१ मई २०२६ । मैथिली जिन्दाबाद!!
आइ फेसबुक टाइमलाइन पर किछु जरूरी चीज सर्च कय रहल छलहुँ । ताहि मे किछु महत्वपूर्ण रचना सब भेटल । किछु हमर, किछु हुनकर – हुनकर अर्थात् जिनक रचना हमरा हृदय केँ स्पर्श कयलक आ अपन टाइमलाइन – विभिन्न फेसबुक ग्रुप सब मे साझा कएने छी विभिन्न समय – स्थिति – परिस्थिति मे । अपने पाठक लेल प्रस्तुत अछिः
१.
जगमग ई सृष्टि तखने दिवाली छी
प्रेम चेतना जागि पडय तखने दिवाली छी
तेल आ पुरातन के हुक्का लोली बनाऊ
पलपल नव दीप जरय तखनय दिवाली छी
नेहकेर धार बहत मनक जग ज्योतिर्मय
हर्खक फूलझडी झडय तखनै दिवाली छी…
अन्न-धन लक्ष्मी आबय दरिद्रा बहार हो
रंगोली रंग भरय तखनै दिवाली छी….
राम शक्ति आगूमे रावण न जीत सकत
रावण जखने जडय तखनै दिवाली छी….
प्रेम चेतना जागि पडय तखनै दिवाली छी
जगमग ई सृष्टि करय तखनै दिवाली छी
हरि: हर:!!
(हेलो मिथिला रेडियो कार्यक्रम मे सुनने रही २०१३ मे, रचनाकार डा. राजेन्द्र विमल छथि जेना स्मृति मे अबैत अछि)
२.
गप मारय लेल छूट अछि, मारू जतेक मारब गप
एहि में कि कोनो खर्च लगैत छैक, भिड़ल रहू मिलि सब!
अपनहि मोंने मियां मुँह मिट्ठू, भले नहि पूछय आन
बनी जनक के नाम सँ हम सभ, मिथिला बनय मशान!
एक भोज में भिनसर सऽ घरबैया भनसिया सब बेहाल
दिन भैरमें टीका-टिप्पणी, साँझक यश सऽ भोज नेहाल!
कर्ता मुख्य सभ दिन रहलै, मिथिला रहलै विदेहराजा
जखनहि नीति ध्वस्त भेलै, बाजि जे गेलै दरिद्री बाजा!
कलजुग छियौ भाइ! देखबें आरो बहुते तरहक खेल
दहेज बलें जखनहि जोड़बें, जीवनसंगिनी सँ मेल!
दुनिया कोनो रुकल थोड़ेक छै, समय तऽ चलिते जाइत छै!
निज कर्तब्यक बोध जतय छै, जीवन सुधरल जाइत छै!
हरिः हरः!!
(२०१२ मे गप्पी सब केँ गप्प छँटैत आ काजक बेर मे घर मे नुकाइत देखि किछु बात बुझेबाक क्रम मे स्वरचित रचना)
३.
जय बिहार
बाँचल नहि जतय निजताक सार – विकृति केर सौंसे प्रसार
तैयो बाजू सब जय बिहार!!
अपन राज्य मे बेरोजगार – परदेशहि मात्र जीवनक सचार
जय बिहार – जय बिहार!!
जाति-पाति टूटल समाज, ताहिपर स्वाभिमानक विचार
जय बिहार – जय बिहार!!
चौपट शिक्षा आ लोक आचार – अपनहि भाषा संग बलात्कार
जय बिहार – जय बिहार!!
यूपीएससी मे सफल दियाद – छोड़ि बिहार बाहरहि बहार
जय बिहार – जय बिहार!!
लिट्टी-चोखा सतुआ अँचार – डाही ढाही सब व्यभिचार
जय बिहार – जय बिहार!!
खाएत गारि-मारि बिहारी कहाएत – भटकी देश विदेश पीटैत कपार
जय बिहार – जय बिहार!!
लालू केर माई समीकरण, नीतीशक दलित-महादलित अपार
जय बिहार – जय बिहार!!
कतेक कहू यौ बिहारी भजार – किदैन फाटय मुदा गाबी मलार
जय बिहार – जय बिहार!!
जँ राखि सकी मौलिक श्रृंगार – पाबि सकी शुद्ध सुसंस्कार
तखनहि प्रवीण कह ‘जय बिहार’!!
हरिः हरः!!
(बिहारक असलियत केँ झाँपि अन्हेरक महिमामंडन पर प्रवीणक विचार – २०१७ नवम्बर केर रचना)
४.
अब जाग चुके हम
सुनो! सुनो! हम जाग गये हैं!
अपना हक भी जान गये हैं!
पहले भी था स्वराज्य हमारा
मिथिला देश स्वतंत्र हमारा
जब से पडी है काली छाया
औरोंको यह कभी न भाया!
अपने भी अब दूर हैं इससे
खुद ही मरते हँसते मनसे
यही हमारी बदकिस्मती है
वैर द्वेष फिर भी मस्ती है!
लिपि-भाषा-संस्कृति मरे तो
देश छोड परदेश पले तो
अपनी भूमि ऊसर ही पडी है
मजदूरी है पर भूखमरी है!
नित नामके खरात वो देते
गुलामों सी हाल बनी है
उपनिवेशी हम बने हुए हैं
दलालोंकी होली मची है!
कभी हमें वो जाति दिखाते
हमपर हुए जुर्मोंको गिनाते
मत से हमारे जीत वो जाते
दीवाली फिर खुद ही मनाते!
क्या बदला हम देख चुके हैं
क्या सुधरा हम देख चुके हैं
अब तो भैया जाग चुके हैं
अपने को भी जान चुके हैं!
लायेंगे स्वराज्य खुदी का
प्रजातंत्र गणतंत्र सभी का
जिसने लूटा वो शत्रु हमारे
जन-गण-मनसे दूर भगारे!
जो शिक्षा तकदीर बनाये
उसको भी बाजार बनाये
ना सुविधा ना हित हमारे
पूँजीवादका झगडा सारे!
लायेंगे स्वराज्य हमारा
मिथिला ही हमें गँवारा
अपना शासन अपना राशन
न कोई झूठा लंबा भाषण!
चलो-चलो! अब लायें अपना
गाँव-गाँव फले स्वर्गसा सपना
बेकारी-मुक्त रोजीका फँसाना
घर-घर चरखा कृषि सजाना!
सुनो! सुनो! हम जाग चुके हैं!
अपना हक भी जान चुके हैं!!
हरि: हर:!!
(२०१३ केर स्वरचित रचना – मिथिला राज्य अभियान मे सक्रिय कार्यकर्ताक भावना)
५.
हमरा ओ माय कम
कसाय बेसी नजरि अबैत अछि
जे अपने बच्चा सँ मातृभाषा छोड़ि
दोसर कोनो भाषा में पोसैत बढ़बैत अछि।
ओ पिता कम चण्डाल बेसी अछि
जे सन्तान केँ ओकर मौलिक संस्कार
मूल गाम ओ परिवार
संग मूल मातृभाषा सँ
सखे-मदे चूर भ वंचित रखैत अछि।
ओ बाबा-बाबी महाफद्दू देखाय दैत अछि
जे पौत्र-पौत्री संग
मखैर मखैर गैर मातृभाषा में बाजि
ओकरा सबकेँ अपन निजताक भान त दूर
आनो आनो केँ अपनहि जेकाँ
फुद्दुगिरी करय लेल फुसलबैत भेटैत अछि।
ई माय, बाबू, बाबा-बाबी कथमपि नहि
शत्रु थिक ओहि सन्तान केर,
जे स्वयं अपन बेवकूफ किरदानी सँ
जन्म लेल तापसी सिद्ध मैथिल केँ
मिथिला सँ सदा-सदा लेल दूर करैत अछि।
भाषा सीखब कोनो बेजा बात नहि,
मुदा निज मातृभाषाक परित्याग?
नहि-नहि!!
ओ अभिभावक पक्का राक्षस कुलक लोक थिक
जे देवकुली सन्तान केँ अबोधे अवस्था सँ
राक्षसी प्रवृत्ति दिस उन्मुख करैत
कठोर तपस्या सँ प्राप्त मिथिला में जन्म
तेकर लाभ सँ
बलजोरी वंचित राखि
ओकरा प्रवासक मरुभूमि में
मृग मरीचिका समान अत्यंत क्रूर निर्दयी प्यास सँ
छटपटाकय मरय लेल मजबूर करैत अछि।
जँ निज मातृभाषाक कियो करैत अछि अपमान
आ कि नकारैत अछि एकर महत्ता केँ
त
अपने त निखत्तर नरक मे खैस्ते अछि
खसा दैछ तीन पीढ़ी ऊपर
आ नष्ट कय लैछ ऐगला कुलदीप केँ!
हो अगल बगल कियो एहेन प्रवृत्ति के
सम्हारु ओकरा अहाँ
ई कर्तब्य बुझिकय
बाद में पछताय स नीक
अगते चिंतन करी
मिथिला ताहि सँ रहल
सदा सनातन चिंतकहि केर!
जय मैथिली, जय मिथिला!!
हरिः हरः!!
(हम मैथिल स्वयं अपन सन्तान सभक संग अन्य भाषा प्रयोग कयला सँ अपन मानवर्द्धन बुझैत छी, तेकरा उपर प्रवीण प्रहार – अक्टूबर २०१७)
६.
‘सरस’ गजल
– सियाराम झा ‘सरस’
– समस्त मैथिल द्वारा मनन करबाक लेल प्रस्तुत
शोणित मे कलम बोरि अपन नाँ कढा लिहें…. हमरा चढौने होउ तऽ बलियो चढा दिहें….
शोणित मे कलम बोरि अपन नाँ कढा लिहें…..
पोखैर खुना के राखि देने जा रहल छियौ…. सट्ठा जँ होउ तऽ घाट सब पक्के मढा लिहें…
शोणित मे कलम बोरि अपन नाँ कढा लिहें…..
धकियौने छौक आइ जतेक काटि-छाँटि कय…. तोँ मर्द छेँ तऽ कम सऽ कम ओतबो बढा लिहें….
शोणित मे कलम बोरि अपन नाँ कढा लिहें……
चलबाक छौक दूर धरि नेनहर बगूर पर…. आ हाथ लेल लोह केर सिक्कर गढा लिहें…
शोणित मे कलम बोरि अपन नाँ कढा लिहें…..
मैथिल समुद्र मे उठय जहिया कोनो ज्वाइर…. शप्पथ जे अगिले माँगि ले हमरे अढा लिहें….
शोणित मे कलम बोरि अपन नाँ कढा लिहें….
लहकैत कलम केर एगो दहकैत सन गजल…. अपना सँ नहि हेतौक तँ ‘सरस’ सँ पढा लिहें….
शोणित मे कलम बोरि अपन नाँ कढा लिहें….
हरि: हर:!!
(ई गजल धीरेन्द्र प्रेमर्षि ओ सुनील मल्लिक जेहेन दुइ महान अग्रज लोकनिक मुखारविन्द सँ विराटनगर विद्यापति स्मृति पर्व समारोह २०६७ मे सुनने रही – अविस्मरणीय आ अद्भुत छाप छोड़लक । धन्यवाद गजलकार सियाराम झा सरस सर)
७.
संख्याक खेलावेला
प्रजातन्त्र में मतसंख्याक महत्व
जनप्रतिनिधि चुनबाक महत्व
सत्ता प्राप्ति लेल हिंसक होड़बाजी
किंवा राज सिंहासन लेल घोर युद्ध
एहि सब सँ बहुत नीक निर्वाचन पद्धति
तखनहु गोटेक प्रश्न मुंह बाबि ठाढ़
पुछैत अछि मानवीय विवेक सँ,
कि जातिक नामपर धर्मक नामपर
संख्याक गोलबन्दी सँ चुनल प्रतिनिधि
बनि सकत कहियो सर्वमान्य,
कय सकत कहियो आम जनकल्याण,
अपन माथ पर सँ हँटा सकत ओ
ओहि खास जाति वा धर्मक ठप्पा ठेक्का?
तखन त पूर्वाग्रही विचारधारा रहत सत्तासीन
जन-जन में पूर्वाग्रह होएत रहत विकसित,
प्रतिशोधक धधकैत रहत ज्वाला
जोड़ घटाव चलत हर पाँच वर्ष में,
मौका लागि गेल त अविश्वास प्रस्ताव केर उठापटक
बदलैत रहत सदन केँ रणभूमि में,
एना में विकासक त बातहि छोड़ू,
ई स्वनिर्मित संख्याक खेलावेला
चाटैत रहत मानव संस्कार आ सभ्यता केँ।
हरिः हरः!!
(२०१६ मे लोकतांत्रिक चुनाव मे तिकड़मबाजीक बिहार नमूना पर प्रवीण अनुभूति)
८.
कर्मे कल्याण
अर्जुन पूछैथ श्रीकृष्ण सँ ज्ञान बड कि कर्म
दुविधा मे छी पडल प्रभुजी मेटाउ हमर भ्रम!
प्रभुजी हँसिते बुझबैथ सबकेँ बाट दुइटा देलौं
ज्ञानमार्ग मनोयोगीकेँ कर्मयोगी लऽ कर्म बनेलौं!
अकर्मक न मार्ग उचित न मोक्ष एहि सँ भेटत
अकर्मक नहि रहि सकत प्रकृति कार्यरत सतत!
कर्मेन्द्रिकेँ बान्हि राखि मुदा मोन चहुँदिशि फिरत
इन्द्री-विषयमे भटकल ई मूढ मिथ्याचारी कहायत!
वशमे राखि बरु इन्द्री विचारसँ अनासक्त जे प्राणी
कर्मेन्द्री केँ सतत लगायत कार्य-दिशा नित जानी!
नियत कर्म करु हे अर्जुन कर्मे अकर्मकेँ जीतत
बिना कर्म नहि रहत शरीरो स्वाँस-प्रसाँसो रुकत!
हर कर्म करू जेना यज्ञ करी बिनु बँधन ईशकेँ सौंपल
ब्रह्मा रचिते कहलैन बढमे बस कर्म-यज्ञ टा ठानल!
तोरा सँ देव, देव सँ तूँ, यैह भर परस्पर पोषण
जैह चाहत वैह पूर करथि यज्ञभोग पोसित भगवन!
यज्ञक शेषान्न पापहारिणी मुदा स्वयंभोगी पापाहारी
सदिखन करु कर्म यज्ञवत् निज भोज प्रसाद निर्विकारी!’
(श्रीमद्भाग्वद्गीता – अध्याय तीन पर आधारित)
हरि: हर:!!
(२०१४ मे स्वाध्यायक सुखद देन थिक ई रचना)
९.
मैथिली मे बाजू!
अपन काज करू,
मित्रक चिन्ता छोड़ू!
ओ बाजथि हिन्दी
बा कि अंग्रेजी,
अहाँ प्रवीण सदिखन
मातृभाषा मे बाजू!
संस्कार आ सद्गति
सदैव आत्माक
परिष्करण सँ संभव छैक,
आत्मा सँ बात करब तखनहि
तत्त्व आ मर्म सेहो बुझबैक,
तैँ, आत्माक भाषा, मोनक भाषा,
मातृभाषा केँ सदिखन धारू!
धर्मो रक्षति रक्षित:,
मैथिली केँ बचाबू!
हरि: हर:!!
(स्वयंसंकल्प – २०१५)
१०.
भाग्य सराहू अपन-अपन!!
हे मिथिलाक सब सपुत
भाग्य सराहू अपन-अपन,
जाहि धरती सिया अयली
ताहि धरा धन्य अहाँक जीवन!
हिमालय सँ गंगा धरि
कोसी सँ गंडक धरि
विस्तृत प्रकृति अरण्य खंड,
माटि पानि आगि वय आकाश
सुन्दर स्वच्छ अछि पावन!
हे मिथिलाक सब सपुत
भाग्य सराहू अपन-अपन!
कोसी बलान कमला बागमती
गंडकी सुरसरि कत रास नदी,
निकसि हिमालय गंगा बाढथि
धोथि पखारथि मिथिक भूमि,
एहि अनुपम भूखंड बीच
आयल छी हम सब मानव तन,
हे मिथिलाक सब सपुत
भाग्य सराहू अपन-अपन!
चर-चाँचर पोखैर इनार
सब तैर गंगाकेर रूप निहार,
माछ मखान आ पान समान
शुभकारी प्रतीकक जहान,
वेदानुरूप सब दृश्य प्रत्यक्ष
ओहि लोक केँ कर जोड़ि नमन!
हे मिथिलाक सब सपुत
भाग्य सराहू अपन-अपन!
खेत पथार खरिहान दलान
पर्णकुटीर समूहक मचान,
बकरी छगरी गाय महिंस
हर बरद मालक बथान,
देह विदेह सीमित साधन
निज कर्मफल भोगबाक मन!
हे मिथिलाक सब सपुत
भाग्य सराहू अपन-अपन!
बाबू माय बाबा बाबी
काका काकी मामा मामी,
पीसा पीसी मौसा मौसी
भाइ-बहिन नाना नानी,
सामूहिकता श्रृंगार जतय
गाँथल फूलक माला सन!
हे मिथिलाक सब सपुत
भाग्य सराहू अपन-अपन!
बुद्धि-विवेक भक्ति ओ ज्ञान
पुरखा सिखाओल धर्म सुजान,
ऋषि-मुनिक देखाओल बाट
ताहि पर मैथिल जीवनक ठाठ,
अन्नपूर्णा देवीक ई नैहरा
उपजय एतय देवलोकक अन्न!
हे मिथिलाक सब सपुत
भाग्य सराहू अपन-अपन!
बाट बिसरि जेना भटकल राही
जाति-धर्म विचार बघारी,
समता समरस जनकक राज
साली-मनखप सब समाज,
घर फूटय त लूटय गँवार
देखि ‘प्रवीण’क टूटल मन!
हे मिथिलाक सब सपुत
भाग्य सराहू अपन-अपन!
समस्त मिथिलावासी केँ फेर याद कराबी जे अहाँक जन्म एहि विशिष्ट भूखण्ड मे होयब बड पैघ सौभाग्य थीक, एकरा जाति-धर्मक नाम पर कम आ परमात्मा सँ बेसी जोड़िकय देखी-बुझी। नव वर्ष २०१७ मे संकल्प ली जे जनक-जानकीक अंश हम-अहाँ अपन मिथलाक नवनिर्माण मे निज जीवन-धनक उपयोग केँ बुझैत कर्तव्यनिष्ठ बनब। विशेष, अहाँ सभ केँ उपरोक्त पदावलीक संग शुभकामना अछि। ईश्वर सभक कल्याण करैथ। ॐ तत्सत्!!
हरिः हरः!!
११.
माँ केँ करी प्रणाम
हे सभक जगज्जननी माँ
चरणन मे प्रणाम!!
दुःख-दारिद्रक हारिणी माँ
शत-शत अहींके प्रणाम!!
चरणन मे प्रणाम मैया –
शत-शत अहींके प्रणाम!!
हे सभक जगज्जननी माँ
चरणन….
असुररूपी मोरा दुर्गुण माँ
करियौ सदिखन नाश,
असत् अविवेक आसक्ति माँ
होय सतत सर्वनाश,
नवरात्रि नवदुर्गा माँ
शक्तिदात्री प्रणाम!!
दुःख-दारिद्रक हारिणी माँ
शत-शत अहींके प्रणाम!!
हे सभक जगज्जननी माँ….
सह-सह दुर्जन शत्रु सँ माँ
रक्षा करू निधान,
बाधा संकट शंका माँ
अज्ञानक करू निदान,
ज्ञानरूपी प्रकाशिनी माँ
भक्तक राखू मान!!
दुःख-दारिद्रयक हारिणी माँ
शत-शत अहींके प्रणाम!!
हे सभक जगज्जननी माँ….
शरण अहींक सदिखन चाही
चरण मे चारू धाम,
माय-पिता-गुरुजन सभ केर
राखि सकी हम मान,
आशीष दियऽ हे जग जननी
पुत्र करै य ध्यान!!
दुःख-दारिद्र्यक हारिणी माँ
शत-शत अहींके प्रणाम!!
हे सभक जगज्जननी माँ…..
शारदीय नवरात्राक मंगलमय शुभकामना!!
हरिः हरः!!
(२०१६ केर दुर्गा पूजा लेल विशेष रचित भजन – रेकर्डिंग सेहो करायल गेल अछि – तेजू मैथिल एवं विद्या मिश्रा केर आवाज संगम स्टूडियो झंझारपुर सँ – प्राण हमर मिथिला एल्बम मे)
१२.
मैथिली फैशन करती!
देखि दुनियाकेर रंग-बिरंगी
टिकली विचरैत एहि संसार,
इच्छा छन्हि मैथिलीकेँ
फैशन हमहुँ करितहुँ यार!!
टाइट जीन्स पहिरतहुँ हमहुँ
फल्लर टीशर्ट ढीले-ढाल,
मैथिली नञि हिंङ्गलिश बजितहुँ
सिनेहिया संग डोलितहुँ गोलमाल!!
कहाँ सौम्यताक पूछ कतहु छैय
चौखैट भीतर नजैर बन्दी?
आब तऽ मन्दिर तेना बनय छैय
भितरक दर्शन सीधासीधी!!
आब कहाँ जे पति परमेश्वर
या पत्नी बस गृहलक्ष्मी?
सापिंग मौल आ कालसेन्टरसऽ
मैथिली कमालक कीमत जी!!
जीवनक नियम परिवर्तन होइ छैय
गीता सेहो कहलक ई!
जँ मैथिली चमचिकनी बनती
हिनका कोना कियो रोकतैन जी!!
हरि: हर:!!
(२०१३ केर स्वरचित रचना – आधुनिकताक वरण मे मस्त मिथिलानी सब पर एक तरहक तंज)
१३.
चुपचाप अपन दिशा मे चलू
अगल-बगल बड शोर छैक
गन्तव्य धरि पहुँचल बिना
किछु नहि बाजू हे बटोही
बस थीर मन सँ चलैत रहू
पहिने बड देरी भऽ गेल अछि
आरो बेसी ध्यान नहि भगाउ
बस चलैत रहू – बस चलैत रहू!!
(२०१६ केर एक स्वयंसंकल्प)
हरिः हरः!!
१४.
भजन
जाबत धरि छौ जीवन तूँ जी ले – जी ले
राम नाम छी अमृत से पी ले – पी ले
बिता लेलें तूँ बचपन बस खेल-खेल मे
यौवन सेहो बितेलें ओहो मेल-ठेल मे
छोड़ बेकारक बात मुंह सी ले – सी ले
राम नाम छी अमृत से पी ले – पी ले
जाबत धरि छौ जीवन तूँ जी ले – जी ले….
नाम महत्व जे बुझलक ओ जपैत रहइ य’
प्रभु प्रसाद सन अमृत ओ पिबैत रहइ य’
ले चरणामृत हाथ आ पी ले – पी ले
राम नाम छी अमृत से पी ले – पी ले
जाबत धरि छौ जीवन तूँ जी ले – जी ले
हरिः हरः!!
(२०२४ मे एकटा भक्ति-रचना श्री सीताराम भगवान केँ समर्पित)
१५.
कविता
(शीर्षक लेल अपनेक सुझाव आमंत्रित)
समय छलैक,
आँखि सँ प्रेम,
छलकैत छल,
भावना मे स्नेह,
भेटैत छल,
चोरा-नुका प्रेमी,
कोहुना कहियो,
नितान्त निर्जनथल,
मिलन करैय छल!
बदैल गेल कनिके,
संगीत, नाच, नायिका,
बरखा मे भिजल,
वस्त्र पहिरन सँ,
कामुक मादक,
यौवनकेर समर्पण,
प्रेमालापक प्रदर्शन,
अन्यक प्रवेश,
खलनायक सन!
आब वस्त्रक बनौट,
आकार ओ प्रकार,
पहिरनाइये प्रदर्शन,
अपनो भान यैह,
देखा रहल अछि,
यौवन आ यौवनांग,
नाचि रहल मन,
नाचत प्रियतम!
हम ओ प्रियतम,
प्रतिद्वंद्वी संग-संग,
पूछत के बस एककेँ,
ताकत रंग-बिरंग,
कि मानवक प्रेम,
विवेकहीन पशुवत्,
कोहुना जीवन,
काटब यौवन?
हरि: हर:!!
(१४ अगस्त २०१४ केर ई रचना – एहिना-ओहिना)
१६.
चिन्तन-मनन-साधना
तखन स्थिति विचित्र बुझना जाइत छैक
जखन परिस्थितिक माइर सँ घर तबाह,
गामक पोर-पोर मे दरिद्रता पैसल मुदा
बाहर मे इज्जत आ प्रतिष्ठाक संग नाम,
दोसरेक भाषा मे बेसुराह गीत गेबाक बात,
बिन लुइरे नाच आ खूनक रंग मिलान छैक!
कि चाहैत छी? धन-संग्रह? मान-संग्रह?
या फेर मनमानी क्रिया ओ कर्मक संसार?
ईशक सत्ता मानितो अपन परिभाषाक जोर
किऐक हम परेशान छी, किऐक हम हैरान छी?
मूक आ बधिर रहब ताहि सँ काज नहि बनत,
बेसी बजलो सऽ, हाथ-पैर पटकलो सऽ कि हैत?
न्याय लेल नीति चाही आ नीति अनुशासन सँ
जीवनक आचार ओ विचार मे शुद्धता आओत
चिन्तन-मनन-साधना सही दिशा मे बढत
निज विचार आ व्यवहार औचित्यपूर्ण होयत
अनुकुल समय अनुसार कर्म करबाक तत्परता
एना जीवन जियबाक कला स्वत: बनैत जायत
मिथिला अहिना कय आगू बढैत जायत!!
हरिः हरः!!
(१० अक्टूबर २०१४ – प्रवीणक मनोभाव)
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