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‘वेद’ – कांची कामकोटि पीठक शंकराचार्य श्री चन्द्रशेखरेन्द्र सरस्वतीक लिखल ‘द वेदाज’ केर मैथिली अनुवाद

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:: संक्षिप्त समीक्षा::
::’वेद’/श्री श्री 1008 श्री चन्द्रशेखरेंद्र सरस्वती/अंग्रेजी::
(मैथिली अनुवाद/श्री प्रवीण ना.चौधरी)

:: रमेश ::

कोनो भाषा,तखन धनीक मानल जाइत अछि, जखन ओकर व्यवस्थित भाषाविज्ञानी आ व्याकरण-प्रारुपक संगहिं,अप्पन देस आ क्षेत्रक प्राचीन सभ्यता-संस्कृति स’ सम्बन्धित, आदिकालीन/प्राचीन शास्त्रीय साहित्यक ग्रंथ सबहक अनुवाद,ओइ जमीनक क्षेत्रीय भाषा मे उपलब्ध भ’ गेल हो!

अइ मे,तें आ तखन सम्बन्धित क्षेत्रीय भाषा मे, अनुवाद-कार्यक महत्ता,बहुत बढ़ि जाइत अछि,जे सरकारी अथवा ‘निजी उपक्रम’ स’ संभव भ’ पबैत अछि।

अइ सम्बन्ध मे,आइ धरि, मैथिली मे अनुवाद- कार्यक प्रगतिक स्थिति,बहुत संतोषजनक नहि रहल अछि।एखनहुँ प्राचीन संस्कृत साहित्यक शास्त्रीय/धार्मिक ग्रन्थ सबहक मैथिली अनुवादक प्रतीक्षा शेष अछिए,यद्यपि एमहर श्रीमती वन्दना झा (अहमदाबाद/दरभंगा) आ श्री प्रवीण ना.चौधरीक सक्रियता,स्वागतयोग्य अछि!

भारतक आदिकालीन सभ्यता,’वैदिक सभ्यता’क आधार-ग्रंथ ‘वेद’क ‘संस्कृत-संस्करण’क ‘मैथिली अनुवाद’ नहि भ’ सकल अछि,जे जर्मन विद्वान मैक्समूलर,जर्मन भाषा मे कहिया ने उपलब्ध करा देलनि।

भारतक साहित्य अकादेमी,संस्कृति मंत्रालय, संस्कृत अकादेमी,मैथिली अकादमी,बिहार ग्रंथ अकादमी, बि.राष्ट्रभाषा परिषद् ,चेतना समिति, पटना,संस्कृत विश्वविद्यालय,दरभंगा,सब अइ काज लेल सक्षम छल(?),आ निजी प्रयास स’ सेहो असंभव नहि छल।

मुदा,से आइ धरि नहि भ’ सकल!

जैह दयनीय स्थिति,प्राचीन आ मध्यकालीन भारतीय इतिहासक ग्रंथ सबहक मैथिली मे अनुवादक रहल,सैह स्थिति भारतीय सभ्यता- संस्कृतिक,धार्मिक आ शास्त्रीय ग्रन्थ सबहक मैथिली अनुवादक आइ धरि रहल अछि..(?)
आइ हम सब ‘चारु वेदक ऋचा आ सूक्ति सबहक’, ऋचावार/सूक्तिवार मैथिली अनुवाद पढ़ि क’ बुझितहुं ; (वस्तुत: सब क्षेत्रीय भाषा मे)अतमा आ नयन जुड़बितहुं, जे हमर पुरुखा लोकनि, ‘केहेन सभ्यता के’, ग्रंथ मे जोगि क’ रखलनि…!

मुदा से स’ख,आइ धरि पूर नहि भेल छल!

तें,आइ,एकटा ‘सीमित आ संक्षिप्त संस्करण’ स’, ‘वेद’क ‘सार-संक्षेप’क ‘अंग्रेजी प्रारुप’क ‘मैथिली अनुवाद’ स’, से सेहेंता श्री प्रवीण नारायण चौधरी,कुर्सों-नदियामी, (विराटनगर)आइ अपन अनुवाद -क्षमता आ मातृभाषा- प्रेम स’ ‘पूर’ क’ रहल छथि,जकर ‘मूल लेखक आ प्रस्तोता’ छथि, कांची कामकोटि पीठक आदिशंकराचार्य- परंपराक एक टा विद्वान प्रतिनिधि,श्री चन्द्रशेखरेंद्र सरस्वती महोदय,जखनकि ‘चारु वेदक चारिटा पोथीक ऋचावार/सूक्तिवार,संस्कृत स’ मैथिली मे प्रत्यक्ष आ सोझका अनुवाद-संस्करणक सपना’, आइयो आंखिए मे नचैत अछि,जे औखन ‘भविष्यक गर्भे मे’ अछि।

‘वेद’,मौलिक रुपें,संस्कृत भाषा मे उपलब्ध’,
प्राचीन भारतीय ‘वैदिक सभ्यताक आधार-ग्रंथ’ थिक,जकर संख्या चारि(वेदव्यास द्वारा विभाजित: ऋग्वेद,अथर्ववेद, सामवेद आ यजुर्वेद)अछि,आ जे ‘व्यवस्थित मंडल सब मे विभाजित’, ‘काव्य-प्रारुप मे उपलब्ध’, ‘विविध ऋषिगण/आर्षगण द्वारा श्रुत'(श्रुति), ‘ऋचा, सूक्ति,आ प्रार्थनाक'(Hymns to Gods) संकलन/संचयन’ थिक ,’भारतक प्राचीनतम लिखित/संकलित धार्मिक, सामाजिक,आर्थिक, साहित्यिक, ऐतिहासिक, सांस्कृतिक,’ग्रंथक श्रृंखला’ थिक।

अइ ‘संस्कृत गीत-ग्रंथक’ ‘अंग्रेजी भावानुवाद’,
मूल लेखक महोदय द्वारा,’गद्य-प्रारुप मे’, ‘The Vedas’ के नामें कयल गेल अछि,आ तकरा स’,ई मैथिली अनुवाद,अनुवादक प्रस्तुत केलनि अछि।

‘वेद’क मीमांसा करैत,अंग्रेजी मे आरो पोथी सब लिखल गेल अछि,जे सब ‘प्राचीन भारतीय इतिहासक सहयोगी-ग्रंथ’ अछि। मुदा,अपन पर्यटन के क्रम मे,धार्मिक प्रवृत्तिक अइ अनुवादकक हाथ,यैह पोथी लगलनि,आ मैथिली मे त’ अभाव छले! मातृभाषा प्रेमवशात् एकर चयन,अनुवाद लेल क’ लेलनि, अनुवादक।

मैथिली मे,शून्यताक स्थिति देखैत,ई तुरंत आ तत्काल जरुरीयो छल!

‘वेद-सार-आधारित’, ‘ई पोथी’, ‘इतिहास-दृष्टि’ आ आधुनिक ‘वैज्ञानिक दृष्टि’ स’ नहि,अपितु ‘भारतीय सनातन धार्मिक दृष्टिकोण स’, लिखल गेल अछि,से ‘विद्वान लेखकक धर्मपीठ देखैत’, स्वाभाविको मानल जायत।

जे किछु हो, मुदा ‘वेदक सम्पूर्ण आदि-परिचय’ त’, मैथिली संसार के,उपलब्ध भ’ गेल अछि,जे प्रसन्नताक विषय थिक।

मैथिलीक ई अनुवाद-पोथी,’वेद’, मूल पोथी जकां, उचिते अनेक खंड मे बांटल अछि।

सर्वप्रथम वैदिक धर्म पर लिखायल चौदह टा ‘प्रामाणिक प्राचीन ग्रंथ सबहक चर्चा,आ तकर बाद फेर ‘वेदांग’ आ चारि टा ‘उपांग’क परिचय सेहो देल गेल अछि।

‘ध्वनि आ सृजन’ मे ‘कंपन’,वेद-ध्वनिक वैशिष्ट्य, ऋषिगणक मंत्रद्रष्टा/खोजकर्त्ता होयब,फेर वेद पर कयल गेल ‘शोध सबहक विवरण’,वेद-पाठ केर त्रुटिरहित आ उचित उच्चारणक उपस्थापन,वेद के ईश्वर वचनामृत हेबाक मान्यता,वेदक अनादिता,अपौरुषेयता,वेदक अनंतता के ज्ञानक अनंतताक मान्यता,सब तरहक यज्ञक आ तकर अनिवार्यता/औचित्यक परिचय,’आरण्यक’, ‘ब्राह्मण ग्रंथ’ सब आ ‘संहिता’, ब्रह्मसूत्रक सम्यक् परिचय,वेदक अंतिम कथित फल,’उपनिषद’ आ तकर सन्देश केर सारांश, अथवा,’उपनिषद’क निर्मिति ‘वेदान्त दर्शन’, वेदक उद्देश्य आ तात्पर्य,वेदक शाखा सबहक विवरण, वेदांगक शिक्षा,वेदांगक मुंह ‘व्याकरण’
(पाणिनिक अष्टाध्यायी/चौदह महेश्वर सूत्र,वररुचि, पतंजलि,आदि),वेदक पयर ‘छन्द’क प्रकारक विवरण, गायत्री महामंत्र,वेदक कान ‘निरुक्ति’,वेदक आंखि ‘ज्योतिष’, वेदक हाथ ‘कल्प’,वेदक उपांग ‘मीमांसा'(दर्शन), ‘न्याय’,वेदक आवर्धक-लेंस ‘पुराण’, ओकर विवरण आ स्वरुप,वेद-पुराणक लक्ष्य-प्राप्तिक मार्ग ‘धर्मशास्त्र’क विवरणादि, धर्मसूत्र,गृहसूत्र,सबहक व्याख्यामय उपस्थापन, अइ पोथीक विशेषता थिक,जे आब मैथिलीयो मे उपलब्ध भ’ गेल अछि।

सत्त पूछल जाय,त’ ई पोथी,मात्र ‘वेद’ टा केर नहि,’सम्पूर्ण वैदिक सभ्यताक विवरण’, उपस्थापित केलक अछि।
आब जं एकर मैथिली अनुवाद पर कनेक ध्यान देल जाय,त’ ‘अनुवादकक द्वैभाषिकता’ आ ‘मैथिली मे हिन्दी-शब्दावलीक किछु बेसी प्रदूषण’,अखरैत अछि।

‘यानि’, ‘यानी’ ‘यानि कि’, ‘भी’, ‘बल्कि'(अपितु), बेसी ठाम ‘की’ के स्थान पर ‘कि’ लिखब(जेना कोनो प्रश्न-वाक्यक आरंभो मे,अथवा,वाक्यक मध्यो मे ‘कि’), ‘मुदा’ के ‘लेकिन’ लिखब,’जें कि’ के ‘चूंकि’ लिखब, ‘चेन्ह’ (symbol) के ‘चिन्ह’ लिखब, मर्जी (इच्छा), मजबूत (मजगूत),उम्मीद (उम्मेद/उमेद), सीधा (सोझे), ‘श्रीमद् भगवद् गीता’ (श्रीमद्भगवद्गीता),अगर (जं,जौं,यदि),भलाइ(कल्याण),नीला(नीलवरण), हैरानी(आश्चर्य),आखिर(अंतत:), हालांकि(यद्यपि/जदपि),सारा समय (सम्पूर्ण समय), मजेदार (आनंदप्रद), आदि दर्जनक दर्जन शब्दावली अछि,जकर विकल्प मैथिली मे उपलब्ध छै,जकर समावेश अगिला संस्करणक सुधार मे अनुवादक क’ सकैत छथि।

अइ विषयक आ एहेन अनुवाद-पोथी मे,दर्जनो अंग्रेजी आ संस्कृत शब्दक आयब,अवश्यंभावी अछि।ताहि लेल हिनका टोकल नहि जा सकैछ।अइ पोथीक दोसर-तेसर संस्करणक प्रकाशन, अवश्यंभावी अछि।तें,आगरिम संस्करण मे, ‘वाक्य-विन्यास’ के,आर व्यवस्थित क’ सकैत छथि।

अनुवादक श्री प्रवीण ना.चौधरी,मैथिलीक ‘समर्पित कार्यकर्ता/सिपाही/मैथिलीस्टे टा नहि,पहिनहुं स’ तुलसीकृत ‘हनुमान चालीसा’ आदि धार्मिक वस्तुक अनुवादक रहलाह अछि। अनुवाद मे हिनकर अभिरुचि, पूर्व-प्रमाणित अछि।

तहिना,ई ‘अंग्रेजीक विद्वान’ सेहो छथि,तें ‘स्रोत-भाषा अंग्रेजी’ स’, मैथिली अनुवाद क’ सकलाह अछि।आ मैथिली मे एकटा कविता- संग्रह सेहो छनि। त’, ‘भाषा-पक्ष’ पर, थोड़ेक आर परिश्रम अपेक्षित अछि, मुदा,हिनकर ‘अनुवादक भाव-पक्ष’,अर्थात् तकर व्याख्या -विश्लेषण,सुस्पष्ट अछि।

अइ मूल-पोथी मे,मूल लेखक द्वारा वर्णित ‘वेद-वेदांगक काल-निर्णय’, ‘प्राचीन भारतीय वैदिक काल-गणना- पद्धतिक अनुकूलहिं’, ‘अक्षुण्ण’ राखल गेल अछि,आ मैथिली अनुवाद मे सेहो ताही पद्धतिक अनुकूल,तहिना राखल गेल अछि,जे दुनू अनुवाद मे उचिते अछि,यद्यपि प्राचीन इतिहास,रसायनशास्त्रक आब आर उन्नत भ’ गेल ‘कार्बन-14क काल-गणना-पद्धति’ पर चलैत अछि,जे अपन वैज्ञानिकताक चलतें,बेसी विश्वसनीयता स्थापित करैत अछि।

आदिशंकराचार्यक मठ-परंपराक शिष्य, माधवाचार्यक ‘शंकरदिग्विजय’ नाटक मे ‘परिकल्पित'(आन कोनो धार्मिक साहित्य-स्रोत स’ अ-संपुष्ट)आदिशंकर-मंडन मिश्रक शास्त्रार्थक मिथक-दंतकथा-प्रसंगक आयब, अवश्यंभावी छल,कारण,मूल लेखक महोदय,ओही परंपराक चारि मे स’ एक शंकराचार्य छथि,आ ‘संन्यासधर्मी अद्वैत वेदांत’क चर्चा त’ भेनाइए छल।

मुदा,मंडन-वाचस्पतिक ‘गृहस्थधर्मी अद्वैत वेदान्तक’ चर्चा स’,मूल लेखक महोदय सायास आ बुधियारी स’ परहेज केने छथि,कारण,हुनका लोकनि के,अपन ‘मठ-मर्यादा मे’, ‘मंडन मिश्र के’ ‘शिष्य आ सुरेश्वराचार्य’ सिद्ध करब,बाध्यता रहैत छनि,जे ‘शास्त्रार्थक अनुश्रुति’, आब पूर्णत: खंडित आ खारिज भ’ चुकल अछि।

मुदा,मूल पोथीक कोनो अंश के,अनुवाद मे ‘छोड़ल आ बदलल’ नहि जा सकैछ,यद्यपि पृष्ठक निच्चांक टिप्पणी मे तकरा अद्यतन करैत,तकर सन्दर्भ/प्रसंग के चिह्नित करैत,तकर प्रावधान कयल जा सकैछ।

से अगिला संस्करण मे अपेक्षित रहत,कारण,प्रश्न अपन मिथिलाक,अपन मंडन मिश्रक,आ हुनकर ‘मीमांसायुक्त अद्वैत-वेदांतक’ छनि,जे वाचस्पतिक ‘भामती’-भाष्यक संग, ‘आदिशंकरक दार्शनिक दिग्विजय अभियान’ के,मिथिला मे रोकि सकल रहथि!

‘अनुवाद-कर्म’, बहुत ‘साधंसपूर्ण,भाषिक सक्षमतापू्र्ण, दूरदर्शितापूर्ण,दायित्वपूर्ण आ स्थायी मूल्यक साहित्यिक काज’ थिक। कोनो सक्षम अनुवादक,आ तें,ई अनुवादक श्री प्रवीण ना. चौधरी सेहो,मूल चारू ‘वेद’क, संस्कृत स’ सोझे मैथिली मे अनुवाद क’ क’,’मातृभाषाक अनुवाद- संसार’ मे,मातृभूमि मे,’साहित्यिक अमरत्व’ प्राप्त क’ सकैत छथि!
कारण,’कीर्त्ति: यस्य,स: जीविति…!’
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समीक्षित पोथी: ‘वेद’.
मूल लेखक- कांची कामकोटिपीठ
शंकराचार्य श्री चंद्रशेखरेंद्र सरस्वती.
अनुवादक: श्री प्रवीण ना.चौधरी.
प्रकाशक:- शशि प्रकाशन,सुपौल.
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