विद्यापति गीत(नखशिख)
सुधामुखि के बिहि निरमिल बाला ॥१॥
अपरुब रूप मनोभवमंगल
त्रिभुवन विजयी माला ॥२॥
सुधामुखि…..
सुन्दर बदन चारु अरु लोचन
काजर-रंजित भेला ॥३॥
कनक-कमल माझ काल-भुजंगिनि
स्त्रीयुत खंजन खेला ॥४॥
सुधामुखि….
नाभि-बिवर सयं लोम-लतावलि
भुजगि निसास-पियासा ॥५॥
नासा खगपति-चंचु भरम-मय
कुच-गिरि-संधि निवासा ॥६॥
सुधामुखि….
तिन बान मदन तेजल तिन भुवने
अबधि रहल दओ बाने ॥७॥
विधि बड़ दारुन बधए रसिकजन
सोंपल तोहर नयाने ॥८॥
सुधामुखि….
भनइ विद्यापति सुन बर जौबति
इह रस केओ पए जाने ॥९॥
राजा सिवसिंघ रूपनरायन
लखिमा देइ रमाने ॥१०॥
सुधामुखि….
भावार्थः
हे सुधामुखि ! कोन विधाता अहाँ केँ बनौलनि !
अपूर्व रूप – कामरूपक शुभ स्वरूप जेकाँ ‘मनोभवमंगल’! त्रिभुवन केँ जितय वला मालाक समान अछि ।
सुन्दर आ मनोहर मुखमंडल मे काजर सँ रंजित (रंगायल) लोचन (आँखि) अछि से मानू सोनाक कमल माझ काल-भुजंगिनि (सर्पिणी) समान स्त्रीयुत खंजन खेला – सुन्दर खंडन जेकाँ खेल कय रहल अछि ।
नाभि-बिवर (नाभिकुंड) सँ लोम-लतावलि (पंक्तिबद्ध केशरूपी लता सब) रूपी भुजगि (सर्पिणी) (नायिकाक सुगंधित) साँसक प्यास मे (आगाँ बढ़ल), मुदा नाक केर (नुकीला भाग केँ) खगपति-चंचु (गरुड़क चोंच) बुझबाक भ्रम मे डरा सँ कुच (स्तन) रूपी (दुइ) पर्वतक सन्धिस्थल (मिलन करबाक मध्यभाग) मे आबि बसल अछि ।
मदन (कामदेव) तीन टा बाण तीन भुवन मे छोड़ि देलनि; (कामदेवक पास कुल पाँच गोट बाण हेबाक मान्यता अछि, ताहि मे सँ तीन टा बाण ओ तीन भुवन मे तेजि चुकल छथि ।) आब बचि गेल दुइ गोट बाण । ई विधाता केहेन निष्ठुर छथि जे रसिकजन सब केँ बेधबाक लेल ओ दुइ गोट बचल बाण अहाँक (नायिका राधाक) नयन केँ सौंपि देलनि ।
कवि विद्यापति कहैत छथि, सुनू हे व्रज केर युवती राधाजी !! एहि रस केँ कियो कियो मात्र जनैत छथि । जेना हमर राजा शिवसिंह जे नारायण रूप मे छथि तथा लखिमा देवीक रमण (पति) छथि ओ ई जनैत छथि ।
हरिः हरः!!
