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विद्यापति गीतः जाइत देखलि पथ नागरि सजनि गे

242 भ्यूज

विद्यापति गीत
(नखशिख)

जाइत देखलि पथ नागरि सजनि गे
आगरि सुबुधि सेयानि ॥१॥
कनक-लता सनि सुन्दरि सजनि गे
बिहि, निरमाओल आनि ॥२॥

हस्ति-गमन जकाँ चलइत सजनि गे
देखइत राज-कुमारि ॥३॥
जिनकर एहनि सोहागिनि सजनि गे
पाओल पदारथ चारि ॥४॥

नील बसन तन घेरल सजनि गे
सिर लेल चिकुर सँभारि ॥५॥
तापर भमरा पिबए रस सजनि गे
बइसल पाँखि पसारि ॥६॥

केहरि सम कटि-गुन अछि सजनि गे
लोचन अम्बुज धारि ॥७॥
विद्यापति कवि गाओल सजनि गे
गुन पाओल अवधारि ॥८॥

शब्दार्थः

नागरि – नगर-निवासिनी; सुचतुरा ।
आगरि – अग्रगणया ।
सनि – समान ।
निरमाओल आनि – आनिकय बनौलनि ।
चिकुर – केश
तापर – ताहि पर
केहरि – सिंह
अम्बुज – कमल
धारि – धारण करू, बुझू ।
अवधारि – निश्चय

भावार्थः

हे सखी, आइ एहन नागरि (सुचतुरा नगर-निवासिनी सब) केँ बाट मे जाइत देखलहुँ जिनकर अग्रगणया (अगुवाइ करयवाली नायिका) अत्यन्तु सुन्दर बुद्धिक सेयानि (युवती) छलिह । ओ कनक-लता (सोनाक लत्ती) समान सुन्दरि छलिह जिनका मानू विधाता (ब्रह्मा) विशेष रूप सँ बनौने होइथ ।

ओ हथिनी जेकाँ मस्त चाइल मे चलि रहल छलिह, देखिते कोनो राजकुमारी बुझाइत छलिह, ई जिनकर सोहागिनि हेतिह से मानू चारू पदारथ (अर्थ, धर्म, काम आ मोक्ष) केर पाबि गेलथि से बुझू ।

हुनक तन नील वस्त्र सँ लेपटायल छलन्हि आ माथा केशरूपी आँचर सँ सजल-सँवारल छलन्हि, ताहि पर भमरा मानू रस पिबाक लेल अपन पाँखि पसारिकय बैसल छल ।

हुनक डाँर्ह कोनो सिंहक समान पातर छल आ आँखि कमलक फूल धारण कएने छल, विद्यापति कवि गाबिकय कहैत छथि जे ओ नारी निश्चय सब गुण सँ सम्पन्न छलिह ।

हरिः हरः!!

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