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विद्यापतिक विभिन्न गीत – भावार्थ सहित

77 भ्यूज

विद्यापति गीत
(मिलन)
हरिनि-नयनि धनि रामा
कानुक सरस परस संभाषन
मेटल लाजक धामा
हरिनि-नयनि धनि रामा…..
हरि-कर हरिनि-नयन तन सौँपलि
सखिगन गेलि आन ठाम
अबसर पाइ धनि कर धरि नागर
बिनति करए अनुपाम
हरिनि-नयनि धनि रामा…..
सुखद सेजोपरि नागरि नागर
बइसल नबरति-सावे
प्रति अंग चुम्बन रस अनुमोदन
थर-थर काँपए राधे
हरिनि-नयनि धनि रामा….
मदन-सिंहासन करल अरोहन
मोहन रसिक सुजान
भय-गढ़ तोड़ल अलप समाधल
राखल सकल समान
हरिनि-नयनि धनि रामा….
कह कबि-सेखर गरुअ भूख पर
करु जत थोर अहार
अइसन दुहु तन तलफइ पुन पुन
उपजल अधिक बिकार
हरिनि-नयनि धनि रामा….
हरिः हरः!!

विद्यापति गीत
(विरह)

माधब, कत परबोधब राधा
हा हरि हा हरि कहतहि बेरि बेरि
अब जिउ करब समाधा
माधब, कत परबोधब राधा….

हे माधव, राधा केँ आर कतेक बौंसब ! ओ बेर-बेर “हा हरि ! हा हरि !!” करैत अपन शरीर केँ समाधिस्थ करबाक लेल अग्रसर भेलि छथि ।

धरनि धरिये धनि जतनहि बइसइ
पुनहि उठए नहि पारा
सहजहि बिरहिन जग महँ तापिनि
बौरि मदन-सर-धारा
माधब, कत परबोधब राधा ……

ई धनि अपन धरनि (शरीर) धरिकय जेतहिये बैसैत छथि ओतय सँ फेर उठब पार नहि लगैत छन्हि । अहाँक विरह मे ई सहज बिरहिनि बनि एहि जग मे तपस्विनी जेकाँ अपन सारा कामना तेजि देलनि अछि ।

अरुन-नयन-नोर तीतल कलेबर
बिलुलित दीघल केसा
मन्दिर बाहिर करइत संसय
सहचरि गनतहि सेषा
माधब, कत परबोधब राधा…..

हिनक लाल-लाल आँखि सँ एतबे नोर बहि रहल छन्हि जे सारा शरीर नोरे नहा गेल छन्हि आ खुजल केश छिड़िया गेल छन्हि । घर केर बाहर मे संशय (दुविधा) सँ भरल अहाँक सहचरि आब मात्र अपन अन्त (मृत्यु) केर समय गानि रहल छथि ।

आनि नलिनि केओ रमनि सुताओलि
केओ देइ मुख पर नीरे
निसबद पेखि केओ साँस निहारए
केओ देइ मन्द समीरे
माधब, कत परबोधब राधा……

कियो गोटे कमलक फूल आनिकय हुनका ताहि पर सुता देलनि, कियो हुनका मुँह पर पानिक छींटा दय रहल छथि । हुनका निसबद (वाकहीन) देखिकय कियो साँस चलि रहल अछि या नहि से देखय लागल छथि, कियो हुनका धीरे-धीरे बियनि डोलाकय हवा लगा रहल अछि ।

कि कहब खेद भेद जनि अन्तर
घन घन उतपत साँस
भनइ बिद्यापति सेहो कलावति
जीव बँधल आस-पास
माधब, कत परबोधब राधा…..

हुनक मोनक भेद (मोनक रहस्यमयी अबस्था) आ खेद किछु कहबा योग्य नहि अछि, बस बस जोर-जोर सँ उत्तप्त (गर्म) साँस टा चलैत देखाइत अछि । कवि विद्यापति कहैत छथि जे ओहो कलावती मात्र मिलनक आशा मे बाँधल कोहुना जिबि रहल छथि ।

हरिः हरः!!

विद्यापति गीत
(मिलन)
कत अनुनय अनुगत अनुबोधि
पति गृह सखिन्हि सुताओलि बोधि ॥
बिमुखि सुतलि धनि समुखि न होए
भागल दल बहुलाबय कोए ॥
बालमु बेसनि बिलामिनि छोटि
मेल न मिलए देलहु हिम कोटि ॥
बसन झपाए बदन धर गोए
बादर तर ससि वेकत न होए ॥
भुज-जुग चाँप जीव जौँ साँच
कुच कञ्चन कोरी फल काँच ॥
लग नहि सरए करए कसि कोर
करे कर बारि करहि कर जोर ॥
एत दिन सैसब लाओल साठ
अब भए मदन पढ़ाओब पाठ ॥
गुरुजन परिजन दुअओ नेबार
मोहर मुदल अछि मदन-भंडार ॥
भनइ बिद्यापति इहो रस भान
राए सिबसिंघ लखिमा बिरमान ॥
(भावार्थ बाद मे)
हरिः हरः!!
विद्यापति गीत
(बसंत)
बिहरइ नवलकिसोर
कालिंदी-पुलिन कुंज बन सोभन
नव नव प्रेम-बिभोर ॥
नव वृन्दावन नव नव तरुगन
नव नव विकसित फूल ।
नवल बसंत नवल मलयानिल
मातल नव अलि कूल ॥
बिहरइ नवलकिसोर….
नवल रसाल-मुकुल-मधु मातल
नव कोकिल कुल गाय ।
नवयुवती गन चित उमताअइ
नव रस कानन धाय ॥
बिहरइ नवलकिसोर…..
नव जुवराज नवल बर नागरि
मीलए नव नव भाँति ।
निति निति ऐसन नव नव खेलन
विद्यापति मति माति ॥
बिहरइ नवलकिसोर…..
हरिः हरः!!
विद्यापति गीत
(प्रार्थना आ नचारी)
कनक – भूधर – शिखर वासिनि
चन्द्रिका चय चारु हासिनि
दशन कोटि विकास बंकिम
तुलित चन्द्रकले ।
क्रुद्ध – सुररिपु बलनिपातिनि
महिष-शुम्भ-निशुम्भ-घातिनि
भीत-भक्तभयापनोदन
पाटल प्रबले ।
जय देवि दुर्गे दुरितहारिणि
दुर्ग मारि विमर्द हारिणि
भक्ति नम्र सुरासुराधिप
मंगलायतरे ।
गगन मंडल गर्भगाहिनि
समर – भूमिषु सिंहवाहिनि
परसु – पाश – कृपाण – सायक
शंख-चक्र-धरे ।
अष्ट भैरवि संग शालिनि
सुकर कृत्त कपाल मालिनि
दनुज शोणित पिशित बद्धित
पारणा रभसे ।
संसारबन्ध निदानमोचिनि
चन्द्र भानु कृशानु लोचिनि
योगिनी गण गीत शोभित
नृत्यभूमि रसे ।
जगति पालन जनन मारण
रूप कार्य सहस्र कारण
हरि विरंचि महेश शेखर
चुम्ब्यमान पदे ।
सकल पापकला परिच्युति
सुकबि बिद्यापति कृतस्तुति
तोषिते शिवसिंह भूपति
कामना फलदे ।
कनक भूधर शिखरवासिनि…..
हरिः हरः!!
(नीचाँ लिखल एक गीत प्रवीण-भाव)

दुनिया बड़ी चारि-सौ-बीस

रे बौआ, दुनिया बड़ी चारि-सौ-बीस
ठाढ़े-ठाढ़ बेचि देतौक दाम उनतीस कि तीस,
रे बौआ, दुनिया बड़ी चारि-सौ-बीस
रे बौआ, दुनिया बड़ी चारि-सौ-बीस

भरल शिकारी अपने भाँज मे
कतेक लोभाबय लोक माँझ मे
कतहु मछेरा बन्सी पथने
छुटलो गछारल गाँझ गाँझ मे
सब तरि मारखाँ तीस, रे बौआ
दुनिया बड़ी चारि-सौ-बीस !

आब कोन मोजर देव-पितर के
कियो कि पुछत जेठ-जिगर के
शास्त्र-पुराण सब घसल अठन्नी
अपनहिं पतरा प्रमाण सभक जे
पन्थ हजार पैंतीस, रे बौआ
दुनिया बड़ी चारि-सौ-बीस !

कर जे मन होइ छौ तोरा से
केकर सुनमे कहतौ कि के
बुद्धि बघारे निज-निज मति के
बुधियारे टा भेटय अगबे
कतय उतारमे खीस, रे बौआ
दुनिया बड़ी चारि-सौ-बीस !

हरिः हरः!!

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