मैथिली विमर्श ओ विमर्शकारक स्तर पर आधारित एक जरूरी चर्चा
– प्रवीण नारायण चौधरी
“विभिन्न सेमिनार सभमे तथाकथित ‘मैथिली’ विद्वान् वक्ता सभकेँ सुनि एहि निष्कर्ष पर पहुँचलहुँ अछि जे वक्ताक रुपमे हुनके आमंत्रित कएल जएबाक चाही जे मासमे कम सँ कम पाँच गोट पोथी पढ़ैत होथि ।”
– मैथिली साहित्यकार ‘सत्येन्द्र कुमार झा’
एहि विन्दु पर गहींर विमर्श हेबाक चाही । मैथिली लेल विद्वान् वक्ता किनका सब केँ मानल जेबाक चाही ? उपरोक्त कथन मे एकटा मानक ठाढ़ कयल गेल अछि जे मास मे कम सँ कम पाँच गोट पोथी पढ़ब आवश्यक होइन्ह । स्कूल-कालेज सँ प्राप्त प्रमाणपत्र आ लब्धांकक आधिक्यता त भरोसा लायक रहिये नहि गेल अछि, तखन कियो विद्वान् छथि से हुनक प्रस्तुति सँ अवश्य झलकि गेल करैत अछि । लेकिन एहि कथन मे जे आधार ‘विभिन्न सेमिनार’ सब मे वक्ताक चयनक सन्दर्भ राखल गेल अछि, विमर्शक जे-जे विषय सब चयन कयल जाइछ तथा ओहि विषय लेल जाहि कोनो वक्ताक चयन कयल जाइछ; ई सब विन्दु पर, विमर्शक प्रस्तुति व लिखित दस्तावेज आदिक मुताबिक विचार-विमर्श कयल जेबाक चाही ।
एहि कथन पर वरिष्ठ साहित्यकार दिलीप कुमार झाक कहब छन्हि – “हँसी लगएयै । उनटा बात करैत छी अहाँ । दिल्ली मे एकटा लिटरेचर फेस्टिवल भेल रहै । डा. शिवशंकर श्रीनिवासक कथा पर चर्चा रहै । तीन पैनलिस्ट मे सँ दू कहलखिन जे हम शिवशंकर श्रीनिवासक एकोटा कथा नहि पढ़ने छी । प्रायः एहेन लोकक चयन कायल जाइत छै । ओ उमेरगर होइथ आ कोनो प्रतिष्ठित पद पर काबिज होइथ ।”
लेखक रमेश केर टिप्पणी छन्हि, “तखन पैरवी आ जोगाड़-प्रबंधन, कत’ जायत ? मिथिलावासी/प्रवासीक कार्यक्रम मे पैरवी नहि हेतै, से ‘निर्मम आ इमानदार शैली/संस्कार’, एखन धरि, मैथिलीक कोनो संस्था के नहि बनि सकलै अछि । ई एखन हमरा लोकनिक एकटा आदर्श आ सपना थिक । यथार्थ भयावह अछि । आयोजक मे, ओ अनुशासन कहाँ …. ! अपने मोने सेहो बहुत लोक (सुन्ता उपासबला, अपन किराया स’), बिना आमंत्रण के, पहुँचि जाइत छथि । तिनको समावेश, संयोजक-प्रायोजक के, करहि पड़ैत छनि । एत’ बिना पोथी पढ़ने, एक घंटा बजनिहार वक्तागण छथि । चिंता किए करैत छी, बन्धुवर ? एखन जे-जेना-जेहेन होइत छै, तेहने होइत रहत । तखन, वसुंधरा, वीरविहीन त’ नहिंएं छै !”
इशनाथ झा लिखैत छथि – “मैथिली मे ‘विद्वान् वक्ता’ वैसे होइत छथि जे पढ़नाइ नामक क्रिया सँ कोसो दूर रहैत छथि ।”
आशीष चमन कहैत छथि – “हमरा विचारसं यदि हमसभ, नित्तः एकघंटा कोनो मैथिली पोथी पढ़ी अथवा सभ मास एकटा पोथी पढि ली त’ सेहो बढिये रहतैक ।”
लक्ष्मण झा ‘सागर’ सहित आरो कतेको टिप्पणीकर्त्ता सब सत्येन्द्र कुमार झाक एहि कथन पर हुनकहि मनोनुकूल मैथिल स्वभावानुसारक टिप्पणी सब देने छथि । एक गोटे युग-लिट नाम्ना आइडी सँ लगभग सब संगोष्ठी, विषय-सन्दर्भ व वक्ताक चयन आदि एहने हेबाक भावना रखने छथि ।
मैथिली जिन्दाबाद पर एहि महत्वपूर्ण चर्चा केँ लय जा रहल छी जाहि सँ मैथिली सँ आबद्ध विभिन्न आयोजक, संयोजक, विमर्शकार एवं विवेचक-विश्लेषक केँ सरोकार बुझय मे अओतनि । आगामी समय आर बेसी सचेत भ’ कोनो विषयक विज्ञ वक्ताक चयन लेल सोचताह, विमर्शक स्तर मानक अनुरूप होयत । विद्वान् विद्वता सँ भरल रहता । तैयारी कय केँ प्रस्तुति देताह । अन्ठेकानी पंचे डेढ़ सय वला हिसाब नहि बैसेता ।

अन्तिम मे, सत्येन्द्र कुमार झा द्वारा लिखल पुस्तक ‘निष्पत्ति’ केर अनुक्रमणिका व कवर पृष्ठ साझा कय रहल छी । कविश्वर चन्दा झा सँ लैत आर कतेको रास विलक्षण मैथिली साहित्यकार सभक लेखनीक विशेषता पर आधारित ई पुस्तक आयल अछि । संछेप मे, एहि पोथी केँ पढ़लो सँ कतेक लोक केँ मैथिली भाषा-साहित्यक अनेकों पुरोधा योगदानकर्ता सभक परिचय भेटि जायत । अपन स्वत्व प्रति जिम्मेदारी सँ गौरवबोध करबाक अवसर भेटत ।
हरिः हरः!!
