
विद्यापति गीत
(विरह)
माधब, कत परबोधब राधा
हा हरि हा हरि कहतहि बेरि बेरि
अब जिउ करब समाधा
माधब, कत परबोधब राधा….
हे माधव, राधा केँ आर कतेक बौंसब ! ओ बेर-बेर “हा हरि ! हा हरि !!” करैत अपन शरीर केँ समाधिस्थ करबाक लेल अग्रसर भेलि छथि ।
धरनि धरिये धनि जतनहि बइसइ
पुनहि उठए नहि पारा
सहजहि बिरहिन जग महँ तापिनि
बौरि मदन-सर-धारा
माधब, कत परबोधब राधा ……
ई धनि अपन धरनि (शरीर) धरिकय जेतहिये बैसैत छथि ओतय सँ फेर उठब पार नहि लगैत छन्हि । अहाँक विरह मे ई सहज बिरहिनि बनि एहि जग मे तपस्विनी जेकाँ अपन सारा कामना तेजि देलनि अछि ।
अरुन-नयन-नोर तीतल कलेबर
बिलुलित दीघल केसा
मन्दिर बाहिर करइत संसय
सहचरि गनतहि सेषा
माधब, कत परबोधब राधा…..
हिनक लाल-लाल आँखि सँ एतबे नोर बहि रहल छन्हि जे सारा शरीर नोरे नहा गेल छन्हि आ खुजल केश छिड़िया गेल छन्हि । घर केर बाहर मे संशय (दुविधा) सँ भरल अहाँक सहचरि आब मात्र अपन अन्त (मृत्यु) केर समय गानि रहल छथि ।
आनि नलिनि केओ रमनि सुताओलि
केओ देइ मुख पर नीरे
निसबद पेखि केओ साँस निहारए
केओ देइ मन्द समीरे
माधब, कत परबोधब राधा……
कियो गोटे कमलक फूल आनिकय हुनका ताहि पर सुता देलनि, कियो हुनका मुँह पर पानिक छींटा दय रहल छथि । हुनका निसबद (वाकहीन) देखिकय कियो साँस चलि रहल अछि या नहि से देखय लागल छथि, कियो हुनका धीरे-धीरे बियनि डोलाकय हवा लगा रहल अछि ।
कि कहब खेद भेद जनि अन्तर
घन घन उतपत साँस
भनइ बिद्यापति सेहो कलावति
जीव बँधल आस-पास
माधब, कत परबोधब राधा…..
हुनक मोनक भेद (मोनक रहस्यमयी अबस्था) आ खेद किछु कहबा योग्य नहि अछि, बस बस जोर-जोर सँ उत्तप्त (गर्म) साँस टा चलैत देखाइत अछि । कवि विद्यापति कहैत छथि जे ओहो कलावती मात्र मिलनक आशा मे बाँधल कोहुना जिबि रहल छथि ।
हरिः हरः!!
दुनिया बड़ी चारि-सौ-बीस
रे बौआ, दुनिया बड़ी चारि-सौ-बीस
ठाढ़े-ठाढ़ बेचि देतौक दाम उनतीस कि तीस,
रे बौआ, दुनिया बड़ी चारि-सौ-बीस
रे बौआ, दुनिया बड़ी चारि-सौ-बीस
भरल शिकारी अपने भाँज मे
कतेक लोभाबय लोक माँझ मे
कतहु मछेरा बन्सी पथने
छुटलो गछारल गाँझ गाँझ मे
सब तरि मारखाँ तीस, रे बौआ
दुनिया बड़ी चारि-सौ-बीस !
आब कोन मोजर देव-पितर के
कियो कि पुछत जेठ-जिगर के
शास्त्र-पुराण सब घसल अठन्नी
अपनहिं पतरा प्रमाण सभक जे
पन्थ हजार पैंतीस, रे बौआ
दुनिया बड़ी चारि-सौ-बीस !
कर जे मन होइ छौ तोरा से
केकर सुनमे कहतौ कि के
बुद्धि बघारे निज-निज मति के
बुधियारे टा भेटय अगबे
कतय उतारमे खीस, रे बौआ
दुनिया बड़ी चारि-सौ-बीस !
हरिः हरः!!
