वेद
– केदार काननप्रिय प्रवीण नारायण चौधरी एक विलक्षण काज कयलनि अछि । हालमे मुम्बईमे सम्पन्न भेल मैथिली साहित्योत्सवमे एहि वेद केर लोकार्पण भेल छल । ताहिमे हमहूं उपस्थित छलहुं । आइ दूपहरमे एहि पोथीकें जतय-ततयसं पढलहुं । अनुवाद बढिया लागल । प्रवीण जी अभियानी छथि ।मैथिलीक हित चिन्तनमे सदैव लागल रहैत छथि ।
कांची कामकोटि पीठक शंकराचार्य श्री चन्द्रशेखरेन्द्र सरस्वती कृत “द वेदाज” के ई मैथिली अनुवाद थिक । वेदकें बुझबाक लेल एहि पोथीकें सुविधापूर्वक पढल जा सकैत अछि ।
प्राचीनतम साहित्यकें मैथिलीमे सहज उपलब्ध करौलनि अछि प्रवीण जी, ओ निस्संदेह बधाइ आ शुभकामनाक पात्र छथि ।
हं, किछु शब्द सभ हमरा खटकल, तकर उल्लेख आवश्यक बुझाइत अछि, एहि आशयक संग जे अगिला संस्करणमे तकर सुधार कयल जा सकय-शायद, वास्ते, हालांकि, हिचकिचाहट, लेकिन, सिर, यानि, बल्कि, यदि, गैर-जरूरी आदि ।
ओना किछु किन्तु-परन्तुकें छोडि दी त’ ई पठनीय अनूदित कृति थिक । एहि अनुवादमे प्रवीण जीकें बहुत समय लागल हेतनि । हुनका पुनः बधाइ ।
