(अनुवाद: प्रवीण नारायण चौधरी)
दान-सुभाषितावली
यद्ददाति विशिष्टेभ्यो यच्चाश्नाति दिने दिने ।
तच्च वित्तमहं मन्ये शेषं कस्यापि रक्षति ॥१॥
जे विशिष्ट सत्पात्र लोक केँ दान दैत अछि तथा जे किछु अपन नित्य भोजनादि मे प्रतिदिन खर्च करैत अछि, तेकरे टा हम ओहि व्यक्तिक वास्तविक धन या सम्पत्ति मानैत छी, अन्यथा शेष सम्पत्ति तँ कियो दोसरक थिकैक, जेकर ओ रखबारि टा करैत अछि ॥१॥
यद्ददाति यदश्नाति तदेव धनिनो धनम् ।
अन्ये मृतस्य क्रीडन्ति दारैरपि धनैरपि ॥२॥
दान मे जे किछु दैत अछि आर जतबे टाक ओ स्वयं उपभोग करैत अछि, ओतबहि टा ओहि धनी लोकक अपन धन थिक । अन्यथा मरि गेलापर ओहि लोकक स्त्री, धन आदि वस्तु सब सँ दोसरे लोक आनन्द मनबैत अछि अर्थात् मौज उड़बैत अछि । तात्पर्य ई अछि जे सावधानीपूर्वक अपन धन-सम्पत्तिक दान आदि सत्कर्म सब मे खर्च करबाक चाही ॥२॥
किं धनेन करिष्यन्ति देहिनोऽपि गतायुषः ।
यद्वर्धयितुमिच्छन्तस्तच्छरीरमशाश्वतम् ॥३॥
जखन आयु केर एक दिन अन्त निश्चित छैक त फेर धन बढ़ाकय तेकरा रखबाक इच्छा करब मूर्खते त छी, ओ धन व्यर्थे त छी, कियैक तँ जाहि शरीर केर रक्षा लेल धन बढ़ेबाक उपक्रम कयल जाइत अछि, ओ शरीरे अस्थिर अछि, नश्वर अछि, तेँ धर्महि केर वृद्धि करबाक चाही, धनक नहि । धन द्वारा दान आदि कय केँ धर्म केर वृद्धिक उपक्रम करबाक चाही, निरन्तर धन बढ़ेला सँ कोनो लाभ नहि ।
अशाश्वतानि गात्राणि विभवो नैव शाश्वतः ।
नित्यं संनिहितो मृत्यु कर्तव्यो धर्मसंग्रहः ॥४॥
शरीरधारी लोकनिक शरीर नश्वर अछि आर धन सेहो सदिखन संग रहयवला नहि अछि; संगहि मृत्यु सेहो लगहि मे माथ पर बैसल अछि – एना बुझिकय प्रतिक्षण धर्मक संग्रह – धर्माचरण मात्र करबाक चाही; कियैक तँ काल केर कोन ठीक कखन आबि जाय, तेँ अपन धन एवं समय केर सदा सदुपयोग टा करबाक चाही ।४॥
यदि नाम न धर्माय न कामाय न कीर्तये ।
यत् परित्यज्य गन्तव्यं तद्धनं किं न दीयते ॥५॥
जे धन धर्म, सुखभोग या यश – कोनो काज मे नहि अबैछ आर जे छोड़िकय एक दिन एतय सँ अवश्ये टा चलि जेबाक अछि, ताहि धन केँ दान आदि धर्म मे उपयोग कियैक नहि कयल जाय ! ॥५॥
जीवन्ति जिवते यस्य विप्रा मित्राणि बान्धवाः ।
जीवितं सफलं तस्य आत्मार्थे को न जीवति ॥६॥
जाहि लोकक जिबय सँ ब्राह्मण, साधु-सन्त, मित्र, बन्धु-बान्धव आदि सब जिबैत अछि – जीवन धारण (निर्वहन) करैत अछि, वैह लोकक जीवन सार्थक छैक – सफल छैक; कियैक तँ अपना लेल के नहि जिबैछ ? पशु-पक्षी आदि क्षुद्र प्राणी सेहो जिबिते रहैछ, तेँ स्वार्थी नहि बनिकय लोक केँ परोपकारी बनबाक चाही ॥६॥
क्रिमयः किं न जीवन्ति भक्षयन्ति परस्परम् ।
परलोकाविरोधेन यो जीवति स जीवति ॥७॥
कीड़ा-मकोड़ा सेहो एक-दोसराक भक्षण करिते कि जीवन धारण (निर्वहन) नहि करैछ ? मुदा एहेन जीवन प्रशंसनीय नहि होइछ । परलोकक लेल दान-धर्मपूर्वक जियल गेनाय टा जीवन छी, वैह सत्य जीवन छी ॥७॥
पशवोऽपि हि जीवन्ति केवलात्मोदरम्भरा: ।
किं कायेन सुपुष्टेन बलिना चिरजीविनः ॥८॥
केवल अपना पेट केँ भरिकय पशु सेहो अपना जीवन धारण करिते अछि । पुष्ट भ’ कय तथा बली बनिकय जे लम्बा समय धरि जिबैत अछि, धर्म नहि करैत अछि – एहेन निरर्थक जीवन सँ कोन लेना-देना ! ओ त पशुक समान जियब थिक ॥८॥
ग्रासादर्धमपि ग्रासमर्थिभ्यः किं न दीयते ।
इच्छानुरूपो विभवः कदा कस्य भविष्यति ॥९॥
अपना भोजनक ग्रास मे सँ आधा या चतुर्थ भाग आवश्यकता वला या माँगयवला केँ कियैक नहि दय दैत छी; कियैक तँ इच्छानुसार धन तँ कखनहुँ केकरो प्राप्त होयबला अछि ? अर्थात् एखन धरि तँ केकरहु प्राप्त नहि भेल अछि आ न आगुए केकरो पास होयत । ई नहि सोचबाक चाही जे एतेक आरो आबि जायत तखन हम दान-पुण्य करब । तेँ जतबे भेटल अछि, ओहि मे सन्तोष कय ओहि मे सँ दान इत्यादि सब धर्मक अभ्यास करबाक चाही ॥९॥
शतेषु जायते शूरः सहस्रेषु च पण्डितः ।
वक्ता शतसहस्रेषु दाता भवति वा न वा ॥१०॥
शूरवीर लोक तँ सैकड़ा मे एकटा तकला सँ भेटि जाइत अछि, हजार मे तकला सँ एकटा विद्वान् लोक सेहो भेटि जाइत अछि, तहिना एक लाख मे सभापर नियन्त्रण करयवला कोनो वक्ता सेहो भेट जाइत अछि, मुदा असली दाता तकलो पर भेटि जाय, ई निश्चयपूर्वक नहि कहल जा सकैछ, अर्थात् दानी व्यक्ति संसार मे सबसँ बेसी दुर्लभ अछि ॥१०॥
न रणे विजयाच्छूरोऽध्ययनान्न च पण्डितः ।
इन्द्रियाणां जये शूरो धर्मं चरति पण्डितः ॥११॥
शूरवीर वैह अछि जे वास्तव मे इन्द्रिय सब पर विजय प्राप्त करैत अछि, युद्ध मे विजय प्राप्त करयवला असली शूरवीर नहि छी । मात्र शास्त्र सभक अध्ययन करयवला ज्ञानी नहि छी, बल्कि तदनुकूल धर्माचरण करयवला टा सच्चा ज्ञानी छी ।११॥
सर्वेषामप्युपायानां दानं श्रेष्ठतमं मतम् ।
सुदत्तेनेह भवति दानेनोभयलोकजित् ॥१२॥
दान समस्त उपाय सब मे सर्वश्रेष्ठ अछि । यथोचित रीति सँ दान देला सँ मनुष्य दुनू लोक केँ जीति लैत अछि ॥१२॥
न सोऽस्ति राजन् दानेन वशगो यो न जायते ।
दानेन वशगा देवा भवन्तीह सदा नृणाम ॥१३॥
रा्जन्! एहेन कियो नहि अछि जे दानद्वारा वश मे नहि कयल जा सकय । दान सँ देवता लोकनि सेहो सदा लेल मनुष्यक वश मे भ’ जाइत छथि ॥१३॥
दानमेवोपजीवन्ति प्रजाः सर्वा नृपोत्तम ।
प्रियो हि दानवाँल्लोके सर्वस्यैवोपजायते ॥१४॥
नृपोत्तम! समस्त प्रजा दानक बल सँ मात्र पालित होइत अछि । दानी मनुष्य संसार मे सभक प्रिय भ’ जाइत अछि ॥१४॥
न केवलं दानपरा जयन्ति, भूर्लोकमेकं पुरुषप्रवीराः ।
जयन्ति ते राजसुरेन्द्रलोकं सुदुर्जयं यो विबूधाधिवासः ॥१५॥
दानपरायण पुरुषश्रेष्ठ केवल एक भूलोक केँ मात्र अपना वश मे नहि करैछ, प्रत्युत ओ अत्यन्त दुर्जय देवराज इन्द्र केर लोकहु केँ, जे देवता लोकनिक निवासस्थान थिक, जीति लैत अछि ।
अदत्तदानाच्च भवेद् दरिद्रो दरिद्रभावाच्च करोति पापम् ।
पापप्रभावान्नरके प्रयाति पुनर्दरिद्रः पुनरेव पापी ॥१६॥
दान नहि देला सँ प्राणी दरिद्र भ’ जाइत अछि । दरिद्र भ’ गेला पर फेर पाप करैत अछि । पापक प्रभाव सँ नरक मे जाइत अछि । आर, नरक सँ घुरिकय पुनः दरिद्र आर पुनः पापी बनि जाइत अछि ॥१६॥
यदैव जायते श्रद्धा पात्रं सम्प्राप्यते यदा ।
स एव पुण्यकालः स्याद्यतः सम्पत्तिरस्थिरा ॥१७॥
जखन कखनहुँ श्रद्धा उत्पन्न भ’ जाय आर जखनहुँ दानक लेल सुपात्र भेटि जाय, वैह समय दानक लेल पुण्यकाल अछि; कियैक तँ सम्पत्ति अस्थिर अछि ॥१७॥
यानि यानि च दानानि दत्तानि भुवि मानवैः ।
यमलोकपथे तानि ह्युपतिष्ठन्ति चाग्रतः ॥१८॥
पृथ्वीपर मनुष्यक द्वारा जे-जे दान देल जाइछ, यमलोकक मार्ग मे वैह सब आगाँ-आगाँ उपस्थित होइत जाइत अछि ॥१८॥
गृहादर्था निवर्तन्ते श्मशानात्सर्वबान्धवाः ।
शुभाशुभं कृतं कर्म गच्छन्तमनुगच्छति ॥१९॥
धन-सम्पत्ति घरहि मे छुटि जाइछ । सब बन्धु-बान्धव श्मसान मे छुटि जाइछ, लेकिन प्राणी द्वारा कयल गेल शुभाशुभ कर्म परलोक धरि ओकर पाछाँ-पाछाँ जाइत अछि ॥१९॥
पितुः शतगुणं पुण्यं सहस्रं मातुरेव च ।
भगिनी दशसहस्रं सोदरे दत्तमक्षयम् ॥२०॥
पिताक उद्देश्य सँ कयल गेल दान सँ सौ गुना, माताक उद्देश्य सँ कयल गेल दान सँ हजार गुना, बहिनक उद्देश्य सँ कयल गेल दान सँ दस हजार गुना आर सहोदर भाइक निमित्त कयल गेल दान सँ अनन्त गुना पुण्य प्राप्त होइत अछि ॥२०॥
अहन्यहनि यान्तमहं मन्ये गुरुं यथा ।
मार्जनं दर्पणस्येव यः करोति दिने दिने ॥२१॥
दिन-प्रतिदिन याचना करयवला केँ हम ओहि गुरुक समान बुझैत छी, जे दर्पण केर समान प्रतिदिन शिष्यक मार्जन करैत रहैत छथि, अर्थात् जेना धूलराशि सँ दर्पण मलिन रहैत अछि, तेनाही शिष्यक अन्तःकरण सेहो मलिन रहैत अछि, गुरु अपन ज्ञानरूपी प्रकाश सँ ओकर अन्तःकरण केँ स्वच्छ कय दैत छथि, ओनाही याचक सेहो याचना करैत लोक केँ ई बोध करा दैत अछि जे यदि दान नहि देब तँ हमरे (भिक्षुक) – जेहेन स्थिति होयत, अतः दान दैत रहबाक चाही । याचक सच्चा एवं हितैषी गुरुक समान अछि ॥२१॥
आयासशतलब्धस्य प्राणेभ्योऽपि गरीयसः ।
गतिरेकैव वित्तस्य दानमन्या विपत्तयः ॥२२॥
सैकड़ों कठिन प्रयत्न सब द्वारा प्राप्त तथा प्राणहु सँ अधिक प्रिय धन केर केवल एकमात्र गति अछि – दान, ओकर अन्य गति सब अर्थात् दान छोड़िकय ओकर अन्य उपयोग करब विपत्ति मात्र अछि ॥२२॥
किं धनेन करिष्यन्ति देहिनो भङ्गुरश्रियाः ।
यदर्थं धनमिच्छन्ति तच्छरीरमशाश्वतम् ॥२३॥
क्षणभरि मे मात्र विनष्ट भ’ जायवला शरीररूपी सम्पदा सँ सम्पन्न मनुष्य धन सँ कि करत; कियैक तँ जाहि शरीरक लेल ओ धन केर अभिलाषा रखैत अछि, ओ शरीर त अशाश्वत छैक, रहइयेवला नहि छैक ॥२३॥
न दानादधिकं किञ्चित् दृश्यन्ते भुवनत्रये ।
दानेन प्राप्यते स्वर्गः श्रीर्दानेनैव लभ्यते ॥२४॥
तीनू लोक मे दान सँ बढ़िकय किछो नहि देखाइछ । दान सँ दिव्य लोक केर प्राप्ति होइछ, लक्ष्मी दानहि द्वारा टा प्राप्त होइत छथि ॥२४॥
धर्मार्थकाममोक्षाणां साधनं परमं स्मृतम् ॥२५॥
दान केँ धर्म, अर्थ, काम तथा मोक्ष – एहि चतुर्वर्गक प्राप्ति केर श्रेष्ठ साधन कहल गेल अछि ॥२५॥
दानं कामफला वृक्षा दानं चिन्तामणिर्नृणाम् ।
दानं पुत्रकलत्राद्यं दानं माता पिता तथा ॥२६॥
दान अभिलाषित फल दयवला वृक्षक समान अछि, दान मनुष्यक लेल चिन्तामणिक समान अछि अर्थात् जाहि वस्तुक चिन्तन कयल जाय, से (दान सँ) तत्काल सुलभ भ’ जाइत अछि । दान पुत्र, स्त्री आदि थिक तथा दाने माता-पिता सेहो थिक ॥२६॥
पापकर्मसमायुक्तं पतन्तं नरके नरम् ।
त्रायते दानमेकं तु पात्रभूते द्विजे कृतम् ॥२७॥
नरक मे पड़ल पापी लोक केँ एकमात्र दाने टा बचा सकैत अछि, बशर्ते कि ओ दान सत्पात्र ब्राह्मण केँ देल गेल हो ॥२७॥
न्यायेनार्जनमर्थानां वर्धनं चाभिरक्षणम् ।
सत्पात्रप्रतिपत्तिश्च सर्वशास्त्रेषु पठयते ॥२८॥
सब शास्त्र केँ पढ़िकय यैह देखल गेल अछि जे न्यायपूर्वक धन केँ अर्जन करबाक चाही, सत्प्रयत्न सँ ओकर वृद्धि करबाक चाही आर ओकर रक्षा सेहो एहि लेल करबाक चाही जाहि सँ कि सत्पात्र मे ओकर विनियोग कयल जा सकय ॥२८॥
यस्य वित्तं न दानाय नोपभोगाय देहिनाम् ।
नापि कीर्त्यै धर्माय तस्य वित्तं निरर्थकम् ॥२९॥
जेकर धन नहि त दान मे प्रयुक्त होइत हो, नहि लोकक उपयोग मे अबैत हो, नहि यश लेल होइत हो आ न धर्मार्जन मे विनियुक्त होइत हो, ओकर धन निरर्थक अछि, निष्प्रयोजन अछि ॥२९॥
गौरवं प्राप्यते दानान्न तु वित्तस्य सञ्चयात् ।
स्थितिरुच्चैः पयोदानां पयोधीनामधः स्थितिः ॥३०॥
गौरव केर प्राप्ति दान सँ होइत छैक, वित्त केर संचय सँ नहि । निरन्तर वर्षा आदिक दान करय सँ बादल सभक स्थिति उपर होइत छैक आर जल केर संग्रह करयवला सागर सभक स्थिति नीचाँ रहैत छैक ॥३१॥
उपार्जितानां वित्तानां त्याग एव हि रक्षणम् ।
तडागोदरसंस्थानां परीवाह इवाम्भसाम् ॥३२॥
जाहि प्रकारे उपार्जित कयल गेल धन-सम्पदाक त्याग मात्र ओकर रक्षा थिक, ताहि प्रकारे पोखरि आदि मे भरल जल केर प्रवाह टा ओकर रक्षण थिक ॥३२॥
दानेन भूतानि वशीभवन्ति दानेन वैराण्यपि यान्ति नाशम् ।
परोऽपि बन्धुत्वमुपैति दानैर्दानं हि सर्वव्यसनानि हन्ति ॥३३॥
दान सँ सब प्राणी वश मे भ’ जाइत अछि, दान सँ वैर सेहो शान्ति भ’ जाइत अछि, दान द्वारा पराया सेहो बन्धु बनि जाइत अछि आर दान सब प्रकारक व्यसन सब केँ दूर कय दैत अछि ॥३४॥
कर्णस्त्वचं शिबिर्मांसं जीवं जीमूतवाहनः ।
ददौ दधीचिरस्थीनि नास्त्यदेयं महात्मनाम् ॥३४॥
महादानी कर्ण अपन त्वचाक दान कय देलनि, शिबि अपन शरीरक मांस दान मे दय देलनि, जीमूतवाहन अपन प्राणक दान कय देलनि, महर्षि दधीचि अस्थिक दान कय देलनि – महात्मा सब लेल किछुओ अदेय नहि अछि ।
द्वारं द्वारमटन्तीह भिक्षुकाः पात्रपाणयः ।
दर्शयन्त्येव लोकानामदातुः फलमीदृशम् ॥३५॥
भिक्षाक पात्र हाथ मे लेने भिक्षुक लोकनि दरबजे-दरबजा घुमैत लोक केँ यैह देखबैत अछि जे दाने नहि देबाक ई फल भेल अछि । यदि पहिने दान देने रहितहुँ त आइ घरे-घर भटकैत भीख नहि माँगय पड़ितय, अतः जेकरा भीख नहि मँगबाक हो, ओकरा दान अवश्य टा देबाक चाही ॥३५॥
स्नानं दानं जपो होमो स्वाध्यायो देवतार्चनम् ।
यस्मिन् दिने न सेव्यन्ते स वृथा दिवसो नृणाम् ॥३६॥
जाहि दिन स्नान, दान, जप, होम, स्वाध्याय तथा देवतार्चन नहि होइछ, मनुष्य केर ओ दिन व्यर्थ भ’ जाइछ ।
यथा वेदाः स्वधीताश्च यथा चेन्द्रियसंयमः ।
सर्वत्यागो यथा चेह तथा दानमनुत्तमम् ॥३७॥
जेना वेदक स्वाध्याय, इन्द्रियक संयम आर सर्वस्वक त्याग उत्तम अछि, ताहि प्रकारे एहि संसार मे दान सेहो अत्यन्त उत्तम मानल गेल अछि ॥३७॥
(व्यासस्मृति, मत्स्य तथा गरुड़ आदि पुराण तथा महाभारत से संग्रहीत । साभारः दानमहिमा विशेषांक ‘कल्याण’ )
हरिः हरः !!
