजानमाघृ‌णिरपगूळ्हं गुहा हितम् । अविन्दच्चित्रबर्हिषम्  ॥ १४ ॥

दीप्तिमान् पूषादेव ने अंतरिक्ष गुहा में छिपे हुए शुभ्र तेजों से युक्त सोमराजा को प्राप्त किया ॥ १४ ॥

२४४. उतो स मह्यमिन्दुभिः षड्युक्ताँ अनुसेषिधत् । गोभिर्यवं न चर्कृषत् ॥ १५ ॥

वे पूषादेव हमारे लिए, याग के हेतुभूत सोमों के साथ वसंतादि षट्‌क्रतुओं को क्रमशः वैसे ही प्राप्त कराते हैं, जैसे यवों (अनाजों) के लिए कृषक बार-बार खेत जोतता है ॥ १५ ॥

२४५. अम्बयो यन्त्यध्वभिर्जामयो अध्वरीयताम् । पृञ्वतीर्मधुना पयः ॥ १६ ॥

यज्ञ की इच्छा करने वालों के सहायक मधुर रसरूप जल – प्रवाह, माताओं के सदृश पुष्टिप्रद हैं । वे दुग्ध को पुष्ट करते हुए यज्ञमार्ग से गमन करते हैं ॥ १६ ॥

[यज्ञ द्वारा पुष्टि प्रदायक रस प्रवाहों के विस्तार का उल्लेख है।]

२४६. अमूर्या उप सूर्ये याभिर्वा सूर्यः सह । ता नो हिन्वन्त्वध्वरम् ॥ १७ ॥

जो वे जल सूर्य में (सूर्य किरणों में) समाहित है अथवा जिन जलों के साथ सूर्य का सान्निध्य है, ऐसे वे पवित्र जल हमारे यज्ञ को उपलब्ध हो ॥ १७ ॥

(उक्त दो मंत्रों में अंतरिक्ष की कृषि का वर्णन है । खेत में अन्न दिखता नहीं, किन्तु उससे उत्पन्न होता है । पूषा-पोषण देने वाले देवों (यज्ञ एवं सूर्य आदि) द्वारा सोम (सूक्ष्म पोषक तत्व) बोया एवं उपजाया जाता है ।)

२४७. अपो देवीरूप ह्वये यत्र गावः पिबन्ति नः । सिन्धुभ्यः कर्त्वं हविः ॥ १८ ॥

हमारी गायें जिस जल का सेवन करती हैं, उन जलों का हम स्तुतिगान करते हैं । (अन्तरिक्ष एवं भूमि पर) प्रवाहमान उन जलों के निमित्त हम हवि अर्पित करते हैं ॥ १८ ॥

१९ से २३ तक के मंत्रों में जस के गुणों और उस्से शारीरिक एवं मानसिक रोगों के शमन का उल्लेख है –

२४८. अप्स्वऽन्तरमृतमप्सु भेषजमपामुत प्रशस्तये । देवा भवत वाजिनः ॥ १९ ॥

जल में अमृतोपम गुण है, जल में ओषधीय गुण है । हे देवो ! ऐसे जल की प्रशंसा से आप उत्साह प्राप्त करें ॥ १९ ॥

२४९. अप्सु मे सोमो अन्नवीदन्तर्विश्वानि भेषजा । अग्नि च विश्वशम्भुवमापश्च विश्वभेषजीः ॥ २० ॥

मुझ (मंत्र द्रष्टा मुनि) से सोमदेव ने कहा है कि जल समूह में सभी ओषधियाँ समाहित हैं । जल में हो सर्व सुख प्रदायक अग्नितत्व समाहित है । सभी ओषधियाँ जलों से ही प्राप्त होती हैं ॥ २० ॥

२५०. आपः पृणीत भेषजं वरूथं तन्वे३मम । ज्योक् च सूर्यं दृशे ॥ २१ ॥

हे जल समूह ! जीवन रक्षक ओषधियों को हमारे शरीर में स्थित करें, जिससे हम नीरोग होकर चिरकाल तक सूर्यदेव का दर्शन करते रहें ॥ २१ ॥

२५१. इदमापः प्र वहत यत्कि च दुरितं मयि । यद्वाहमभिदुद्रोह यद्वा शेप उतानृतम् ॥ २२ ॥

हे जल देवो ! हम याजकों ने अज्ञानवश जो दुष्कृत्य किये हों, जान-बूझकर किसी से दोह किया हो, सत्पुरुषों पर आक्रोश किया हो या असत्य आचरण किया हो तथा इस प्रकार के हमारे जो भी दोष हों, उन सबको बहाकर दूर करें ॥ २२ ॥

२५२. आपो अद्यान्वचारिषं रसेन समगस्महि । पयस्वानग्न आ गहि तं मा सं सृज वर्चसा ॥२३॥

आज हमने जल में प्रविष्ट होकर अवभृथ स्नान किया है, इस प्रकार जल में प्रवेश करके हम रस से आप्लावित हुए हैं । हे पयस्वान् ! हे अग्निदेव ! आप हमें वर्चस्वी बनाएँ, हम आपका स्वागत करते हैं ॥ २३ ॥

२५३. सं माग्ने वर्चसा सूज सं प्रजया समायुषा । विद्युमें अस्य देवा इन्द्रो विद्यात्सह ऋषिभिः ॥ २४ ॥

हे अग्निदेव ! आप हमें तेजस्विता प्रदान करें । हमें प्रजा और दीर्घ आयु से युक्त करें । देवगण हमारे अनुष्ठान को जानें और इन्द्रदेव ऋषियों के साथ इसे जानें ॥ २४ ॥

[ सूक्त २४ ]

[ ऋषि – शुनःशेप आजीगर्ति (कृत्रिम देवरात वैश्वामित्र) । देवता – १ क (प्रजापति), २ अग्नि, ३-४ सविता, ५ सविता अथवा भग, ६-१५ वरुण । छन्द – १, २, ६-१५ त्रिष्टुप्, ३-५ गायत्री । ]

२५४. कस्य नूनं कतमस्यामृतानां मनामहे चारु देवस्य नाम । को नो मह्या अदितये पुनर्दात्पितरं च दृशेयं मातरं च ॥ १ ॥

हम अमर देवों में से किस देव के सुन्दर नाम का स्मरण करें ? कौन से देव हमें महती अदिति – पृथिवी को प्राप्त करायेंगे ? जिससे हम अपने पिता और माता को देख सकेंगे ॥ १ ॥

२५५. अग्नेर्वयं प्रथमस्यामृतानां मनामहे चारु देवस्य नाम । स नो मह्या अदितये पुनर्दात्पितरं च दृशेयं मातरं च ॥ २ ॥

हम अमर देवों में प्रथम अग्निदेव के सुन्दर नाम का मनन करें । वह हमें महती अदिति को प्राप्त करायेंगे, जिससे हम अपने माता-पिता को देख सकेंगे ॥ २ ॥

२५६. अभि त्वा देव सवितरीशानं वार्याणाम् । सदावन्भागमीमहे ॥ ३ ॥

हे सर्वदा रक्षणशील सवितादेव । आप वरण करने योग्य धनों के स्वामी हैं, अतः हम आपसे ऐश्वयों के उत्तम भाग को माँगते हैं ॥ ३ ॥

२५७. यश्चिद्धि त इत्था भगः शशमानः पुरा निदः । अद्वेषो हस्तयोर्दधे ॥ ४ ॥

हे सवितादेव ! आप तेजस्विता युक्त, निन्दा रहित, द्वेष रहित, वरण करने योग्य धनों को दोनों हाथों से धारण करने वाले हैं ॥ ४ ॥

२५८. भगभक्तस्य ते वयमुदशेम तवावसा । मूर्धानं राय आरभे ॥ ५ ॥

हे सवितादेव ! हम आपके ऐश्वर्य की छाया में रहकर संरक्षण को प्राप्त करें । उन्नति करते हुए सफलताओं के सर्वोच्च शिखर तक पहुँचकर भी अपने कर्तव्यों को पूरा करते रहें ॥ ५ ॥

[ उच्चपदों पर पहुँचकर भी मानवोचित सहज कर्तव्यों को न भूलने का संकल्प यहाँ व्यक्त हो रहा है । ]

२५९. नहि ते क्षत्रं न सहो न मन्युं वयश्चनामी पतयन्त आपुः । नेमा आपो अनिमिषं चरन्तीर्न ये वातस्य प्रमिनन्त्यभ्वम् ॥ ६ ॥

हे वरुणदेव ! ये उड़ने वाले पक्षी आपके पराक्रम, आपके बल और सुनीति युक्त क्रोध (मन्यु) को नहीं जान पाते । सतत गमनशील जलप्रवाह आपकी गति को नहीं जान सकते और प्रबल वायु के वेग भी आपको नहीं रोक सकते ॥ ६ ॥

२६०. अबुध्ने राजा वरुणो वनस्योर्ध्वं स्तूपं ददते पूतदक्षः । नीचीनाः स्थुरुपरि बुध्न एषामस्मे अन्तर्निहिताः केतवः स्युः ॥ ७ ॥

पवित्र पराक्रम युक्त राजा वरुण (सबको आच्छादित करने वाले) दिव्य तेज पुञ्ज (सूर्यदेव) को, आधारहित आकाश में धारण करते हैं । इस तेज पुञ्ज (सूर्यदेव) का मुख नीचे की ओर और मूल ऊपर की ओर है । इसके मध्य में दिव्य किरणें विस्तीर्ण होती चलती हैं ॥ ७ ॥

२६१. उरुं हि राजा वरुणश्चकार सूर्याय पन्थामन्वेतवा उ । अपदे पादा प्रतिधातवेऽकरुतापवक्ता हृदयाविधश्चित् ॥ ८ ॥

राजा वरुणदेव ने सूर्यगमन के लिए विस्तृत मार्ग निर्धारित किया है, जहाँ पैर भी स्थापित न हो, वे ऐसे अन्तरिक्ष स्थान पर भी चलने के लिए मार्ग विनिर्मित कर देते हैं और वे हृदय की पीड़ा का निवारण करने वाले हैं ॥ ८ ॥

२६२. शतं ते राजन्भिषजः सहस्रमुर्वी गभीरा सुमतिष्टे अस्तु । बाधस्य दूरे निर्ऋतिं पराचैः कृतं चिदेनः प्र मुमुग्ध्यस्मत् ॥ ९ ॥

हे वरुणदेव ! आपके पास असंख्य उपाय हैं । आपकी उत्तम बुद्धि अत्यन्त व्यापक और गम्भीर है । आप हमारी पाप वृत्तियों को हमसे दूर करें । किये हुए पापों से हमें विमुक्त करें ॥ ९ ॥

२६३. अमी य ऋक्षा निहितास उच्चा नक्तं ददृश्रे कुह चिद्दिवेयुः । अदब्धानि वरुणस्य व्रतानि विचाकशच्चन्द्रमा नक्तमेति ॥ १० ॥

ये नक्षत्रगण आकाश में रात्रि के समय दिखते हैं, परन्तु ये दिन में कहाँ विलीन होते हैं ? विशेष प्रकाशित चन्द्रमा रात्रि में आता है । वरुणराजा के ये नियम कभी नष्ट नहीं होते ॥ १० ॥

२६४. तत्वा यामि ब्रह्मणा वन्दमानस्तदा शास्ते यजमानो हविर्भिः । अहेळमानो वरुणेह बोध्युरुशंस मा न आयुः प्र मोषीः ॥ ११ ॥

हे वरुणदेव ! मन्त्ररूप वाणी से आपकी स्तुति करते हुए आपसे याचना करते हैं । यजमान हविष्यान्न अर्पित करते हुए कहते हैं – हे बहु प्रशंसित देव ! हमारी उपेक्षा न करें, हमारी स्तुतियों को जानें । हमारी आयु को क्षीण न करें ॥ ११ ॥

२६५. तदिन्नक्तं तद्दिवा महामाहुस्तदयं केतो हृद आ वि चष्टे । शुनः शेपो यमह्वद्गृभीतः सो अस्मान् राजा वरुणो मुमोक्तु ॥ १२ ॥

रात-दिन में (अनवरत) ज्ञानियों के कहे अनुसार यही ज्ञान (चिन्तन) हमारे हृदय में होता रहा है कि बन्धन में पड़े शुनःशेप ने जिस वरुणदेव को बुलाकर मुक्ति को प्राप्त किया, वही वरुणदेव हमें भी बन्धनों से मुक्त करें ॥ १२ ॥

२६६. शुनः शेपो ह्यह्वद्गृभीतस्त्रिष्वादित्यं द्रुपदेषु बद्धः । अवैनं राजा वरुणः ससृज्याद्विद्वाँ अदब्धो वि मुमोक्तु पाशान् ॥ १३ ॥

तीन स्तम्भों में बंधे हुए शुनःशेप ने अदिति पुत्र वरुणेदव का आवाहन करके उनसे निवेदन किया कि वे ज्ञानी और अटल वरुणदेव हमारे पाशों को काटकर हमें मुक्त करें ॥ १३ ॥

२६७. अव ते हेळो वरुण नमोभिरव यज्ञेभिरीमहे हविर्भिः । क्षयन्नस्मध्यमसुर प्रचेता राजन्नेनांसि शिश्रथः कृतानि ॥ १४ ॥

हे वरुणदेव ! आपके क्रोध को शान्त करने के लिए हम स्तुति रूप वचनों को सुनाते हैं । हविर्द्रव्यों के द्वारा यज्ञ में सन्तुष्ट होकर हे प्रखर बुद्धि वाले राजन् ! आप हमारे यहाँ वास करते हुए हमें पापों के बन्धन से मुक्त करें ॥ १४ ॥

२६८. उदुत्तमं वरुण पाशमस्मदवाथमं वि मध्यमं श्रथाय । अथा वयमादित्य व्रते तवानागसो अदितये स्याम ॥ १५ ॥

हे वरुणदेव । आप तीनों तापों रूपी बन्धनों से हमें मुक्त करें । आधिदैविक, आधिभौतिक और आध्यात्मिक पाश हमसे दूर हों तथा मध्य के एवं नीचे के बन्धन अलग करें । हे सूर्य पुत्र ! पापों से रहित होकर हम आपके कर्मफल सिद्धान्त में अनुशासित हों, दयनीय स्थिति में हम न रहें ॥ १५  ॥

[ सूक्त २५ ]

[ ऋषि – शुनःशेप आजीगर्ति (कृत्रिम देवरात वैश्वामित्र) । देवता – वरुण । छन्द – गायत्री । ]

२६९. यच्चिद्धि ते विशो यथा प्र देव वरुण व्रतम् । मिनीमसि द्यविद्यवि ॥ १ ॥

हे वरुणदेव ! जैसे अन्य मनुष्य आपके व्रत-अनुष्ठान में प्रमाद करते हैं, वैसे ही हमसे भी आपके नियमों आदि में कभी-कभी प्रमाद हो जाता है । (कृपया इसे क्षमा करें ।) ॥ १ ॥

२७०. मा नो वधाय हत्नवे जिहीळानस्य रीरधः । मा हुणानस्य मन्यवे ॥ २ ॥

हे वरुणदेव ! आप अपने निरादर करने वाले का वध करने के लिए धारण किये गये शस्त्र के सम्मुख हमें प्रस्तुत न करें । अपनी क्रुद्ध अवस्था में भी हम पर कृपा करके क्रोध न करें ॥ २ ॥

२७१. वि मृळीकाय ते मनो रथीरश्वं न सन्दितम् । गीर्भिर्वरुण सीमहि ॥ ३ ॥

हे वरुणदेव । जिस प्रकार रथी वीर अपने थके घोड़ों की परिचर्या करते हैं, उसी प्रकार आपके मन को हर्षित करने के लिए हम स्तुतियों का गान करते हैं ॥ ३ ॥

२७२. परा हि मे विमन्यवः पतन्ति वस्यइष्टये । वयो न वसतीरूप ॥ ४ ॥

(हे वरुणदेव !) जिस प्रकार पक्षी अपने घोसलों की ओर दौड़ते हुए गमन करते हैं, उसी प्रकार हमारी चंचल बुद्धियाँ धन प्राप्ति के लिए दूर-दूर दौड़ती हैं ॥ ४ ॥

२७३. कदा क्षत्रश्रियं नरमा वरुणं करीमहे । मुळीकायोरुचक्षसम् ॥ ५ ॥

बल-ऐश्वर्य के अधिपति सर्वद्रष्टा वरुणदेव को कल्याण के निमित्त हम यहाँ (यज्ञस्थल में) कब बुलायेंगे ? (अर्थात् यह अवसर कब मिलेगा ?) ॥ ५ ॥

२७४. तदित्समानमाशाते वेनन्ता न प्र युच्छतः। धृतव्रताय दाशुषे ॥ ६ ॥

व्रत धारण करने वाले (हविष्यान्न) दाता यजमान के मंगल के निमित्त ये मित्र और वरुण देव हविष्यान्न की इच्छा करते हैं, वे कभी उसका त्याग नहीं करते । वे हमें बन्धन से मुक्त करें ॥ ६ ॥

२७५. वेदा यो वीनां पदमन्तरिक्षेण पतताम् । वेद नावः समुद्रियः ॥ ७ ॥

हे वरुणदेव । अन्तरिक्ष में उड़ने वाले पक्षियों के मार्ग को और समुद्र में संचार करने वाली नौकाओं के मार्ग को भी आप जानते हैं ॥ ७ ॥

२७६. वेद मासो धृतव्रतो द्वादश प्रजावतः । वेदा य उपजायते ॥ ८ ॥

नियमधारक वरुणदेव प्रजा के उपयोगी बारह महीनों को जानते हैं और तेरहवें माह (अधिक मास) को भी जानते हैं ॥ ८ ॥

२७७. वेद वातस्य वर्तनिमुरोर्ऋष्वस्य बृहतः । वेदा ये अध्यासते ॥ ९ ॥

वे वरुणदेव अत्यन्त विस्तृत, दर्शनीय और अधिक गुणवान् वायु के मार्ग को जानते हैं । वे ऊपर द्युलोक में रहने वाले देवों को भी जानते हैं ॥ ९ ॥

२७८. नि बसाद घृतवतो वरुणः पस्त्या३स्वा । साम्राज्याय सुक्रतुः ॥ १० ॥

प्रकृति के नियमों का विधिवत् पालन कराने वाले, श्रेष्ठ कर्मों में सदैव निरत रहने वाले वरुणदेव प्रजाओं में साम्राज्य स्थापित करने के लिए बैठते हैं ॥ १० ॥

२७९. अतो विश्वान्यद्भुता चिकित्वाँ अभि पश्यति । कृतानि या च कर्त्या ॥ ११ ॥

सब अद्भुत कर्मों की क्रिया-विधि जानने वाले वरुणदेव, जो कर्म सम्पादित हो चुके हैं और जो किये जाने हैं, उन सबको भली-भाँति देखते हैं ॥ ११ ॥

२८०. स नो विश्वाहा सुक्रतुरादित्यः सुपथा करत् । प्र ण आयूंषि तारिषत् ॥ १२ ॥

वे उत्तम कर्मशील अदिति पुत्र वरुणदेव हमें सदा श्रेष्ठ मार्ग की ओर प्रेरित करें और हमारी आयु को बढ़ाएँ ॥ १२ ॥

२८१. बिभ्रद्द्रापिं हिरण्ययं वरुणो वस्त निर्णिजम् । परि स्पशो नि षेदिरे ॥ १३ ॥

सुवर्णमय कवच धारण करके वरुणदेव अपने हृष्ट-पुष्ट शरीर को सुसज्जित करते हैं । शुभ्र प्रकाश किरणें उनके चारों ओर विस्तीर्ण होती हैं ॥ १३ ॥

२८२. न यं दिप्सन्ति दिप्सवो न द्रुह्वाणो जनानाम् । न देवमभिमातयः ॥ १४ ॥

हिंसा करने की इच्छा वाले शत्रु-जन (भयाक्रान्ता होकर) जिनकी हिंसा नहीं कर पाते, लोगों के प्रति द्वेष रखने वाले, जिनसे द्वेष नहीं कर पाते – ऐसे (वरुण) देव को पापीजन स्पर्श तक नहीं कर पाते ॥ १४ ॥

२८३. उत यो मानुषेध्वा यशश्चके असाम्या । अस्माकमुदरेष्वा ॥ १५ ॥

जिन वरुणदेव ने मनुष्यों के लिए विपुल अन्न – भंडार उत्पन्न किया है; उन्होंने ही हमारे उदर में पाचन सामर्थ्य भी स्थापित की है ॥ १५ ॥

२८४. परा मे यन्ति धीतयो गावो न गव्यूतीरनु । इच्छन्तीरुरुचक्षसम् ॥ १६ ॥

उस सर्वद्रष्टा वरुणदेव की कामना करनेवाली हमारी बुद्धियाँ, वैसे ही उन तक पहुँचती हैं, जैसे गौएँ गोष्ठ (बाड़े) की ओर जाती हैं ॥ १६ ॥

२८५. सं नु वोचावहै पुनर्यतो मे मध्वाभृतम् । होतेव क्षदसे प्रियम् ॥ १७ ॥

होता (अग्निदेव) के समान हमारे द्वारा लाकर समर्पित की गई हवियों का आप अग्निदेव के समान भक्षण करें, फिर हम दोनों वार्ता करेंगे ॥ १७ ॥

२८६. दर्शं नु विश्वदर्शतं दर्शं रथमथि क्षमि । एता जुषत मे गिरः ॥ १८ ॥

दर्शन योग्य वरुणदेव को उनके रथ के साथ हमने भूमि पर देखा है । उन्होंने हमारी स्तुतियाँ स्वीकारी है ॥ १८ ॥

२८७. इमं में वरुण श्रुधी हवमद्या च मृळय । त्वामवस्युरा चके ॥ १९ ॥

हे वरुणदेव ! आप हमारी प्रार्थना पर ध्यान दें, हमें सुखी बनायें । अपनी रक्षा के लिए हम आपकी स्तुति करते हैं ॥ १९ ॥

२८८. त्वं विश्वस्य मेधिर दिवश्च ग्मश्च राजसि । स यामनि प्रति श्रुधि ॥ २० ॥

हे मेधावी वरुणदेव ! आप द्युलोक, भूलोक और सारे विश्वपर आधिपत्य रखते हैं, आप हमारे आवाहन को स्वीकार कर ‘हम रक्षा करेंगे’ ऐसा प्रत्युत्तर प्रदान करें ॥ २० ॥

२८९. उदुत्तमं मुमुग्धि नो वि पाशं मध्यमं चृत । अवाधमानि जीवसे ॥ २१ ॥

हे वरुणदेव ! हमारे उत्तम (ऊपर के) पाश को खोल दें, हमारे मध्यम पाश को काट दें और हमारे नीचे के पाश को हटाकर हमें उत्तम जीवन प्रदान करें ॥ २१ ॥

[ सूक्त – २६ ]

[ ऋषि – शुनःशेप आजीगर्ति (कृत्रिम देवरात वैश्वामित्र) । देवता – अग्नि । छन्द – गायत्री । ]

२९०. वसिष्वा हि मियेध्य वस्त्राण्यूर्जा पते । सेमं नो अध्वरं यज ॥ १ ॥

हे यज्ञ योग्य, (हवियोग्य) अन्नों के पालक अग्निदेव ! आप अपने तेजरूप वस्त्रों को पहनकर हमारे यज्ञ को सम्पादित करें ॥ १ ॥

२९१. नि नो होता वरेण्यः सदा यविष्ठ मन्मभिः । अग्ने दिवित्मता वचः ॥ २ ॥

सदा तरुण रहने वाले हे अग्निदेव ! आप सर्वोत्तम होता (यज्ञ सम्पन्न कर्ता) के रूप में यज्ञकुण्ड में स्थापित होकर यजमान के स्तुति वचनों का श्रवण करें ॥ २ ॥

२९२. आ हि घ्या सूनव पितापिर्यजत्यापय । सखा सख्य वरेण्यः ॥ ३ ॥

हे वरण करने योग्य अग्निदेव जैसे पिता अपने पुत्र के, भाई अपने भाई के और मित्र अपने मित्र के सहायक होते हैं, वैसे ही आप हमारी सहायता करें ॥ ३ ॥

२९३. आ नो बहीं रिशादसो वरुणो मित्रो अर्यमा । सीदन्तु मनुषो यथा ॥ ४ ॥

जिस प्रकार प्रजापति के यज्ञ में “मनु” आकर शोभा बढ़ाते हैं, उसी प्रकार शत्रुनाशक वरुणदेव, मित्र – देव एवं अर्यमादेव हमारे यज्ञ में आकर विराजमान हों ॥ ४ ॥

२९४. पूर्व्य होतरस्य नो मन्दस्व सख्यस्य च । इमा उ षु श्रुधी गिरः ॥ ५ ॥

पुरातन होता हे अग्निदेव ! आप हमारे इस यज्ञ से और हमारे मित्रभाव से प्रसन्न हों और हमारी स्तुतियों को भली प्रकार सुनें ॥ ५ ॥

२९५. यच्चिद्धि शश्वता तना देवन्देवं यजामहे । त्वे इ‌द्धूयते हविः ॥ ६ ॥

हे अग्निदेव ! इन्द्र, वरुण आदि अन्य देवताओं के लिए प्रतिदिन विस्तृत आहुतियाँ अर्पित करने पर भी सभी हविष्यान्न आपको ही प्राप्त होते हैं ॥ ६ ॥

२९६. प्रियो नो अस्तु विश्पतिर्होता मन्द्रो वरेण्यः । प्रियाः स्वग्नयो वयम् ॥ ७ ॥

यज्ञ सम्पन्न करने वाले प्रजापालक आनन्दवर्धक, वरण करने योग्य हे अग्निदेव ! आप हमें प्रिय हों तथा श्रेष्ठ विधि से यज्ञाग्नि की रक्षा करते हुए हम सदैव आपके प्रिंय रहें ॥ ७ ॥

२९७. स्वग्नयो हि वार्यं देवासो दधिरे च नः । स्वग्नयो मनामहे ॥ ८ ॥

उत्तम अग्नि से युक्त होकर देदीप्यमान ऋत्विजों ने हमारे लिए ऐश्वर्य को धारण किया है, वैसे ही हम उत्तम अग्नि से युक्त होकर इनका (ऋत्विज् का) स्मरण करते हैं ॥ ८ ॥

२९८. अथा न उभयेषाममृत मर्त्यानाम् । मिथः सन्तु प्रशस्तयः ॥ ९ ॥

अमरत्व को धारण करने वाले हे अग्निदेव! आपके और हम मरणशील मनुष्यों के बीच स्नेहयुक्त, प्रशंसनीय वाणियों का आदान प्रदान होता रहे ॥ ९ ॥

२९९. विश्वेभिरग्ने अग्निभिरिमं यज्ञमिदं वचः । चनो धाः सहसो यहो ॥ १० ॥

बल के पुत्र (अरणि मन्थन रूप शक्ति से उत्पन्न) हे अग्निदेव ! आप (आहवनीयादि) अग्नियों के साथ यज्ञ में पधारें और स्तुतियों को सुनते हुए हमें अन्न (पोषण) प्रदान करें ॥ १० ॥

क्रमशः…..

हरिः हरः!!

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